कृष्ण

 

 

I am a wildlife biologist and a nature photographer, I love old books, sculptures, historic places, and people as well. As a freelance writer and photographer I try to explore and narrate the importance of ancient monuments, culture, wildlife and literature to those who explain the things at their surface meaning. Kheri district of north India is rich with its vibrant culture and medieval art, Its unexplored and unknown treasure of culture and environmental heritage is the specified area in which I have been working since last ten years, many a thing have been worked out yet “Miles to go before I sleep!!!

इन्ही बिगड़े दिमागों में घनी खुशियों के लच्छें हैं हमें पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे है

११-०८-१९७७ को बृहस्पतिवार की दोपहर को इस दुनियां में आंखे खोली अपने जनपद मुख्यालय के सरकारी अस्पताल में, स्कूली शिक्षा मैनहन की प्राथमिक पाठशाला में, फ़िर मितौली के राजा लोने सिंह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से कक्षा आठ उर्त्तीण किया तदपश्चात मेरा दाखिला लखीमपुर शहर के धर्म सभा इण्टर कालेज में कराया गया, विज्ञान स्नातक की शिक्षा युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर से फ़िर एशिया के विशालतम महाविद्यालय दयानन्द एंग्लों वैदिक कालेज से जन्तुविज्ञान में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की विद्यालय में प्रथम श्रेणी का दर्ज़ा हासिल किया, और यही से शुरूवात हुई प्रकृति के अध्ययन करने की उत्कठां की और पी०एचडी० में दाखिला लेकर मैं चल पड़ा अपने दुधवा जंगल की तरफ़ यात्रा जारी है पर यह कभी खत्म नही होगी प्रकृति के अथाह ज्ञान भण्डार से जितना कुछ मालूम होता जा रहा है उतनी ही आंनद की अनुभूति बढ़ती जा रही है….शायद चर्मोंउत्कर्ष की स्थित प्राप्त हो जाये और मैं बुद्ध हो जाऊ यही अभिलाषा है।

बचपन में मां ने रामायण, महाभारत की कहानियों से मेरे भीतर आदर्शता व भारतीयता के संस्कार भरे, आल्हा की कहानियों और परी कथाओं से मुझ में साहस और कल्पना शक्ति का विकास किया, कक्षा ९ में मैं अपनी मां के सौजन्य से  लखीमपुर के विलोबी मेमोरिअल हाल पुस्तकालय का सदस्य बना और वहां मैं परिचित हुआ इस रंग भरी दुनियां से, गांधी, लेनिन, जोसेफ़ स्टालिन, चर्चिल, गोर्की, दोस्तोविस्की, जयशंकर प्रसाद, बकीमंचन्द, शरतचन्द और मुसोलिनी से परिचित हुआ।

मेरे बाबा की उर्दू तालीम ने मुझे प्रभावित किया तो मैने उर्दू पर भी अधिकार हासिल किया, संस्कृत और ज्योतिष की शिक्षा में मेरे नाना प्रेरणा स्रोत बने।

मेरे व्यक्तित्व में सर्वागीण विकास की देन मेरे पिता की है जिन्होने मुझे प्रोत्साहित किया हर मौके पर और उनके बेहतरीन व्यक्तित्व की छाप मुझ स्पष्ट झलकती है। उनकी सरलता, बच्चो के प्रति प्रेम और समाज के प्रति सौहार्द और शिक्षा के विकास पर उनका संघर्ष, उनकी हर आदत ने मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी है जो अब संस्कार बन चुकें है। और ये लक्षण मुझ में परिलक्षित होते है हमेशा जो लोगो को मेरे पिता की याद दिलाते हैं।

कुल मिलाकर मैं प्रतिकृति हूं अपने माता-पिता, बाबा-दादी, नाना-नानी की किन्तु ये तो उनसे हमारा सीधा आंनुवशिक रिस्ता है इसके अलावा मुझे लगता है कि मुझ में उन सब का समावेश है जो इस धरती या ब्रह्माण्ड में मौजूद है, और मैं हर वक्त उन सब चीजों का अंश होने का एहसास करता हूं।

मुझे ये नही पता मुझे क्या बनना है पर ये मालूम है कि मुझे बेहतर करना अतीत में अपने बुजर्गों की तरह, एक सुन्दर कहानी कि रचना, सब लोगो के साथ मिलकर जो धरातल पर हो ………….यथार्थ!

क्योंकि मैं बचपन से आज तक रोमांचित होता आया हूं उन कहानियों को सुनकर, उन बेहतरीन लोगों की बेहतरीन संघर्ष गाथायें।

धरती पर मौजूद अपने सहजीवियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा हूं इस आशा के साथ की कभी तो लोग तहे दिल से इस अभियान में शामिल होगें, …………..

संसार के तमाम ऋणों में जैसे मातृ ऋण, पितृ ऋण, गुरू ऋण की थोड़ी बहुत भरपाई करने की अथक कोशिश तो करता रहता हूं किन्त मुझे मेरे कन्धों पर सदैव प्रकृति के सभी अंशों का ऋण महसूस होता है उनका कर्ज कैसे उतार पाऊ बस यही जुगत करनी है जीवन भर।

फ़िलवक्त अखबारों, पत्रिकाओं, और वैज्ञानिक जरनल्स में लेखन कार्य कर रहा हूं, अध्यापन के साथ-साथ, किसान परिवार से ताल्लुक होने के कारण अपनी जमीन में खेती जैसा सुन्दर रचनात्मक कार्य भी, फ़ोटोग्राफ़ी मेरा शौक है और मैं हर वक्त वर्तमान को कैमरे में कैद करने की कोशिश में जुटा रहता हूं इससे पहले की वह इतिहास हो जाये, और बिना प्रमाण की कहानियों में तब्दील!

