गांव का कच्ची मिट्टी का घर ऐर उसके सामने विचरण करते क्रौंच

मैनहन, खीरी, उत्तर प्रदेश भारत

क्योंकि अब वहा पेड़ नही बचे, लपचू एक ऐसा खेल है जिसमे खिलाड़ियों की तादाद पर कोई प्रतिबन्ध नही है, सब एक वृक्ष के नीचे इकठ्ठे होते फ़िर टास जैसा बात होती और एक बच्चे को बैटिंग करने का मौका दिया जाता बल्ले की नाम पर एक लगदा यानी बेहया या लकड़ी का टुकड़ा , जो भी इफ़रात में मौजूद हो वहां, करीब दो फ़ीट लम्बा यह लगदा(डंडा) फ़ेका जाता और जब तक वह बच्चा उसे उठा कर लाता सभी पेड़ पर चढ़ जाते, फ़िर वह जमीन पर मौजूद बच्चा उस डंडे को जमीन पर रख कर पेड़ पर चढ़ता उन सभी बच्चों में से किसी एक को पकड़ लेने या छू लेने के लिये, और जिसे भी वह छू लेता फ़िर उसे वह डंडा ऊठाना पड़ता और यह प्रक्रिया दोहरानी पड़ती जब तक की वह किसी को शिकार न बना ले यानी छू ले।

इस खेल के पीछे यदि कॊइ बेहतरीन भावना छुपी है तो वह बच्चो को विशाल वृक्षों पर चढ़ने की कला का प्रशिक्षण और वह मनोरंजन के साथ यानी शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ मानसिक प्रसन्नता की अनुभुति।

किन्तु अब हमारे गांवों के बच्चे लपचू नही खेलते क्योंकि गांव में विशाल वृक्ष ही नही बचे कलमी बघीचों ने उनकी जगह ली जिसकी जो भी डाल पकड़ ली जाय तो उसमे लटकने वाला बच्चा धराशायी……….इसके अलावा गांवों की बदलती संस्कृति जिसमें बचपन से ही बच्चे को विद्द्वान बनाने की जी तोड़ कोशिश शामिल है ये ऐसा युद्ध है जिसमे गार्जियन बच्चों के साथ-साथ युद्ध लड़ते है । रही सही कसर डीवीडी और सीडी ने पूरी कर दी है, ग्रामीण खेलॊं की विलुप्ति का एक और मुख्य कार्ण मेरी समझ में आ रहा है वह है आर्थिक सुरक्षा, इस अनियोजित विकास की दौड़ में मेहनत करने के बाद रोटी नसीब हो रही है किन्तु सकून नही।

लुक्काचोर_

यह खेल भी बहुत मज़ेदार है बचपन में मैनें इन सब खेलों के साथ जो आंनद की अनुभूति की है उसका वैसा बयान तो नही कर सकता। इस खेल में एक बच्चे को चोर मान कर उससे आंखे बन्द करने को कहा जाता है और फ़िर सारे बच्चे दौड़कर मिट्टी की घारियों, छप्पर की झोपड़ियों व धान के पैरा (पुवाल) की बनी विशालकाय चट्टों में छूप जाते थे, फिर वह बालक आखे खोलता तो सभी गायब और वह जुट जाता उनमें से किसी एक को खोजने में यदि कोई दिखाई भी पड़ जाय तो उस बालक को चोर बनने से मुक्ति मिल जाती और जो बच्चा उसके द्वारा खोजा जाता उसे चोर बनना पड़ता इस तरह खेल दूसरा राउड़ शुरू ए हो जाता,  ये खेल अंधेरा होने के बाद तक भी चलता रहता था क्योंकि गांव में कोल्हू होते थे जिनकी भट्टियों मे आग जलती और लोगों की मौजऊदगी से चहल-पहल हुआ करती थी,   यहां एक बात मेरे दिल में आती है जब मैं शहर के कुत्तों और उनके नवजात शिशुओं यानी पिल्लों को ठ्ण्ड मे ठिठुरते देखता हूं, जब लुक्काचोर खेल के दौरान मै किसी मिट्टी की घारी में छुपता जिसमें मवेशी या फ़िर उनके खाने का सामान भूसा आदि रखा जाता था, तो उसमे किसी कुतिया को अपने बच्चों के साथ पुवाल या भूसा पर बैठे पाता जो उस चारों तरफ़ से घिरे स्थान में ठंड में भी पुवाल की गर्माहट का आंनद ले रही होती थी, या फ़िर किसी पुआल(धान निकालने के बाद बचे हुए सूखे पौधे जो जानवर के खाने व मनुष्यों द्वारा जलानें में प्रयुक्त होता है) के चट्टे में  पिल्लों की मां द्वारा

खोड़ बनाई गयी होती थी उसमेम छुपता था गुदगुदे पुवाल की गर्माहट कभी-कभी अधिक देर छुपे रहने को मज़बूर करती भले ेल समाप्त हो जाये। अब खेतों में ही पुवाल की बिक्री कर दी जाती, या मशीन द्वारा धान-गेहूं आदि निकलवाने से उससे प्राप्त होने वाला पुवाल व भूसा खेत में ही नष्ट हो जाता है। अब गांवों में बच्चे लुक्काचोर नही खेल पाते, अब वह क्रिकेट खेलते है भले बल्ले के नाम पर लकड़ी का डंडा प्रयोग में लाया जा रहा हो, और अब उनके छुपने की जगहे भी समाप्त हो गयी चरागाह समाप्त होने से अब हर आम व्यक्ति मवेशी नही पाल सकता क्योकि उसके पास खेत नही और न ही वह घारी बना सकता है क्योकि अब गांवों में मिट्टी भी मोल मिलती है और घारी छाने के लिये पुवाल और खर-पतवार भी।

चीजे बदल रही है और उनके साथ-साथ मूल्य भी। मैं यह नही जानता आगे का भविष्य कैसा होगा पर आज़ के हालात बताते हैं कि माज़रा ठीक नही लगता ।

कृष्न कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

चरागाहों का खत्म होना भी इसका मुख्य कारण है जहां ये बच्चे टोलियों में अपने मवेशियों के साथ जाते और उन्हे चरने के लिये छोड़कर लपचू, सटर्रा, कबड्डी आदि खेलों में व्यस्त हो जाते…एक स्वस्थ्य मनोरंजन।

अब या तो गांव का बच्चा भारी-भरकम बस्ता लादता है या फ़िर सिर पर बोझा !

कृष्ण कुमार मिश्र

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