नेहरू और उनकी पुत्री इन्दिरा गांधी रूस में एक कृषि प्रदर्शनी में

विचार धाराओं का प्रयोग और उन्हे सार्थक बनाने में गांवों की प्रयोगशालाओं की तरह जो भूमिका रही है उसे हम नही भुला सकते, विचार और उनके प्रयोग दोनो के उदाहरण हम बापू, लेनिन, और लातीनी अमेरिका की क्रान्ति मे खोज सकते है।

इन्ही गांवों में से एक मैनहन गांव का यह गवांर आज अपने नज़रिये को जाहिर कर रहा !

कल मेरी बात मेरे मित्र सुशान्त जी (जी शब्द से मेरे दक्षिण पंथी होने का अनुमान मत लगाइयेगा) से हो रही थी बावत राहुल गांधी के, वो कुछ लिखना चाह रहे थे, और मै शुरू हो गया जैसा कि हमेशा मेरे साथ होता है दौरा-ए-व्याख्यान  एक………बीमारी

राहुल जिन्हे आप सुल्तान कह सकते हो और भविष्य के प्रायोजित प्रधानमन्त्री किन्तु क्या उनमे वो लक्षण परिलक्षित हो रहे है, जो किसी मुल्क के लम्बरदार में होने चाहिये। सुल्तान इस लिये कहा कि १९४७ ईस्वी में ब्रिटिश क्राउन के मुलाजिम माउन्टबेटन ने इडिंया को डोमेनियन मुल्क के तौर पर नेहरू के नाम स्थान्तरित किया था । उस बिनाह पर ये सुल्तान है भारत के, और वह दस्तावेज़ आज भी भारत के पास मौजूद नही है, यदि हैं तो नागरिकों को उन्हे देखने की इज़ाजत नही। प्रायोजित इस लिये कि आप को जिस तरह पालिश किया जा रहा है तमाम देशी-विदेशी राजिनीतिक महत्माओं द्वारा उसके बावजूद ये पोलिश यही प्रदर्शित कर पा रही है, कि साहब ३८-३९ वर्ष की उम्र में भी इन्नोसेन्ट और दुनियादारी से बेखबर है, और किशोर-बालक की तरह व्यवहार करते है, यदि यह रणनीति है ऐसी छवि प्रदर्शित करने की तो  तो यकीनन बेमतलब होगी और यदि उनका ऐसा व्यक्तित्व है तो यकीनी तौर पर भारत को ऐसा या किसी मुल्क को ऐसा प्रधानमन्त्री नही चाहिये होगा।

जे०एन०यू और अन्य जगहों पर जहां भारत के ग्रामीण-शहरी, मध्य-निम्न और उच्च तमाम वर्गों के लोग अपने -अपने सवाल करते है तो बड़ी शालीनता से कुछ मीठा जवाब देकर बच-निकलते है अच्छा है इससे छवि भी बरकरार और सवाल से भी पीछा छूट जाता है, पर क्या ये एक राजनीतज्ञ के गुण है।

मुझे शक है कि जनाव ने अपने नाना का भी बेहतरीन साहित्य नही पढ़ा होगा जो उन्हे जमीनी तो नही किन्तु किताबी ही सही हिन्दुस्तान और दुनिया की झलकें दिखा सकता था, और महात्मा का भी नही क्योंकि वो सारी चीज़े नदारत है आप में।

