नैमिषारण्य, अट्ठासी हजार ऋषियों की पावन तपस्थली
नैमिषारण्य, नैमिष और नीमसार यह एक ही नाम है उस जगह के जहां कभी आर्यों की सबसे बड़ी मिशनरी रही, उत्तर भारत में ऋषियों यानी धर्म-प्ररचारकों का सबसे बड़ा गढ़। आप को बताऊं यह बिल्कुल वैसे ही जैसे अठारवीं सदी में योरोप और अमेरिका से आई ईसाई मिशनरियों ने भारत के जंगलों में रहने वाले लोगों के मध्य अपना धर्म-प्रचार किया और उन्हे ईसाई दीन की शिक्षा-दीक्षा दी, वैसे ही यह आर्य चार-पाँच हज़ार पूर्व आकर इन नदियों के किनारे वनों में अपने धर्म-स्थलों की स्थापना कर जन-मानस पर अपना प्रभाव छोड़ने लगे…धर्म एक व्यवस्था…एक कानून है और यह आसानी से जन-मानस को प्रभावित करता है और उनके मष्तिष्क पर काबू भी ! नतीजतन धर्म के सहारें फ़िर यह धर्माचार्य जनता पर अपना अप्रत्यक्ष शासन चलाना शुरू करते है…उदाहरण बहित है…रोम का पोप…भारत में बौद्ध मठ ….इत्यादि…!
दरअसल ये धर्माचार्य आम मनुष्य के अतिरिक्त सर्वप्रथम राजा पर अपना प्रभाव छोड़ते है, राजा उनका अनुयायी हुआ नही कि जनता अपने आप उनसे अभिशक्त हो जाती है, यदि हम इतिहास में झांके को देखेगे..चन्द्रगुप्त मौर्य पर बौद्ध धर्माचार्यों ने अपना प्रभाव छोड़ना शुरू किया वह आशक्त भी हुआ बौद्ध धर्म से किन्तु चाणक्य के डर से वह बौद्ध नही बन पाया, कनिष्क कुषाण था किन्तु आर्यावर्त के स्नातन धर्माचार्यों के प्रभाव से वह शिव यानी महादेव का उपासक हो गया औय ही हाल तुर्किस्तान से आये शकों का था जो महादेव के अनुवायी बन छोटे छोटे छत्रपों के रूप में उत्तर भारत पर राज्य करते रहे । धर्म का वाहक ऋषि जो गुरू होता था राजा और प्रजा का, राम को ही ले तो दशरथ से ज्यादा हक़ वशिष्ठ और विश्वामित्र का था राम पर….जैसा गुरू कहे राजा वही करता था यानी अप्रत्यक्ष रूप से धर्म का ही शासन…चलो ये भी ठीक धर्म कोई भी हो सही राह दिखाता है….लेकिन यदि धर्म के वाहक ही अधर्म के कैंन्सर से ग्रस्त हो जायें तो उस राज्य और वहां के रहने वालों का ईश्वर मालिक…..।
आप सब को इतिहास की इन खिड़कियों में झाकने के लिए विवश करने की वजह थी, मेरा आर्यावर्त में नैमिष के उस महान स्थल का अवलोकन व विश्लेषण जिसने मुझे स्तब्ध कर दिया ! धर्म के विद्रूप दृष्यों और क्रियाकलापों को देखकर..अब न तो वहां कॊई धर्म का सदगुणी वाहक है और न ही जन-कल्याण की भावना, और न ही कोई ऐसा धर्माचार्य जो मौजूदा लोकतान्त्रिक इन्द्र को यानी लाल-बत्ती वालों को प्रभावित कर अच्छे या बुरे (अपने विचारों के अनुरूप) कार्य करवा सकें…यदि कुछ बचा है तो अतीत का वह रमणीक स्थल जहां कभी कल-कल बहती आदिगंगा गोमती का वह सिकुड़ा हुआ रूप जो एक सूखे नाले में परिवर्तित हो चुका है, घने वनों की जगह मात्र छोटे छोटे स्थल बचे हुए है जहां कुछ वन जैसा प्रतीत हो सकता है ! और ऋषि आश्रमों में जहां हज़ारों गायें विचरण करती थी, हज़ारों बच्चे संस्कृत में वेदों की ऋचाओं का उदघोष करते थे और आचार्य धर्म पर व्याख्यान देते थे…इन सबकी जगह अब वह हमारी निश्छल और गरीब जनता को ठगने और उनका आर्थिक व शारीरिक शोषण करने वाले मनुष्य बचे हुए…गन्दे, भद्दे, मूर्ख, चतुर, कपटी, लोभी, लालची, मनुष्य जो सन्त के चोले में हमारे निश्छल, भोले, सादे, व धर्म भक्ति में डूबे लोगों को वह कपटी, साधनहीन सन्त अपनी जीविका और अय्याशी का साधन बनाने की फ़िराक में तत्पर दिखती है, उनकी आंखों में लोभ की चमक साफ़ दिखती है..! बस वे इसी फ़िराक में रहते है कि कब हमारे गांवों से आये हुए तीर्थ-यात्रियों में से कोई व्यक्ति उनके चंगुल में फ़ंसे…!
यहां एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि अतीत में धर्म के सहारे सीधे या अप्रत्यक्ष रूप पर जनता पर आधिपत्य करने की कोशिश में धर्म कानून की किताब की तरह कार्य करता था, जिसका पालन शासक और शासित दोनो किया करते थे…लोकतन्त्र और शिक्षा के प्रसार ने अब उस धार्मिक शासन ्यव्स्था को ध्वस्त तो कर दिया किन्तु जन-मानस के मस्तिष्क में वह धर्म और उसका डर अभी भी परंपरा के रूप में पीढी दर पीढी चला आ रहा है, हां अब न तो योग्य ऋषि है और न ही अन्वेषणकर्ता मुनि, सन्त इत्यादि बचे है वो लकीर के फ़कीर भी नही है, बस आडम्बर से लबा-लब भरे विषयुक्त ह्रदय वाले मनुष्य धर्म के भेष में शैतान है जिनकी उपमा किसी जानवर से भी नही दी जा सकती..क्योंकि वह जानवर क्रूरता और दुर्दान्तता के शब्दों सेब मानव द्वारा परिभाषित किया जाता है उसके पीछे उसके जीवित रहने की विभीषिका होती है न कि इन कथित सन्तों की तरह कुटिल कूतिनीति, लालच …..
धर्म के नाम पर बड़े बड़े गढ़, आश्रम और तीर्थ, मन्दिर इत्यादि का निर्माण सिर्फ़ व्यक्तिगत महत्वांकाक्षाओं का नतीजा होते है, जन-कल्याण और शिक्षा की भावना गौढ होती है…नतीजतन ये धर्म स्थल व्यक्ति के अंह और उसके द्वारा बनाये गये नियमों को जनता पर थोपने का अड्डा बनते है..तकि धन, एश्वर्य और वासना की पूर्ति कर सके ये कुंठित धर्माधिकारी।
मैने अपनी इस यात्रा में एक हजारों हेक्टेयर में फ़ैले आश्रम को देखा जहां सैकड़ो ऋषि कुटिया बीरान पड़ी, गौशालायें सूनी है, और संस्कृत शिक्षा देने वाले विद्यालयों में ६०-७० बच्चे, जिन्हे ठीक से इस कठित देव-भाषा का भी ज्ञान नही दिया जा सका, उनसे पूछने पर की आगे चलकर क्या बनना चाहोगे तो उन्हे पता नही…हां एक बच्चे ने बड़े गर्व से कहां हम यहां से पढ़ाई करके यज्ञाचार्य, वेदाचार्य और न जाने कौन कौन से चार्य बनने की बात कही..कुल मिलाकर उन्हे भिखारी बनाने की जुगत और बड़े होकर मां बाप को पानी न दे सके इसकी योजना बस यों ही भटकते रहे कि कब कोई धर्म भीर मिले और वे उसे लूट सके…!
