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वृक्ष:..असना, बहेरा, बकैन, भिलवा, हर्र, कैमा या कैम, कंजी, किरियारी(अमलताश), नेवरा, पियामन, भिल्लर, सिहोरा, तेन्दू, बनबेरा, गोहलौरा, भटवास या कटु, चमरौधा, गन्धैला, झाऊ, करौन्दा, मैनफ़ल, रोहड़ी, रूसा, आइला, बेन्त, दूधीबेल, हडजोड़िया, कंजा, मकोई,

घास:…पनहर या चरनी, सिवरा, मकरा, अकरा, अकसा, मुनुमुन, मड़ौरा, कोदरौली, नागरमोथा या भादा, तिपतिया, हिरनखुरी, कुकुरौधा, झरूआ, मड़ुआ, सिलवारी, नारी, चिन्ना, पसाही, चौधरा, रामबांस

बेल:. कौड़िल्ला, कौआगोड़ी, गुर्च, ,…………………………………..

मेरी मां बताती है कि मैनफ़ल के फ़ल का प्रयोग सिरदर्द में किया जाता है, पियामन की जड़ व हड़जोड़िया के पौधे का औषधीय महत्व है।

ज्ञान की हो रही चोरी या फ़िर हम निकम्में है!

एक बात और हमारी इस प्राकृतिक विरासत का अध्ययन अपनी भाषा में हो और उसे संरक्षित किया जाय ताकि उससे कोई विदेशी चोरी न कर सके, दुनिया को हम बतायें कि हमारे यहां ये वनस्पति है जिसका महत्व फ़ला बीमारी में है जो कि आधुनिक मेडिकल साइन्स में लाइलाज है और इसका पेटेंट भी हमारा हो, किन्तु ऐसा नही है क्योंकि विदेशियों ने हमारे सभी ग्रन्थो का अनुवाद सैकड़ों वर्ष पहले कर लिया और उस ज्ञान का लाभ उठाया, और आज भी हम जो भी कर रहे है उन्ही की भाषा में और हम ठीक से अपनी बात विश्व मंच पर कहे इससे पहले वह इस ज्ञान को अपने तरीके से परिभाषित कर दुनिया के आगे परोस देते हैं।

क्योकि कोई भी वनस्पति संपदा की चोरी कर सकता है किन्तु उस वनस्पति के गुण-दोष को आसानी से नही जान सकता जब तलक हम उसे न बताये और यदि जान भी जाये तो उसका प्रयोग किस तरह और कहां करना है ये वह नही जान सकता बल्कि हमारे पूर्वज सदियो से इन प्रयोगों को दोहरते आयें सफ़लता पूर्वक यानी मेडिसिन टेस्टिंग।

जहां तक मैं सोच पा रहा हूं भारत के गांव, कस्बे व शहरों के नाम उनकी भौगोलिक स्थिति, इतिहास, व वनस्पतियों की बहुतायात में उपलब्धता के आधार पर रखे गये जिसमें गांवों के नाम तो भौगोलिक व पेड़-पौधों की उपस्थिति के आधार पर अधिक आधारित है, जैसे ऊपर दिये गये पौधो व घास के आधार पर यदि मै अपने जनपद व आस-पास के जनपदों के गांवों के नामों का मिलान करे तो क्या महोली, मड़ौरा, कौड़िल्ला, कैमा, आदि ये वनस्पति भी है और गांवों के नाम भी इसके अलावा क्या मैनफ़ल का अपभ्रंस मैनहन नही हो सकता। क्योकि मैं तमाम गांवों को जानता हूं जहां पाई जाने वाली वनस्पति के आधार पर उनके नाम है ये अलग बात कै की कालान्तर में वे प्रजातियां विलुप्त हो गयी, राजा-महाराजा या धर्मिक व्यक्तियों के नाम पर गांव व शहरॊं के नाम रखना काफ़ी बाद में प्रचलित हुआ और कुच नवीन गांवों पर यह बात ज्यादा लागू होती है, अकबरपुर, मोहम्मदपुर, आदि आदि ऐसे भी तमाम गांव मेरे जनपद में है और कुछ तो अधिकारियों के नाम पर भी जैसे सरैया विलियम, थारन्टन स्मिथ आदि आदि।

हमारे जानवर

उपरोक्त में तमाम घासे है जो समाप्त हो चुकी है विकास के नाम पर और वो जगहे भी जहां ये उगती थी और इनमे पौष्टिक तत्वों के अलावा औषधीय तत्व भी थे जो हमारे मवेशियों को ताकत के अतिरिक्त उन्हे स्वस्थ्य भी रखते थी अब सरकार और हमारे लोग कहते है कि दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जाय तो बताइए यह कैसे संभव होगा क्योंकि अब न तो चरागाह और न ये वनस्पतियां जिन्हे जानवर खाते थे।

तो क्या अब दुग्ध व्यवसाय फ़ार्मी मुर्गा पालन की तरफ़ तब्दील हो रहा है सोचिये एक छोटे से दबड़े में बधें ये जीव जिन्हे सूखा भुसा और आक्सीटोसिन का इन्जेक्शन नसीब होता है खाने के नाम पर, सरकार के इस दवा पर रोक लगाने के बावजूद!

ये तमाम नाम जिन्हे अब हमारी नई पीढ़ी नही जनती और ये शब्द स्थानीय होने के कारण आप को किसी अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोष में भी नही मिलेंगे, चूकि आजादी के बाद भारत सरकार ने उन तमाम चीजों का डाकूमेन्टेशन नही किया जिसे अग्रेज करते रहते थे यह एक विडम्बना ही है!

तो अब कैसे पहचानेगें हम इन दुर्लभ पौधों को जो अनगिनत औषधीय गुणों से युक्त है?

क्योंकि अग्रेजों ने जो ग्रन्थ तैयार किये थे वो अब बहुत पुराने हो चुके है और उनमे दिये हुए देशी नाम जो स्थानीय बोलियों में है अब बदल चुके है हमारे जनमानस में जैसे रोहीणी अब रोहनिया हो चुकी है, रूसा रुशाहा, सिहोरा, सिहोरिया, पतेर, पतौरा, और तमाम चीजों के तो नाम ही बदल चुके है हमारी बोली-बानी में, हमें जो बताया गया हमने वो किया सरकार ने कहा हाईब्रिड बीज बोईए तो हमने वही किया, उसने जंगल काटे और विदेशी प्रजातिया रोपी, तालाब पते बिल्डिग बनी, कहा गया कि पेस्टीसाइड का इस्तेमाल करो, फ़र्टिलाइजर डालॊ हमने किया, अब वही लोग कहते है कि देशी फ़सले उगानी चाहिये, कीटनशाक और फ़र्टिलाइज़र का इस्तेमाल नही या कम करना चाहिये, जंगल लगाइए आदि आदि अब हम जब सब खो चुके है कहां है देशी असल बीज जिन्हे हम रोपे, कहां है …………

अब न तो गावों में वनकिया बची है न ही जंगलियां तो फ़िर अचानक वन या जंगल कैसे प्रगट हो जायेगें?

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७

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