अंग्रेजी में Grove कहते है उस स्थान को जहां वृक्ष, झाड़ी, लतिकायें, और खर-फ़ूस सब हो एक छोटे क्षेत्रफ़ल में, हमारे ग्रामीण इस स्थान को अलाहिदा नामों से जानते रहे है, और इन नामॊं में वनकिया यानी वन का छोटा रूप, या जंगलिया के नाम से ज्यादा प्रचिलित है। इन्ही स्थानों मे तमाम जंगली पुष्प व फ़लों वाले पेड़-झाड़ी और लतायें मौजूद होती थी जिन न जाने कितनी तरह की चिड़िया, कीट-पतंगे, तितलिया मड़राती थी और मनुष्य भी अपनी रोज़मर्रा की तमाम जरूरते इन्ही जगहों से पूरी करता था जैसे लकड़ी, जानवरों की चराई और कुछ जंगली फ़लों का प्रयोग खाने में करते आये है। यह दुखद है कि अब ये वनकिया-जंगलिया समाप्त हो चुकी है और इन स्थानों पर विदेशी प्रजाति के पौधे लगायें जाते है जिससे विविधिता तो नष्ट ही होती है और ये व्यवसायिक इस्तेमाल के लायक ही होते है ग्रामीण जनमानस को इनसे कोई लाभ नही मिलता, केवल व्यक्तिगत लाभ………….

मैनहन में जंगल समाप्त होने के बाद भी मेरे बचपन में तमाम छोटी वनकिया थी किन्तु अब वह नस्ते-नाबूद कर दी गई है और साथ ही इनके साथ वह रंग-बिरंगे जीव भी समाप्त हो चुके है जिनका ये वनकिया घर हुआ करती थी।

एक बात और जो महत्वपूर्ण है, कि अब गांवों में सिर्फ़ कुछ गिनी-चुनी फ़सले बोई जा रही है जिनका आर्थिक महत्व अधिक है या सरकार -बाज़ार द्वारा किसानों को ऐसा करने पर मजबूर किया गया है इसके चलते अब वह सब घासे, नष्ट हो गयी है जो इन फ़सलों के साथ होती थी जिन्हे आप खरपतवार या वीड्स नही कह सकते क्योंकि ये घासे पशुओं व मनुष्यों दोनो के द्वारा खाने में भी प्रयुक्त होती थी, भारत की गरीब जनता का तो बहुत मदद मिलती थी इन वनस्पतियों से क्योंकि खेत के मालिक को कोई एतराज़ नही होता था इस बिना बोई प्रजाति का इस्तेमाल दूसरे द्वारा किये जानें में।

इसका उदाहरण है चना के साथ उगने वाली अकसा घास जिसे लोग कभी-कभी खाने में प्रयुक्त करते थे, गन्ने में होने वाली कोदरौली, हिरनखुरी, झरुआ आदि जिसे जानवर बड़े चाव से खाते थे, मड़ुआ घास को तो जानवर और आदमी दोनो बहुत ज्यादा पसन्द करते आयें अब ये विलुप्त हो चुकी है या धीरे-धीरे हो रही है और इनके साथ भी इन पर आश्रित कीट, पक्षी आदि भी समाप्त हो रहे है कोंकि अब हर किसान घास-नासक जहर का अंधाधुन्ध प्रयोग कर रहा है, जबकि इन घासों के सहारे जो जीव चिड़िया आदि इन खेतों मे रहते थे तो वह उस फ़सल में लगने वाले खिटों को भी अपना भोजन बनाकर संतुलन कायम रखते थे, यानी उस जीव ने आप के खेत की फ़सल के जितने दाने खाता था उसका कर्ज भी वह जाने-अनजाने अदा करता रहता था “इसे ही प्राकृतिक संतुलन कहते है लेकिन हमने उसे बिगाड़ दिया जो अब जल्द सुधर नही सकता”

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

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