जब मैं इस विद्यालय के भीतर घुसा तो बच्चे अपने सिखाये गये तरीको का इस्तेमाल करने लगे…जैसा कि उनके गुरूवों ने बताया होगा कि किसी आगन्तुक की घुसपैठ पर तुम सभी को कैसा व्यवहार करना है..ताकि यह विद्यालय और बालक ऐसे प्रतीत हो सके जैसे की चौथी- पाचवींं सदी के गुरूकुल या राम की उस कथा के गुरूकुलों की तरह….बच्चे पेड़ो के चारो तरफ़ बने चबूतरे के आस-पास इकट्ठा होने लगे अपने वस्त्र संभालते हुए…एक-दो कमजोर टाइप के बालक (शायद गुरू के आदेश पर जबरू टाइप के बच्चो ने यह मेहनत वाला नाटक करने के लिए कमजोर टाइप के बालकों को चुना होगा)रेत में झाड़ू लगाने लगे..जबकि बुहारने जैसा वहां कुछ नही था…
मैनें उन बच्चों से पूछा की भाई कोई फ़ीस भी पड़ती है..बोले हां ३० रूपये महीना मैने कहां ये तो सरकारी स्कूलों से भी ज्यादा है…तो एक सुधी बालक बड़े संतुष्ट भाव से बोला तीन सौ रूपये में खाना पीना और रहना सब कुछ तो है………
मजे के बात गुरूवों अता पता नही शायद वो सब कही शादी-ब्याह या हवन कराकर अपनी जीविकापार्जन में लगे थे, मैने पूंछा प्रिंसिपल…तो बोले समाधि में है….समाधि में है तो यह सुनकर दो विचार है, कि समाधि दो तरह की होती है..एक मरने के बाद दफ़ना दिए जाने पर और दूसरे जीवित रहकर ध्यान की अवस्था में शिव की तरह…अब मरा हुआ व्यक्ति प्रोसिंपलगिरी तो नही कर सकता सो मैने सोचा आह..क्या बात है अभी भी समाधि लेते है ये महापुरूष..किन्तु..बड़ी देर में पता चला किसी सन्त की समाधि बनी होगी वहा अब बड़ा भवन है पंखा-कूलर इत्यादि से सुसज्जित वही आराम फ़रमा रहे है।
एक बड़े भवन में माइक पर भाषण देता सन्त रूपी मूर्ख चाण्डाल और उसके बीच बैठे कुछ गांव के सीधे-साधे धर्म की पट्टी बाधें गवांर…मुझे उन सब पर बड़ा तरस आया…वह चाण्डाल बार बार माइक पर रटे जा रहा था धर्म पुस्तकों का अध्ययन करो…करो….उन अनपढ़े लोगो से…!
कहते है भगवान विष्णु का चक्र गिरा था तो पाताल तक चला गया और वही पानी निकलता रहता है….!! इस गोलाकार कुऎं रूपी रचना के चारो तरफ़ भी बाउन्ड्री बाल बनाकर चक्र तीर्थ का निर्माण हुआ, यहां प्लास्टिक की थलियाम कड़े और पूजा सामग्री से लबलब भरा यह जल जिसमें श्रद्धालु स्नान कर रहे थे…और उन श्रद्धालुओं से अधिक गोते लगा रहे थे पण्डे (पूजा इत्यादि कराने वाले) क्यों कि जनमानस द्वारा पैसा आदि या चांदी स्वर्ण इत्यादि को चक्र में प्रवाह किया जाता है..जिसे ये लालची पण्डे दिन भर पाने में तैर तैर कर खोजते रहते है……
कुल मिलाकर कभी यह निर्जन स्थान आर्यों के छिपने और बसने की जगह बनी, पहले से रह रही जातियों और मूल भारतीयों से जिनको इन्होंने राक्षस कह कर पुकारा ! और यही दधीच ऋषि ने इन्ही भारतीयों से लड़ने के लिए गायों से अपने शरीर पर नमक डालकर चटवाकर अपनी हड्डियों से धनुष बनवाने के लिए प्राण त्यागे…यह किवदन्ती है जो भी हो ये ऋषि आर्य राजओं के पक्षधर बन जनता में उनके विश्वास को कायम करने में तल्लीन रहते थे और राजनीति यही संचालित होती थी जैसा कि बाद में बौद्ध मठों में हुआ और कुछ सूफ़ियों ने किया….। सत्ता को हासिल करने में धर्म की तलवार का इस्तेमाल नया नही बहुत पुराना है…ईसाई और मुसलमानों से पहले …बहुत पहले से…!
एक बात और पुराणों के नाम पर बहुत से कलुषित विचारों वाले मूर्ख ऋषियों ने दर्जनों पुस्तकों को बूक डाला और हमारी जनता अन्ध-भक्त बन देवताओं और महा-मानवो की वासनाओं की कथाये बड़ी भक्ति भाव से आज भी बाच रहा है टीका चन्दन और धूपबत्ती के साथ। यही वह स्थल है जहां मूर्खों ने तमाम मन-गढन्त देवी देवताओं की वासनाओं का लेखन किया जो दरसल लिखने वाले के दिमाग की उपज थी।
उत्तर भारत को इन आर्य आक्रान्ताओं ने इन्ही धर्माचार्यों की मदद से अपने अधिकार में कर लिया और यही कारण था कि भारत में पहले से रह रही जातियां इन आर्यों से अपने छीने हुए अधिकारों और संपदा को वापस लेने के लिए कुटिल ऋषियों को अपना निशाना बनाते थे…ये आर्यों के एजेन्ट ऋषि हवन यग्य आदि के नाम पर अन्न धन बटोरने में जुटे रहते थे भारतवासियों से और आर्य राजाओं की नीतियों को धर्म का जामा पहनाकर जनमानस को मूढ़ बनाते रहते है….
सिन्धुघाटी को नष्ट करते हुए ये आताताई पूरे उत्तर भारत में फ़ैल गये, धर्म के प्रचार-प्रसार की व्यवस्था आज की ईसाई मिशन्रियों से भी अधिक पुख्ता थी, धर्म को कानून बनाकर जनता पर अत्याचार करते हुए इन आर्यों ने हिन्दुस्तान की धरती को पर वर्न्शंकरों की फ़ौज तैयार कर दी, साथ ही पहले से रह रही मूल?
जातियों को दक्षिण में खदेड़ दिया, इनकी सत्ता भी ब्रिटिश साम्राज्य की तरह या अरब के खलीफ़ा की तरह थी..वे गुलामों की फ़ौज भेजते और भारत की धरती पर गुलामों की फ़ौज जनता को अपना गुलाम बनाती…यानी पहले दर्जे का गुलाम दोयम दर्जे के गुलाम पर शासन करता है और लूट-मार का सामान लन्दन या बल्क-बुखारा भेजता…यही हाल था इन आर्यों का जो इन्द्र और उनसे भी बड़े किन्तु अघोषित देवताओं की गुलामी करते ये गुलाम भारत भूमि पर आये और यज्ञ्य के नाम पर यानी टेक्स वसूलते और इन्द्र को भेजते …यहां तक कि जबरियन इन्द्र की पूजा कराई जाती … इतना ही नही इन्द्र जैसे शासक अपने ही भेजे गये एजेन्टो यानी ऋषि पत्नियों के साथ बलात्कार भी करते और उस महिला पर चरित्रहीन होने का झूठा आरोप भी लगाते जिसे न चाहते हुए उस महिला के पति और जनता दोनों को मानन पड़ता। अजीब हालात थे..इन हरामखोर देवताओ और इनके गुलामों के…..आप को याद होगा भारत में आर्यों की वर्णशंकर संतानों ने उन्हे चुनौती दी..जैसा कि अमेरिकन ने कभी जंगे आजादी की लड़ाई अपनी ही कौम से लड़ी थी… हां मै बात कर रहा हूं कृष्ण की जिन्होंने इन्द्र पूजा को समाप्त कर गोवर्धन की पोजा करवाई यह इतिहासी शायद पहली लिखित घटना हो आत्म-स्वालम्बन की, स्वन्त्रता की…पराधीनता के खिलाफ़ कृष्ण का यह विद्रोह मन में स्वाधीनता व आत्मनिर्भरता का सुन्दर भान कराता है…एक वाकया और उस राम का जिसे हम आदर्श मानते है, यकीनन वह गर्व करने वाले व्यक्तित्व थे जो अपने पिता के आकाओं के विरूद्ध जाकर एक नारी के चरित्र पर लगे उस झूठे आरोप को मिटा डाला…हालांकि सत्ता के शीर्ष पर बैठे इन्द्र को दण्डित करने का साहस नही दिखा सके किन्तु उस ऋषि पत्नी पर लगे आरोप समाज से बहिष्ख्रुत महिला की दोबारा वापसी का श्रेष्ठ कार्य दशरथ पुत्र राम ने अवश्य किया…..इतिहास की ये घटनायें हमें यह बताती है कि कैसे धर्म कानून बन अत्याचार और शोषण का माध्यम बना…जो आज भी जारी है….
