नैनादेवी मन्दिर

१८१७ ई० में कुमायूं के कमिश्नर मिस्टर जी० ड्बल्यू० ट्रैल ने नैनीताल की यात्रा की, किन्तु यह स्थान दुनिया की नज़र में शकर व्यवसायी पी० वैरन के द्वारा सन १९३९ ई० में आया, और इसी व्यक्ति ने यहां योरोपीय उपनिवेशियों की रिहाइस गाह बनाई।

शिवालिक पहाड़ियों पर मौजूद एक कटोरे नुमा झील के चारो तरफ़ बसा ये शहर जनश्रुतियों व पुरानों के मुताबिक शिव पत्नी सती की आंख यानी नैन के गिरने से बनी यह झील ६४ शक्ति पीठों मे से एक माना जाता है। इस झील के उत्तर-पश्चिम किनारे पर नैना देवी का मन्दिर है।

पुराणों मे सप्त रिषियों में से तीन रिषियों का जिक्र भी मिलता है। स्कन्द पुरान में पुलस्त्य, पुलाह और अत्रि के आने का वर्णन है, इन रिषियों की हिमालय यात्रा के दौरान जब प्यास लगी तो उन्होंने यहां एक जलाशय का निर्माण कर उसे मानसरोवर के जल से पवित्र कर तीर्थ में परिवर्तित कर दिया।

अंग्रेजी हुकूमत में, सन १९४१-४२ ई० में  इस सुरम्य पहाड़ी स्थल की चर्चा अग्रेजों की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता से लेकर लन्दन तक में होना शुरू हो गयी थी।

पहाड़ियों से घिरी यह झील और इसके आस-पास की तमाम झीलें आकर्षण का केन्द्र बन गयी और प्रत्येक योरोपीय नागरिक यहां बसने की लालसा लेकर आने लगा। बाद में ब्रिटिश-भारतीय सरकार ने  नैनीताल को यूनाइटेड प्रोविन्सेज की गर्मियों की राजधानी घोषित कर दिया। और इसी दौरान यहां तमाम योरोपीय शैली की इमारतों का निर्माण हुआ, गवर्नर हाऊस और सेन्ट जान चर्च इस निर्माण कला के अदभुत उदाहरण है।

नैनीताल जनपद अब उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत है, और एक बेहतरीन पर्यटन स्थल जहां पूरे वर्ष देश-विदेश के पर्यटकों का आगमन जारी रहता है। यह शहर समुन्द्र तल से १९३४ मीटर की ऊचाई पर स्थित है।

यहां की आबोहवा और सुन्दर प्राकृतिक दृश्य मन को सकून देते ही हैं साथ ही आप की देव भूमि में उपस्थित का एहसास भी कराते हैं।

हांलाकि पर्यटन का बढ़ता दबाव इस शहर के मिज़ाज़ बदल रहा है।  भूस्खलन के कारण पवित्र देवदार, ओक, पांगर, पहाड़ी पीपल, सुरई, कुन्ज, अखरोट, हिसालू, किलमोरा आदि के वृक्षों को जो नुकसान पहुच रहा है उसकी भरपाई पुन: वृक्षारोपण से नही की जा पा रही है।

पहाड़ के इस शहर की सुन्दरता लाजवाब है जिसका जिक्र करने में मैं अपने आप को अक्षम पा रहा हूं, कभी आप आ के खुद महसूस कर लीजिए!

खुरपाताल, नैनीताल

एक बात-चीत नैनीताल के सम्मानित बाशिन्दे से, जिनकी तीन पीढ़िया इस शहर को देखती आई है, जिन्हे अफ़सोस है कि शहर तेज़ी से अपना मिज़ाज़ बदल रहा है जो कि खतरनाक है। वह इसे कु्छ यूं परिभाषित करते है कि इस शहर का अपना कुछ नही, न तो लोग और न ही संस्कृति यानी तहज़ीब!

कुछ भी नही है अपना इस शहर का !!!

कभी विदेशी शासको की एशगाह रही ये नगरी अब भारतीय धनाढ्य वर्ग की रिहाइस गाह बन चुकी है, जिनकी मेट्रोपोलिटन तहज़ीब इस शहर को कुछ भी देने में अक्षम है सिवाय धन के।

मैने उनसे कहा कि कोई भी इन्वैसिव स्पसीज़, नेटिव स्पसीज़ पर डामिनेन्ट होने की क्षमता रखती है फ़िर चाहे वह विदेशी हो या देशी! मेरा मतलब था वे लोग चाहे सात समन्दर पार से आकर कब्ज़ेदार बने हो इस नगर के, या सात सौ कि०मी० से आये हों। सभी ने पहाड़ के स्थानीय निवासियों का शोषण किया, नतीजतन वो आज भी उसी बदहाली में जीने को मज़बूर है जैसे १०० वर्ष पहले अग्रेजी राज में थे।

किन्तु मैं कुछ बसुधैव कुटुम्बकम वाले सिद्धांत का अनुगामी होकर बोला भाई कुछ तो बेहतर है इस नगर में विभिन्न संस्कृतियों के लोग अपने गुणों को भी छोड़ जाते है, बुराईयों के साथ-साथ………..विभिन्नता में एकता……..और विभिन्न तहजीबों का संगम है आप का शहर। पं० नेहरू के उत्तर भारत की तरह विभिन्न संस्कृतियों का कटोरा…!!

तो उनका जवाब था हां मिश्रा जी, बिल्कुल किसी गंदले पानी की तरह!

मैने अब बस इतना ही कहा कि भाई लूट लिया आप ने………………मै लाजवाब था।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारतवर्ष

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