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….ताजमहल जिसका नामो-निशान मिट जाता !

नष्ट हो जाता मध्य-कालीन भारत का यह अदभुत व सुन्दर अतीत

भारत के इतिहास की एक झांकी ताज के बहाने…

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक

मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से..!

साहिर लुधियानवी (१९२१ – २५ अक्टूबर १९८०) की गज़ल की कुछ लाइनें पेश है, जिन्हे मेरे अजीज नें मुझे भेजी, और मैं बावस्ता हुआ इस एहसास से, उनके शब्दों में मुफ़लिसी की पीड़ा, मायूसियत के भाव, हीनता की विडंबना को बड़ी खूबशूरती से पिरोया है, उनकी इन पंक्तियों के सहारे मुझे खयाल आया कुछ किस्सों का जो जुड़े है इस बेहतरीन इमारत से, और भारतीय पुरातात्विक मसलों सें ।

कौन नही जानता इस कब्र को जिसमें मोहब्बत के एहसासात सफ़ेद मार्बल के तौर पर गुथे हुए हैं इस आलीशान इमारत में, जो आज एक मशहूर पर्यटन स्थल, जिससे जुड़ी है तमाम कहानी किस्से कुछ झूठे कुछ सच्चे ! पर मैं बात करूंगा कुछ चुनिंदा वाकयात की जो अहम हैं।

लार्ड विलियम हेनरी कैन्डेविश बेन्टिक, सती प्रथा, और ताजमहल

ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के गवर्नर जनरल (1828-1835) लार्ड विलियम हेनरी कैन्डेविश बेन्टिक (1774-1839) ने ताजमहल को ढहाने के आदेश जारी कर दिए थे, और उसके निर्माण में लगी तमाम बेशकीमती चीजों को बेच देने की मंशा जाहिर की थी। खासतौर से इमारत में इस्तेमाल हुए संगमरमर को। यह वही शख्स है जिसने भारत में सती प्रथा पर पूर्ण प्रतिबन्ध (बंगाल प्रेसीडेंसी में) का फ़रमान जारी कर दिया था, वह दिन चार दिसम्बर 1929 ई० था। ताजमहल हो नष्ट कर देने की चर्चा उस वक्त इंग्लैंड से लेकर पूरे हिन्दुस्तान में थी, बेन्टिंक ने आगरा फ़ोर्ट में अलग हुए संगमरमर की विक्री कर दी थी, और ताजमहल को एक फ़ालतू इमारत मानते हुए उसे भी ढहा कर संगमरमर की नीलामी का आदेश पारित कर दिया था, बताते है, आगरा में नीलामी को लेकर कुच दिक्कते आई जिसके चलते गवरनर जनरल ले अपना इरादा बदल दिया। इस वाकये का पुख्ता जिक्र ई० वी० हैवल की पुस्तक  “इंण्डियन स्क्लप्चर एंड पेंटिंग” में मिलता है उन्होंने लिखा कि गवर्नर जनरल बेन्टिक पूरी तरह से ताजमहल को तबाह कर उसके संगमरमर को नीलाम कर देना चाहते थे, किन्तु आगरा फ़ोर्ट के संगमरमर की नीलामी से असंतुष्ट होने के कारण उन्होंने अपना इरादा बदला था। जी०टी० गैरट ने हैवल के शब्दों से अधिक तीक्ष्णता से इस बात को कहा। काफ़ी बाद में सन 1948 ई० में एच०जी रालिन्सन ने तो कमाल ही कर दिया, उन्होंने कहा कि कम्पनी सरकार के समय के लोग बिल्कुल असभ्य व मूर्ख थे, नतीजतन उनसे ऐसे ही फ़ैसलों की उम्मीद की जा सकती थी, जो सिर्फ़ सत्ता को स्थापित करने के लिए थी।

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भारतीय पुरातत्व सरंक्षण (ASI)

