सरकार की अर्थनीति, व्यापारनीति, और राजनीति इन तीनों चीज़ों से मैं कोई राफ़्ता नही रखता और न ही मुझे इस वाबत बहुत जानकारी है, लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं, कि यदि देश के हालात खराब हो या इन नेताओं के द्वारा खराब किए जा रहे हो तो हमारे गांव इस बात की कूबत रखते है, कि इन्हे सुधार सके और उन लोगो को सबक भी सिखा सके, जो इस देश को चलाने का दम भरते है।

कल मैं शक्कर खरीदने गया तो कीमत ४० रूपए प्रति किलो, मुझे क्रोध भी आया और शर्म भी क्योकि मैं दुनियां के उस हिस्से में रहता हूं जहां गन्ना उत्पादन और चीनी उत्पादन दोनों का ग्राफ़ बहुत ऊंचा है। खीरी जनपद जहां चीनी मिलों की तादाद और लाखों हेक्टेयर गन्ना, ये दोनों सबब है दुनियां के लोगों की होठों की मिठास का, किन्तु इसी जनपद के लोगो को चीनी नसीब नही है, और न ही उस गन्ने की कीमत जिसके लिए हम पूरे  वर्ष हाड़- तोड़ मेहनत करते हैं। मसलन खेत की जुताई,  बीज की व्यवस्था, बुआई, खाद-पानी, और गोड़ाई फ़िर गन्ने की छुलाई-लदाई, और मिलों के दरवाज़े तक की ढुलाई, आदमी-बैल दोनों की जान निकल जाती है, इस फ़सल के उत्पादन में ऊपर से गन्ने के उत्पादन में आने वाली लागत किसान को कर्ज़ के बोझ से बोझिल कर देती है। इन तमाम बदहालियों के बाद न तो वह रकम मिलती है जिसे मुनाफ़ा कहा जा सके, और न ही उसे वह चीज़ आसानी से प्राप्त हो पाती है जिसे वह खुद उत्पादित करता है यानी “चीनी”! इसे बिडम्बना ही कहे कि, एक भी दाना नही नसीब होता है इसके मुख्य उत्पादक को और न ही उस जानवर को जो इसे उत्पादित करने में सबसे ज्यादा महती भूमिका निभाता है पर कोल्हू लगाने से यह विडम्बना अवश्य दूर हो जाएगी।

मैं कहता हूं की टाटा कार बनाते है तो उसकी कीमत का निर्धारण वो करते है। बिड़ला सीमेन्ट बनाते है कीमत वो निर्धारित करते है….किन्तु जब किसान फ़सल उत्पादित करता है तो उसकी कीमत तय करने वाली सरकार, बाज़ार और मिल मालिक कौन होते है। क्या हम अभी भी बंधुआ मज़दूर है इससे तो बेहतर है कि कम्युनिस्ट शासन की तरह सरकारी फ़ार्म बना दिए जाय और हम पूरी तरह से मज़दूर बन कर काम करे ताकि हमें संतोष तो रहेगा कि हम सिर्फ़ मज़दूर है न कि धरती के टुकड़ों के मालिक जिसे किसान पूजता है मां की तरह, पिता की तरह और देवता की तरह।

किसान को चाहिए की सारे आंदोलन बन्द कर दे और पंचायत स्तर पर यह प्रस्ताव लाए की गांवों में फ़िर से कोल्हू आबाद किए जाए और हम खुद गुड़ का निर्माण करे अपनी फ़सल से अपना उत्पादन। इससे कई फ़ायदे होगे जिनमें

शक्कर की जरूरत पूरी होगी । गुड़ जो शक्कर से ज्यादा फ़ायदेमंद है सेहत के लिए, मिल मालिकों को अपनी हैसियत का अंदाज़ा लगेगा और सरकार को अपनी गलतियों का। ये सारे के काम एक साथ हो जाएगें।

मेरी नज़र में एक विषेश लाभ होगा, पर्यावरण का और फ़िर से गांवों में फ़ूल खिलेगे, चिडिया चहचहाएगी, मधुमखियां मधु इक्कठठा करेगी,  बर्र-डिंगारे भिन-भिनाने वाला गीत गायेंगे, जानवर   शरबत पियेंगे  और कुत्ते मिठाई खायेंगे, गांव रात में भी जगमगायेंगे, चहल-पहल होगी, लोगों में सामुदायिक प्रेम का प्रादुर्भाव होगा।

कुछ इस तरह– बहना बनेंगें( गुड़-राब बनाने का स्थान) जहां कोल्हू गड़ेगा, भट्ठी बनाई जाएगी, गन्ना पेरा जाएगा, रस निकलेगा,  विशाल कढ़ाइयों में गर्म किया जाएगा, पेराई से निकली गन्ने की खोई से भट्ठी गर्म की जाएगी और गुड़ के बाइ-प्रोडक्ट बनेगे, जैसे मई (गन्ने का रस गर्म करने पर जो झाग बनता है) जिसे कुत्ते, कीट व मवेशी खाते है, धोवन (कढाई की धुलाई) से निकली मिठास तमाम जीवों की ग्लुकोज़ की जरूरत पूरी कर देती है। लोग जुटेगे एक साथ काम करेगे आपसी संवाद होगा——————आदि-आदि

हम इस उत्पादन को बेचकर रूपए (मुद्रा) की जरूरत भी पूरी कर सकते है और मिठास की भी। चलिए थोड़े दिन शकर न खाई जाय, सफ़ेदी का चक्कर छोड़िए और स्वस्थ्य रहा जाय।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

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