आज मैने एक फ़िल्म देखी “एट बिलो” Eight below जो आठ कुत्तो की कहानी है। ये दूसरी बार है जब मै यह फ़िल्म देख कर एक बार फ़िर द्रवित हो गया, ये स्लेड कुत्ते एक टीम का हिस्सा होते, जो अंटार्कटिका  के बर्फ़ीले स्थानों में फ़िसलने वाली गाड़ी को घसीटते है। जेरी सेफ़र्ड जो नेशनल सांइस फ़ाउडेशन का रिसर्च गाइड होता है, वैज्ञानिक डा० डेविस जो मरकरी ग्रह के मीटियोराइट की तलाश में माउंट मेलबर्न पर इस पराग्रही धरती के टुकड़े की तलाश में आता है। उसे वहां मीटियोराइट तो मिल जाता है लेकिन बर्फ़ में धस जाने की वजह से उसका बचना नामुमकिन होता है तभी माया जो उन कुत्तो के समूह  की नेता होती है, बड़ी होशियारी से डा० डेविड को बचाती है , और बेस कैम्प तक पहुचाती भी है।  डा० डेविस की  इस हादसे में एक टांग भी टूट जाती है,  जेरी की उंगलिया ठंड में डेविड को बचाने में गलने लगती है।

कैम्प में पहले से अलर्ट हो जाता है कि सभी टीम मेंबर्स को वापस बुला लिया जाय, एक भयानक तूफ़ान आने की सूचना और फ़िर सर्दियों की शुरूवात यानी कई महीनों तक इस जगह पर वापस आना अंसभव!

जहाज में कुत्तों के लिए जगह न होने के कारण उन्हे यह कह कर बेस पर उनके पट्टे कसकर (ताकि वह छूट न जाए)  छोड़ दिया जाता है, कि दोबारा आकर उन्हे यहां से ले जाया जायेगा!

मांउट मेलबर्न

जेरी जो इन कुत्तो को गाइड करता आया है उसे इस बात दुख है, लेकिन दोबारा आकर ले जाने वाली बात से वह मान जाता है। बाद में प्लान बदल दिया जाता है और उन कुत्तों को वही मरने के लिए छोड़ देने का फ़ैसला! जेरी मिलेट्री, से मदद मांगता है, डा० डेविस से भी, जिसकी जान इन्ही कुत्तो ने बचाई थी, लेकिन उसे हर तरफ़ से निराशा मिलती है।

जेरी के पास न तो इतना पैसा होता है और न संसाधन की वह स्वंम जाकर अपने प्रिय कुत्तों को ला सके। जेरी की मन: स्थित बिगड़ने लगती है, हर तरफ़ से निराश।

डा० डेविस को पुरस्कृत किया जाता है मीटियोंराइट की खोज के लिए। जेरी फ़िर उन्हे याद दिलाता है उन कुत्तों का एहसान, डा० डेविस जब घर लौटते है तो उनके बेटे के कमरे में उसके द्वारा बनाई ड्राइग जिनमे वह कुत्ते  बने होते है और लिखा होता है “The Dogs who saved to my father”  और यही से डेविस का ह्रदय परिवर्तन होता है और वह जेरी से मिलते है न्यूजीलैंण्ड में जहां जेरी एक नाव के मालिक से मोलतोल कर रहा होता है कि वह उसे अंटार्कटिका पहुंचा दे।

माया

आखिर में सभी टीम मेंबर्स डा० डेविस सहित अंटार्कटिका पहुंचते है,  तब तक १७५ दिन गुज़र चुके होते है कैम्प में कुत्तो को जंजीरो में बांधकर छोड़ने से उनके मरने की पूरी उम्मीद होती है, लेकिन ऐसा नही होता है कुत्तों ने अपने आप को छुड़ा लिया होता है और उन विषम परिस्थितियों में वो कैसे जीते है इस बर्फ़ीले रेगिस्तान में……………ये रोमांचक और ह्रदय विदारक है!

इन छह महीनों में उनकी इंस्टिंक्ट यानी प्रकृति प्रदत्त गुण, और माया का बेहतरीन नेतृत्व  ही उन्हे बचाए रखते है। जो सिखाते है कि कैसे हम विपरीत हालातों में टीम भावना के साथ संघर्ष करके अपने अस्तित्व को बचाए रख सकते है। मनुष्य हमेंशा से इन जानवरों से सीखता आया है किन्तु इस कथित विकसित सभ्यता में हम अपने सहचरों को भूल गये जिनसे हमारे पूर्वजों ने बहुत कुछ सीखा और आज हमारा अस्तित्व बचाने में कामयाब रहे।

जेरी का उन जानवरों के लिए स्नेह और उन्हे बचाने का प्रयास काबिले तारीफ़ है। इस फ़िल्म को जरूर देखे ताकि उन लोगों को यह मालूम हो सके कि जानवर आप को समझते है आप के इशारे, आप की भाषा, यहां तक कि आप का दुख-दर्द भी, फ़िर आप क्यों नही समझ पाते उन की भाषा, क्यों नही पढ़ पाते उनके चेहरों पर दुख-दर्द की लकीरें, क्योंकि आप सुनना नही चाहते और न ही पढ़ना।

नक्शा मांउट मेलबर्न "साभार विकीपीडिया से"

लोगों के लिए जानवर पालना भी एक फ़ैशन है न कि उनके प्रति प्रेम।

इस फ़िल्म को निर्देशित किया है फ़्रैन्क मार्शल ने, और कहानी लिखी है डेविड डिग्ग्लियों ने। यह सच्ची घटना पर आधारित फ़िल्म है। मेरा ध्येय बस यही है कि लोग इस फ़िल्म को देखे और यह एहसास करे कि धरती पर सब कुछ महत्वपूर्ण है,  जीवों के प्रति सोये हुए प्रेम का दोबारा प्रादुर्भाव हो सके।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारतवर्ष

Advertisements