हिन्दुस्तान बट रहा है और लोग उत्साहित हो रहे है, यहां सहूलियत या विकास की बात नही, बात क्षेत्रिय उन्माद की है, जैसे यह मुल्क भाषा के आधार पर राज्यों में बांटा गया था उसके भी परिणाम बहुत अच्छे नही हुए। अब राजिनैतिक कुनबे अपने अस्तित्व को और इतिहास में अपनी अमरता को लेकर ये टुकड़े करवाने की कोशिश में लगे है। जहां कुछ हरा नही उसे हरित प्रदेश चाहिए क्योंकि कुछ कथित किसान नेता  विरासत में मिली शाख को लम्बा करना चह्ते है, मैं फ़िर उत्तर प्रदेश की तराई को हरित प्रदेश के तौर पर बांटने की बात करूगां , जो ज्यादा हरा है! मांगे जा रहे भूभाग से। बात रही विकास और सहूलियत की तो उत्तरांचल की राजधानी देहरादून है अब आप बताए कि अमरनाथ के इलाके में बसे गांव हों या पूर्वी शिवालिक रेंज के गांव जिनके लिए देहरादून पहुचना कितना दुरूह है जबकि लखनऊ आसान है, फ़िर कैसी सहूलियत भाई, वैसे तो ब्रिटिश इंडिया से सबक ले सकते है कि सयुंक्त प्रान्त की दो राजधानियां हुआ करती थी नैनीताल और लखनऊ, सवाल व्यवस्था का है और यदि सरकार में कूबत है तो सब कुछ मुमकिन है। नही तो इस मुल्क को ये अलगाव वादी  लोग रेपब्लिक, यूनिअन ओफ़ इंडिया से रूस की तरह फ़ेडरल बना देगें इन टुकड़ों की आपस में दूरियां बढ़ती जायेंगी, क्षेत्रवाद, भाषा वाद, धर्म और जाति न जाने किन किन मुद्दों पर हम लड़े, वैसे आज भी कोई कम लड़ाई नही है इन सब मामलों को लेकर, मै खिलाफ़त नही कर रहा इन सब वादों की पर इन सब से ऊपर भी एक वाद है जिसे राष्ट्रवाद कहते है, और ये सर्वोपरि है।

भारतवर्ष !

लोगों को अपनी चीज़ों का विकास प्रसार आदि करने का हक तो हासिल है इस मुल्क में, फ़िर वे क्यों समाज़ की मुख्य धारा में आना नही चाहते, मैं उन राज्यों का उल्लेख करना मुनासिब नही समझता जो तमाम वादों (इज़्म) के  चलते यूनियन आफ़ इंडिया को बस एक प्रतीक मानते है उनके दिल-दिमाग अलाहिदा हो चुके है इस मुल्क के अस्तित्व से।

हां एक बात और मौजूदा हालातों मे अलाहिदा प्रदेश, तहसील, जिला, थाना आदि -आदि बनने से भृष्टाचार का बढ़ना निश्चित है। विकास की तो बिल्कुल उम्मीद न करे……..विकास बटने में नही जुड़ने में होता है ।

पहले उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, और अब तेलंगाना, हरित प्रदेश, बुन्देलखण्ड, जम्मू, लद्दाख और गोरखालैंड कहां तक बांटे भारत मां को, लकीर चाहे हल्की हो या गहरी पर वह निशान जरूर छोड़ जाती है। चाहे मुल्क बंटे हो या राज्य उनकी लकीरे आज भी जुदा किए हुए है लोगों के दिलों को।

हां विकास के नाम पर ये बटवारा मुखमन्त्री आवास, विधानसभायें और राजभवन की विशाल इमारते अवश्य बन जायेंगी, इनसे न किसान का भला होना है और न मज़दूरों को किन्तु दलालों, ठेके दारों को लाभ होना लाज़मी है, सरकारी लाल बत्ती वाले रथ भी उन लोगों को हासिल हो जायेंगे जिन्हे बिना बटवारे के ये सुविधायें नही मिल पाती।

