हिन्दी


प्रेम (मन) की कैसी यह विडम्बना….
खीरी जनपद की निघासन तहसील के शंकरपुर गाँव का एक दीवाना जिसने बेसिक शिक्षा स्कूल में तैनात नवीन शहरी शिक्षिका के प्यार में अपने सीने पर बाँके से आठ वार किए, और बोला अगर आप ने मेरे प्रेम को स्वीकार नही किया तो अगली बार अपना सिर काट कर आप के चरणों में रख दूंगा..वाह री दीवानगी..एकतरफ़ा प्रेम का यह वीभत्स रूप..इसका कारण क्या शहरों से आई वे फ़ैशन परस्त युवतियां है,  जिनके अक्स में ये गांव के युवक करीना कपूर या बिपासा कों झांकने की कोशिश करते है।

फ़िलहाल युवक अस्पताल में है, और डी०एम०, एस०पी० को खत लिख चुका है कि यदि उन्होंने उसका प्यार उसे नही दिलाया तो वह अपना सिर काट लेगा…अफ़सरान परेशान है, फ़िलहाल शिक्षिका का अन्यन्त्र तबादला कर दिया गया है…

सुना है कि वह मुस्काराती है और अपने हुस्न के गरूर में गाफ़िल है..बेचारा वह युवक…अभी आला अफ़सरान उस युवक के पत्रों को मार्क कर छोटे अधिकारियों को भेज रहे है, अब वे क्या करें इस भयानक प्रेम की त्रासदी से कैसे निपटे..क्या अफ़सरों का दिलों पर अख्तियार है ?

….खैर एक शिक्षिका शिक्षिका के लिबास में दिखे और आचरण में भी बजाए इसके कि वह किसी फ़िल्मी नायिका का अक्स लिए इन बंजर जमीनों में खेत-खलिहानों में घूमें स्कूटी पर मुंह में दुपट्टा लपेटे किसी डाकू-हसीना की तरह..ऐसे में यदि हमारे गांव का कोई गबरू जवान इस कदर दीवाना बन बैठे तो उसमें उसकी क्या खता…!!.

..सुन्दर महिलाओं से क्षमा प्रार्थना के साथ आपका कृष्ण

कृष्ण कुमार मिश्र

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क्या अवधी को हिन्दी खा गयी!

अफ़सोस इस बात का है कि हिन्दी उत्तर भारत की तमाम बोलियों को खा तो गयी किन्तु हिन्दी हिन्दवी नही बन पायी। यह वाक्य शायद तमाम लोगों को अजीब लगे, पर यह मसला बहस का है। एक समय था जब ब्रज काव्य की भाषा के तौर पर भारत की तमाम भाषाओं की सिरमौर थी और अवधी का दर्जा यकीनन ब्रज के बाद दूसरा था।  पूरी दुनिया में बेहतरीन महाकाव्यों की रचना इन्ही भाषाओं में हुई और धरती पर इन भाषाओं को एक अनोखा रुतवा हासिल है कि कही न कही तुलसी की रामचरित मानस और सूर व मीरा के पदों का गायन न हो रहा, बिना रुके लगातार….. ब्रज-अवधी-बुन्देली सूफ़ियों के गायन से लेकर दिल्ली दरबारों की शोभा बढ़ाती थी। कही ठुमरी तो कही ईश बन्दना को जबान इन्ही भाषाओं ने दी।  जैसे eयहां मैं निश्चित तौर पर अपनी इन्ही भाषाओं (बोलियों) में रचे गये महाकाव्यों की बिनाह पर  ये कह सकता हूं कि काव्य के मसले में हम पूरी दुनियां से अव्वल है। यहां मैं इन भाषाओं को बोलियां नही कह रहा हूं, जैसा की हिन्दी वाले कहते आये है! क्यों कि उन्होंने हिन्दी के उत्थान के लिए इन्ही भाषाओं के खण्डहरों पर हिन्दी की इमारत खड़ी  करने की कोशिश की।

