कृष्ण कुमार मिश्र* बरवर का ध्वस्त साम्राज्य- जो बाछिलों के गौरवशाली अतीत का प्रतीक है

महाभारत काल की प्रसिद्ध विराटपुरी खीरी जनपद के बड़खर को कहां जाता है जहॉं आज भी प्राचीन मूर्तियां, शिवलिंग व ध्वंशावशेष मिलते हैं। मध्य भारत के बाछिल रजवाड़े जो खीरी, पीलीभीत जनपदों पर काबिज थे इन राजाओं की सत्ता का मुख्य केन्द्र था बड़खर जहॉं विशाल किला निर्मित था इनके अन्य सत्ता केन्द्र थे निगोही-शाहजहॉंपुर, दीवाल-पीलीभीत और कैम्प शारदा-खीरी जहॉं से ये अपनी प्रशासनिक कारगुजारियां संचालित करते थे। इसी वक्त का एक भव्य किला था बरवर में वह जगह अब दिलावर नगर के नाम से जानी जाती है। सबसे खास बात यह है कि ये बाछिल क्षत्रिय अपने आप को पौराणिक राजा वेंना का वंशज कहते थे जो महाभारतकालीन राजा विराट के पिता थे। इन बाछिलों का जिक्र एतिहासिक दस्तावेजों में सन 992 ईस्वी तक का ही इतिहास प्राप्य है जब ये खीरी के पश्चिम में पीलीभीत तक अपना साम्राज्य विस्तारित किये हुए थे किन्तु 992 ईस्वी से लेकर सन 1600 ईस्वी तक के मध्य का इतिहास अस्पष्ट है शताब्दियों से शासन कर रहे बाछिल तुगलकशाह व फिरोजशाह की हुकूमत में थोड़ा बहुत अवश्य विचलित किये गये लेकिन शहजहॉं का शासनकाल आते-आते खीरी पर पूर्ण रूप स बाछिलों का आधिपत्य हो चुका था जिसमें धौरहरा, निघासन, भूड़, खैरीगड़ स्टेट (आज का दुधवा नेशनल पार्क) इलाके इनके आधिपत्य में थे पौराणिक राजा विराट के बाद यदि कोई बाछिल राजा महत्व पा सका है तो वह बरवर का  बाछिल राजा छिप्पी खान था असल में छिप्पी खान इस राजा का असली नाम नही था यह नाम तो दिल्ली सरकार द्वारा दी गयी एक उपाधि थी इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है- एक बार कर्रा मानिकपुर में दिल्ली सरकार के विरूद्ध विद्रोह भड़क उठा जिसे कुचलने के लिए शाहजहॉं ने बरवर के बाछिल राजा को भेजा और इस व्यक्ति ने बड़ी बर्बरता  से विद्रोह को कुचला यह राजा कत्ल-ए-आम में माहिर व भयानक कृत्य करता था जिससे इसकी पोशाक रक्त के छींटों से (छीप) रंग जाती थी इन्ही छींटों के कारण यह व्यक्ति दिल्ली राज में व जनमानस में छिप्पी खान के नाम से जाना गया। कहा जाता है कि इस व्यक्ति ने एक-एक विद्रोही के सिर धड़ से अलग किये और तलवार से उनके धड़ों को क्षत-विक्षत कर दिया इस युद्ध में बाछिल राजा की रक्तरजिंत तलवार व रक्त से सने कपड़ो को देखकर शाहजहॉं ने इस योद्धा को छिप्पी खान की उपाधि से नवाजा। इसके बाद छिप्पी खान ने अपने अधिकार में अन्य जागीरें भी शमिल की, एक विशाल जागीर का मालिक बन जाने पर इस राजा के मन में खैराबाद सरकार (दिल्ली सरकार की एक कमिश्नरी) से नाता तोड़ने का खयाल आ गया ताकि वह इस समृद्ध रियासत पर स्वन्तंत्र हुकूमत कर सके इस कारण इसने चौका नदी के घनें जंगलो के मध्य अपना अभेद्यय दुर्ग बनवाया और यहीं से सत्ता का संचालन करने लगा अब तक दिल्ली पर शाहजहॉं का राज खत्म हो चुका था और उसका बेटा औरंगजेब अपने पिता शाहजहॉं को सत्ताच्युत करके खुदमुख्तार बन गया था उसने छिप्पी खान पर कुपित होकर राजपूताना (राजस्थान) के चौहान राजा छत्रभोज को छिप्पी खान को रियासत से बेदखल कर देने का हुख्म जारी कर दिया छत्रभोज ने शाही सेनाओं के साथ बाछिलो के साम्राज्य पर हमला बोल दिया और छिप्पी खान को गिरफ्तार कर लिया इस लड़ाई में छत्रभोज की सेनाओं नें छिप्पी खान के किलों को भी ध्वस्त कर दिया छिप्पी खान को 18 महीनों तक रखा गया और फिर तलवार से उसका सर कलम करने का फरमान जारी किया गया छिप्पी खान की हत्या के बाद  पिहानी के सैयदांे नें छिप्पी खान के सत्ता के हेडक्वार्टर बरवर पर अपना अधिकार कर लिया बाछिल राजा छिप्पी खान के 11 भाई थे जिनमें दिल्ली सरकार के प्रति बहुत आक्रोश था उन्होने बगावत भी की पर वह अपना छिना हुआ साम्राज्य कभी वापस न ले पाए अंततः वह डाकुओं की तरह जीवन यापन करने लगे इनमें से एक भगवन्त सिंह नामीं डाकू हुआ जिसका खौफ कठना नदी के जंगलों में इस कदर था कि अंग्रेज इन्तजामियां भी इससे डरती थी।

