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[फोटो साभार: हिन्दी विकीपीडिया]

भारतीय डाक और भारतीय प्रेम!–एक अफ़साना (कृष्ण कुमार मिश्र )

बात पुराणी है पुराने लखनऊ की, एक थे राघव दादा कलेक्टर बनाने की उम्मीद से पढ़ने आये थे लखनऊ, तैयारी कर रहे थे, इसी मध्य उन्हें एक लड़की से इश्क हो गया और कुछ अरसे में इश्क का अंत? भी….. जीवनं अनवरत जारी था अपनी रफ़्तार में तभी एक घटना ने राघव दादा के मुर्दा प्रेम को ज़िंदा करने की सनक पैदा कर दी….दरअसल एक विक्कू नाम का लड़का भी तैयारी कर रहा था सिविल सर्विसेज की थोड़ा हरफन मौला टाइप का मिजाज था उसका.. ज़िंदगी से बड़ी आसानी से दो चार कर लेने के फन में माहिर ! पर दादा ठहरे गहराई पसंद सो मामला पेंचीदा हो गया…विक्कू का कोइ चलताऊ नवयुग का प्रेम अफेयर था मामला डिस्कनेक्ट हो चुका था सो उस युवती को मोबाइल नंबर पहुंचाने की जुगत में लगे थे विक्कू बाबू …बात राघव दादा तक पहुँची …बगल वाले कमरे में तो रहते थे वे …बड़े व्यवहारिक.. उधार ले लेते अपनों से जूनियरस को खिलाने-पिलाने के लिए …बड़ी शिद्दत और जिम्मेदारी से बड़े होने का पालन करते….विक्कू के नवयुग प्रेम से अनिभिग्य दादा ने विक्कू से कहा की मैं तुम्हे एक प्रेमपत्र लिख दूंगा जिसमे शब्द शब्द दर्शन से सने हुए होगे पढ़ते ही वह बालिका तुम्हारे प्रेम के कमरे में दोबारा प्रवेश ले लेगी ….होशियार विक्कू यही तो चाहता था की अपनी हैण्ड राईटिंग में न लिखना पड़े पत्र..कही वह नव विचार युक्त भूमंडलीकृत विचारों से सुशोभित कन्या विक्कू के हस्तलिखित प्रेमपत्र का गलत इस्तेमाल न करदे ….. अंतत: विक्कू के लिए पत्र दादा ने लिखा और बड़प्पन दिखाते हुए कंधे पर हाथ रख कर बोले दे आ समझो वह बालिका फिर से तेरी हुई …..बिक्कू दौड़ता हुआ उस कन्या के कार्यक्षेत्र में पहुंचा जहा आगुन्तको के स्वागत हेतु बैठी बालिका को पत्र थमा का वांछित कन्या को दे देने के लिए कह कर सरपट वापस आ गया …..विक्कू अपने कमरे पर पहुंचा ही था…की नवयुग की कन्या का फोन विक्कू के पास आ गया … दादा भी प्रभाव देखना चाहते थे अपने लेखन के चातुर्य का ……दादा बोले किसका है? बिक्कू ने इशारा किया ..उसी का …दादा बहुत ही प्रसन्न हुए ….किन्तु इस प्रसन्नता ने उन्हें उनके अतीत में धकेल दिया …जहां सिर्फ अन्धेरा था और था मुर्दा प्रेम…..दादा ने उसी वक्त ठान लिया की क्यों न वह अपने शब्द मन्त्रों से खतों की आहुति दे अपने मुर्दा प्रेम पर …वह जाग उठेगा किसी रामसे ब्रदर्स की डरावनी फिल्मों के भूतों की तरह …..राघव दादा ने अब ख़त लिखना शुरू कर दिया अपनी प्रेयसी को ….जवाब नहीं आये तो रजिस्टर्ड डाक का इस्तेमाल किया …ख़त ही वापस आने लगे उनके पास …तो खीझ कर उन्हों ने अपनी प्रेमिका के पड़ोसियों को केयर आफ बनाकर पत्र भेजने शुरू किए ..दो महीने गुजर गए इस ख़त बाज़ी में …दादा के पत्र अभी भी निरूत्तर ही थे … किन्तु एक फर्क आया था उस मोहल्ले में जहां .दादा की प्रेमिका रहती थी ..अब मोहल्ले वाले डाकिए को देखकर अपने दरवाजे बंद कर लेते या राह में डाकिया मिल जाता तो नज़र बचाकर भागने लगे …यह असर जरूर पडा था दादा के खतों का …शब्दों का प्रभाव अभी बाकी था? क्योंकि पत्र पढ़े नहीं गए थे वे तो वापस हो आते थे ! ….दादा का पत्र लेखन जारी था अब तो वह शहर की सीमाए लांघ कर प्रेमिका के रिश्तदारों को ख़त भेजने लगे थे ! …किन्तु जवाब न आने से वह थोड़ा विचलित थे …आखिर कार पांच महीने गुजर गए सब्र का बाँध धाह गया दादा अपनी प्रेयसी के मोहल्ले पहुँच गए …कुछ मलिक्ष मन्त्रों अर्थात गालियों का आह्वाहन किया ..मोहल्ले में लोग बाग़ अपनी अपनी छतो पर सवार पूर्व विदित मामले का जायजा ले रहे थे …तभी धडाम की आवाज आई …और लोग चिल्ला उठे बम…..बम ……!!!!]

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****************दूसरी क़िस्त********************

(दादा अब लखनऊ से बरेली आ चुके थे …बरेली जेल …….दरअसल उनहोंने उस रोज अपनी प्रेमिका के घर पर बम फेका था …कोइ हताहत तो नहीं हुआ बस दीवार टूट गयी थी और कुछ लोगों को चोंटे आई थी ….इसी कृत्य के बदले उन्हें यह सरकारी इमदाद मिली की कुछ दिनों तक सरकारी घर और सरकारी भोजन…….दादा अभी भी हार नहीं माने थे …पत्र लेखन जेल से भी जारी था ! इसी बीच उनके सह्बोले सूत्रों ने जेल में खबर पहुंचाई की भौजी की तो शादी हो गयी ! …राघव दादा उस रोज बहुत रोये ….निराशा ने उनके जीवन के इस परम उद्देश्य को बंदी बना लिया …पर बड़ी जीवटता वाले शख्स थे फिर कलम उठाई और शुरू कर दिया अपनी प्रेमिका की ससुराल में पत्र भेजना …ये सारी खबरे विक्कू जैसे उनके तमाम मित्रवत छोटे भाई समय समय पर जेल में पहुंचाते रहते …..पर अबकी बार ख़त वापस नहीं आये यानी वो पढ़े गए …चिट्ठी का असर तो आप सभी लोग देख ही चुके थे पूरा मुहल्ला आतंकित था डाकिए की सूरत देखकर …अब राघव दादा के शब्दों की कारस्तानी बाकी थी वो भी पूरी होने वाली थी अब! ….एक रोज जेल में एक अपरिचित राघव दादा से मिलने की दरयाफ्त लेकर आया …दादा उससे मिले …पता चला वो उनकी प्रेमिका का पति है. उसने ख़त पढ़े थे सो उन्ही शब्दों के असर से बावस्ता होकर वह भागा चला आया था राघव दादा के पास ………अब रूबरू होकर दादा के वाक के चातुर्य से दो चार होने वाला था वो …दादा ने उसे अपने प्रेम प्रसंग की तमाम बारीकियों से परिचित कराया उसे तमाम दलीले दी और सबूतों के मौजूद होने की बात कही ! वह व्यक्ति अवाक सा था ! उसके जहन में सुनामी सी भड़क रही थी और पैर धरती का सहारा लेने में अक्षम से हो रहे थे ऐसा था दादा का दलीलनाम ! …दरअसल दादा ने वकालत की भी पढाई की थी सो प्रेम की वकालत करने में भी वकील होने का पुट पर्याप्त था….यहाँ एक बात बता देना जरूरी है की दादा से उनकी प्रेमिका ने कभी संसर्ग के पश्चात कहा था की तुम्ही मेरे पति हो मेरी मांग भर दो मैं जीवन भर तुम्हारी ही रहूँगी! बस क्या था दादा ने फ़िल्मी अंदाज़ में भावनाओं से सरोबार अपने रक्त की कुछ बूंदों से उसकी मांग भरी थी ….और यही बात उनके मन में पैबस्त हो गयी थी की उसने कहा था ! की मैं तुम्हारी हूँ और जीवन भर तुम्हारी रहूँगी…इस प्रसंग पर दादा अपने सह्बोलो से अक्सर कहते क्यों कहा था? उसने ऐसा फिर क्यों नहीं पूरा किया अपना वादा! …जो मेरे जीवन का उद्देश्य बन चुका था ! ……… खैर कहानी ने यहाँ बड़ा मार्मिक मोड़ लिया दादा की प्रेयसी के पति ने उसे तलाक दे दिया……दादा के प्राइवेट सूत्रों ने ये खुशखबरी दादा को पहुंचाई …एक बार फिर उस मोहल्ले में डाकिए की आमद बढ़ गयी और लोग बाग़ दोबारा विचलित होने लगे ! दादा ने फिर अपनी प्रेयसी के घर पत्र लिखना शुरू कर दिया था क्योंकि उन्हें पता चल चुका था की उनकी प्रेमिका को उसके पति ने छोड़ दिया है! ….किन्तु वह मुर्दा प्रेम इतनी कवायदों पर भी जागृत नहीं हो पा रहा था …..दादा को जमानत मिली वह लखनऊ छोड़ अपने घर जिला शाहपुर वापस आ गए और खेती करने लगे साथ ही वही की डिस्ट्रिक्ट की सिविल कोर्ट में वकालत भी ! राघव दादा अब टूट चुके थे…अपने पुराने प्रेम को शब्दों की अभिव्यक्ति से ख़त के माध्यम से जिलाने में ……जीवन के कई बरस की तहोबाला कर दी थी उन्होंने इस ख़्वाब के लिए की शायद उनकी प्रेयसी दौड़कर उन्हें गले लगा लेगी और सीने में धधकती ज्वालामुखी ठंडी हो जायेगी उस प्रेम की बारिश से …पर ऐसा नहीं हुआ …अक्सर होता भी नहीं है यथार्थ में …टूटे हुए रिश्ते और टूटे हुए धागे रहीम की बहुत मानते है ..चटक जाए तो जुड़ते नहीं जुड़ जाए तो गाँठ ………! दादा ने अपने प्रेम को खो दिया था और शायद हार भी मान चुके थे …परन्तु विक्कू के सतही प्रेम की रवादारी देख उनकी गहरी आँखों में अपने प्रेम को जगा लेने की तमन्ना पैदा हो गयी …सर्वविदित है की गहराई में जाने पर डूबने की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है बजाए सतह पर रहने से …विक्कू आज भी तैर रहा है रंग बिरंगी स्वीमिंग ड्रेस में कभी कभी हलके फुल्के गोते भी लगा लेता है किन्तु गहराई में नहीं जाता कभी !……. .शेष अगली क़िस्त में ..कृष्ण कुमार मिश्र )

