dadi2माँ यथार्थ में…

मैं यानी कृष्ण कुमार मिश्र आज सुबह से ही अपने ग्राम जाने के कार्यक्रम को निर्णय नही दे पा रहा था, क्योंकि यहाँ भी कुछ आवश्यक कार्यों में गतिरोध उत्पन्न हो रहा था, अंततः मैंने निर्णय लिया और अपने पूर्वजों की जमीन पर कदम रखने की कल्पना को लेकर अपनी यात्रा प्रारम्भ कर दी, यात्रा का साधन था बस, सो मैंने बस में प्रवेश किया परन्तु भीड़ से भरी बस में मुझे खड़े रहना पड़ा, बस अपनी चाल में मग्न होकर चल पड़ी, उसे यात्रियों की परेशानियों से क्या मतलब ! थोड़ी दूरी तय करने के बाद बस कुछ खाली हुई, और मुझे बैठने के लिए थोड़ी जगह मिल गयी, बस ने अपनी गति फिर पकड़ ली, कुछ दूरी के बाद बस फिर रुकी, कुछ यात्री उतरे, और कुछ ने बस में प्रवेश किया, उन यात्रियों में एक वृद्धा थी, जिन्होंने मेरी समझ में प्रकृति को काफी कुछ देखकर ऊब चुकी थी, वह दीं-दुनिया से विरक्त, अतिसंवेद्नीय, कुछ कुछ अंतरात्मीय दिख रही थी, मई उन्हें देखे जा रहा था, मुझे उनमे संसार की वास्तविकता दृश्यित हो रही थी, आज ही मेरे साथ ऐसा नहीं हो रहा था, क्योंकि बुजर्गों में मुझे ईश्वर की झलक मिलती है, उनके झुर्रीदार चेहरे में समय के साथ अनुभव और अनुभव से परिपूर्ण शरीर मानों उन्होंने सारी दुनिया को देख लिया हो और उनके देखने के लिए इस संसार में अब कुछ बचा ही न हो, को देखकर मैं सिहर उठता हूँ! और यह वास्तविकता भी है की संसार में ८०-९० बरस देखने के बाद व्यक्ति खुद ब खुद इश्वर के करीब हो जाता है,  उसमे व्याप्त काम क्रोध लोभ इत्यादि का नास होने लगता है, हाँ इसके कुछ बूढ़े अपवाद भी होते है, की अंत तक वह माया मोह से फुर्सत नाहे पाते, परन्तु उनमे भी यह माया मोह अपने स्वार्थ के लिए नही होता है, एक तरीके से यह परस्वार्थ ही है, क्योंकि वह अपने कुटुंब के प्रति चिंतित होते हैं, सो वह अपनी पूंजी को अंतिम समय तक संजोने का प्रयास करते है, और उनमे आने वाला क्रोध भी दुनियादारी से परे होता है, क्योंकि की वह किसी पर झुझलाते है तो अपनी मनोव्यथा के कारण अपने दुःख के कारण किसी स्वार्थ से व्याप्त क्रोध नहीं करते है, अपने आप पर मन ही मन क्रोधित हुआ करते है, अंततोगत्वा यह सिद्ध होता है की वृद्ध व्यक्ति इश्वर में व्याप्त होने के लिए  व्याकुल रहता है,  और इश्वर उस व्यक्ति में व्याप्त होने के लिए आकुल रहता है,  यह बात सर्वथा सत्य है, वृद्ध व्यक्तियों के मुख को देखकर मुझे जितनी शान्ति मिलती है शायद और कहीं नही, मगर कुछ वृद्धों को देखकर क्रोध भी आता है, जो इस बात से परे है और अपवाद भी, जिनमे माया मोह  काम क्रोध का भण्डार है, जो सिर्फ अपने लिए जीते है, वह इस सिद्धांत अर्थात मेरे कथन पर एक कलंक है.