मैं एक बात कहना चाहूंगा कि उन्हे बेनिटों मुसोलीनी, चेग्वेरा, एदोल्फ़ हिटलर, चर्चिल, लेनिन और स्टालिन की आत्मकथा से लेकर भारत के नेहरू, गांधी और रामधारी सिंह दिनकर के भारत को पढ़ना होगा और इन्हे अपने चरित्र में उतारना भी, यहां ये विवाद का विषय हो सकता है कि भाई उपरोक्त तानाशाहों को क्यों तो जवाब हैं हालात बदलते है, मुसोलीनी की बीस वर्ष का अथक संघर्ष रोम के भ्रष्ट राजा और उसकी संसद के खिलाफ़, जातीय हिंसा के खिलाफ़ और पीपल द इटालिया अखबार से इटली के लोगों को अपनी बात बताना और लोगों का उनके साथ आकर रोम की सड़को पर आंदोलन कर देना, ऐसा ही कुछ जर्मनी में था, सैनिक मरते वक्त भी जहाजों पर हिटलर और जर्मनी के गीत गाते थे। स्टालिन एक छोटा सा सैनिक था जिसका एक हाथ शुरूवाती सैनिक अभियान में बेकार हो गया, उसने रूस की सेनाओं का नेतृत्व किया तमाम उदाहरण है, हम सभी को तो कम से कम इतना तो सीखना ही चाहिये कि कैसे और किन परिस्थितियों मे ये लोग इतनी बुलन्दी पर पहुंचे और जो गलतियां इनसे हुई उनसे सबक भी।

वैसे तो मै कह सकता हूं कि इतिहासकार का नज़रिया होता है और हम चीज़ों को उसी की नज़र से देखने लगते है और ऐसा ही इंग्लैंड को छोड़कर योरोप के प्रति हमारा है क्योंकि हमने उनकी नज़र से देखा है इन सबकों

इतिहास में क्या हिटलर से अधिक बर्बरता अग्रेजॊं ने नही की हिन्दुस्तानियों लातीनियों और अफ़्रीकियों के साथ और यदि लाशें गिन ली जाय तो जिन तानाशाहों को यही लोग दुर्दान्त कहते है तो उनके द्वारा गिराई गई लाशों से सैकड़ो गुना लाशे इनने गिराई है अतीत में।

क्या भारत विभाजन के दौरान जो लाखों लोग मारे गये वो नेहरू और जिन्ना जैसे महत्वाकाक्षी लोगो की देन नही थी!

हम अंग्रेजो को विदेशी शासक मानते है और अपने आप को गुलाम किन्तु हम मुस्लिम शासन को विदेशी शासन नही मानते क्योंकि उनके पास कहने को घर ही नही था खानाबदोशों ने मुल्क को हथिया लिया इन कायर भारतीय रजुल्लों की मदद से और जजिया से लेकर तमाम प्रतिबन्ध लगा दिये गये, हम पर वो गुलामी नही है हमारे इतिहासकारों की नज़र में,  कुछ तो डरते हैं,  क्योंकि मुस्लिम आबादी मौजूद है। किन्तु क्या कोई भारतीय मुसलमान इस गलत बात को सही कहेगा बिल्कुल नही बात धर्म की नही शासन और शासक की हो रही है, हां कुछ तो अल्पसख्यक वोट की वज़ह से चीज़ों को उल्टा करके देख रहे है? चूकि अंग्रेज़ उस वक्त बोरिया-बिस्तर लेकर चले गये थे तो आज़ादी का जोश और इतिहास में उन्हे शैतान और न जाने कितनी गालियां देने का अधिकार हम पा गये,  यदि उनमे से १० फ़ीसदी आबादी यहां मौजूद होती तो इतिहास कुछ और लिखा जाता, वज़ह यह है कि हम जिन्दा कौमें नही है।

हां बात नेहरू कि हो रही थी वह एक अच्छे इतिहासकार और मह्त्वाकाक्षी व्यक्ति थे, कुशल राजनैतिक व्यक्ति मैं उन्हे नही कह सकता, किन्तु शुरूवाती दौर में भारत को हांकने की अपरोक्ष कोशिश उन्होनें उन्ही लोगो की तरह किया…………………….उनकी १९५५ की रूस यात्रा में मैने उन्हे नाटकीय अंदाज़ में हाथ में रूल लिये देखा जा सकता है, जैसे रूसियों को यह बताना चाह रहे हो कि मैं भारत…………..