हमें सीख लेनी चाहिए, बर्लिन की दीवार से दो इलाहिदा मुल्क क्या वो विकास कर पा रहे थे, किन्तु दीवार गिरी लोग और उनके संसाधन एक हुए, तो जर्मनी योरोप में अपनी खोई चमक को दोबारा दैदीप्तमान कर रहा है।

भारत में आप सभी देख रहे होगे कि कही दो प्रान्त नदियों के पानी पर झगड़ रहे है तो कोई रेल लाइन के लिए कोई वनों के लिए, भाषा के लिए,  जाति……….शायद कुछ दिनों बाद हवा के लिए भी!!

ये एक इन्सर्जेन्सी है और मुल्क की जो भी संस्था इस इस राजद्रोह के लिए सज़ा मुकर्रर कर सकती हो तो उसे फ़ौरन इस ओर कदम उठाने चाहिए नही तो नेताओं की व्यक्तिगत महत्वांकाक्षायें इस मुल्क के भूगोल को बदसूरत बना देगे, हमारे समाज़ में लकीर तो उन्होंने खींच ही दी अब बस जमीन पर खीचना बाकी है।

धरती पर जो लकीरे समय ने खीची है बस वही स्थिर व सत्य है, मानव द्वारा खीची लकीरे कभी भी स्थापित नही हो पायी,  पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी, उत्तर व दक्षिण कोरिया, भारत व पाकिस्तान, के इन भूभागों के मध्य डाली गयी रेखायें इन भूभागों को स्थायित्व प्रदान कर पायी?

हमारे मुल्क में राजनीति जनता को उन्मादित कर इतना बदहवास कर देती है कि लोग राज्य के नाम बदलने के अन्दोंलनों में अपनी जान दे देते है।

भारतीय उपमहाद्वीप जो प्रकृति प्रदत्त भौगोलिक क्षेत्र है इस पृथ्वी पर, जिस पर कभी ब्रिटिश क्राउन का आधिपत्य था जो भी औपनिवेशिक विकास किया जा रहा था क्या वह धीमा था या इस बात से बाधित हो रहा था कि प्रदेश बड़े है या जनपद,! फ़िर चाहे वह रेलवे हो, फ़ारेस्ट्री हो या रेवन्यू, नहर, अस्पताल वगैरह वगैरह…………….।

आज पाकिस्तान इसी प्राकृतिक भूभाग का हिस्सा कहलाने में भी शर्म करता है क्योंकि इसमें भारतीय शब्द जुड़ा है। आखिरकार उसने चीन की औपनिवेशिक मानसिकता ने एक नया शब्द ईज़ाद कर लिया साउथ एशिया, पर क्या इससे वह इन प्राकृतिक सीमाओं से अलग हो सकेगा !

यहां मैं मुल्को की बात इस लिए कर रहा हूं कि भारत गणराज्य में जिस तरह के उग्र अनशन, आंन्दोलन चलाए जा रहे हैं वो अलगाववादी प्रवत्तियों से ओतप्रोत है न कि विकासवादी। मज़े की बात यह है कि इन आंदोलनों में बापू की प्रतिमा का सहारा भी लिया जा रहा है, जिससे यही प्रतीत होता है कि ये सभी आंदोलन कारी भारत सरकार के लिए एनार्किस्ट है जैसे अगस्त रेवोलूशन में बापू अंग्रेजों के लिए हुआ करते थे। और यही सत्य है।

भारत के इन्ही लोगों के बदौलत चाइना के एक संस्थान ने कहा था कि भारत राष्ट्र जैसी कोई चीज़ नही है, इसे जब चाहें तोड़ दे।

इस लिंक पर यहां अवश्य चटका लगायें।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारतवर्ष

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