सन 1904 में लार्ड कर्जन के भारत आगमन पर पुरातात्विक महत्व की चीजों को पुख्ता सरंक्षण प्राप्त हुआ।, कर्जन स्वयं एक विरासत प्रेमी थे, और उन्होंने स्मारकों (निशानियों, यादगार) के सरंक्षण का कानून पारित किया। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अन्तर्गत कार्य करने वाला संगठन है, जो पुराने स्मारकों के सरंक्षण व संवर्धन में पिछले 100 वर्षों से अधिक समय से कार्य कर रहा है। माना जाता है, ए०एस०आई० की नींव सन 1764 में पुरातत्ववेत्ता विलियम जान के प्रयासों से हुई, जब इन्होंने  एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना की थी। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया की औपचारिक स्थापना सन 1871 में की गयी। इसकी स्थापना का श्रेय अलेक्जेंडर कनिंघम को जाता है, जो उस वक्त ब्रिटिश इण्डिया के बंगाल में इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। और अलेक्जेंडर कनिंघम को ही ए०एस०आई० का प्रथम डाइरेक्टर जनरल बनने का गौरव प्राप्त हुआ, आज से ठीक 140 वर्ष पूर्व। पुराने स्मारकों, नवीन खुदाई स्थलों से प्राप्त जानकारियों के विषय में संकलन व प्रकाशन ए०एस०आई० द्वारा समय समय किया जाता है, इसी संस्था के सन 1924 में डाइरेक्टर जनरल जॉन मार्शल द्वारा सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज की औपचारिक घोषणा सन 1924 में की। यह खोज भारतीय इतिहास की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में से एक थी, इसी खोज ने मार्शल को रातो रात ब्रिटेन और भारत के अतिरिक्त सारी दुनिया में हीरो बना दिया। प्रत्येक राज्य में ए०एस०आई के कार्यालय मौजूद हैं, जहां से सरंक्षण की गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है। सन 1902 में जॉन मार्शल द्वारा पुरातात्विक वस्तुओं के सरंक्षण व संवर्धन में बनाई गयी नीति इतनी बेहतर व दूरगामी सोच का परिणाम थी कि हम सब आज भी उसी निति के कायल है, “किसी भी ध्वंश पुरातात्विक वस्तु का पुनर्निर्माण तब तक वर्जित है, जब तक कुशल कारीगर व तकनीक और उचित निर्माण सामग्री प्राप्त न हो, जो उस ध्वंश प्राचीन वस्तु को हुबहू निर्मित कर दे , अन्यथा उस प्राचीन स्मारक आदि को यथा स्थिति में ही सरंक्षित रखा जाए”।

किन्तु ASI के तमाम नियम कानूनों के बाद ASI द्वारा सरंक्षित स्थलों पर बेन्टिक के उस नीति का खुला उल्लंघन हो रहा है, जो पुरातात्विक महत्व की चीजों के लिए मुफ़ीद है, लखीमपुर खीरी के ओयल (ब्रिटिश-भारत की एक रियासत) द्वारा बनवाये गये विश्व प्रसिद्ध मेढक मन्दिर व अन्य प्राचीन इमारतों के जीर्णोंद्धार के नाम पर सीमेन्ट बालू व मौरंग का प्रयोग कर दिया गया, जो कि उन पदार्थों से बिल्कुल भिन्न है, जिनसे ये दीवारे, कलाकृतियां निर्मित हुई थी, यह मेढ़क मन्दिर उत्तर प्रदेश में पुरातत्व विभाग द्वारा आर्कियोलाजिकल साइट के रूप में दर्ज है। यानि हम सही बात को भी स्वीकार करना नही जानते जो हमारे लिए और हमारे एतिहासिक गौरव के लिए लाभप्रद है।

ऐसे हुआ ब्राह्मी लिपि व सम्राट अशोक के फ़रमानों का पर्दाफ़ास

ब्राह्मी लिपि को पहली बार 1830 में समझा गया,  ए०एस०आई० संस्था के सचिव जेम्स प्रिंसेप द्वारा। इस लिपि को पढ़ लेने व समझनें की खोज से भारतीय अतीत के तमाम रहस्य प्रकाश में आये। सम्राट अशोक के राजाज्ञा को जाना गया इस लिपि को समझने के पश्चात, यह एक अदभुत खोज थी।

मौजूदा समय में एक आकलन के मुताबिक भारत में 50,000 स्मारक है, जबकि  ए०एस०आई० द्वारा चिन्हित व सरंक्षित स्मारकों की संख्या मात्र 7000 (राज्य व केन्द्र द्वारा संयुक्त प्रयास)  हैं। ये दुर्भाग्य ही है कि स्वंत्रता प्राप्ति के 62 वर्षों के उपरान्त भी हम विरासत के सरंक्षण में हम अंग्रेजों से बहुत पीछे हैं। और उन्ही के अध्ययन की बार-बार नकल कर अपने आप को ज्ञानी व इतिहासकार साबित करने की नाकाम कोशिशे करते रहते है !

विरासत के प्रति हमारा यह कैसा मोह है, कि अपने अतीत को महिमा मंडित करने से कही नही चूकते, झूठ पर झूठ बोल कर स्वयं और अपने गरीब व अनपढ़ पूर्वजों को महान बनाने की चेष्टा करते है, बल्कि तमाम खण्ड काव्यों की रचनायेंभी, जिनमे अतिशयोक्ति के अतिरिक्त कुछ नही ! अफ़सोस कि हम ईमानदारी से अतीत को दर्ज करना और उसका सरंक्षण करना आज भी नही सीख पायें, उन मास्टर्स से भी नही जिन्होंने हमारे मुल्क पर सदियों राज किया ।

क्या हम इतिहास की महत्ता को स्वीकार कर कुछ करते है, अपने आस-पास के उस वर्तमान का संकलन, जो कल को इतिहास बनने वाला है ?

जिसका अतीत ही अनिश्चित, अनिर्णित, अस्पष्ट व अज्ञात हो,  उसके वर्तमान व भविष्य का ईश्वर मालिक !

कृष्ण कुमार मिश्र

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन हाउस

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