धर्म स्वयं की अभिव्यक्ति है और साधना भी स्वयं की अभिव्यक्ति है और ईश्वर भी ! फ़िर क्यूं अन्यन्त्र खोजते है हम इसे….सद-शिक्षा, सेवा, जन-कल्याण की भावना से किए गये धार्मिक अनुष्ठान तो समझ आते है पर कपटी लम्पट और अति महात्वाकाक्षीं कथित सन्तों के पीछे पीछे झण्डाबरदारी करते हमारे साधारण व आस्थावान लोग जो प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष इन महानुभावों की कीर्ति की बढोत्तरी का साधन मात्र बन कर रह जाते है यह बात मेरी समझ नही आती !
किसी जाति को गुलाम बनाना हो तो उसकी भाषा, उसका इतिहास और उसका धर्म बदल दो वह जाति आप की अनुयायी हो जायेगी…और आर्यों ने, मुसलमानों ने और ईसाईयों ने यही किया…और बदल डाला पूरा समाज जो परंपरा के रूप में बचा वह आज भी विद्यमान है कही कही…!
अपनी यात्रा के अन्तिम चरण में आदि देव विशुद्ध भारतीय महादेव देव-देवेश्वर के दर्शन के किए जो नैमिष से कुछ ही किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में गोमती के तट पर एक वन में स्थापित है…प्राचीन शिला का यह शिवलिंग अदभुत है।
इस पूरे तीर्थ स्थल पर मुझे कुछ अच्छा लगा तो वे नि्ष्कपट, आस्थावान, लोगो के चेहरे जिनमें निश्छलता और धर्म के प्रति अगाध प्रेम साफ़ दिखाई दे रहा था..किसी कपटी सन्त के बजाए मुझे इन चेहरों के दर्शन मेरी इस यात्रा की सफ़लता थे।
कृष्ण कुमार मिश्र



मई 7, 2011 at 6:49 पूर्वाह्न
बहुत सुन्दर विश्लेषण और इतिहास की घटनाओं की जानकारी बहुत ज्ञानवर्धक रही ….सार्थक लेखन के लिए साधुवाद..
Dr. Rama Dwivedi
मई 12, 2011 at 8:50 अपराह्न
aapki tipani me apane us vichar ko shadhuwad diya hai jo shadu parampara ko pakhand ke alava kuch manane ko taiyar nahi.virdhabhas alankar ke pryog se apaki tipani kavyamay ho gayi hai…
मार्च 16, 2013 at 3:06 अपराह्न
Doctor sahiba aap ko ek achhe doctor ki jaroorat hai…
मई 7, 2011 at 7:18 पूर्वाह्न
Sach kaha hai aapne, bookish knowledge par nhi, all over facts par sochne ki jarurat hai.
ye dharmacharan ka DHANDHA to aaj bhi aaryo k kathit vanshaj “PANDIT” jo sirf vanshanu kram me pandit hai baaki our kaafi had tak kuch nhi, chalaate aa rahe hai…
mool nivasiyo ko khadeda gaya ya shoshan kiya gaya ho
par hindustaan ki wo hi JANTA sabse jyada gulaam rahi hai
kisi or desh k apexa…….
isko kahte hai baap ki karni baccho ko bharni hi padti hai…
aapne jo nirbheekta dikhaai hai wo appreciable hai…kyuki hum is par ghar me baat karte hai ki kya hua tha our iske pichhe kya scientific reasons rahe honge par social nhi hue….
ham sabhi logo ko manthan karna chahiye
or is level par sochna chahiy
keep it up sir……..
Ankur Dutt
मई 8, 2011 at 10:12 पूर्वाह्न
arya koi community nahi hai mere mitar.arya ek jeevan shaily hai.arya ka arth ha wah har adami jo adam jo apane jeevan, samaz,rastra aur vishav ko behtar banane ke liye janam se martyu tak har pal pryasrat rahe.yadi koi is ksouti par khara nahi utrata to wah arya kaise ho sakta hai.
जनवरी 4, 2012 at 10:21 पूर्वाह्न
Ankur Dutt ji
24-25-26 feb 2012 ko jind me ek debate rakha gaya hai jisme aap bhi nimantrit hai aur aapke guru krishan kumar mishra bhi.Yaha debate camera me record hoga.Waha par agar aap kisi baat ka utar nahi de paye (validate karke) toh aapko manna padega ki aapke pas gyan nahi hai aap bhed bakri hai.Kripya usme aakar show kare ki aap ke under sach me knowledge hai bekar me prachar na kare.1000 sal gulam rahe log krishan misra aur aap kaise kuch bol sakte hai
मई 7, 2011 at 10:11 अपराह्न
काफ़ी कुछ कह गये भाई…बेहतर…
अक्टूबर 22, 2011 at 3:29 अपराह्न
Ravi ji kya aap mujhe is Bharata des ka jiska asli nam Aaryavart hai is AARYAVART Sse purana nam bata sakte han.
मई 15, 2012 at 4:19 अपराह्न
Dear Brother iska purana nam ‘Bharat’ hi tha jise bad mein ‘Aryavart’ kaha gya, for detail contact http://www.brahmakumaris.com
मई 8, 2011 at 6:53 पूर्वाह्न
nice
मई 12, 2011 at 9:02 अपराह्न
bhartiya sankriti me ravan ,kans duryodhan aadi ke liye bhi sahitya me gali ka upyog nahi hua hai aur unke charitar ka stik varnan bhi kiya hai yah hai.yah ahi bhartiya lekhan aur darshan ki paripakvata.par aaj gali ke sheersak se likhe lekh prshansa…….ashcharya….
मई 15, 2012 at 4:22 अपराह्न
Brother ji, jab Krishna mishra ji ki Bhavnao ko samjhen to galti nahi hai, ….” agar shanti se kahte to ap comment karte kya?”
मई 8, 2011 at 8:41 पूर्वाह्न
——यह कथा ’ हम हरामखोर” के नाम से प्रकाशित होनी चाहिये….क्योंकि हरामखोर आर्य नहीं थे….जीतने वाली जाति या समाज या वर्ग कैसे हरामखोर हो सकता है…
——.क्या आप संसार को जीतने वाली जाति “अन्ग्रेज़” को हरामखोर कह सकते है..??? नहीं हम हरामखोर होगये थे और आप जैसों के विचारों से अपने कर्मपूर्ण अतीत को भूलकर..काम चोर होकर पूरी एक सदी तक गुलाम रहे……
—- विदेशी चश्मे से देखने पर यही दिखाई देता है…….तिलक को पढो…तो इतिहास का सही ग्यान हो……
—- पौराणिक इतिहास के तथ्यों की समाज-वैग्यानिक व राजनैतिक व्याख्या समझिये तभी असलियत का ग्यान होता है…..विदेशियों के लिखे आलेखों से नहीं….
अक्टूबर 22, 2011 at 3:18 अपराह्न
Gupta ji Aap bilkul thik kaha rahe hai .
जनवरी 4, 2012 at 10:23 पूर्वाह्न
dhanyavad gupta ji
Sab logo ko 24-26 FEB ke challenge ka bulawa hai aaye aur apni knowledge dhikhaye.jind me(haryana)
मई 8, 2011 at 8:52 पूर्वाह्न
“”नैमिषारण्य, नैमिष और नीमसार यह एक ही नाम है उस जगह के जहां कभी आर्यों की सबसे बड़ी मिशनरी रही, उत्तर भारत में ऋषियों यानी धर्म-प्ररचारकों का सबसे बड़ा गढ़। “”"
—नैमिसारण्य कभी आर्यों बहुत बडा धार्मिक गढ नहीं रहा…..अपितु सत्य तो यह है कि यहां सिर्फ़ एक बहुत बडा धार्मिक-सम्मेलन( जो उस समय मानव आचरण के नीति-नियमों की व्याखाया के लिये हुआ करते थे ….जैसे आजकल भी धार्मिक सम्मेलन होते हैं) हुआ था जिसके अध्यक्ष वेद-व्यास बनाये गये थे…..
—-सिर्फ़ स्थान को देखने से किसी को पूर्ण सत्य ग्यात नहीं हो पाता….प्रायः वहीं रहने वाले लोग उस स्थान की महत्ता व इतिहास नहीं जानते…..
—–प्रक्टिकल से पहले शास्त्रीय( थ्योरी–मूल नियमों ) ग्यान बहुत आवश्यक होता है…अन्यथा भ्रमपूर्ण ग्यान प्रकट हो जाता है….
मई 8, 2011 at 8:55 पूर्वाह्न
—सर्व धर्म परित्यज्य मामैकं शरणं ब्रज—– सारे ग्रन्थों को भूलकर सिर्फ़ –वैदिक व औपनिषदीय साहित्य पढें….सारे भ्रम दूर होजायेंगे..