कृष्ण कुमार मिश्र

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16 Responses to “मेरे बारे में”


  1. Gone thru some of the post of urs …. Impressive !!! u got gud eyes n a pen too !!! Keep writing and clicking ….hav added ur blog in ma do read list !!!

    Sandesh

  2. Nishant Says:

    प्रिय कृष्ण, आपने अपने बारे में बहुत बढ़िया लिखा है जो प्रभावित करता है.
    शुभकामनाएं.

  3. babysngh Says:

    आज मैंने जब तुम्हारे बारे में पढ़ा जिस में तुमने लिखा है की और “मैं बुद्ध हो जाऊ यही अभिलाषा है”। तो मुझे बहुत आश्चर्ये हुआ की मैने तुम्हारा नंबर बुद्ध नाम से ही लिखा है। दूसरी बात की तुमने जो लिखा है की “इसके अलावा मुझे लगता है कि मुझ में उन सब का समावेश है जो इस धरती या ब्रह्माण्ड में मौजूद है, और मैं हर वक्त उन सब चीजों का अंश होने का एहसास करता हूं”। मुझे ऐसा भी एहसास हुआ है ।

  4. Sourav Roy Says:

    मित्रवर ! यह जान कर अपार प्रसन्नता हुई कि आप हिंदी भाषा के उद्धार के लिए तत्पर हैं | आप को मेरी ढेरों शुभकामनाएं | मैं ख़ुद भी थोड़ी बहुत कविताएँ लिख लेता हूँ | आप मेरी कविताएँ यहाँ पर पढ़ सकते हैं- http://souravroy.com/poems/

    आपके बारे में और भी जाने की इच्छा हुई | कभी फुर्सत में संपर्क कीजियेगा…


  5. “”मेरे व्यक्तित्व में सर्वागीण विकास की देन मेरे पिता की है जिन्होने मुझे प्रोत्साहित किया हर मौके पर और उनके बेहतरीन व्यक्तित्व की छाप मुझ स्पष्ट झलकती है। उनकी सरलता, बच्चो के प्रति प्रेम और समाज के प्रति सौहार्द और शिक्षा के विकास पर उनका संघर्ष, उनकी हर आदत ने मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी है जो अब संस्कार बन चुकें है। और ये लक्षण मुझ में परिलक्षित होते है हमेशा जो लोगो को मेरे पिता की याद दिलाते हैं।——“”
    —–क्रष्ण–यह आत्मश्लाघा है–क्या आप का व्यक्तित्व सर्वान्गीण विकसित होचुका है..????? स्वयं भगवान क्रष्ण भी सिर्फ़ १६ कलाओं से युक्त थे उन्होंने स्वयं को सर्वान्गीण विकसित नहीं कहा….
    —— आत्मश्लाघा से अनुश्रित व्यक्ति कभी भी वस्तुओं की यथा-तथ्य व्याख्या नहीं कर सकता अपितु एक प्रकार से पूर्वाग्रह के चश्मे से ही देख पाता है……
    —- तुम्हारे ये सारे आलेख अन्ग्रेज़ी पुस्तकों के पढने से बने हुए विचार हैं…जो आधे अधूरे भ्रमित-भाव व असत्य हैं……बिना किसी प्रमाण व उसकी व्याखया के …

  6. Manish Says:

    गूगलियाते हुए यहाँ तक पहुँचा… आपके शौक हमें अपने शौक की याद दिलाते हैं.. लेकिन जरा ज्ञान के मामले में अभी कच्चा हूँ… न उर्दू आती है और न संस्कृत और ज्योतिष.. 😦 कोई सिखाने वाला ही न मिला और न ही पारिवारिक सहयोग. स्कूली शिक्षा में ही पिसता रहा. और ससुरे मास्टर फालतू का प्रश्न पूछ पूछ कर धोते रहे.. 😥
    आपके बारे में पढ़ना अच्छा लगा. 🙂

  7. Manju Gupta Says:

    धरती पर मौजूद अपने सहजीवियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा हूं इस आशा के साथ की कभी तो लोग तहे दिल से इस अभियान में शामिल होगें, …………..

    संसार के तमाम ऋणों में जैसे मातृ ऋण, पितृ ऋण, गुरू ऋण की थोड़ी बहुत भरपाई करने की अथक कोशिश तो करता रहता हूं किन्त मुझे मेरे कन्धों पर सदैव प्रकृति के सभी अंशों का ऋण महसूस होता है उनका कर्ज कैसे उतार पाऊ बस यही जुगत करनी है जीवन भर।

    sahi kaha hain krishnaji

  8. vivek Says:

    piry Krishan ji,
    mere pass bhi do beite hai or apki katha pad kar aisa laga ki abhi bahut mehnat karni apne baccho ko apke jaisa banane ke liye.
    Happy New Year 2014. Best Wishes N Regards

  9. pandey,ganesh chandra Says:

    aapaka sarvangin vikas ho hi chuka hai to aapake baare me kya kaha ja sakata hai! yaha esa kaun hai jisake paas apane kuch hone ka ahankar nahi hai!!

  10. AMAR SINHA Says:

    Dear Mr.Mishra,I read yours writings and felt once again that I am reading a very natural writing after Babu Premchand.I have passed more than three decades in journelism with DAINIK JAGRAN and NAVBHARAT group and now I am with a National magazine GYANVITARANAM,it is secially designed for teens and youth of INDIA, if you feel better we can publish your articles on history with your name.It may help our coming generation to know the fact.Awaiting for your reply-With regards-AMAR SINHA Mob-09323160689

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