प्रकाश स्तंभों की कहानी

हमारी राहों को रोशन करने वाले इन प्रकाश स्तंभों की एक लघु-कथा

Image source: Wikipedia
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उस रोज एक अंग्रेजी अखबार में मीनार नुमा आकृति देखी जिसे लाइट हाउस यानि प्रकाश स्तंभ कहते हैं, तो मन किया चलों कुछ पढ़ा-लिखा जाए इन आकृतियों पर जो हमारें लोगों को शताब्दियों से राह दिखाने का काम करते आए हैं। चूंकि हम नदियों के प्रदेश में रहने वाले लोग समन्दर की हलचलों से नावाकिफ़ ही रहे, बस पत्र-पत्रिकाओं और टी०वी० आदि में उन विशाल लहरों, जंजीरों, जहाजों और प्राचीन प्रकाश स्तंभों के किस्से कहानी सुनते आयें थे।

फ़िर भी चलिए हम बात कर लेते है उन गाइड की जो हमारें लोगों को समन्दर में राह दिखाते रहे हैं….वैसे भारतीय उप-महाद्वीप में मौर्य काल  बौद्ध कालीन शासन व्यवस्था में प्रकाश स्तंभों के निर्माण का जिक्र है, किन्तु योरोपीय व्यापारियों, के भारत आने पर जिन लाइट हाउस का निर्माण हुआ उनका विस्तृत प्रामाणिक इतिहास मौजूद है।  हमारी राहों को रोशन करने वाले इन प्रकाश स्तंभों की एक कथा…..

हमारे धरती पर प्रादुर्भाव होने से और खात्में तक तमाम लाइट हाउस हमारा मार्गदर्शन करते हैं, वह फ़िर चाहें समन्दर के किनारे खड़े ईंट-गारे से बनी ऊंची मीनारें हो जिनके शिखर पर हो रही रोशनी नाविकों को मंजिल तक पहुंचानें में मदद करती हैं, या फ़िर कोई इन्सान हो जो दिगन्तर बन हमें राह दिखाता इस जीवन के पथ पर…या फ़िर वह कोई वस्तु जो हमारी मंजिल के मध्य स्थिर होती है, और आसरा देती है, कि अब मंजिल दूर नही….तो ये है अपने अपने लाइट हाउस…..। लेकिन हम बात करेगें उन ऊंची इमारतों की जिनमें कोयला, लकड़ी, केरोसिन, खाद्य तेल, व्हेल के शरीर से प्राप्त तेल (वसा) गैस और विद्युत से तीव्र प्रकाश किया जाता था, और वह प्रकाश नाविकों का पथ प्रदर्शन करता था, तकनीक के विकास के साथ साथ प्रकाश स्तंभों से निकलने वाले प्रकाश की तीव्रता में भी गजब का इज़ाफ़ा हुआ, लेन्स आदि की मदद से प्रकाश को अत्यधिक तीव्रता से फ़ोकस किया जाता था,  ताकि नाविक अपनी नाव समुन्द्र के किनारे ला सकें, या फ़िर आगे का रास्ता तय कर सके। दरसल ये लाइट हाउस अपनी एक खासी पहचान रखते है, आकार, ऊंचाई, तीव्र रोशनी के जलने-बुझनें के मध्य का अन्तर, और दिन के समय प्रत्येक लाइट हाउस पर किया गया रंग-रोगन नाविकों को यह जानने में मदद करता है, कि यह लाइट हाउस कौन सा है, यानि नाविक कहां पर है, और यदि वह यहां से आगे जाना चाहे तो कितनी दूरी पर अगला स्थान मौजूद इसका अन्दाजा लगया जा सकता था।

शताब्दियों से यह लाइट हाउस लोगों को राह दिखाते आयें, आधुनिक विज्ञान में राडार आदि प्रणालियों से इन लाइट हाउसों का महत्व अवश्य कम हुआ है पर यह अनुपयोगी नही है, नतीजतन भारत सरकार का डाइरेक्टोरेट जनरल ऑफ़ लाइट हाउसेज एण्ड लाइट सिप्स संस्था स्थापित हैं, जिसके द्वारा सभी लाइट हाउस एंव लाइट सिप्स का नियन्त्रण व देखभाल की जाती हैं। विभिन्न देशों में इसका अपना-अपना महत्व हैं।