*************************तीसरी क़िस्त ***************************

Photo Courtesy: Wikipedia

Photo Courtesy: Wikipedia

…जिला शाहपुर …राघव दादा के नाम से बहुत जल्दी वाकिफ हो चुका था चंद महीनों में ….उनकी यह शोहरत वकालत के लिए नहीं थी और न ही उनकी वह मुर्दा मोहब्बत थी इसकी वजह!

वे लोगों में, मुख्यता: उस जनपद के सरकारी तंत्र में कुख्यात हो चुके थे …वजह थी उनकी पत्र लिखने की आदत जो अभी भी बरकरार थी उनमे, बावजूद इसके की वह अपनी मोहब्बत में पत्राचार करके फेल हो चुके थे…..दरअसल ये सब कमाल था वारेन हेस्टिंग्स की डाक का जी हाँ यही शख्स तो था जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी के गवर्नर जनरल का रूतबा मिलने के बाद अपने शासन में डाक सुविधा को आम जनता को मुहैया कराई और एक डाक की फीस एक आना १०० मील ….यही डाक ने तो राघव दादा को कई रंग दिखाए थे …जिसमे लाल रंग की छटा ज्यादा प्रभाई थी …भारतीय डाक का डाकिया राघव दादा की वजह से उदय प्रकाश के वारेन हेस्टिंग्स का सांड बन चुका था कही उससे भी ज्यादा भयावह ……..

राघव दादा अब भारतीय डाक के उस इम्पेरियल लाल रंग वाले बक्से का पूरा इस्तेमाल अपने गृह जनपद में कर रहे थे …एक लेखपाल की नौकरी ले चुके थे अभी तक खतों के माध्यम से और अब एक डिप्टी कलेक्टर के पीछे पड़े हुए थे …खतों का सिलसिला मुसलसल जारी था और खतों की मंजिल होती थी दस जनपथ और रायसीना हिल ………राघव दादा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से नीचे के ओहदे वालों को अमूनन ख़त नहीं लिखते थे यह विशेषता थी उनकी ! ….शनै: शनै: शाहपुर कचहरी में जब दादा की आमद होती तो वहां के सरकारी अफसर और कर्मचारी राघव दादा को देखकर कन्नी काटने लगते ……ये सब कमाल था दादा के वारेन हेस्टिंग्स के डाक का ! ….इश्क से हाथ धो बैठे थे पर भारतीय डाक का इस्तेमाल करने की आदत अभी भी मौजूं थी और शायद और पैनी हो चुकी थी अब तलक के समयावधि में ……..कभी भारत जैसे देश में हरकहरे एक जगह से सरकारी डाक दूसरी जगह पहुंचाते थे या व्यक्तिगत सूचनाएं लोग बाग़ एक दुसरे के रिश्तेदारों के माध्यम से …कभी कबूतर भी था जो प्रेम संदेशों की अदला बदली कर दिया करता था …लेकिन ये सारे माध्यम खुद सुनसान राहों जंगलों और डाकुओं से डरते थे ….पर वारेन हेस्टिंग्स का डाकिया जब अवतरित होता राघव की डाक लेकर तो बड़े बड़ों की घिग्गियाँ बंध जाती……..

भारतीय डाक पारस के बादशाहों से लेकर सुल्तानों की सुल्तानी तक के सफ़र के बाद द ग्रेट ईस्ट इंडिया की इन्त्जामियाँ में ख़ास से आम हुई … ब्रिटिश भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की रीढ़ बनी भारतीय डाक …कहते है की १९४२ के दौर में बापू जब क्रान्ति कर रहे थे तो ब्रिटिश भारतीय डाक द्वारा किसी भी चिट्ठी पर सिर्फ गांधी, बापू या महात्मा लिखा होने भर से वह डाक बापू तक पहुँच जाती थी वह चाहे जहां हो पूरे भारत वर्ष में …..ऐसा ही कुछ क्रांतिकारी प्रभाव था राघव दादा में की डाकिया उनकी प्रेमिका के मोहल्ले में पहुंचा नहीं के लोग जान जाते थे की उन्ही का ख़त आया होगा …….ख्याति तो थी बापू विख्यात थे भारत वर्ष में तो चिट्ठी पहुँच जाती थी वो कही भी हो बिना पते के …और दादा कुख्यात थे चिट्ठी पहुँचने से पहले ही डाकिए की सूरत से लोग भांप जाया करते थे! की आ गयी ……..!!१ आज कुछ ऐसा ही शाहपुर के सरकारी तंत्र के लोगों में भय व्याप्त रहता है …अर्दलियों के चिट्ठी देने से पहले अफसर पूंछते की राघव से सम्बंधित तो कोइ पत्र नहीं है ? और अर्दली डाकियों से पूंछते उसका तो नहीं है कुछ? …..

बात इस्तेमाल की है भारतीय डाक ने कई इतिहास रचे ..हर बुरी परिस्थितियों में उस व्यवस्था ने जनमानस का साथ दिया …और आज भी डाकिए मुस्तैद है अपने काम पर सूचनाओं से लैस …इलेक्ट्रानिक संदेशों की व्यवस्था ठप हो जाने पर यह इंसानी मशीनरी हर वक्त काम करती है हर आपदा में …..पत्रों की एक और खासियत है की इनकी सनद ज्यादा पुख्ता रहती है …किसी और सूचना के माध्यम के बजाए …और इनका प्रभाव भी ……

इतिहास सिखाता है दादा ने भी सीखा होगा ….की हर वह व्यक्ति जो जितना अधिक चिट्ठीबाज़ था वह उतना ही अधिक महान हुआ ….मोहनदास नेहरू टैगोर आदि आदि …..पत्रों की रूमानियत और उनकी खासियत तो कोइ दिल वाला ही जान सकता है …दादा ने भी जाना आखिर जो वो दिलदार ठहरे ..पर इस्तेमाल का तरीका ज़रा तिरछा हो गया …! नतीजतन कहानी मोड़ नहीं ले पायी ! ….पर दादा अब भ्रष्टाचार को चुनौती दे रहे है, भारतीय डाक के माध्यम से …उनके जज्बे को सलाम ….की जिन्दगी अब मुसलसल एक रफ़्तार और सीधी राह पर रफ्ता रफ्ता चल रही है …अब गाफिल नहीं है वह !