मई 12, 2011 at 10:42 अपराह्न
kshama kare neeche wali tipani apke liye nahu balki krishan mishra ke liye thi
जनवरी 9, 2013 at 10:41 अपराह्न
aur gulam banana chahte ho kya
मई 8, 2011 at 9:16 पूर्वाह्न
aap jo khud nahi jante use use bhi dusron ko batane ka jo prayas aap kar rahe hain uske liye prsansha ke patra hain.do you know wht does arya means?
मई 8, 2011 at 10:26 पूर्वाह्न
lekhan jitna aasan aap sajhte hai vastav me utana hai nahi. Jis vishay par aap likh rahe hai matar uski janakari hi pryapt nahi hoti, apitu jin shabdon ka chayan aap kar rahe hain un sabka vatvik arth aur mahtav aapko malum hona chahiye. nahi to pahle hi samaz me jinke galat arth liye jate hain aap usi vikriti ko aur poshit karenge
मई 8, 2011 at 1:30 अपराह्न
डा० श्याम गुप्त जी सबसे पहले आप को धन्यवाद टिप्पड़ी चिपकाने केलिए..आगे मसला ये है कि अंग्रेज इस लिए पूर्ण रूप से हरामखोर नही थे क्योंकि उन्हों ने किसानों के शोषण के बदले नहरे खुदवाई, स्कूल, अस्पताल इत्यादि एक बेहतरीन सिस्टम…चूंकि वो विदेशी शासक थे और भारत की धरा की संपत्ति इंग्लैंड रवाना करते थे,..जो उनके पारिश्रमिक से ज्यादा थी इस लिए वो भी हरामखोर थे..एक बात और उन्हों ने भारत में हरामियों यानी वर्णशंकर सन्तानों की फ़ौज इकट्टा नही की मुसलमानों और आर्यों की तरह…आर्य एक बर्बर और खानाबदोश जाति थी और उन्हों ने भारत आकर द्रविड़ों,कौल-भिल्लो और आग्स्तेय आदि जातियों से वन-संपदा, औषधि और भवन निर्माण इत्यादि सीखे आप को बता दू वेदों में आर्य ऋषियों से ज्यादा ऋचाएं द्रविड़ ऋषियों की है…
मई 8, 2011 at 1:36 अपराह्न
विजय जी सर्वप्रथम आप को नमस्कार…लगता है आप उन्ही गफ़लत में रहने वाले लोगों में से है जो हिन्दू की परिभाषाएं बनाते रहते है…एक पुरानी व धनी भाषा का ये शब्द जिसे सेकुलर भारत में आप एक विशेष सम्प्रदाय को चिन्न्हित करना चाहते है..क्योंकि आपके पास आप की पहचान का कोई शब्द नही…खैर आप ही मुझे बताए जिन्हे आप हिन्दूं कहते है वे कौन है..लेक्चर मत दीजिएगा और बहकी बहकी बाते मत करिएगा….भारत के संविधान में अपने धर्म की परिभाषा खोजिए कही मिलती है…कही सनातन धर्म कहते हो कही आर्य कही वैदिक आखिर मसला क्या है..वैसे हरामियों का धर्म क्या होता होगा..खैर अमेरिका से सीखिए वे अलग अलग कौमों की सन्तान होने के बाद भी ईसाई है और उनकी एक पहचान है…महाभारत के कुछ पन्ने फ़ाड़ कर गीता बना देने से या किसी आदर्श राजा के चरित्रगाथा को धर्मपुस्तक बना देने भर से आप की जिम्मेदारे खत्म नही होती…..अपनी पहचान खोजिए ये एक बड़ा सवाल है…
मई 9, 2011 at 9:18 पूर्वाह्न
meri matar ek tipani ke aadhar par par mere vyaktitav ka aakalan karne ke liye apka dhanywad. Mujhe aap purvagrah se peedit mante hain ispar bhi koi aschraya nahi hai balki mujhse swand ke liye aapka aabhari hun. Par ek nivedan hai 1835 me british parliament me lord Mekale ke tatkalin bhartiya siksha aur samajik vyavastha tatha usko smapat karane ke uddeshyon ko padenge to aapko aapki bat khud hashyapad lagegi
मई 11, 2011 at 4:39 अपराह्न
i think mr.krishna u r really a guy having more logic and scientific point of view .it is really good but at some extent only. you cant abuse a community on the basis of doctored fact which is nothing but the outcome of mentally ill people like you before writing any thing you have to think a lot otherwise it can be panic for others and we cant have a good and healthy society where people can live together with proper harmony and full of respect and love for one another . the ARYA word is derived from Sanskrit means people from ARANYA (JUNGLE) SO WE ALL FROM SAME COMMUNITY . if u cant believe it please get your DNA test done so that u can come to know the fact. i know that u will never allow this post published on your blog that is why i am posting it on facebook.
मई 11, 2011 at 4:40 अपराह्न
i think mr.krishna u r really a guy having more logic and scientific point of view .it is really good but at some extent only. you cant abuse a community on the basis of doctored fact which is nothing but the outcome of mentally ill people like you before writing any thing you have to think a lot otherwise it can be panic for others and we cant have a good and healthy society where people can live together with proper harmony and full of respect and love for one another . the ARYA word is derived from Sanskrit means people from ARANYA (JUNGLE) SO WE ALL FROM SAME COMMUNITY . if u cant believe it please get your DNA test done so that u can come to know the fact. i know that u will never allow this post published on your blog that is why i am posting it on facebook.
मई 11, 2011 at 11:56 अपराह्न
बी के मिश्र जी आर्य का अभिप्राय होता है श्रेष्ठ न कि आप का मनगढन्त अर्थ जंगली…..अभी और पढ़े
मई 12, 2011 at 12:00 पूर्वाह्न
आर्यों के विशाल इतिहास और उनके क्रियाकलापों पर मेरा यह लेख मात्र एक झलकी है इसे किसी इतिहासिक शोध या मैने अपने ज‘जान को बघारने का दुश्साहस नही किया है बल्कि आप सभी के नज़रिये से अवगत होने का कारण मात्र हैं मेरे ये विचार…कि हरामखोरों की मौजूदा कौमें जिनमें मध्य-एशिया, योरोप आदि के वंशजों का मिलाजुला रक्त है क्या सोचती है इतिहास के इस पन्ने के विषय में…तो हरामियों आप का स्वागत है….कुछ कहें अवश्य !
मई 12, 2011 at 10:30 अपराह्न
jis aadmi ne jeevan me jo kamaya hai wah dushron ko wahi de sakta hai.Isliye mishra ji hame khed hai ki humne galiyan kamai hi nahi hai to apko kaise de sakte hain. Lekin ye hum par nirbhar hai ki hum kisi ki di hui vastu sweekar kare ya na karen.so aapki galiyon ka kosh aapke budhikosh kosh ko hi sushobhit karta rahega. mere pass apko dene ko sirf subhkamnaye,prem aur nek salah hain jo maine jeevan me kamayi hain
मई 12, 2011 at 11:25 पूर्वाह्न
ise pdho http://en.wikipedia.org/wiki/Brahmin_communities#Brahmin_communities_and_genetic_studies ye Genetic study ye kehti h ki Brahmins Local original Indian caste h. Aryans knhi se nhi aae ye India ki hi product the. Britishers jo kehte hn ki Aryans outsider the wo galat h wo Study Language similarity ka result tha Genetics ki Study usse mel nhi kha rhi.
मई 12, 2011 at 8:39 अपराह्न
aapka satya ko shidh karne ka pryas kabile tarif hai par mishra ji ko samjhana vyarth hai kyonki soye hue ko jagya ja sakta hai par jagte hue bhi sone ka natak karne wale ko jagana namumkin hai.hum tark ka jawab de sakte hai kutrk ka nahi .
मई 13, 2011 at 9:09 अपराह्न
MACALE K GULAMO JISE NAHI JANTE US PAR MAT LIKHO YUN ARYO KO BADNAM NA KARO JANNA HAI TO SAMNE AAO ARYO NE JIS DESH PAR APNI DHARM SASKRITI KA PARCHAR KIYA THA US DESH KA KYA NAM THA OR ARYA KAHA SE AAYE THE IS DESH KA NAM ARYAVART TERE MACALE NE RAKHA THA KYA?
