© Krishna Kumar Mishra

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एक बात जो ठीक से नही कह पा रहा…..

आज गुजरा शहर के कोर एरिया से..तो कुछ अध्यापक बन्धु मिले तो ठहर लिया सड़क के किनारे, तभी एक फ़ल वाला अपनी चलती फ़िरती दुकान को घर ले जाने की तैयारी में था, और उसने कुछ खराब हो चुके अंगूर सड़क के किनारे लगा दिए…मैने सारे मामले को अपने हिसाब से गढ़ लिया ..कि कोई गाय आयेगी और उसे ये अंगूर खाने को मिल जायेगें…तभी एक अधेड़ आदमी उन्हें बटोरने लगा बड़े इत्मिनान से और जब सारे सड़े-गले अंगूर उसकी थैली में समा गये तो वह बड़े इत्मिनान से साईकिल में थैली को टांगकर चल पड़ा…देखिए यह है आवश्यकता का एक रूप जो व्यक्ति और हालात के हिसाब से बदलता रहता है..एक के लिए जो अंगूर खराब हो चुके थे..दूसरे के लिए बेशकीमती थे….इसलिए मित्र संसार में हर वस्तु कीमती है..मोल आप को लगाना है अपनी जरूरत के हिसाब से….आइन्दा से किसी भी चीज को हिकारत से मत देखिएगा…पता नही वह किसी के लिए कितनी कीमती हो..

कृष्ण कुमार मिश्र

13 अप्रैल 2011

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