..राघव दादा की प्रेयसी काश ..खुद डाकिये से यह कह देती की “ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू …वो जान जायेगें ..पहचान जायेंगे ” तो ये डाकिये की डाक वारेन हेस्टिंग्स के सांड की तरह न होती वहां के लोगों में….पर अफसानों का क्या वे किसी पर रहम थोड़े करते है बस बयान कर देते है जस का तस !@

……यकीन मानिए ये वारेन हेस्टिंग्स की डाक लाने वाले डाकिए की सूरत को देखकर राघव दादा की प्रेयसी के उस मोहल्ले के लोग अब भी मुस्करा दिया करते होगे ………..इति

कृष्ण कुमार मिश्र

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बक्सेवाला

ये वाकया जिसे मैंने फेसबुक पर प्रसारित किया था ..अब मैनहन विलेज में 

ये बुजुर्ग है हमारे खीरी क़स्बे के बक्से वगैरह की मरम्मत करते है। उस्ताद हैं अपने फ़न में। उम्र तकरीबन 85 साल सुनाई भी कम पढता है कुछ पूछने पर न सुन पाने पर दोबारा पूछने पर अपनी अक्षमता को हासिए पर कर देते है वो मुस्कराकर जवाब देकर! पुछा की क़स्बे से इतनी दूर साईकल चलाकर आते है थक जाते होंगे।।। जवाब बड़ा मार्मिक सा था एक दम खरा कार्लमार्क्स वाला ।। पेट पर हाथ रखा बोले सब इसकी ख़ातिर। पेट की खातिर वाली बात बुर्जुआ लोग शायद ही समझ पाए और अगर समझ ले तो दुनिया और खूबसूरत हो जाए। खैर चलिए एक और बात बताई हमें इन बुजुर्ग ने जब मैंने पूछा की बेटे तो होंगे परिवार होगा तो बोले हाँ सब है पर सब अपने अपने दाना घास में मशगूल है। फिर एक सुन्दर बात बोले ये बुजुर्ग ज़रा ध्यान से सुनिएगा आप लोग भी….बोले..दोनों हाथ आपस में जोड़ कर सिर आसमान की तरफ़..सब बंसी वाले का करम है वही सबका मददगार है…बुर्राक सफ़ेद दाढ़ी..उम्र को रेखांकित करता रेखाओं दार सफ़ेद चेहरा…आँखों में एक सदी की परछाई सबकुछ बयां कर रही थी।…ये कृष्ण के कर्मवाद की मजबूरी है या आवश्यकता समझ नहीं आता बंसी वाले तेरी धरती के लोग तेरे नाम का सहारा लेते है चाहे वो किसी मजहब को मानते है।… हमने आज इन बुजुर्ग में फिर एक बार अपने भारत को देखा..आप भी देखना चाहेंगे!..कृष्ण

कृष्ण कुमार मिश्र 

Ab kya kha jaaye
Vaise desh ko isi prakar ke muslims ki jarurat hai na ki baat – baat pr jehad ka nara lgane waalo ki
  • कृष्ण कुमार मिश्र Dharmendra Awasthi ji बात इस प्रकार और उस प्रकार के मुसलमान या हिन्दू की नहीं है यहाँ।। यहाँ इंसानी बात है।। और कृष्ण और राम चुकी भारतीय जनमानस में रचे है इस लिए स्वाभाविक है किसी भी व्यक्ति के मुख से उनके नाम का उच्चारण।।। ईश्वर के कई नाम हो सकते है।। अल्लाह भी और कृष्ण भी।
  • कृष्ण कुमार मिश्र Dharmendra Awasthi Uttam Pandey ji मज़े की बात ये है की यार बंसी वाले का रौला बहुत है आज भी। बंसी वाला मिल जाए तो पूंछू यार बड़ा जलवा है तेरा…सूर रसखान मीराबाई मिल जाए तो चरण पकड़ लू की भाई आपलोग तो जनमानस के ह्रदय में ही ले जा के बिठा दिऎ अपने कृष्ण कन्हैया को।। ज़रा इधर भी दृष्टी डाल दो दो चार दोहे सवैया हो जाए।।। फिर क्या कहने।।???
Bura kuch nhi hai
Ham hi shi hai aor ham hi mahan hai
Jab koi ye bolta hai problm wahi se suru hoti hai
  • कृष्ण कुमार मिश्र और हां आमिर खुसरों रसखान ने ब्रज में ही अपनी रचनाए लिखी जो कृष्ण को ईश मानकर उनके प्रेम में डूब जाने के भावों को शब्दांकित किया है
  • Vivek Saxena yahi khasiyat hai marxism ki, ke burjua ko koso aur khud burjua banne ki hasrat palo………. kya sampoorna samyavadi vyavastha me bhi ye sambhav hai ki sabhi burjua ya sabhi sarvahara ho jayen……… jamini haqiqat me to ye sambhav nahi, haan……….diva swapna me ho sakta hai, jo marxist aksar dekhte rahte hain…………
  • Jitendra Geete बहुत अच्छे ” मिश्र जी ” यही तो हमारा भारत है। इस सोच पर सब कुछ न्योछावर ” भारत दर्शन ” के लिए शुक्रिया
  • Erum Raza Afsos aj bhi karl marx ko aap khara kehte hi.
  • हिमाँशु तिवारी भाई साब आपने बुजुर्ग चाचा का मार्मिकता के साथ शानदार वर्णन करते हुए अपने अन्दर के साहित्यकार का ख़ूबसूरत उपयोग किया लेकिन हर बात के लिए बुर्जुआ को जिम्मेदारी दे देना केजरिवालवाद(पलायनवाद )की निशानी हैं
  • कृष्ण कुमार मिश्र Erum Raza हिमाँश जी बात कार्लमार्क्स की नहीं पेट की है और उस सन्दर्भ में मैंने मार्क्सवादियों के शब्द इस्तेमाल किए बस ।।यहाँ मैंने कुछ भी धार्मिक या राजनैतिक होकर नहीं कहा।। सिर्फ संस्कृति की सुन्दरता समाज और परिवार की वेदना और अपने भारत की बात कही है बंधू।।।। शेष।।। कुछ नहीं
  • Vivek Saxena pet ki baat per agar hamesha akele marx yaad aayen…….kabhi kabeer ya kisi aur ka naam na aye ……….tab to ye marxwaad hi hua……..
  • कृष्ण कुमार मिश्र Vivek Saxena ji कबीर के दौर में मुल्क की स्तिथि ये नहीं थी सयुंक्त परिवार थे सामाजिक संवेदनाये थी और तभी कबीर ने पेट की बात के बजाए अध्यात्म की बात की संतोष और शान्ति की बात की।। तब तो इस बात का पालन होता था की ।।।इतना दीजिए जा में कुटुम समाय मैं भी भूSee More
  • Erum Raza U mean to say desi daal me vilayti tadka.
  • कृष्ण कुमार मिश्र Erum Raza ji कुछ भी समझ ले। अभियक्ति मेरी समझ आप की!!!
  • कृष्ण कुमार मिश्र

फ़ोटो क्रेडिट: flowersofindia.netअब सुगन्ध व फ़ूलों पर रईसों की बपौती नही रहनी चाहिए!