सूफ़ी शिविरों से लेकर दरबारों तक ब्रज में आमिर खुसरो के छाप तिलक सब छीनी गूँज रही तो…. पं० बंशीधर शुक्ल का अवधी गीत  उठ जाग मुसाफ़िर रैन कहां जो सोवत है बापू के साबरमती का भोर का प्रार्थना गीत बना।

इन सब मसायल पर बात कर रहा हूँ क्योंकि आज मैं रूबरू हुआ हिन्दी-अवधी के तमाम पुरोधाओं से, अवधी सम्राट के गाँव मन्योरा में।

पं० बशीधर शुक्ल और अवधी के इस प्रसंगवश जो विचार आये उसका ये अभिप्राय कतई नही है कि मैं किसी विशेष भाषा के उत्थान या अवसान की तरफ़दारी कर रहा हूं। यहां एक ही मलाल और मकसद है कि जिसे हम अपनी राष्ट्र भाषा कहते है उसके प्रति ईमानदार हो न कि सिर्फ़ आयोजन या घोषणाओं से हिन्दी जनों को संतुष्ट करते रहे।

हम स्थापित करने के बजाय प्रयोगों में विश्वास अधिक रखते है और यही कारण है कि हिन्दुस्तानी को हमने हिन्दी बनाया फ़िर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी बनाने के लिए कमर तोड़ दी, लेकिन हिन्दी हिन्दुस्तानी की तरह प्रचलित होती गयी, आज कामिर्शिलाइज्ड हिन्दी यानी हिंग्लिश के स्वरूप और उसका बढ़ता चलन हमें लुभा रहा है। लेकिन अफ़सोस हम इसे स्वरूप नही दे पाये, ये काल और परिस्थित की गुलाम होकर डगमगाती हुई आगे बढ़ रही है…..इसकी वजह है इन्तजामियां का विमुख होना अपनी भाषा से, और कथित बुद्धिजीवीयों का दुख दर्द और दहाड़ पूर्ण कविता व कहानियों में माथा-पच्ची करते रहना, एक होड़ सी मची है कि कौन लेखक महाशय अपनी कविता की करुण? क्रन्दना से या कहानी से पाठक को इतना रुला दे कि उसकी छाती बैठ जाय और रचना बेस्ट-सेलर हो जाय…..हिन्दी में दर्द, कथित प्रेम और समाज़ कि कुरूपता बेचने की कवायद! यदि हम रामधारी सिंह दिनकर की संस्कृति के चार अध्याय, अमृत लाल नागर की गदर के फ़ूल, राहुल सांकृतायन की वोल्गा से गंगा………….आदि-आदि पुस्तको को छोड़ दे, तो इतिहास में जो भी हिन्दी भाषा के शोध है वे या तो नकल है अंग्रेजी पुस्तकों के या सिर्फ़ किस्सागोई। हम सिर्फ़ अपनी भाषा में सौन्दर्य ही लिखते रहे भूगोल, इतिहास, विज्ञान जैसे विषयों भूल ही गये जिसे पढ़ कर हमारी नई पीढ़ियां दुनिया को जान सके और देश व समाज़ के लिए कुछ करने लायक बन सके,……किन्तु कदाचित ऐसा नही है। इन्होने तो बिल्कुल ऐसा माहौल बना दिया है जिसे श्रीलाल शुक्ल ने कुछ यूं कहां, कि भागला नागर बाँध को देखकर अनायास ये लोग इसे ईश्वर की अदभुत रचना मान ले या स्ट्रेचर पर पड़ी बीमार युवती में भी इन्हे सौन्दर्य बोध हो और ये कवितायें करने लगे।

भाषा की समृद्धता इस बात पर निर्भर करती है कि उस भाषा में विश्व का कितना ज्ञान उपलब्ध है। और इस मामले में हम सबसे फ़िसड्डी है। सोवियत युनियन के दिनों में मास्को हिन्दी प्रकाशन ने रूस के बेहतरीन साहित्य का परिचय हमें कराया, उससे अब हमारी नयी हिन्दी भाषी पीढ़िया अनिभिज्ञ ही रहेगी, क्यों कि अब यह प्रकाशन बन्द हो चुका है।