अमेरिका में लाइट हाउस के प्रति जो स्नेह है वह शौक के रूप में तब्दील हो चुका है, वहां प्रकाश स्तंभों के सरंक्षण व अध्ययन के लिए तमाम संस्थायें व कल्ब स्थापित किए जा चुके हैं, और लोग लाइट हाउसों का भ्रमण व अध्ययन करते है इस भावना के साथ कि कभी उनके पूर्वजों को इन्ही प्रकाश स्तंभों ने राह दिखाई होगी, तब उन्होंने अमेरिका की धरती पर पहली बार कदम रखा होगा। चूंकि अमेरिकी महाद्वीप पर अत्यधिक लोग योरोप, अफ़्रीका और एशिया से आकर अपनी अपनी कालोनी बसाई, और उस वक्त समुन्द्री मार्गों से ही यी आवागमन हुए जिनमें ये लाइट हाउस ही उन्हे राह दिखाते थे,  किनारे पहुंचाते थे, और उनका इस धरती पर पहला इस्तकबाल भी इन्ही प्रकाश स्तंभों ने ही किया था।   यही वजह है कि अमेरिकी इन प्रकाश स्तभों के प्रति अगाध प्रेम रखते है, और इनमें अपने पूर्वजों के प्रथम आगमन का स्मरण करते हैं।

कहा जाता है दुनिया का पहला लाइट हाउस अलेक्जेन्ड्रिया में स्थित है, जिसे इजिप्ट के शासक टाल्मी द्वितीय ने तीसरी शताब्दी में बनवाया था। कई शताब्दियों तक यह दुनिया की सबसे ऊंची इमारत का दर्जा हासिल रहा, और पुरानी दुनिया में इसे सात अजूबों में से एक माना जाता था। भारत में सर्वप्रथम  तमिल साहित्य “सिलाप्पाडिगरम” में मिलता है, कावेरीपट्टिनम में एक खूबसूरत प्रकाश स्तंभ का उल्लेख। भारत में स्बसे प्राचीन व सक्रिय प्रकाश स्तंभ फ़ाल्स पाइन्ट उड़ीसा में है। भारत की समुन्द्री सीमायें सात जनपदों के अन्तर्गत हैं, मुम्बई, कोची, चेन्नई, विशाखापट्टनम, कोलकाता और पोर्ट ब्लेयर। इस समुन्द्री सीमा की ल० 7517 कि०मी० हैं। भारत सरकार के जहाजरानी मन्त्रालय नें पर्यटन के दृष्टिकोण से 13 प्रकाश स्तंभों को विरासत के रूप में सरंक्षित किया जायेगा जिसमें 300 करोड़ रूपयें की अनुमानित राशि खर्च की जायेगी।

इन प्रकाश स्तंभों के साथ जो मानव-निर्मित हैं, के अतिरिक्त हमें उन प्रकाश स्तंभों को भी कभी नही भूलना चाहिए जो सदियों से यूं ही हमे राह दिखाते आ रहे है, अडिग, अनवरत, फ़िर चाहे वह उर्जा का केन्द्र सूर्य हो जो पूरब-पश्चिम का भान कराता है, या सुबह पूर्व दिशा में उगने वाला शुक्र तारा, जो सुबह की दस्तक की खबर के साथ पूरब दिशा को बतलाता है। ये चाद सितारे, प्रकृतिक सरंचनायें, और पूर्वजों से प्राप्त बोध हमें जीवन के पथ पर अनवरत चलते रहने की प्रेरणा देता है और हमारे साथ साथ चलता है पथ-प्रदर्शक के रूप में…हमें अपने-अपने इन लाइट हाउसों को विस्मृत नही होने देना है, क्योंकि ये हमें हर पल राह बतलाते के साथ-साथ हमारे भीतर को भी दैदीप्तिमान करते है।

….तो आप ने सोचा कि आप का लाइट हाउस कौन है?

भारत के प्रकाश स्तंभों के बावत जानकारी हासिल करने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन हाउस

77, कैनाल रोड शिवकालोनी लखीमपुर-खीरी-262701

भारत

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