बात फ़ूलों की करना चाह्ता हूं, चूंकि मसला खूबसूरती और खुशबुओं का है तो थोड़ा हिचक रहा हूं! प्रकृति की अतुलनीय सुन्दरता का बखान करना वर्तमान में मुश्किल और पिछड़ेपन की निशानी है..इन महान साहित्य पुरोधाओं के मध्य…क्योंकि वह समाज की गन्दगी जो उनकी नज़र में पहले से मौजूद है, रिस्तों की कड़वाहट जो उनके घरों में विद्यमान है…दुखों, करूणाओं और प्रेम के तमाम विद्रूप आकार-प्रकारों को (जो उनके मन शाम-सबेरे हर वक्त उपजते रहते हैं) बेचते ये बुद्धि-विद्या के स्वयंभू अब प्रकृति की बात करने में शर्मसार होते है..कारण स्पष्ट है कि रेलवे स्टेशनों, बसड्डों  के बुक स्टाल्स पर प्रकृति  प्रेम नही तलाशा जाता..!.. और राजिनीतिक गलियारों में वोट और गोट की जगह प्रकृति समा ही नही सकती!…फ़िर कौन बेवकूफ़ इन्हे फ़ूल, पत्तियों पर लेखन के लिए पुरस्कृत कर देगा! खैर..मैं लिए चलता हूं कालीदास और उस दौर के…. प्रकृतिकारों का नाम भूल रहा हूं!!!!…..  जब सरोवरों में कमल-कमलिनियां पुष्पित होते थे और राज-कन्यायें उनमें स्नान करने आया करती थी…तो घोड़े पर सवार राज-पुरूषों के घोड़ो को अक्सर उन्ही सरोवरों पर पानी पिलाना आवश्यक होता था !! महलों और बगीचों में युनान,  मंगोलिया, अरब देशो से लाये गये वृक्षों, झाड़ियों, और लताओं की सुनहरी छटाओं का जिक्र रामायण काल से लेकर राज महलों व बौद्ध मठों तक विस्तारित था! मुगलों ने भी दुनियाभर से प्रकृति के विविध रूपों को अपने बगीचों में खूब इकट्ठा किया….फ़ुलवारियों के रूप में!…हाँ हमें अंग्रेजों को कतई नही भूलना हैं जिन्होंने दुनिया में मौजूद अपने सामराज्य के प्रत्येक भू-भाग पर उगने वाली सुन्दरता को भारत में रचा-बसा दिया जिसकी कुछ झलके अभी भी कुछ सरकारी आवासों में दिखाई दे जाती हैं!…मैं आप को याद दिला दूं एडविन लैंडसीयर लुटियन की जिसने नई दिल्ली का निर्माण किया और गवर्नर हाउस, रायसीना हिल जैसी जगहों को प्रकृति के इन रंगो से सरोबार….!! भारत के वन विभाग के पुराने डाक बंग्लों में कुछ योरोपीय व अफ़्रीकी वनस्पतियां अभी भी मिल जायेंगी जिन्हे ये अंग्रेज सुन्दरता और सुगन्ध के लिए इन जगहों पर लगाया था!….एक बात कहना चाहूंगा कि धरती पर कोई प्रजाति देशी-विदेशी नही होती…बशर्ते उसे धरती का वह हिस्सा उस प्रजाति को अपना ले…..! अब भूमिका शायद लम्बी व निरर्थक हो रही तो चलिए आप को ले चलते है उत्तर भारत के मैनहन ग्राम में जहा सरोवर भी है और आम-जामुन व पलाश के बगीचे भी जो धीरे-धीरे पतन की राह पर अग्रसर किए जा रहे हैं! १९८०-९० के भारत में बचपन में मैनें उन्ही गांवों में फ़ुलवारियां देखी जहां कोई मन्दिर मौजूद हुआ और उसके आस-पास पुजारी प्रवृत्ति के लोग…उन्हे रोज जो भगवान को पुष्प अर्पित करने होते थे! सो पुष्प की उप्लब्धता की व्यवस्था इन फ़ुलवारियों के रूप में होती ्थी! नही तो पुष्प व पुष्प-वाटिकायें आदि भारत में राजा-महराजाओं, मध्य भारत में नवाबों और माडर्न ईंडिया में अफ़सरों का विषय ही रहे, एक आम व औसत हिन्दुस्तानी रोटी के जुगाड़ में ही दिन काट रहा होता था उसे तो पेट भरने के लिए रोटी की सुगन्ध ही दरकार रही बेचारा पुष्प और उनकी खुशबुओं से बावस्ता हो इसका न तो उसे कभी मौका मिला और न ही खयाल आ पाया। हाँ इतिहास के पन्नों में जमींदारों और राजाओं की जो फ़ुलवारियां हुआ करती थी उनमें न तो आम हिन्दुस्तानी को जाने की इजाजत थी और न ही उस फ़ुलवारी के किसी पौधें का बीज या कलम किसी अन्य को मिल सकती थी..कारण स्पष्ट था कि आम हिन्दुस्तानी के घरों में पुष्प खिला तो उन जमींदार महाशय के रसूख में धब्बा लग जायेगा….एक वाकया याद आ गया है सुन ले….मेरे जनपद की तहसील मोहम्मदी जो कभी बरतानिया सरकार में  जिला होने का गौरव रख चुका है, वहां दिल्ली सरकार (मुगल) के समय डिप्टी कमिश्नर टाइप की हैसियत से रहने वाले जनाब ने एक बगीचा लगाया था उसमें केतकी (केवड़ा) का पुष्प कहीं से लाया गया, जो इस इलाके भर में अदभुत व अप्राप्त वनस्पति वन कर सैकड़ों सालों तक गौरवान्वित होता रहा…आम हिन्दुस्तानी जिसकी आज भी आदत क्या खून में यह पैबस्त है कि राजा के घर की घास-पूस भी कुछ अतुलनीयता अवश्य रखती है…और वह मूर्ख उस सामान्य बात या वस्तु को असमान्य ढंग से पेश करता हुआ अपने को गौरवान्वित करता आया है….हाँ तो वह साधारण सा केवड़ा केतकी वन सिर उसी बाग में खिलता रहा और हमारे लोग यहाँ तक की मीडिया गौरवगीत गा गा कर भरार्ने लगा….लेकिन सिलसिला नही टूटा….आदत में है जो…..कभी भारत की विविधिता का खयाल भी नही किया कि जहां हर देवता के सहस्र नाम हो, जहं की भाषा पर्यावाचियों से लबलब ठसी हुई हो..जहां एक कोश पर चीजों के नाम बदल जाते हों…इस बारे में भी नही सोचा…..बस केतकी जो वर्ष में एक बार  खिलती है!….दुनिया में सिर्फ़ मोहम्मदी में…संसार में नही होती…फ़लाने हसन द्वारा लाई गयी..केतकी….यह डाकूमेन्टेशन है हमारे मुल्क में…..बहुत जल्दी जहां चीजे बिना सोचे समझे अदभुत हो जाती है…और सरकार व पढ़े लिखे लोग उसे पढ़ते जाते है…बिना सोचे…जाने….साल दर साल केतकी खिलती रही….अभी भी खिलती है…….पूरे संसार में सिर खीरी जिले को यह गौरव प्राप्त है…..आखिर फ़िर वह लाये कहां से थे इस केतकी को?..जब संसार में सिर्फ़…..मजा तो तब आया जब मेरे एक परिचित बुजर्ग ने गर्जना करते हुए मुझसे कहा कि केतकी उनके यहां खिला…..उनकी गर्जना में सदियों से गुलाम रहे हिन्दुस्तानी के भीतर चेतना व आत्म-गौरव का झरना स्फ़ुटित हो रहा था…जैसे वह तोड़ देना चाहते हो उन जंजीरों को जो सिर्फ़ यही कहती हो कि यह पुष्प सिर्फ़ राजा या नवाब के बगीचे में खिलता हो….उन्हे मैं सलाम करता हूं उनके इस जज्बे के लिए….काश…

दरसल वो कही से केतकी का सम्पूर्ण पौधा लाये और उसे रोप दिया…इसमें एक टेक्निकल मामला है, मोहम्मदी वाले केतकी का पौधा जमींदारी रहते तो आम आदमी को अपने घर लगाने की गुस्ताखी नही कर सकता था, लेकिन आजादी के बाद उसने जरूर प्रयास किए..किन्तु इस प्रजाति में नर व मादा पौधे अलग-अलग होते हैम..इसलिए जिसने भी एक पौध उखाड़ कर अपने घरों में लगाई तो नर व मादा में से एक की अनुपस्थिति उसमे पुष्पं के पल्लवन में बाधक बनी रही अंतत: यह मान लिया गया कि यह पौधा उसी बाग में खिल सकता है….नवाब साहब …के बाग …कोई कहता वह पौधे के साथ उस जगह से मिट्टी भी लाये थे..इसीलिए यह उसी बगीचे में खिल सकता है!….या कोई कहता भाई आदमी आदमी की बात होती है, उसके हाथों में…..जस!

खैर अब चलिए मैनहन में जहाँ मैने अपने पूर्वजों के घर के पुनर्निर्माण के साथ-साथ दुआरे पर फ़ुलवारी की परिकल्पना पर काम कर रहा हूं..आखिर आजाद भारत का बाशिन्दा हूं और फ़िजाओं में खुसबूं और सुन्दरता तलाशने का मुझे पूरा हक है! तो मैने पहले चरण में…हरसिंगार, चम्पा, चमेली, रात के रानी, अलमान्डा, बेला, मालती,  के पौधे रोपे हैं, दूसरे चरण में मैं गन्धराज, मौलश्री, जूही, कचनार, बेल का रोपन करूंगा, साथ ही बरगद, सागौन जैसे विशाल वृक्ष भी मेरी कार में सुसज्जित है….जिन्हे कल रोपित किया जायेगा….फ़िलहाल मेरा अगला कदम गाँव के हर व्यक्ति कों तमाम खुशबुओं वाले पौधें भेट करने का निश्चय है!…लेकिन क्रमबृद्ध तरीके से…शायद रात की रानी मिशन…बेला…..चमेली….या फ़िर गन्धराज मिशन…एक वर्ष में प्रत्येक  सगन्ध पुष्प वालें पौधों  में एक सुगन्धित पौधा. वितरित करूंगा..जो हर घर में पल्ल्वित हो…..इसी इरादे के साथ.. पुष्पवाटिकाओं के चलन की शुरूवात करने की कोशिश…शायद रिषियों, और राज-कन्याओं और राज-पुरूषों के शैरगाह की जगहें आम हो सके आम आदमी के मध्य…जमींदारों, नवाबों और नौकरशाहों के बगीचों का मान तोड़ती ये पुष्पवाटिकायें एक औसत हिन्दुस्तानी को अपनी परेशानियों व तंगहालियों की गन्ध के मध्य विविध सुगन्धों का एहसास करा सके…और सुगन्धों व नवाबों के मध्य रिस्तों का मिथक टूट पाये….!