बाछिल राजा छिप्पी खान का वह विशाल किला खण्डहर के रूप में आज भी विद्यमान है बरवर का यह किला जो बाद सैयद राजा मुक्तदी खान जो गोपामऊ के गर्वनर रहे मुर्तजा खान का पोता था, ने अपने कब्जे में ले लिया अब बाछिलों की यह जागीर सैयदों के पास आ गयी थी, यह रियासत सैयद मुर्तजा खान को दिल्ली सरकार ने मालगुजारी से मुक्त (रेन्ट फ्री) कर के दी थी मुक्तदी खान बरवर चतुष्कणीय विशाल किले का निर्माण कराया इसके अलावा बाछिलो के पुरानें किले पर भी निर्माण कार्य कराए गये, आज दिलावर नगर का यह किला अपने वैभवकाल का प्रतीक चिन्ह है इस विशाल दुर्ग का मुख्य दुर्गद्वार अभी भी मौजूद है। सैयदों की शासन व्यवस्था में निर्मित शाही हमाम, कुऑं, व अन्य छोटी इमारतें आज भी सुरक्षित हैं हांलाकि विशाल टीले पर बना यह दुर्ग विभिन्न प्रकार की झाड़ियों, जगली पुष्पों व जीव-जन्तुओं का बसेरा बन चुका है। लेकिन इन झाड़ियों में विलुप्त हो रही गौरैया अच्छी सख्या में दिखायी दी यह बात पंक्षी प्रेमियों के लिए अवश्य सुखद होगी, स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक यहॉं अक्सर लोग खजानें की तलाश में आते हैं और जगह-जगह पर खुदायी करते हैं इस बात के प्रमाण के तौर पर कई स्थानों पर गडढे मौजूद हैं।

सैयद राजवंश के वर्तमान वारिस नवाब सैयद आरिफ हुसैन ने बताया कि उनके ही खानदान के एक शख्स जो सूफी थे जिनका नाम नवाब अली रजा था इन्होने विवाह नही किया और जीवन पर्यन्त दिलावर नगर के प्राचीन बाछिलों के किले में रहे उनकी मजार भी इसी किले के भीतर ही बनवायी गयी स्थानीय लोग इस मजार पर सजदा करते है नवाब आरिफ हुसैन इस किले को सूफी नवाब अली रजा़ की स्मृति में एक धार्मिक स्थल के रूप में विकसित करना चाहते हैं। मोहम्मदी निवासी फज़लुर रहमान ने बताया कि अब इस स्थान पर लोगो का अतिक्रमण बढ़ रहा है साथ ही साथ पास के साउथ खीरी फारेस्ट की जमीन पर भी लोगों की नजर है

बाछिलों का यह अतीत आज भी इस प्राचीन किले के रूप में सरक्षित है जो ग़दर के वक्त लगभग नष्ट कर दिया गया था बाछिलों के साथ-साथ ग्रेट सैयद फैमिली का रोचक इतिहास भी यह किला अपने में सजोंये हुए है दो संस्कृतियों की यह विरासत यदि पुरातत्व विभाग व स्थानीय इन्तजामिया द्वारा संरक्षित व विकसित न की गयी तो जल्द ही यह हजारों वर्ष का इतिहास गर्त में समा जाएगा और हमारी अगली पीढ़ी अपने इस अतीत से वंछित हो जाएगी हांलाकि यह वह वक्त था जब सत्ता को हासिल करने के लिए सारे वसूल व सम्बंधों को दरकिनार कर दिया जाता था और व्यक्ति सत्ता के लिए किसी का भी कत्ल व किसी से भी बगावत करने में नही चूकता था किन्तु अतीत अपना ही होता है चाहे वो कितना ही बुरा क्यों न हो और अतीत का संरक्षण व अध्ययन हमारे भविष्य का पथ प्रदर्शन में सहायक होता है।  इसलिए धूल की परतों की तरह विभिन्न सभ्यतायें एंव संस्कृतियों की परतों से युक्त हमारा इतिहास जिसे बड़ी जिम्मेंदारी व सावधानी से सहेजकर एक-एक परत का अनावरण कर उन संस्कृतियों को पढ़ना होगा ताकि हमारी बिखरी एतिहासिक कड़ियां आपस में जोड़ी जा सकें।

-कृष्ण कुमार मिश्र
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