मैनहन की तमाम सुबहों में मैने वो गीत सुने जिन्हे चुनुवा फ़कीर गाया करते थे। अब वे लोग जैसे विलुप्त हो गये या यूं कहे कि विकास की बलि-वेदीं पर चढ़ा दिए गये। भोर हो नही पाता था पांच या सात की तादाद में ये लोग पीले य सफ़ेद वस्त्रों से आच्छादित, नंगे पैर, और हाथों में कंमडल लिए गांव की फ़ेरी करते, गीत गाते जैसे ग्रामीणों को जगा रहे हो कि अब भोर हो गई है अपनी दिनचर्या शुरू करे !!  जब गांव की परिक्रमा पूरी हो जाती, तो वो गीत गाना बंद कर देते, और फ़िर एक दूसरी परिक्रमा करते और ग्रामीणों के द्वार-द्वार जाकर रुकते, जो कुछ मिलता चुपचाप ले लेते और चले जाते।

…………………………….चुनुवा फ़कीर

बस अन्तिम शब्द याद रहे है मुझे गीत धूमिल हो गया है कभी किसी बुजुर्ग से पूंछूगा और विस्तार से बताऊं गा आखिर कौन थे वे लोग।

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