कृष्ण कुमा्र मिश्र

मैनहन-262727

भारतवर्ष

-कृष्ण कुमार मिश्र

अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं।

गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के लिए- राष्ट्रीय बीमा योजना।

(श्रम एंव नियोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार एंव आई सी आई लोम्बार्ड द्वारा)

भारत की एक बड़ी आबादी जो अपनी उंगलियों के चिन्ह खो चुकी है ये वही चिन्ह है जो सरकारी कार्यों  में व्यक्ति के होने का प्रमाण होते है और भारत की एक आबादी के लिए ये निशान भाग्य की भाषा के शब्द जिनमें ज्योतिषी शंख व चक्र जैसी आकृतियों की बिनाह पर जजमान को उसके जीवन में राज-योग को सुनश्चित करते है,…….!

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश के एक गाँव  में लगाई गयी, मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप के साथ, ताकि वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके और बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली कर ले। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के उपरान्त मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके, एक तरह का वेरीफ़िकेशन……..।

यहां मैं अपने लोगों की जिस जीर्ण-शीर्ण दशा से रूबरू हुआ उसके लिए शायद माकूल शब्द न प्रस्तुत कर पाऊं किन्तु मुझे किसी भी व्यक्ति की उंगलियों के निशान नही मिले जिन्हे स्कैन किया जा सके। गरीबी और शोषण की हर परिस्थिति ने उन्हे नोचा-घसोटा था, कहते हैं, आदमी के हाथो की लकीरे उसका भूत-भविष्य बताती है, तो यकीनन उनके हाथ मुझे उनका भूत-भविष्य और वर्तमान सभी कुछ बता रहे थे, जिसे कोई ज्योतिषी कभी नही पढ़ सकता था, क्योंकि लकीरे नदारत थी उनके हाथों से अगर कुछ था तो समय की मार के चिन्ह फ़टी हुई मोटी व भद्दी हो चुकी बिना रक्त की खाल जो हथेलियों के बचे हुए सख्त मांस व हड्डियों पर चढ़ी भर थीं। जिसे प्रबुद्ध जन कर्म-योग कहते है तो उसकी प्रतिमूर्ति थे,  इस मुल्क के अनियोजित विकास को ढ़ोने में इनके हाथों पर चढ़ी हुई कालिख हमें बता रही थी कि कैसे नगरीय सभ्यता के संभ्रान्त लोगों की तमाम अयास्सियों का भार यह अन्न-दाता ढ़ो रहा है।  लोगों के धूप व मौसम की तल्खियों से बुझे हुए चेहरे और थका हुआ शरीर जिसकी सख्त व काली हो चुकी खाल को फ़ौरी तौर पर देखकर कोई डाक्टर ये नही बता सकता था कि ये भयानक रक्त अल्पता की बीमारी से ग्रसित है, हाँ हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर रहने वाली औरतों की त्वचा स्पष्ट जाहिर कर रही थी कि ये मात्र सूखे मांस और हड्डियों का कंकाल हैं और इस विद्रूप व रूग्ण शरीर की इज्जत इनकी पीली त्वचा जरूर ढ़क रही है।  कुछ-कुछ परदा कहानी के फ़टे हुए परदे की तरह ………………।

तकरीबन ९० फ़ीसदी परिवारों की यही दशा थी जिनमें स्त्री-पुरूषों की दोनों हाथों की सभी उंगलियों के सारे प्रयास निरर्थक हो जा रहे थे। किन्तु स्कैनर एक भी निशान नही खोज पा रहा था। आखिरकार  उनके बच्चों के निशानों को स्कैन कर दिया जाता, जिनके हाथ अभी इस तरूणायी में सुरक्षित थे और शायद तैयारी भी कर रहे थे, अपनी लकीरों के अस्तित्व को खोने के लिए भविष्य में, मानों यही नियति हो इन हाथों की। यदि  नियमों का पालन होता और परिवार के मुखिया के ही निशान स्कैन करने की कवायद की जाती तो शायद दो-चार कार्डों के सिवा ( जुगाड़ द्वारा बनवायें गये अमीरों द्वारा बीपीएल कार्ड धारकों ) सभी को खाली हाथ वापस जाना पड़ता। और उन्हे ये भी दुख होता कि दिन भर की मशक्क्त में दिहाड़ी भी गयी और कार्ड भी नही मिला।  लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि ये कार्ड तो निरर्थक है क्योंकि परिवार के मुखिया के बजाय छोटे बच्चों की उंगलियों के निशान मौजूद है इन कार्डों में? तस्वीर किसी और की और उंगलियों के निशान किसी और के!  और कम्पनी द्वारा तैनात किए गये दैनिक वेतन-भोगियों को भी तो प्रति कार्ड पैसा मिलना था। जितने कार्ड उतना कमीशन। पर क्या कोई विकल्प था, जब गांव के सभी गरीबों के हाथों में तकदीर की रेखायें ही नदारद है। यही स्थित पूरे के पूरे जनपद में। कैसा विकास है यह! इससे बेहतर तो सूदखोरों का दौर था जब इन गरीबों की जमीनों को गिरवी रखते वक्त वह इनके अगूंठे का निशान तो पा जाते थे। यहां एक और स्थिति बनी जो मुझे शर्मसार करती थी बार-बार…..जब भी किसी की उंगलियों का निशान न मिले तो तकनीके खोजी जाय की सिर में अंगूठे को रगड़ों तो यह साफ़ भी हो जायेगा और बालों में लगे तेल से साफ़ व मुलायम भी, पर यहां किसी के सिर में चिकनाई की एक बूंद भी नही थी आखिर में कम्प्यूटर वाला लड़का अपने सिर से उस व्यक्ति का अंगूठा रगड़ता, यदि फ़िर भी काम नही चलता तो हार कर वह अपना अंगूठा रख देता स्कैनर पर, व्यक्ति और अंगूठा किसी और का,… पर  तो कभी कभी यह रगड़ने वाली युक्ति काम आ जाती, पर ज्यों ही मुझे उस व्यक्ति के अंगूठे के निशान को वेरीफ़ाई करने के लिए अपना अंगूठा स्कैनर पर रखता तो झट से कम्प्यूटर  वह निशान ले लेता और अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे  लोगों में एक खुशी की लहर दौड़ जाती कि अरे साहब का की उंगलियों के निशान कितने सुन्दर आ रहे है, झट से…….ले ले रहा है। और यही वह मौका होता जब मेरी गर्दन शर्म से झुक जाती, मुझे सिर्फ़ यही एहसास होता कि ये हमारे लोग है और मैं इन्ही का एक हिस्सा हूं, बिना रेखाओं वाली हथेलियों के मध्य  मेरी हथेली की भाग्य रेखायें मुझ पर मुस्करा रही थी……एक व्यंगात्मक हंसी!

मैं आमंत्रित करता हूं उन सभी भद्र जनों को जो ये हाल देखना चाहते अपने सो-काल्ड विकास का वो उत्तर भारत के किसी गांव में आये और कोशिश कर ले, अंगूठों के निशान पाने की वहा एक काले ठप्पे के सिवा कुछ नही मिलेगा।  जिन्हे ये गरीब या गरीबी रेखा के नीचे, टाइप के वाक्यों से संबोधित करते है।

भयानक ठण्ड और सर्वहारा की उत्सुक भीड़, मुझे बार-बार उनके कुछ पा लेने की लालसा लिए चेहरों में झाकने को विवश करती और मैं उन्हे ठगा हुआ सा पाता। दिन में बमुश्किल तीस ही  रुपया कमाने वाला व्यक्ति जिस पर सारे परिवार की रोटी की जिम्मेदारी हो वह अपने दिन की पूरी कमाई लिए उत्सुक खड़ा था बीमा कार्ड बनवाने के लिए! यहां यह बता देना जरूरी है कि बीमित व्यक्ति की कम से कम दो उंगलियों के निशान और उसके परिवार के किसी अन्य वयस्क सदस्य के निशान लेना जरूरी था। इसके बदले उस परिवार के मुखिया को एक प्लास्टिक कार्ड मिलना था जिसमें उसके अगूंठे और उंगलियों के निशान कैद थे, ताकि जब वह बीमार हो तो उस कम्पनी द्वारा निर्धारित सेन्टर पर जा कर उस कार्ड से अपनी पहचान करा सके कि असल व्यक्ति वही है। हाँ बीमा कम्पनी की शर्ते भी सुन लीजिये, यदि मरीज भर्ती होने की स्थित में नही है तो, नशा आदि के कारण बीमार हुआ है तो, महिला गर्भवती है तो,  इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नही है कि सर्प आदि ने काट लिया है तो, और प्राकृतिक आपदा हुई है तो वह बीमित राशि ३०,००० रुपये का लाभ नही पा सकता। हाँ बड़ी खामी यह कि यदि किसी परिवार के मुखिया न हो, यानी माँ-बाप की मृत्यु हो गयी हो तो अव्यस्क बच्चों के लिए यह बीमा नही हो सकता……..। जिस कुपोषण में महिलायें सिर्फ़ बीमार बच्चों को जन्म देती है वहां इस बीमा की शर्तों के अनुसार किसी जन्म-जात बीमारी का इलाज की सुविधा नही। फ़िर आप बतायें हमारे गांव के आदमी का कौन सा विमान क्रैश या कार दुर्घटनाओं से साबिका पड़ता है जो वह इस बीमित राशि का लाभ ले पायेगा?