 

गांधी ने भी कहा की भारत गाँवों में बसता है, और भारत की आत्मा भी,  तो मुझे वह वृद्ध देखने में जो गाँवों की भारतीय सभ्यता से परिपोषित और अपने बुजुर्गों की परम्परा को निभाते हुए सर्वप्रथम और साधारण जीवन गामी  है, वह सर्वमान्य और मेरे द्वारा पूज्य है, क्योंकि उनके मुख की सिमतनों को देखने पर मुझे उस मुख में संसार की वास्तविकता नज़र आती है, उनके वृद्ध शरीर को देखकर मुझे उनमे संसार में जीने का तरीका दिखाई पड़ता है, और उनकी मंदगति को देखकर मुझे संसार (प्रकृति) गर्जना नष्ट कर देने वाली ध्वनी सुनाई पड़ती है, क्योंकि जब तक वह तरुण रहे माँ की गोद और पिता के स्नेह से युक्त दैदीप्त्मान रहे, युवा हुए तो जीवन के संघर्ष को झेलते झेलते वृद्ध हो गए और बुढापा उनको अपने में समेटकर प्रकृति की गहरी खाई की दहकती आग में घकेलने को आतुर है, क्या यही है जिन्दगी ?  जिसे तुलसीदास ने सबसे बड़ा और भाग्य से युक्त मनुष्य का जीवन बताया है, अगर यही दुसरे पहलु से देखा जाए तो जीवन में सुख ही सुख है, यही प्रकृति जो उत्पन्न करती है और नष्ट करती है, इससे संघर्ष करते जाओ, लेकिन यह सिलसिला एक दिन आदमी को थका देता है,  और यही थकन एक दिन नष्ट होने को मजबूर कर देती है, जब जब प्रकृति मनुष्य पर हावी रही तब तक मनुष्य दुःख झेलता रहा और अब मनुष्य प्रकृति से आगे निकलना चाहता है तो उसे क्यों रोका जाता है, सुख इसी में है की प्रकृति से लड़ो और आगे निकल जाओ…

 

खैर इन सब बातों पर चर्चा कभी ख़त्म नही हो सकती अंततोगत्वा अपने यथार्थ में आकर मैं आकर मैं अपनी उस यात्रा का वर्णन करता हूँ, वृद्धा के प्रवेश करने के कुछ क्षणों के उपरान्त बस में स्थान खाली हुआ और परिचालक ने उन्हें सीट पर बैठने का आमंत्रण दिया, वह काफी कमजोर होने के कारण उठ न सकी जोकि बस की जमीन पर बैठी थी, इसलिए उनके सुपुत्र ने उनकी बाहू को पकड़ कर उन्हें सीट पर बैठाने का प्रयास किया किन्तु वह असफल रहे, क्योंकि वह वृद्धा कमजोर होने के कारण गिर पड़ी, वृद्धा की इस विफलता और उनके सुपुत्र की असफलता ने सुपुत्र को काफी झुझला दिया, और वह अपनी माता पर आग बबूला होकर कहने लगा की इतनी कमजोर हो चल भी नहीं सकती और उन्हें वही जमीन पर गिरा छोड़कर आँखें  लाल पीली करने लगा, सभी के कहने पर उसने  सीट पर इस तरह बिठा दिया जैसे कोइ वस्तु पटक दी हो, मैं उस व्यक्ति से ही नहीं जिसने यह अमानवीय और अपने कर्तव्य से च्युत कार्य किया, एनी सब संसार के पुत्रों से कहता हूँ पूंछता हूँ…की बचपन में जब वह गिरे थे तब उनकी माँ ने उन्हें दौड़कर उन्हें उठाकर अपने सीने से नहीं लगाया होगा, और वह एक बार ही नही बार बार गिरते होंगे और उनकी माताएं झट से दौड़कर उन्हें सीने से लागाती होगी, शायद वह यह कभी नहीं कहती होंगी की इतने कमजोर हो गए हो की चल नहीं सकते…

 

कृष्ण कुमार मिश्र

(लेखक वन्य जीव विशेषग्य एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका दुधवा लाइव के संस्थापक संपादक हैं)

(यह शब्द मन में उपजे थे जब मैं स्कूल का विद्यार्थी था, सन १९९५ इस्वी की बात है अपने गाँव मैनहन जाते हुए..एक यात्रा वृतांत जिसे संस्मरण कह सकते हैं!)

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