देखिये और सोचिये हमारे महान नेता की शख्सियत कैसी है इनके मध्य

रूस यात्रा के दौरान नेहरू और हाथ में उनके तानाशाहों वाली छड़ी

मुद्दों पर आक्रोश, साहस और जज्बों की कमी किन्तु व्यक्तिगत मसलों में हर वक्त आक्रोश…..साहस सभीकुछ फ़िर चाहे बापू पर चिल्लाना हो, या कांग्रेस के नेताओं पर, या फ़िर भारत के लोगो पर जिसे वह अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते थे। १९६२ में चाइना पर आक्रोश, साहस, जज्बा दिखाने की बात आई तो कलई खुल गयी, जनाब लार्ड माउंटबेटेन के तो बिल्कुल शागिर्द थे। एक तस्वीर देखियेगा जिसमें वायसराय अपनी पत्नी एडविना के साथ अपनी नेवी वाली वर्दी में है, नेहरू पीछे खड़े है। एडविना तनी हुई सीधे आगे को देखरही हैं, किन्तु आप साहब मुगल दरवार के किसी मुलाजिम की तरह झुके हुए बिना मतलब हसंने और कुछ फ़रियाद करने की कोशिश कर रहे है, उन दोनो की थोड़ी सी जर्रानवाजी पाने के लिए मुझे उन कलुषित दिमाग वाले लोगों पर हंसी आती है जो नेहरू-एडविना के प्रेम संबध कायम कराने की आज़ भी कोशिश में जुटे है, कि इसी से शायद किताब बिक जाए, एक मालिक और उसके गुलाम मुलाज़िम में प्रेम बहुत अजीब स्थिति में होता हैं डोमेनियन भारत का वायसराय और उसके द्वारा नियुक्त प्रधानमन्त्री।.मालिक-नौकर की प्रेमकहानी.बनाए रहो………..

भारत की अद्वतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी, यह वह व्यक्तित्व था जिसने अपना आक्रोश, साहस जज्बा अपने व्यक्तिगत मामलों के लिए नही बल्कि देश के लिए बचा कर रखा था और आप उनके साहस के उदाहरण पाकिस्तान, चीन आदि के मसलों पर देख सकते हो, एशिया में भारत भले ही महाशक्ति न हो , किन्तु उस वक्त वह महिला महाशक्तिनी पूरी दुनिया में अपनी व्यक्तिकत ताकत से भारत की ताकत को परिभाषित करवा रही थीं, क्रेमलिन से लेकर व्हाइट हाउस तक अगर डरते नही थे उनसे, तो सहमते जरूर थे। हां इन्दिरा जी के व्यक्तित्व निर्माण में नेहरू का ही योगदान था एक बेहतर पिता के रूप में। सर्वश्रेष्ठ पिता के तौर पर।

मैं इन्दिरा जी के बाद यदि भारत के किसी बेहतर प्रधानमन्त्री को जानता हूं तो वह चन्द्रशेखर थे उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली के आगे राजीव और अन्य प्रधान्मन्त्री भी फ़ीके थे किन्तु अफ़सोस उन्हे मौका नही मिला….।

एक सत्य और हंसी की बात क्या राहुल में यह क्षमता है कि भारत के राजनैतिक धरातल पर मौजूद बिचेज़ और डेविल्स से मुलाकबला कर सके, संसद और उसके बाहर, ताड़ुका, महिषासुर टाईप के नेताओं से।

श्रीमती सोनिया गांधी  एक संक्षम व कुशल राजनैतिक अवश्य है किन्तु भारत के रेसिज्म की अवधारणा से युक्त बीमार लोग उन्हे पसन्द नही करते।

राहुल को चाहिये वो मुद्दो की लड़ाई जिन्दा लोगों की तरह लड़े ताकि हमारी सोयी हुई कौमें फ़िर से सक्रिय हो, और उनकी यह लड़ाई और ताकत का असली अन्दाजा तो तब लगे जब विपक्ष में आकर इन सबकी लड़ाई लड़े….. गांवों और वहां के अन्नदेवता के अधिकारों और दरिद्रनारायण की रोटी की …………..

फ़िलवक्त मैं भारत में किसी भी प्राइमिनिस्टरियल कन्डीडेट को नही जानता जो हमारे मुल्क का सरबरा बन सके!

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारत वर्ष

Advertisements