गांवों में तो लोग अक्सर भांग-गांजा या बीड़ी आदि के कारण ही दमें आदि बीमारियों से ग्रसित होते है और प्राकृतिक आपदायें ही उनका सर्वस्व नष्ट कर देती है। और वैसे भी वह भर्ती होने वाली दशा तक अस्पताल नही पंहुच पाते है क्योंकि उनका प्राथमिक इलाज़ ही नही हो पाता जो वह भर्ती प्रक्रिया तक अपना दम साधे रहे।

हल्की बीमारी में यह कम्पनी बीमित राशि का लाभ नही देती। एक बात और ये लोग इतने भी सक्षम नही होते कि उन सेन्टरों तक पंहुच कर अपनी बात रख सके फ़िर आखिर ये तमाशा क्यों क्या उस कम्पनी और सरकारों को उनकी हाड़ तोड़ मेहनत के तीस रुपये भर लेने है। अरबो की आबादी वाले प्रदेश व देश के अरबों गरीब लोगों तीस-तीस रुपये का कर! जो खरबों की राशि में इकठ्ठा हो जायेगा। यह सवाल इस लिए और जरूरी हो जाता है कि सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर मौजूद मुफ़्त सेवायें ही इन्हे नसीब नही होती तो फ़िर ये कवायद क्यों!

अपने लोगों की बदहाली के सैकड़ों कारण तो मुझे याद आ रहे है किन्तु बिगड़े हुए इन भयानक हालातों में कौन सी जुगति इन्हे उबार लेगी ये बात अब मेरे मस्तिष्क से परे है……मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ।

यहां प्रश्न ये नही है बीमा कम्पनी से इन्हे लाभ मिलेगा या नही या यह योजना उचित या अनुचित है यहाँ एक भारी प्रश्न तो यह है, उन लोगो के लिए जो दम भरते है विकास है, ताकि वह देखे और सोचे कि हमारे देश का एक हिस्सा जो बद से बदतर हो रहा है, कही अतीत में उसे बेहतर कहा जा सकता है आज की इस विद्रूपता को देखकर।

तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नही होते। ये शेर कह कर मैं रूमानी नही होना चाहता और न ही अपने आप को और उनको झूठी तसल्ली।

क्या हमारा दरिद्र नारायण हमेशा ऐसी दुर्गति के साथ जीता रहेगा। एक भारत में इतनी असमानता क्या यही विविधिता है जिस पर बड़े बुद्धिजीवी गर्व करते है।

कृष्ण कुमार मिश्र

(वन्य-जीव विशेषज्ञ, स्वतन्त्र पत्रकारिता, फ़ोटोग्राफ़ी)

क्या अवधी को हिन्दी खा गयी!

अफ़सोस इस बात का है कि हिन्दी उत्तर भारत की तमाम बोलियों को खा तो गयी किन्तु हिन्दी हिन्दवी नही बन पायी। यह वाक्य शायद तमाम लोगों को अजीब लगे, पर यह मसला बहस का है। एक समय था जब ब्रज काव्य की भाषा के तौर पर भारत की तमाम भाषाओं की सिरमौर थी और अवधी का दर्जा यकीनन ब्रज के बाद दूसरा था।  पूरी दुनिया में बेहतरीन महाकाव्यों की रचना इन्ही भाषाओं में हुई और धरती पर इन भाषाओं को एक अनोखा रुतवा हासिल है कि कही न कही तुलसी की रामचरित मानस और सूर व मीरा के पदों का गायन न हो रहा, बिना रुके लगातार….. ब्रज-अवधी-बुन्देली सूफ़ियों के गायन से लेकर दिल्ली दरबारों की शोभा बढ़ाती थी। कही ठुमरी तो कही ईश बन्दना को जबान इन्ही भाषाओं ने दी।  जैसे eयहां मैं निश्चित तौर पर अपनी इन्ही भाषाओं (बोलियों) में रचे गये महाकाव्यों की बिनाह पर  ये कह सकता हूं कि काव्य के मसले में हम पूरी दुनियां से अव्वल है। यहां मैं इन भाषाओं को बोलियां नही कह रहा हूं, जैसा की हिन्दी वाले कहते आये है! क्यों कि उन्होंने हिन्दी के उत्थान के लिए इन्ही भाषाओं के खण्डहरों पर हिन्दी की इमारत खड़ी  करने की कोशिश की।

सूफ़ी शिविरों से लेकर दरबारों तक ब्रज में आमिर खुसरो के छाप तिलक सब छीनी गूँज रही तो…. पं० बंशीधर शुक्ल का अवधी गीत  उठ जाग मुसाफ़िर रैन कहां जो सोवत है बापू के साबरमती का भोर का प्रार्थना गीत बना।

इन सब मसायल पर बात कर रहा हूँ क्योंकि आज मैं रूबरू हुआ हिन्दी-अवधी के तमाम पुरोधाओं से, अवधी सम्राट के गाँव मन्योरा में।

पं० बशीधर शुक्ल और अवधी के इस प्रसंगवश जो विचार आये उसका ये अभिप्राय कतई नही है कि मैं किसी विशेष भाषा के उत्थान या अवसान की तरफ़दारी कर रहा हूं। यहां एक ही मलाल और मकसद है कि जिसे हम अपनी राष्ट्र भाषा कहते है उसके प्रति ईमानदार हो न कि सिर्फ़ आयोजन या घोषणाओं से हिन्दी जनों को संतुष्ट करते रहे।

हम स्थापित करने के बजाय प्रयोगों में विश्वास अधिक रखते है और यही कारण है कि हिन्दुस्तानी को हमने हिन्दी बनाया फ़िर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी बनाने के लिए कमर तोड़ दी, लेकिन हिन्दी हिन्दुस्तानी की तरह प्रचलित होती गयी, आज कामिर्शिलाइज्ड हिन्दी यानी हिंग्लिश के स्वरूप और उसका बढ़ता चलन हमें लुभा रहा है। लेकिन अफ़सोस हम इसे स्वरूप नही दे पाये, ये काल और परिस्थित की गुलाम होकर डगमगाती हुई आगे बढ़ रही है…..इसकी वजह है इन्तजामियां का विमुख होना अपनी भाषा से, और कथित बुद्धिजीवीयों का दुख दर्द और दहाड़ पूर्ण कविता व कहानियों में माथा-पच्ची करते रहना, एक होड़ सी मची है कि कौन लेखक महाशय अपनी कविता की करुण? क्रन्दना से या कहानी से पाठक को इतना रुला दे कि उसकी छाती बैठ जाय और रचना बेस्ट-सेलर हो जाय…..हिन्दी में दर्द, कथित प्रेम और समाज़ कि कुरूपता बेचने की कवायद! यदि हम रामधारी सिंह दिनकर की संस्कृति के चार अध्याय, अमृत लाल नागर की गदर के फ़ूल, राहुल सांकृतायन की वोल्गा से गंगा………….आदि-आदि पुस्तको को छोड़ दे, तो इतिहास में जो भी हिन्दी भाषा के शोध है वे या तो नकल है अंग्रेजी पुस्तकों के या सिर्फ़ किस्सागोई। हम सिर्फ़ अपनी भाषा में सौन्दर्य ही लिखते रहे भूगोल, इतिहास, विज्ञान जैसे विषयों भूल ही गये जिसे पढ़ कर हमारी नई पीढ़ियां दुनिया को जान सके और देश व समाज़ के लिए कुछ करने लायक बन सके,……किन्तु कदाचित ऐसा नही है। इन्होने तो बिल्कुल ऐसा माहौल बना दिया है जिसे श्रीलाल शुक्ल ने कुछ यूं कहां, कि भागला नागर बाँध को देखकर अनायास ये लोग इसे ईश्वर की अदभुत रचना मान ले या स्ट्रेचर पर पड़ी बीमार युवती में भी इन्हे सौन्दर्य बोध हो और ये कवितायें करने लगे।