मई 14, 2011 at 1:12 पूर्वाह्न
aditya ji aap hi bata de ye arya kaun the aur kaha se aaye aur ye itane buddhiman aur saksham the to fir apane vajood ko aryavart me bacha kyo nahi paaye…aur ha desh shahar aur gaon ka naam vijeta rakhta hai gulam nahi…angrejo aur musalamaano ke dwara rakhe naamo par gaur kare jinhe aap jaise varnshankar aaj bhi badal nahi paaye…allahabad, murshidabad, alhaganj, cownpore, mohammadpur, saraiya william..etc
मई 14, 2011 at 1:19 पूर्वाह्न
vijay ji aur neeraj ji please read some latest study “who is in your blood and where from !” nowadays most north indian population is a mixture of many races due to lots of foreign invasions….if you want perfect result of aryan race then go to search for human body of 2000 BC….you will get genetic blue print..which will be related to the somewhere middle east or west…
मई 31, 2011 at 7:17 अपराह्न
Are bhaiyon Arya aur Dravid ko maro goli..petrol our deasel ki baat karo. gadi ki tanki bharwaane kisi ke purkhe dhan lekar nahi aayenge. kab tak bekaar ki baaton me samay gavayega ye desh. Ateet ke chaddar se bhavishya ki pareshaniyon ki nahi dhanka ja sakta. age kya karna hai. kaise karna hai ye socho bhai..ki arya aur dravid pe matha pachhi karte duniya ko hamse aage jaate dekhna hai..
सितम्बर 5, 2011 at 12:17 पूर्वाह्न
I am really surprised that why this Foolish & half knowledge chap KK Mishra has taken this responsibility to explain what is Arya & what is not. Please Mr. KK do something new or relevant. There are many things in this world which really don’t need your expert (rubbish, immature & garbage) comments.
It is your way to interpret the things, even I could do the same thing which you did like without knowing your full name krishna kumar mishra I call it KK mishra & a poor chap like you could itself read it as …?….? a nice abuse ?, because your vision & knowledge can read this only.
At last let me share you one thing that the harm which mishra’s caused to India is far less then any Britsh or Muslim invaders.
So next time be careful while taking any rubbish task like this.
सितम्बर 14, 2011 at 11:09 पूर्वाह्न
श्रीमान मिश्रा जी आप का लेख पड़ने का सौभाग्य मिला! अब पता लगा की देश अंग्रेजो का गुलाम क्यों हुआ और हमें २०० साल क्यों लगे अंग्रेजो को भागने में! आप जैसे महान लोग जो वज्ञानिक है, दर्शन शाश्त्री है! वाह! कौन आर्य, कौन द्रविड़ कौन हो आप कौन है हम! इन प्रशनो की खोज में लाखो करोड़ों लोग लगे है और आप के पास इन सभी प्रशनो का कितने सरल उत्तर है! थोड़ी शर्म करिए, आप आज भी अंग्रेजो के उस मकडजाल में फंसे है जो उन्होंने दुनिया को पागल बनाने के लिए बनाया था…”ईशाई प्रजाति भारतियों से श्रेष्ठ है”,, आर्य, द्रविड़, ये सभी उसी मकडजाल के पात्र है! …(deleted….what’s cure and why? moderator ) और थोडा महाभारत के फटे हुए पन्नो को पढ़िए, सकूं मिलेगा!
सितम्बर 14, 2011 at 1:58 अपराह्न
आशीष जी, विकल्प जी एवं Gateway? ji, बहुत बहुत आभार आपकी बहमूल्य टिप्पड़ियों के लिए, आप ने मैनहन विलेज ब्लाग पर अपना बहुमूल्य समय देकर उसे पढ़ा…वैसे आशीष जी महाभारत बचपन में ही पढ़ी थी और उसे फ़ाड़ भी दिया था अब फ़टे हुए पन्ने मेरे पास कही पड़े है चाहे तो आप को दे दूं बेहतरीन ड्रामा है जरूर पढिएगा..
जुलाई 22, 2012 at 7:37 अपराह्न
to filhal ap kon si kitab pad rahain hain…..sayad aap ke pas koi aise kitab nahi hogi main janta hoon aap pahle likhgain phir padhegain
kyunki jis pustak ka naam le rahain ye vishwaw ki 10 pramukh puston main aata hai
सितम्बर 15, 2011 at 4:21 अपराह्न
काश आपने महाभारत पढ़ा होता, और खास कर वो फटे हुए पन्ने! खैर! मेरा मकशद आप के अहम् को ठेस पहुँचाना नहीं था! अगर आप अपने मत में खुश है तो किसी को इसमें परेशानी नहीं होनी चाहिए!
हर धर्म में कुछ अच्छी और कुछ बुरी धारणाये होती है! हिन्दू / सनातन / आर्य धर्म भी इसका अपवाद नहीं है! अच्छा हो अगर आप सजगता से उन बुराइयों को उजागर करें और कोशिश करें की उन्हें हम अपने समाज से बहार पाए!
एक बात पूछना चाहूँगा, क्या आप ने कभी सोचा है की हम आर्य आज तक अपनी पहचान को जीवित क्यों रख पाए जबकि इस पृथिवी पर विकसित हुई बाकि सभ्यताएं एक के बाद एक समाप्त हो गयी! ये हमरी आश्था और हमारा विस्वाश है, अपने धर्म में, जो हमारे वजूद को मिटने नहीं देती!
और एक आखरी बात, हम सब कितना भी बोल ले, कितना भी मन को बहला ले…पर सत्य यही है की हम सब उस सनातन परमात्मा की संतान है!
हम सब “हरामखोर आर्य” है!
जनवरी 25, 2012 at 8:55 अपराह्न
Well…bco’z i am also an INDIAN, aur mujhe paresani hai, us sab se jo log ise kisi bhi rup me nicha dikhane ki kosis karte hai, aur mujhe lagta hai ki aap sabhi ko bhi hona chaiye if ever u feel like an indian, agar other nationality ke ho to alag baat hai….Bande Matram
सितम्बर 15, 2011 at 4:30 अपराह्न
और हाँ अगर आप अपने आप को आर्य नहीं कुछ और मानते है तो कृपा कर बताइए की आपने अपना genetic टेस्ट कहाँ से करवाया और ये किस के साथ मैच करता है…अंग्रेजों के साथ?
अक्टूबर 30, 2011 at 5:15 अपराह्न
Hi Mr Krishna Kumar Mishra
only three words for u
You are sick
नवम्बर 4, 2011 at 6:51 अपराह्न
my dear neeraj, my sickness can improve your mind!!!
