photo courtsy by : K.L. Kamat

डांडी मार्च "फ़ोटो साभार के० एल० कामत"

नमक कानून के साथ टूटा एक मिथक “बिन्नियों वाला मिथक”

६१ वर्ष के युग पुरूष ने जब २४१ मील की लम्बी यात्रा लाखों -करोड़ों भारतीयों के साथ २४ दिनों में पूरी कर अप्रैल सन १९३० के प्रथम सप्ताह में डांडी में बिना टैक्स दिये नमक का निर्माण किया तो पूरी दुनिया इस क्रान्तिकारी कदम से हतप्रभ रह गयी । ब्रिटिश भारत के नमक कानून का उलंघन करके उन्होंने बरतानिया हुकूमत को बता दिया कि अब उनकी पूर्ण स्वराज की मांग को मानना ही होगा,

किन्तु बापू ने उस रोज एक और मान्यता को तोड़ दिया था जो हमारे जनमानस में सैकड़ों वर्षों से व्याप्त थी एक अंधविश्वास की तरह ! लेकिन भारत में कही इस बात पर चर्चा नही हुई जिसे आज मैं जाहिर कर रहा हूं अपनी दादी की जुबानी !!

यह बड़ा अजीब लग रहा होगा कि मेरी दादी और बापू के नमक सत्याग्रह में क्या संबध था ? जवाब हो सकता है कि वह भी हिस्सा थी इस आंदोलन का हर एक भारतीय की तरह !! किन्तु यहां पर मसला ये भी नही है !

“एक सामान्य सी बात है कि किसी मुल्क के लोगों को अपने आधीन करना हो तो उनकी नितान्त जरूरत की चीजों को अपने अधिकार क्षेत्र में कर लो फ़िर चाहे जैसे ड्राइव करो उस मुल्क की पूरी की पूरी आबादी को ।”

कुछ ऐसा ही किया था अग्रेजों ने हमारे मुल्क में “नमक” एक बुनियादी जरूरत है हमारे हाड़-मांस के शरीर की और इस जरूरत पर ताला लगा हुआ था बरतानिया सरकार का और यही वजह थी कि लोग नमक का इस्तेमाल “ऊंट के मुंह में जीरा” वाली कहावत के मुताबिक इस्तेमाल करते थे, अति आवश्यक वस्तु कि अनुप्लब्धता उस वस्तु को सोने (या कोई भी दुर्लभ व आसानी से न मिलने वाली वस्तु) के समान बना देती है ।

नमक का वितरण भी सरकार के हाथ में था । और लोग पचासों मील की लम्बी यात्रा पैदल तय करते हुये सरकार के मुख्यालयों पर जाते और यदि कही वितरण न हो रहा होता तो बिना नमक वापस होते । और ऐसी स्थिति में लोग एक दूसरे के घरों से नमक मांग कर काम चलाते।

उस दौर में दो बुनियादी चीजों का आदान – प्रदान आपसी सहभागिता-सहकारिता से होता था “आग और नमक”, मेरी दादी बताती थी कि लोग अपने घरों में गाय के गोबर से बने उपलो को जलाते थे और भोजन पकाने के उपरान्त उस बची हुई आग को राख से ढ़क देते थे जिससे आग दूसरी सुबह या शाम तक जीवित रहे । इस तरह जिसके घर राख ढ़कने की प्रक्रिया में अवधान आता है आग बुझ जाती तो वह दूसरे के घर से आग मांग कर अपना काम चलाता, आग को सुरक्षित रखने वाली महिला सुघड़(अच्छी) और आग का सरक्षण न कर पाने वाली महिला फ़ूहड़ (खराब) मानी जाती थी !

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मेरी दादी

खैर बात नमक की हो रही है! मेरी दादी का जन्म सन १९१२ ईस्वी में हुआ यानी सन १९३० ईस्वी में उनकी उम्र १८ वर्ष की रही होगी और सन २००६ ईस्वी में उनका देहावसान हुआ, वह इस धरती और इस मुल्क में कुल मुलाकर ९४ वर्ष रही।

गुलाम भारत और आज़ाद भारत के प्रत्येक अच्छे-बुरे हालात को उन्हो ने जिया और देखा । उनकी एक बात जो बचपन मैं नही समझ सका बड़ा हुआ तो समझ आया वही बयान कर रहा हूं । बचपन में मुझसे जब भी नमक जमीन पर गिर जाये या मै फ़ेक दू तो वह डाट कर कहती ये क्या कर रहा है यह तो अपशगुन है ! मै पूछता ऐसा क्यों ? तो जवाब मिलता कि नमक के जितने दाने जमीन पर गिरते है, गिराने वाले मनुष्य की उतनी बिन्नियां(आंख की पलक के बाल) गिर जाती है ! आज मुझे मेरे लोगो की वह बिडम्बना समझ आयी । जिसे पूर्व की राजशाही और अग्रेजी हुकूमत ने उत्पन्न किया था यानी “नमक पर नियंत्रण” और हमारे लोग इसी लिये उस नमक का एक भी दाना जाया नही करने देना चाहते थे जिसे वह बड़ी मुश्किलात से हासिल करते थे .सैकड़ो मील की पैदल यात्रा और तंगी के बावजूद नमक के बदले लगने वाली लागत ! और उस समस्या नें लोगो को यह धारणा विकसित करने के लिये मजबूर किया, ताकि बहुमूल्य व दुर्लभ नमक का एक कण भी बरबाद न किया जाय, खासतौर से अबोध बच्चो के लिए जो खेल -खेल में नमक की कीमत न समझने के कारण उसे बरबाद कर देते थे !

पर आज़ हमे इस मान्यता, अवधारणा से मुक्ति मिल चुकी है । महात्मा गांधी ने उस रोज़ नमक कानून ही नही तोड़ा भारत के हर घर में प्रचलित इस मजबूरी बस बनायी गयी मान्यता को भी तोड़ दिया वह दिन था “६ अप्रैल १९३० डांड़ी गुजरात भारत।”,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,किन्तु इसका मतलब ये कतई नही कि हम अपनी जरूरत से अधिक चीजो का बेजाइस्तेमाल करे !

अब दादी की बिन्निया गिर जाने वाली कहानी का सच मुझे मालूम है क्या आप को था ?

कृष्ण कुमार मिश्र

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भारतवर्ष

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