भाषा की समृद्धता इस बात पर निर्भर करती है कि उस भाषा में विश्व का कितना ज्ञान उपलब्ध है। और इस मामले में हम सबसे फ़िसड्डी है। सोवियत युनियन के दिनों में मास्को हिन्दी प्रकाशन ने रूस के बेहतरीन साहित्य का परिचय हमें कराया, उससे अब हमारी नयी हिन्दी भाषी पीढ़िया अनिभिज्ञ ही रहेगी, क्यों कि अब यह प्रकाशन बन्द हो चुका है।

जब सारी दुनियाबी बातें हमारी भाषा को अलंकृत करेगी तो हमारी भाषा से प्रत्येक जिज्ञासु अलंकृत होना चाहेगा बजाय इसके की वह उस इल्म को ढ़ूड़ने के लिए किसी और भाषा के दरवाजे पर दस्तक दे।

मध्य कालीन गुलामी ने प्राकृत के सभी प्रकारों को लगभग विलुप्त कर दिया, फ़ारसी ने राज-दरबारों की शोभा बढ़ाई और रियासतों के काम वहां की स्थानीय भाषा में शुरू हुए, जिसे हम हिन्दुस्तान कहते है उसमे उर्दू प्रमुख भाषा थी राज-काज की। इन्तजामियां बदली तो फ़ारसी की जगह अंग्रेजी ने ले ली और रियासती काम उर्दू में ही जारी रहे। भारत आजाद हुआ तो हिन्दी को राज भाषा तो बना दिया गया किन्तु भाषा के प्रति जिम्मेदारी से अलाहिदा ही रही सरकारें! बुजर्वा वर्ग अंग्रेजी को अपनी भाषा बना चुका था सो आज भी जारी है और वह अंग्रेजी भाषा के महा-भंडार से ज्ञान की चुस्कियां लेलेकर सर्वहारा पर अपनी लम्बरदारी जाहिर कर रहे है। और कविता कहानी पढ़ पढ़ कर हमारे लोगों का सौन्दर्य बोध, करुणा, उत्साह आदि तत्वों का मात्रात्मक स्वरूप तो बढ़ता गया किन्तु दुनियाबी मामलो से हम दूर होते गये और इसी के साथ साथ हिन्दी भाषी और हिन्दी लेखक हीन होता गया।

एक जिक्र जरूरी है,  शासन-सत्ता की जबानों ने हमेशा प्रगति की, फ़िर चाहे वह महाभारत काल हो, मोर्य काल हो या कनिष्क का शासन हो राजा के पश्रय में संस्कृत और पाली में आयुर्विज्ञान से लेकर खगोल शास्त्र तक लिखे गये, यदि इसी तरह अवधी और ब्रज आदि भाषाओं को भी राज प्रश्रय मिलता तो काव्य के अतिरिक्त भी तमाम इल्म का समावेश इनमें हो जाता है। क्योंकि इल्म पर परोक्ष अपरोक्ष नियन्त्रण सरकारों का ही रहता है, इनकी अनुमति के बिना कोई अप्लीकेशन संभव नही है। गुलामी के दिनों में यह द्वितीयक नागिरिको वाली बोलियों के तौर पर देखी जाती थी और आज आजादी के बाद भी वही व्यवहार जारी है। ब्रज़ की आवै-जावै, अवधी की आइब-जाइब को हिन्दी में आये-जाये बना देने से कुछ नही होता है।

भाषा विकास में अब अहम जरूरत है, कि हिन्दी में अनुवाद को प्राथमिकता दी जाय और हम अपनी भाषा में प्रत्येक उस विधा को शामिल कर ले, जो दुनिया की तमाम भाषाओं में है। सरकारों को बेहतर व सस्ते प्रकाशन मुहैया कराने चाहिए। और अच्छी पुस्तकों के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी भी, ताकि बड़े व्यापारिक घरानों द्वारा परोसी जा रही मनमानी चीज़ों के आगे हमारे बेहतर लेखन को भी जगह मिल सके। और जब ये ज्ञान हमारे अपने लोगों के बीच उन्ही की अपनी भाषा में पहुंचेगा तो यकीन मानियें ये लोग भांगला नागर बांध को देखकर ईश्वर की अदभुत रचना नही कहेगे बल्कि इसकी इन्जीनियरिंग की तारीफ़ करेगे और बीमार युवती को देखकर सौन्दर्य बोध के या करुणा( प्रेम की जड़) के बजाय उसकी बीमारी का कारण व इलाज़ बता देंगें।

आज भाषा, नदियां, तालाब, संस्कृतियां, और प्रजातियां सभी कुछ तो विलुप्त हो रहा है, इस हिन्दी को हम कब तक बचा पायेंगे, हिंग्लिश तो बना ही चुके है कल किसी नयी बयार में हिन्दी की जगह कुछ और बन जायेगा और हम नाव खेते रहेंगे बिना पतवार..बढ़ते रहेंगे..दिशाहीन और अनिश्चित मंजिल की ओर। क्या यही विकास है!

मेरा निशाना फ़िर वही लम्बरदार है जो बड़े औहदों पर बैठे मसलों को सिर्फ़ खाना-पूर्ति की नज़र से देखते है। और हम फ़िसड्डी होते जा रहे है अपने अतीत और अपनी चीज़ों के संरक्षण में, जो  वर्तमान और भविष्य में हमें मज़बूती दे सकती है।

(यह लेख २३ जनवरी सन २०१० को अमृत वर्षा के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है)

कृष्ण कुमार मिश्र

77-कैनाल रोड शिवकालोनी

लखीमपुर खीरी-262701

भारत

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अवधी सम्राट पं० बंशीधर शुक्ल

क्यों न हम पं० बंशीधर शुक्ल जी के जन्म-दिवस को विश्व अवधी दिवस के रूप में मनायें।

वो विधायक थे, स्वंतत्रा संग्राम सेनानी थे और हिन्दी अवधी के मर्मग्य, लेकिन फ़िर भी वो जननायक नही थे और न ही नेता, असल में सच्चे हितैषी थे उन सभी प्रजातियों के जो इस धरती पर रहती है। ये सारी बाते उनकी रचनाओं मे परिलक्षित हो रही है, कभी “गरीब की होली”  में उन्होंने सर्वहारा की दारूण कथा का बयान किया  कि कैसे इन गरीबों के घर कुत्ते-बिल्लिया ही घुमड़-घुमड़ कर आते है, जबकि लोग इधर का रूख ही नही करते। तो दूसरी तरफ़ ” बछड़ा धन्य गाय के पूत” लिखकर इन्होंने पूरी मानव जाति को ये एहसास कराने की कोशिश कि कैसे मनुष्य जानवरों का शोषण करता है और बदले में उन्हे तमाम कष्ट और भूखा रखता है……..भयानक गुलामी…..!

इस महान शख्सियत की कुछ बाते ब्लाग पर उकेरने की एक कोशिश!

बसन्तोत्सव के अवसर पर, मैं रूबरू हुआ हिन्दी-अवधी के तमाम पुरोधाओं से, जो संघर्षरत है अपने सीमित संसाधनों के बल पर अपनी भाषा की सेवा के लिए! बसन्त पंचमी के इस अवसर पर मेरा जाना हुआ उस धरती पर जहां सर्वहारा के लिए संघर्ष करने वाले इस नायक का जन्म हुआ। यहां हर वर्ष ये आयोजन होता है जो उनके परिजनों द्वारा संचालित होता है। गांव मे मैं रास्ता पूंछने लगा कुछ बच्चों से कि भैया “कवि वाला कार्यक्रम” कहां हो रहा है तो बच्चे ने इशारे से बताया किन्तु उत्सुकतावश ये पूछने पर कि ये कौन थे……..तो बालक निरुत्तर थे! खैर शुक्ल जी की स्मृति में बनी लाइब्रेरी जिसकी शक्ल गांव की प्राथमिक पाठशालाओं सी थी, में इधर-उधर कुछ कुर्सियों पर लोग छितरे हुए थे मध्य में जमीन पर दरे बिछाये गये थे, शायद ये जहमत बच्चों के बैठने के लिए की गयी थी। किन्तु भारत के भविष्य का एक भी कर्णधार मुझे वहां नही दिखा! न तो ग्रामीणों की सहभागिता थी और न ही जनपद वासियों की, प्रशासन का भी कोई कारिन्दा मौजूद नही था। मंचासीन कवियों व गणमान्य व्यक्तियों की तादाद अधिक थी और स्रोताओं की कम! और उनकी वेशभूषा और शरीर की दशा-व्यथा उनकी भाषा की दशा-व्यथा से पूरी तरह मेल खाती थी। सस्ते व वैवाहिक कार्ड छापने वाले प्रकाशनों से मूल्य आदि चुका कर प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन और उनका मान बढ़ाने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों का सहारा कुछ यूं लग रहा था जैसे हमारे लोग किसी अंग्रेजी पुस्तक के पांच-सितारा होटल में हो रहे एडवरटीजमेन्ट की नकल कर अपनी खीज निकालने की कोशिश कर रहे हो।……..झोलों से निकाल-निकाल कर पुरस्कार वितरण, और कांपते हुए हिन्दी-शरीरों पर शाल डालने की कवायदें।    ……बिडंबना के अतिरिक्त कोई माकूल शब्द नही है मेरे पास।  हाँ कुछ पत्रकार, अवधी प्रेमी और कुछ समय के लिए खीरी के मौजूदा सांसद अवश्य मौजूद थे। मैं यहां ये नही कहूंगा कि मूल्यों में गिरावट हुई है, हाँ मूल्य बदल जरूर रहे है। अगर कुछ नही बदला है तो अतीत की बेहतर चीजों का परंपरा के तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी जिन्दा रखने की हमारी नियति। और इसी नियति ने अवधी को भी जिन्दा रखा है हमारे घरों में……।

