मेरी मां

अभी शाम के वक्त मेरी मां ने मुझसे कहां कि आज उन्हे बहुत पुरानी कविता याद आ गयी, जब छत पर गय़ी और आसमान की तरफ़ देखा, “अम्मा जरा देख तो ऊपर चले आ रहे हैं बादल……….” उन्हे इस कविता कि कुछ पंक्तिया ही याद थी ।  मै आनलाईन था और बड़े गर्व से बोला अम्मा अभी आप को वह पुरानी रचना पढ़वाता हूं, तभी  नेट पर मेरा अथाह विश्वास टूटने लगा जब पहली दफ़ा मैनें गूगल में कविता के कुछ शब्द लिखे। किन्तु जैसे मैने दोबारा थोड़ी हेर-फ़ेर कर कविता की पहली पंक्तिया सर्च की शिवकुमार जी और ज्ञान दत्त पाण्डेय जी का ब्लाग मिल गया  इस कविता के साथ।……….उन्हे .धन्यवाद मेरी मां की तरफ़ से जिनकी सुखद विस्मित स्मृतियों को आप ने ताज़ा करा दिया।

अम्मा जरा देख तो ऊपर
चले आ रहे हैं बादल
गरज रहे हैं, बरस रहे हैं
दीख रहा है जल ही जल

हवा चल रही क्या पुरवाई
भीग रही है डाली-डाली
ऊपर काली घटा घिरी है
नीचे फैली हरियाली

भीग रहे हैं खेत, बाग़, वन
भीग रहे हैं घर, आँगन
बाहर निकलूँ मैं भी भीगूँ
चाह रहा है मेरा मन।

एक और कविता जिसे भी मैंने अन्तर्जाल से प्राप्त किया, उनींदरा नामक ब्लाग से जिस पर शायदा जी ने कुछ पंक्तियां लिखी थी और आगे की पंक्तियों के लिए अनुरोध किया था जिसे अनूप जी ने पूरा किया।

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का
बच्चे की सुन बात, कहा माता ने ‘अरे सलोने`
कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा
घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है
अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज लिवायें
सी दे एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये।

हिन्दी ब्लाग कितने उपयोगी है विगत स्मृतियों को ढ़ूड़ने में । और यही ब्लागर की मेहनत सफ़लता प्राप्त कर लेती है जब उसके द्वारा प्रकाशित रचना को पढ़कर या पाकर कोई आनन्द की अनुभूति करता है।

Advertisements