अक्टूबर 31, 2011 at 5:13 अपराह्न
dear kindly read this artical
असलियत आर्य-द्रविड़ भाषाओं के विभाजन की
आलेख: डॉ0 परमानंद पांचाल ; नई दिल्ली
दिनांक: 04 अगस्त 2010 समय: 12:31
पाश्चात्य विद्वानों द्वारा निरंतर यह भ्रम फैलाने को प्रयत्न किया जाता रहा है कि आर्य भारत में बाहर से आक्रामक के रूप में आए और उन्होंने यहां के मूल निवासी द्रविड़ों को उत्तर से भगा दिया, जो आज दक्षिण में रह रहे हैं। इस मिथ्या प्रचार का दुष्परिणाम निकला- भारत का उत्तर और दक्षिण के रूप में अनुवांशिक आधार पर विभाजन और परस्पर जातीय वैमन्स्य। ब्रिटिश साम्राज्य को अपनी जड़ें मजबूत करने में इस सिद्धांत से अपेक्षित सहायता भी मिली। हमारे इतिहासकारों और भाषा वैज्ञानिकों ने शिक्षा के क्षेत्र में इसका प्रचार किया। परिणामत: उत्तर और दक्षिण के बीच जातीय आधार पर जो खाई उत्पन्न हुई, उसके घातक परिणाम सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में भी देखने को मिले। सभी जानते हैं कि एक प्रांत का नाम तो मात्र प्रजातीय आधार पर ही रखा गया। यही नहीं, एक दो राजनैतिक दलों का गठन भी द्रविड़ शब्द को आधार मानकर किया गया, जिसकी पृष्ठभूमि में स्पष्ट रूप से जातीय पृथकता की गंध आती है। देखा जाए तो श्रीलंका के लम्बे जातीय संघर्ष के पीछे भी यही तत्व विद्यमान रहा है।
प्रसन्नता का विषय है कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय और भारतीय शोद्यार्थियों के एक दल ने अपने एक नवीनतम अध्ययन के आधार पर अब यह मत प्रकट किया है कि आर्य और द्रविड़ विभाजन महज एक कल्पना है। इससे सदियों से चली आ रही यह मान्यता कि उत्तर भारतीय लोग आर्य हैं और दक्षिण भारतीय द्रविड़ जाति के हैं, एक कपोल कल्पना के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
कोशिकीय तथा आणविक जीव विज्ञान केन्द्र (सेंटर फोर सेल्यूलर एंड मॉलिक्यूलर बायॉलजी) अर्थात सीसीएमबी ने इस अध्ययन को हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, ऑफ पब्लिक हैल्थ ब्रॉड इन्स्ट्िटयूट ऑफ हार्वर्ड एमआईटी के सहयोग से अंजाम दिया है।
इस अध्ययन के परिणामों ने इतिहास को एक नया मोड़ दे दिया है। इसके अनुसार सभी भारतीय अनुवांशिक रूप में जुड़े हुए हैं। सभी भारतीय एक हैं। उत्तर और दक्षिण भारतीयों के पुरखों का जिनेटिक अंश एक है। सीसीएमबी के वरिष्ठ वैज्ञानिक, के- तंगराज कहते हैं कि ‘आर्य द्रविड़ सिद्धांत’ में जरा भी सच्चाई नहीं है।
यह सिद्धांत उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों के अपनी-अपनी जगह जम जाने के सैंकड़ों वर्ष बाद आया। इतिहास की सच्चाई में एक नया मोड़ देने वाले इस अध्ययन के ‘को-ऑथर‘ और सीसीएमबी के पूर्व निदेशक श्री लालजी सिंह का कहना है कि यह शोध-पत्र इतिहास को नए सिरे से लिखेगा। इस अध्ययन के अनुसार 65,000 वर्ष पहले दक्षिण भारत और अंडमान में बस्तियां वजूद में आईं और उसके 25,000 वर्ष बाद उत्तर भारत आबाद होने लगा। धीरे-धीरे उत्तर और दक्षिण भारतीयों का मिलन हुआ और एक मिश्रित पैदाइश ने आकार ले लिया। इस प्रकार दक्षिण और उत्तर भारतीय लोग आनुवांशिकी दृष्टि से परस्पर सम्बद्ध और एक हैं। इससे पूर्व भी विद्वानों ने आर्य और द्रविड़ विभाजन के सिद्धांत का पूर्णत: खंडन किया है। सरस्वती नदी, जो 2,000 ई- पूर्व में सूख गई थी, के अवशेषों की खोज ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि सरस्वती घाटी की सभ्यता हजारों वर्ष पूर्व की एक विकसित सभ्यता थी। ऋग्वेद में सरस्वती नदी का बहुलता से गुणगान है, जो हिमालय से निकलकर अरब सागर में मिलती थी। वास्तव में सिंधु और सरस्वती घाटी की सभ्यताएं इसके प्रमाण हैं कि हड़प्पा सभ्यता जो सिंधु से राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक फैली थी, वह एक ही सभ्यता के विभिन्न रूप थे। अब सिंधु घाटी सभ्यता के चिह्न सुदूर केरल के एडक्कल और तमिलनाडु में भी ऐसे अवशेष मिले हैं, जो सिंधु घाटी सभ्यता जैसे हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार एमआर राघव वेरियर के अनुसार एडक्कल गुफाओं में प्राप्त ‘घड़ा‘ सिंधु सभ्यता के अवशेषों से बिल्कुल मिलता-जुलता है। सिंधु लिपि के चिह्नों की यहां विद्यमानता सिद्ध करती है कि प्रागैतिहासिक काल में यहां समान सभ्यताएं विकसित थीं। फिर आर्यों का बाहर से आने का सिद्धांत और आर्य द्रविड़ विभाजन पूर्णत: काल्पनिक और साद्देश्य मात्र रह जाता है।
हाल ही में हार्वर्ड में हुए एक अध्ययन से स्वत: ही आर्य और द्रविड़ परिवार की भाषाओं का मिथक भी ध्वस्त हो जाता है। जब आर्य और द्रविड़ का विभाजन ही काल्पनिक है तो आर्य और द्रविड़ नाम के भाषाई परिवारों की कल्पना भी कपोल कल्पित होने के सिवा कुछ नहीं है। आर्य और द्रविड़ परिवार के भाषाओं के सिद्धांत ने भारत में एक भाषाई वैमन्सय और उन्माद को जन्म दिया, जिसका लाभ साम्राज्यवादी शक्तियों ने उठाया और भारतीय अस्मिता को धूमिल करने में सहायता की। भारतीय भाषाओं के बीच जो दरार पैदा की गई उसका भरना आसान नहीं है। राष्ट्रीय एकता के लिए महात्मा गांधी और देश के अन्य अग्रणी नेताओं ने राष्ट्रभाषा के रूप में जिस भाषा की पहचान की थी, उसको सिरे ही नहीं चढ़ने दिया गया। उसके मार्ग में प्रमुख अवरोध का कारण भी यह सिद्धांत ही बना कि हिंदी आर्य परिवारों की भाषा है।
अगर मैं यह कहूं कि शुद्धता के नाम पर भारत की इस प्राचीन और समृद्ध भाषा तमिल के स्वाभाविक और प्रगामी प्रवाह को रोकने का भी एक कृत्रिम प्रयत्न किया गया, तो कोई अत्युक्ति न होगी, क्योंकि भाषा तो बहता नीर है।
जैसा कि पहले कहा गया है कि ‘आर्य‘ कोई जाति नहीं थी। ‘आर्य‘ और ‘द्रविड़‘ नाम से जातियों की कल्पना महज एक मिथक है। ‘आर्य‘ का अर्थ है- श्रेष्ठ, आदरणीय, योग्य आदि। (शिवाराम वामन आप्टे का संस्कृत हिंदी कोश, पृ0 159) ऋग्वेद का एक मंत्र है- ‘इन्द्र वर्द्वंतु अप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम‘ अपध्नन्तो अराव्ण: अर्थात्- हम सज्जनों की वृद्धि का प्रयास करें और विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाते चलें और दुष्टों का नाश करते चलें।
इसमें विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाने का आह्वान है। जाति का नहीं। क्योंकि किसी जाति (रेस) को कैसे बनाया जा सकता है? उसे तो श्रेष्ठ ही बनाया जा सकता है। स्पष्ट है कि आर्य कोई जाति नहीं थी और न वह भारत में बाहर से आई थी। आर्य को एक जाति (रेस) के रूप में स्थापित करने वाले एएफआर हर्नले ने कम्पैरेटिव ग्रामर ऑफ गौडियन लैंग्वेज में यहां तक लिखा है कि भारत में आर्य कम से कम दो बार में आए। इसी प्रकार कई भाषाविज्ञानियों और इतिहासकारों ने भी आर्यों को आक्रामक के रूप में बाहर से आने वाले बताया है। यह सत्य है कि भारतीयों का संबंध प्राचीन काल से ही मध्य एशिया और यूरोपीय देशों से रहा है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि यहां आर्य नाम से कोई जाति बाहर से आई थी। इसका कहीं भी कोई प्रमाण नहीं मिलता।
विशप रावर्ड कॉल्डवैल (1814-1841) ने ‘दि कम्पेरिटव ग्रामर ऑफ द्रविडियन लैंग्वेजेज‘ (1856) में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सुदृढ़ता के लिए अपना सिंद्धात रखा था जो राजनैतिक, शैक्षिक और नंवजागरणवाद के उद्देश्यों पर आधारित था, जिसने 20वीं शती में ‘द्रविडियन‘ राष्ट्रवाद का प्रचार किया। इसने निश्चय ही भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को धीमा करने में सहायता की। कॉल्डवैल तत्कालीन यूरोप के वैज्ञानिक जातीय सिद्धांत से प्रभावित था। इसलिए उसने आर्य-द्रविड विभाजन सिद्धांत को हवा दी। द्रविड़ भाषाएं नाम की उत्पत्ति उसी की देन है। चार्ल्स ई गोवर तथा डीपी शिवराम (1871) ने काल्डवेल की मान्यताओं का प्रतिवाद किया है और उन्हें निराधार बताया।