बसन्त पंचमी का दिन खीरी जनपद में खासा महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन अवधी सम्राट पं० बंशीधर शुक्ल का जन्म हुआ था। यें वही शख्स है जिनकी रचनाओं ने, सुभाष की आजाद हिन्द फ़ैज़ को लांग मार्च का गीत दिया और बापू के साबरमती आश्रम को भोर की प्रार्थना। सन १९०४ ईस्वी को पं० बंशीधर शुक्ल का जन्म खीरी जिले के मन्योरा ग्राम में हुआ। आप बापू के नमक आंदोलन से लेकर आजाद भारत में लगाई गयी इमेर्जेन्सी में भी जेल यात्रायें की। १९३८ में आप ने लखनऊ में रेडियों में नौकरी भी की, स्वन्त्रता आंन्दोलन के इस सिपाही ने आजाद भारत की नेहरू सरकार की व्यव्स्था से भी विद्रोह किया और कांग्रेस छोड़कर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में चले गये। इसी वक्त उन्होंने लिखा था “ देश का को है जिम्मेदार, चौराहे पर ठाड़ किसनऊ ताकय चरिव वार”। सन १९५७ के उत्तर प्रदेश असेम्बली चुनाव में बंशीधर शुक्ल लखीमपुर से एम०एल०ए० चुने गये। सन १९७८ ईस्वी में शुक्ल जी को उत्तर प्रदेश सरकार के हिन्दी संस्थान ने मलिक मोहम्मद जायसी पुरस्कार से सम्मानित किया। किन्तु शुक्ल जी का सच्चा सम्मान तो जन जन में व्याप्त था उनकी रचनाओं के द्वारा, “कदम-कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा…..”  प्रत्येक सुबह रेडियों पर उन्ही का गीत गूंजता “उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है” जिसे मैने भी अपने बचपन में सुना है। सन १९८० में सच्चे समाजवादी की भूमिका निभाते हुए ७६ वर्ष की आयु में आप का निधन हो गया।

खूनी परचा, राम मड़ैया, किसान की अर्ज़ी, लीडराबाद, राजा की कोठी, बेदखली, सूखा आदि रचनाये उस दौर में जनमानस में खूब प्रचलित रही। पं० बंशीधर शुक्ल के ४८ वें जन्म-दिवस पर उनके गांव मन्योरा में एक अभिनन्दन समारोह हुआ। इसके पश्चात बसन्त पंचमी १ फ़रवरी सन १९७९ में कथा सम्राट अमृत लाल नागर व तत्कालीन उप-मुख्यमन्त्री भगवती सिंह की मौजूदगी में शुक्ल जी का अभिनन्दन उनके गाँव में किया गया। शुक्ल जी के बाद भी तब से आज तक यह सिलसिला जारी है, मन्योरा और जिला खीरी के लोगों द्वारा। शुक्ल जी के नाम पर उनके गांव मन्योरा में एक पुस्तकालय और लखीमपुर रेलवे स्टेशन में एक पुस्तकालय जो हमेशा बन्द रहता है। उस स्वतन्त्रता सेनानी और अवधी के मर्मग्य की बस यही स्मृति शेष है।

अन्तता: यही कहा जा सकता है सरकारों को इस देश की माटी के सपूतों के महान प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिए, नही तो तमाम बेहतर व जरूरी चीज़े नष्ट हो जायेगी।

कृष्ण कुमार मिश्र

Helios from the Temple of Athena at Troy( 300 BCE) that located on Pergamum Museum. courtsy: History of Mecedonia. साभार हिस्ट्री आफ़ मेसीडोनिया

……..मकर संक्रान्ति पर आप सभी को शुभकामनायें, आखिर सूरज तमाम झंझावातों के बावजूद अपनी मंजिल तक पहुंच गया, यानी मकर राशि के स्टेशन पर, ..वैसे उसने बड़ी तकलीफ़े झेली, खराब मौसम, नो विजिबिलिटी, पतवार खो गयी थी, नाव डगमगाई थी, पटरी से गाड़ी भी एक बार उतर गयी थी किन्तु उस साहसी ने सफ़र पूरा कर लिया और आ पहुंचा मकर नगर के राशि हवाई अड्डे पर!…..मैनहन टुडे!

आओं हम सब हमारे ब्रह्माण्ड के मुख्य ऊर्जा स्रोत को स्वागत करे, नमन करे!

सूर्य आज यानी १४ जनवरी को धनु राशि से पलायन कर मकर राशि पर पहुंचता है, आज के ही बाद से दिनों में बढ़ोत्तरी शुरू-ए होती है।

हमारे यहां मकर संक्रान्ति को खिचड़ी कह कर संबोधित किया जाता है। इसे पंतगों का त्योहार बनाया, मुगलों और नवाबों ने, अवध की पतंगबाजी बे-मिसाल है पूरे भारत में!  वैसे इस खगोलीय घटना के विविध रूप हैं हमारे भारत में, कहीं पोंगल तो कही लोहड़ी……..किन्तु अभिप्राय एक है…सूरज का मकर राशि में स्वागत करना। एक बात और १२ राशियां बारह संक्रान्ति, पर मकर संक्रान्ति अपना धार्मिक महत्व है। तमाम कथायें भी प्रचलित है इस घतना के सन्दर्भ में।

माघे मासि महादेव यो दाद घृतकंबलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अंते मोक्षं च विंदति॥


आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व मकर सन्क्रान्ति ३१  दिसम्बर को पड़ती थी और आज से ९००० वर्ष बाद ये घटना जू न में घटित होगी। वैसे ये ग्रहों का खेल है। जिसे विज्ञान अपने ढ़ग से समझाती है। पर मैं आप को लिए चलता हूं, मैनहन गांव में जहां ये त्योहार पांरपरिक ढ़ग से मनाया जाता है।

प्रात: ब्रह्म-मुहूर्त में तालाब, नदी या कुएं में स्नान करना शुभ माना जाता है। यहां के तमाम धार्मिक लोग इस रोज नैमिषारण्य के चक्र तीर्थ में स्नान करने जाते है। कुछ गंगा या गोमती में ।

सुबह की स्नान पूजन के बाद तोरई (कुकरबिटेसी) की सूखी लताओं से आग प्रज्वलित की जाती है ताकि सर्द मौसम से बचा जा सके। तोरई की लता को जलाना शुभ माना जाता है।

बच्चों को हमेशा यह कह कर प्रात: स्नान के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि जो सबसे पहले उठ कर तालाब के ठण्डे पानी में नहायेंगा उसे उतनी सुन्दर पत्नी व पति मिलेगा।

इस दिन शिव पूजा का विधान है और लोग स्नान आदि करने के बाद शिव की उपासना करते है उसके उपरान्त सन्तों और भिखारियों को खिचड़ी दान का कार्यक्रम।

इस तरह मनाते है मकर संक्रान्ति हमारे गाव में, हां एक बात तो भूल ही गया, यहां मेरे गाँव के लोग और खास-तौर से मेरी माँ की नज़र में कोई पशु-पक्षी नही छूटता जिसे खिचड़ी का भोग न लगाया जाय।

मकर संक्रान्ति का धार्मिक महत्व

किवदंतियां है कि इस दिन भगवान सूर्य (भास्कर)  अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन को ही चुना था। और इसी दिन को ही गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

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