कही ककरहा ताल सरोवर निर्माण की अदभुत परंपरा तो नही !

कल रात में खीरी के एक गांव छाऊछ जो शहर से जुड़ा हुआ है, में मैं मेरे मित्र हिमाशु तिवारी के घर पर था, अलाव जल रहा था और मेरी गुफ़्तगू चाचा श्री प्रकाश चन्द्र तिवारी जी से शुरू ए हुई मामला पौराणीक बातो तक गया और फ़िर गहराई लेते हुए महाभारत काल तक, कई चीज़े सामने आई जिनसे मै बिल्कुल अनिभिज्ञ था, इस शब्द के बारे में मेरा मानना है, कि अनिभिज्ञता ही जीवन में उल्लास और संवेदनशीलता लाती है, और जिज्ञाशा भी ! नही तो हम बुद्ध हो जाये और संसार की व्यवस्था देवलोक जैसी किसी व्यवस्था में तब्दील हो जाये और यह भयानक परिवर्तन कैसे परिणाम देंगा यह सोच कर मै विचलित हो जाता हूं खैर बात शब्दों की हो रही है ।

छाऊछ में मध्यकाल के किसी राजा की गढ़ी के अवशेष है किन्तु उनका इतिहास अब विस्मृत हो चुका है।

रानी विजया कुंवरि आफ़ महेवा

यही मुझे मालूम हुआ कि लखिमपुर में बेहजम बस अड्डे के पास एक पक्का तालाब और एक सुन्दर बगीचा जिसमें एक खूबसूरत निवास स्थान बना है आज वह मन्दिर का रूप ले चुका है किन्तु संगमरमर से सजाया ये सरोवर और इमारत कभी महेवा रियासत की रानी विजया कुंवरि का प्रसाद हुआ करता था और यह सरोवर उनके जल क्रीड़ा का स्थान किन्तु उनके बनारस चले जाने के बाद उनकी जमीने जिन्हे उन्होने ने अपने सेवकों के हवाले कर दी थी और एक सन्त ने इसे मन्दिर का रूप दे दिया।

इतिहास की ये झलकियां मुझे और जानने की जिज्ञासा की ओर दौड़ने को कह रही है। मैं जब उस जगह पहुंचूगा तो आप सब को मिलूंगा एक नई कहानी के साथ!

वालदा

इस शब्द को जानने से पहले बग्गर शब्द को जान लेना जरूरी है, बग्गर गांवों में प्रचलित शब्द है जो उस स्थान को कहा जाता है जहा मवेशी पाले जाते है और उनके खाने आदि की व्यवस्था यह स्थान एक मैदान जो घिरा भी हो सकता है फ़ूस-टटिया से कांटों से या चारदिवारी से मध्य में वृक्ष आदि और एक घारी(कच्ची निट्टी का बना घर ) और उसके आगे छप्पर, घारी में भूसा, चारा वगैरह और कृषि संबधी उपकरण रखे जाते है और उसके आगे के छप्परों में मवेशियों के रहने की व्यवस्था। और इस घारी और छप्पर वाले स्थान को वालदा या वाल्दा कहते है। अर्थात बग्गर में बना मवेशियों का घर वालदा कहलाता है।

छाऊछ में कुछ एतिहासिक प्रमाण_

मै उत्सुक रहता हूं ग्रामीण भाषा के शब्दों और उनके इतिहास को और यही उत्सुकता मुझे ले गयी छाऊछ के कुछ एतिहासिक स्थलों में मेरे यह पूछने पर कि चाचा गांवों में ककरहा नाम ताल क्यों होते है उनका भी जवाब मेरे अनुमान से मिलता जुलता है क्योंकि मैनहन, दुधवा और अन्य स्थानों पर तमाम तालों के नाम ककरहा या इससे मिलते जुलते है और इन सब जगहों से भी मैं परिचित हूं, तालाब की तलहटी में कंकड़ होना ही इस शब्द कि उत्पत्ति का कारक बना, किन्तु इन सभी ककरहा तालों में ये कंकड़ कहां से आये जबकि इनके बिल्कुल समीप के तालों की तलहटी में चिकनी मिट्टी मौजूद है?

मैनहन में ककरहा ताल से जुड़ा हुआ कुण्डा ताल जिसमें चिकनी मिट्टी है और वह ग्रामीणों द्वारा डेहरिया, कच्चे घरों की मरम्मत और मिट्टी के बर्तन बनाने में इस्तेमाल होती रही है।

मैं सोचता हूं कि कही ये तालाब निर्माण की कोई व्यवस्था तो नही थी जिसमें इसकी तलहटी में कंकड़ डाले जाते हों ताकि सोतों से स्वच्छ पानी छन कर आये और उसमे नहाने वाले लोगों के पैर मिट्टी में न धंसे और यदि कोई चीज़ तालाब में गिर जाये तो वह मिट्टी-कीचड़ में पैबस्त न होने पाये बल्कि तलहटी में कंकड़ों पर सुरक्षित रहे। यहां एक बात गौरतलब है कि ये  कंकड़ नुकीले न होकर गोल है ताकि मनुष्य और जानवर दोनों के पैर सुरक्षित रहे, छिद्रदार कंकड़। झाऊ पत्थर के………………।

तालाब निर्माण की तकनीक जो प्रचलित थी हमारी प्राचीन ग्रामीण सभ्यता में। कुछ आप भी सोचिये और बताइये।

और यह तकनीक जोड़ती है उन सब क्षेत्रों को जहां ककरहा ताल है और उन लोगो को भी .ये सभी एक ही परंपरा के लोग रहे होगे।

चाऊछ में भी मुझे पता चला ककरहा ताल के पास मठहा ताल है उसमें कंकड़ नही है और वहां पांच मठ बने हुए है इतिहास में इसके प्रमाण है कि विराटपुरी खीरी जनपद के बड़खर गांव में थी और यह सारे क्षेत्र उसी राज्य की सीमा में थे इस लिये अज्ञातवास के सम्य पाण्डवों के दुर्दिन भी इन तमाम जगहों पर बितीत हे जिनमें छाऊछ का जिक्र मैने पहली बार सुना जबकि आज के दुढवा टाइगर रिजर्व के जंगलों में कई स्थानों पर पाण्डवों के निवास करने की बाते कही जाती है।

इन मठॊ में चार मठ एक स्थान पर और एक थॊड़ा अलग और विशाल, कहते है पांचाली इसी मठ में रहती थी और इस मठ के द्वार पर जिसकी खड़ाऊ मौजूद होती थी तो यह अन्य भाईयों में मान लिया जाता था कि आज द्रौपदी के साथ रात्रि विश्राम कौन कर रहा है!

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