यहां मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि देश को जातीय आधार पर विभाजित रखना ब्रिटिश राज के हित में था। ईस्ट इंडिया कम्पनी के इतिहास को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि जब कम्पनी का चार्टर नया किया गया तो सर जान मेल्कम ने कहा कि संसदीय राजसत्ता के विरुद्ध किसी विद्रोह की संभावना नहीं है।
यदि हम लिपि की दृष्टि से देखें तो भारत और प्रमुख भाषाओं की लिपियों की उद्गम एक ही लिपि ब्राह्मी लिपि रही है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक की सभी भाषाओं की लिपियां ब्राह्मी की वंशज हैं। यदि जातीय आधार पर आर्य और द्रविड़ परिवार की भाषाएं अलग हैं, तो द्रविड़ परिवार की भाषाओं की लिपियों का उद्गम भी कुछ न कुछ अलग होना चाहिए था, जो नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि ब्राह्मी और कालांतर में देवनागरी लिपि का प्रचलन भी सर्व प्रथम दक्षिण में ही हुआ था। भाषाविद श्रीनिवास रिती की दृष्टि में अशोक-पूर्व ब्राह्मी ध्रुव दक्षिण में उत्पन्न हुई थी और आंध्र प्रदेश होते हुए उत्तर में गई। प्रारंभिक ब्राह्मी अभिलेख पांड्य प्रदेश की राजधानी मदुरा में प्रचुर संख्या में मिले हैं। अत: लिपि के आधार पर भी आर्य-द्रविड़ पृथकता का सिद्धांत खरा नहीं उतरता।
इस प्रकार हम देखते हैं कि साम्राज्यवाद के हित में ब्रिटिश इतिहासकारों और भाषा वैज्ञानिकों ने देश को विभाजित रखने और यहां के लोगों को जातीय और भाषाई आधार पर बांटे रखने के लिए जो प्रयास किए थे, आज उन पर पुनर्विचार करने की परम आवश्यकता है।
अक्टूबर 31, 2011 at 5:20 अपराह्न
द्रविड़ शब्द अंग्रेजों की दें है वास्तव में व्यापर करने वाले आर्यों को द्रमिल कहा जाता था सिन्धु प्रदेश व्यापारिक केंद्र था सरस्वती नदी के प्रकोप से यहाँ विनाश हुआ बाद में अंग्रेजो ने इसे द्रविड़ और आर्य दो नाम दे दिए रंग भेद भी बता दिया आज भी आप समुद्र के किनारे दक्षिण भारत में रहने लगो तो आप की आने वाली पीढ़ी दक्षिण भारतियों जैसी ही दीखेगी. सत्य तो यही है की समुद्र या नदियों के माध्यम से व्यापर करने वालो को द्रमिल कहा जाता था जो बाद में द्रविड़ बना वरना द्रविड़ और आर्य एक ही है
जनवरी 4, 2012 at 10:27 पूर्वाह्न
Krishan kumar misra ji aapne galti se sirf apni hi family ka varnan kiya hai.Aaryo me se aap nahi hai isliye yah aaryo ke bare me nahi hai.Chunati hai aapko ki kabhi bhi aap debate karne ke liye hame bula sakte hai.Debate camera par record hoga aur harne walo ko saja milegi 100 code ki.Aapko apni bate validate karni hogi aur hamko bhi.Dekhte hai aap bulate hai ya nahi
जनवरी 17, 2012 at 10:53 अपराह्न
mr. k.k. mishra, ye aryo k bare me bkwas kr k kya sabit krna chahtey ho, gulam honey k bhut sare karan they, aur ab past ki baat kyo karey hum, ab aisey toh tum “bihario” ne jo gund faila rkha hai useey pura india vakif hai….
hmmmmm…ab lgi na aag…aisey kisi dusri jati k bare me ulta bolney se kuch nhi hoga sir, aaj kaun si jati k log bura nhi kr rhey aur kaun si jati k log acha nhi kr rhey, kya aap kuch galat nhi krtey kya…….main bhi krta hu, jarurt hai khud ko sudharne ki aur acha bn kr logo k samne example establish krne ki…
‘don’t b a problem riser (by pointing finger,thus advertising the problem) rather be a solution’
kha suni maaf
regards
An Indian
जनवरी 25, 2012 at 8:50 अपराह्न
Great…Mera Desh Mahan, aur uske aap jaise mahan log, krishna kumar ji,
Just tell me one thing, aapne itni mehnat ki past ke bare me, to bhaisabh thoda present ke bare me bhi kar lete, akhir hum present me hi jite hai, ki hamre desh me christan and muslim community kya haram khori kar rahi hai, bco’z hamara future present se jurda hai na ki Past se….Wah re mere desh ke sache saput, islye hi kaha hai ki loktantra ki yahi kami hai jise dekho kuch bhi bol deta hai…
फ़रवरी 6, 2012 at 10:46 अपराह्न
aar aaj anaary ho rahe hai, aur iski vajah b pandit hi hain.
फ़रवरी 6, 2012 at 10:53 अपराह्न
aaj ham aaryon k niymo aur anushashan me chalne ki bajay angrajon k hi kanoon par chal rahe hain. kyoki congrace party ne bharat ko aajadi nhi dilwae balki angrejon se sauda kiya, shiksha ka, kanoon ka, sanvidhan ka, aur janta ko vivash kar diya, nirankush aajadi me sans lene k liye. gandhi shabd bharat ka abhishap ban gaya hai. yah shabd jab tak yojnaon me, noton me, school & college k naam par, history me rahega, bharat ka uddhar sambhav nhi hai,
मार्च 26, 2012 at 8:30 अपराह्न
hello to all
Listen Rajiv dixit in http://www.rajivdixit.com
to know the rality of Past India with proof and evidence.
Nitendr Raajput
अप्रैल 4, 2012 at 11:27 पूर्वाह्न
bhai waah kya visleshan hi Mishra ji ka ……….. jab tak aap jase jaichand ….. meer jafar ….. paida hote rahenge tab tak Hindustan ko Pakistan jase desho ki avasyakta hi nahi padegi………. vedik dharm ko vigyan ke chasme se poori duniya yaha tak ki NASA bhi dekh raha hi aur aap ise …… haramkhoro ki sabhyata bata rahe hi……. science ki history uthaoo sir…. adhi se jyada invension ……yha tak ki jis computer aur internet ko hum aap use kr rhe hi vo bhi …isi so called “haramkhor” ki calculation ki vajah se hi…jyada jankari ke liye Wikipedia me Charles babbage ki history pad lo…… shame on u ….. Jise apni sanskrati par proud nahi hi vo apne desh ke liye kya kaam kar sakega?? isme aap ki galti bhi nahi hi…….. hamare yha unhi agrejo ka high profile nukar banne ka jo ek prachalan chal pada hi!… called MNC’s …. bhai hame aajadi mili thi aapne ko agrejo ki gulami chodne ko … Hamare ancestor’s ne shocha tha ki hamare baccho ko aangrejoo ki gulami na karni pade …. becharoo ko kya maaloom tha ki unke bacche khusi khusi unki nukari aajadi ke baad bhi karenge….Hail Makale…… good job with great thinking…
जून 4, 2012 at 10:35 पूर्वाह्न
The design for the site is a little bit off in Epiphany. Nevertheless I like your weblog. I might have to install a normal web browser just to enjoy it.
जून 20, 2012 at 11:24 अपराह्न
kuch karne ke liye DIL ka ek pal ke liye hi saaf hona paryapat h……………..usko aap koi anya sabdo ka nam lekar ………uske achche kam kai burai na kare……………..yahi vinay!
जुलाई 22, 2012 at 7:18 अपराह्न
lok priyta pane ke bagut ganda shrishak chuna gaya…………..yeh karoro log ke mann ko thesh pahucheye ga………web per diye gaye lakhan ki aajadi yeh bahut bara durpoyog hai.
अगस्त 16, 2012 at 8:09 अपराह्न
aapki mahiti kam hai..kripya Satyarth Prakash padhiye ya kisi Arya Samaj Mandir me jaakar shanka samadhan kijiye ya visit http://www.Agniveer.com
अगस्त 19, 2012 at 3:20 पूर्वाह्न
sara padha ….bada aannd aaya …lekhn jimmedaari bhara kaam hai mitron
)
सितम्बर 12, 2012 at 12:14 अपराह्न
mitra apne bahut sunder likha ..mera bhi namis kai bar jana hua hai ..iswar ki kripa se mai bhi itihas ki thodi bahut jankari rakhta hu..apki sari bate veecharneeya hai..lekin haramkhor aarya khna uchit nahi arya koi vishesh vyakti nahi arya ka matlab uccha ,shrestha hota hai ..to jin haramkhor pando ke bare me apne likha hai vo arya kaise ho sakte hai ..vo to chor lutere hai …
दिसम्बर 1, 2012 at 4:28 अपराह्न
to phir un logan ko mention karo jo galat hain na ki “arya” sabd.
सितम्बर 28, 2012 at 1:20 अपराह्न
really feel good to see youth of my nation also think about it and its history……lekin mishra g plz bina kisi logic k apni personal thinking ko aise samagic sites par na dale….thik h apko jo shi lga apne likha or ek bat main apse bat kar rha hu kyonki ap aise hi koi bat nhi keh rhe kyonki apki jyatar bat sach h……….lekin apne jo kaha arya bahar se aye the to ek bar search kro ke aryavarta ki seemayein kahan tak thi apka sak mit jayega…..aur kisi achi jankari wale insaan se puchna ki vedo k anusaar is srishti ki uttpatti kahan hui ………jis madhya asia ki bat ap kar rhe ho wahan tak aryavarta ki hi seemaye thi …….aur ap ye bhi keh rhe ho k arya ka matlab h shreshth or jo shi nhi h wo arya nhi to phir arya haramkhor kaise ……ap apni hi bat se sehmat nhi ho…..or thik chalo apki bat mante h arya galat ved galat anrej galt muslim gal ab ap ye batane ki kripa karein ki shi kon h…………….
अक्टूबर 10, 2012 at 7:51 अपराह्न
”मैँ भारत काफी घूमा हूँ, इधर उधर मैँने यह देश छान मारा।
और मुझे एक भी भिखारी बल्कि एक भी चोर देखने को नहीँ मिला
यह देश इतना समृध्द हैँ और इसके नैतिक मूल्य इतने उच्च हैँ, यहाँ के लोग इतनी सक्षमता और योग्यता लिये हुये हैँ कि इस देश को कभी हम जीत सकते हैँ यह मुझे नहीँ लगता।
इस देश की आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक पंरपरा इस देश की रीढ़ हैँ
और अगर इस देश को जीतना तो इसे तोड़ना ही पड़ेगा
उसके लिये इस देश की प्राचीन शिक्षा पध्दति और संस्कृति बदलनी ही पड़ेगी
भारतीय लोग यदी यह मानने लगे कि ब्रिटिश जो हैँ वो श्रेष्ठ हैँ, अपनी स्वंय की संस्कृति से भी ऊचेँ हैँ
तो वे अपना आत्म सम्मान गवां बैढ़ेंगे और फिर शायद हमारे कहने पर चलेँगे”-
लार्ड मैकाले, ब्रिटेन पार्लियामेँट ,2 फरवरी 1835.
“English translation-
one thing if arya comes from other country then how ram setu was founded ion the way to lanka , why dwarka puri founded in sea as it is mentioned in hindu scriptures .
दिसम्बर 27, 2012 at 12:50 पूर्वाह्न
Hamari sanskriti mahan thi, mahan hai aur mahan rahegi. Ye kuch Angrejo ke manas putra hai jo is sanskriti ko badanam karne per tule hue hai. Pahle k jamane me kuchh brahman hue jo khudko sabse upper batakar is mahan si sanskriti ka satyanash karwa gaye, Apni panditai ki chhap chhodne. phir angrej aaye to yaha k kuchh gaddar unke sath ho gaye apne swarth ki roti sekne. is sanskriti per kai tarike ke nasty comment kiye. Phir abhi kuchh padhe likhe gawar, jinko kawadi ka gyan nahi sirf angerejo ki kitabe padh lene se khud ko gyani samajhate hai wastav me kore bewkoof hai. Hamari sanskiri, hamare naitik mulya, hamari jivancharya, hamara darshan, hamari chikitsa, hamara adhyatmik gyan, hamara vyapar, hamari sadgi, aur hamari soch itni mahan thi ki duniya k log yaha ye sab sikhne ate the. Jab angrejo ka astitva hi nahi tha. Aur vigyan ka aur duniya me padhai likhai ka koi astitva nahi tha, hamare desh me mahan lekhak, mahan darshnik aur vigyanik drishtikone aur vigyan ki samajh wale log the. Lekin hamare purvaj bahimurkhi hone ki apechha antarmukhi the, isliye unhone bhoutik gyan se jyada adhyatmik gyan ko jyada mahatva diya. Isliye hamare desh me kai adhyamic darshan shashtra, yog ka vikas hua. hamari mahantam sanskiriti ka both yahi se lagaya ja sakta hai ki, jab duniya k logo ko shayad chadi pahanna yad nahi tha tabhi rishi yagyavalk ne kaha ki, “Vaktyi swatantra janm leta hai, swatantra hi jina chahiye aur swatantra hi mar jana chahiye”.
Vidur niti kahti hai,”Dusro k sath vah vyahhar mat karo jo tumhe khud pasand nahi.
Upnishad kahte hai,” satya ek hai, gyani lok use alag alag nam se pukarte hai”.
Manu ne kaha hai, ” jaha nari ki puja hoti hai, waha devta was karte hai”
aur manu ne kaha hai,” 100 murkh ladko se achhi ek vidushi ladki achhi jo apne samaj, desh ka nam ucha kare”.
Sukti kahti hai,” jaise rath(chariot) ek pahye se nahi chal sakta, waise hi bhagya purusharth ke bina kuchh nahi kar sakta.
Bhagwad gita me likha hai,” jo vyakti hathi me, kutte me, chitti me, me,ya chandal me bhi usi ishwar ko mahsoos karta hai wo sabhi dharmo se shreshta hai”.
aur likha hai,” gyan k saman pavitra vastu is sansmar me dusri koi nahi hai”.
Ye hamari sanskriti ki mahan dharovar hai. Angrejo ne, ya samaj k thekedaro ne in bato k taraf aur aisi hajaro mahan bate jo hamare shastro me likhi gayi hai k taraf apna dhyan ko nahi diya.
Hamara dharm mahan hai isliye hum aaj bhi apne ma, baap ko, guru ko, bhagwan mante hai. sirf aur sirf hamara desh ki sanskriti ya dharm hi ye bata sakta hai ki duniya me sabhi striyo me hamari khud ki ma, beti ya bahan ki drusthi se dekho, ye bat alag hai ki hum us virasat ko bhul gaye aur hamara naitik patan ho gaya, aur jaise ki mackaley ne kaha tha ki is desh ka naitik mulya girane se hi ye desh gulam hoga, result hamare samne hai.
Dhanyawad
Anirudra
मार्च 27, 2013 at 11:51 अपराह्न
aryans ek mahan jati hai sabhy logo ko aryans kaha jata tha tum englishman or lord Mekale ke phelaye gaye roag se ab tak mukt nahi ho paye ho bhai
tumhare pass koyi pukhta sabut hai ki aary bahar se aaye hai or agar aarye ne dharm ka prachar kiya to Hindu religion ko banaya kisne ye bata ? kisi particular aadmi ne banaya hoga
Gaurav Tripathi
The Ancient Indian
Bharat ki prachin sanskriti ka punah jagran naveeenta k sath
आर्यों एक महान जाति है सभ्य लोगो को आर्य कहा जाता था तुम अंग्रेज या प्रभु Mekale के phelaye गए roag से अब तक mukt नही हो Paye हो भाई
तुम्हारे से गुजारें koyi pukhta sabut hai ki aary बहार से आए hai या अगर aarye पूर्वोत्तर dharm का प्रचार हिंदू धर्म को बनाया kisne तु बाटा किया? Kisi विशेष आदमी ने बनाया होगा
गौरव त्रिपाठी
प्राचीन भारतीय
भारत की प्राचीन संस्कृति का punah जागरण naveeenta कश्मीर sath
मई 1, 2013 at 3:00 अपराह्न
कृष्णकुमार जी!!..मैं आपका दुख,आपकी पीड़ा,आपकी अंतर्व्यथा सब समझ रही हूँ…इसी वजह से आपकी उत्तेजना इस लेख में दिखाई देती है…सामाजिक हो, राजनैतिक हो आर्थिक हो या नैतिक हो, हर जगह यही आम आदमी पिसता रहता है…जिसका आपने उल्लेख इस लेख में किया है….जब हर क्षेत्र में इसका इस्तेमाल हो ही रहा है…तो…धार्मिक क्षेत्र कैसे छूट सकता था!!!??….यहाँ तो बल्कि और भी सरल और सीधे तरीके से इसका इस्तेमाल किया जा सकता है….जिस तरह आप नैमिषारण्य की बात कर रहे हैं; मैं भारत में कई धार्मिक स्थलों का ये हाल देखती आ रही हूँ….हाल ही में अयोध्या में भी यही सब देखने को मिलता है…बस…इंसानियत ही कहीं नहीं दिखती है!!!…
मई 1, 2013 at 3:29 अपराह्न
बस…इतना ज़रूर कहना चाहूँगी,कि आप कुछ वैचारिक लिख रहे हैं; तो वो ज़िम्मेदार रूप से गम्भीर लगना चाहिए इसलिए भाषा और शब्दों के चयन पर अंकुश हो…ये ज़रूरी है!!!…शुभकामनाओं सहित!!!