जब सारी दुनियाबी बातें हमारी भाषा को अलंकृत करेगी तो हमारी भाषा से प्रत्येक जिज्ञासु अलंकृत होना चाहेगा बजाय इसके की वह उस इल्म को ढ़ूड़ने के लिए किसी और भाषा के दरवाजे पर दस्तक दे।

मध्य कालीन गुलामी ने प्राकृत के सभी प्रकारों को लगभग विलुप्त कर दिया, फ़ारसी ने राज-दरबारों की शोभा बढ़ाई और रियासतों के काम वहां की स्थानीय भाषा में शुरू हुए, जिसे हम हिन्दुस्तान कहते है उसमे उर्दू प्रमुख भाषा थी राज-काज की। इन्तजामियां बदली तो फ़ारसी की जगह अंग्रेजी ने ले ली और रियासती काम उर्दू में ही जारी रहे। भारत आजाद हुआ तो हिन्दी को राज भाषा तो बना दिया गया किन्तु भाषा के प्रति जिम्मेदारी से अलाहिदा ही रही सरकारें! बुजर्वा वर्ग अंग्रेजी को अपनी भाषा बना चुका था सो आज भी जारी है और वह अंग्रेजी भाषा के महा-भंडार से ज्ञान की चुस्कियां लेलेकर सर्वहारा पर अपनी लम्बरदारी जाहिर कर रहे है। और कविता कहानी पढ़ पढ़ कर हमारे लोगों का सौन्दर्य बोध, करुणा, उत्साह आदि तत्वों का मात्रात्मक स्वरूप तो बढ़ता गया किन्तु दुनियाबी मामलो से हम दूर होते गये और इसी के साथ साथ हिन्दी भाषी और हिन्दी लेखक हीन होता गया।

एक जिक्र जरूरी है,  शासन-सत्ता की जबानों ने हमेशा प्रगति की, फ़िर चाहे वह महाभारत काल हो, मोर्य काल हो या कनिष्क का शासन हो राजा के पश्रय में संस्कृत और पाली में आयुर्विज्ञान से लेकर खगोल शास्त्र तक लिखे गये, यदि इसी तरह अवधी और ब्रज आदि भाषाओं को भी राज प्रश्रय मिलता तो काव्य के अतिरिक्त भी तमाम इल्म का समावेश इनमें हो जाता है। क्योंकि इल्म पर परोक्ष अपरोक्ष नियन्त्रण सरकारों का ही रहता है, इनकी अनुमति के बिना कोई अप्लीकेशन संभव नही है। गुलामी के दिनों में यह द्वितीयक नागिरिको वाली बोलियों के तौर पर देखी जाती थी और आज आजादी के बाद भी वही व्यवहार जारी है। ब्रज़ की आवै-जावै, अवधी की आइब-जाइब को हिन्दी में आये-जाये बना देने से कुछ नही होता है।

भाषा विकास में अब अहम जरूरत है, कि हिन्दी में अनुवाद को प्राथमिकता दी जाय और हम अपनी भाषा में प्रत्येक उस विधा को शामिल कर ले, जो दुनिया की तमाम भाषाओं में है। सरकारों को बेहतर व सस्ते प्रकाशन मुहैया कराने चाहिए। और अच्छी पुस्तकों के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी भी, ताकि बड़े व्यापारिक घरानों द्वारा परोसी जा रही मनमानी चीज़ों के आगे हमारे बेहतर लेखन को भी जगह मिल सके। और जब ये ज्ञान हमारे अपने लोगों के बीच उन्ही की अपनी भाषा में पहुंचेगा तो यकीन मानियें ये लोग भांगला नागर बांध को देखकर ईश्वर की अदभुत रचना नही कहेगे बल्कि इसकी इन्जीनियरिंग की तारीफ़ करेगे और बीमार युवती को देखकर सौन्दर्य बोध के या करुणा( प्रेम की जड़) के बजाय उसकी बीमारी का कारण व इलाज़ बता देंगें।

आज भाषा, नदियां, तालाब, संस्कृतियां, और प्रजातियां सभी कुछ तो विलुप्त हो रहा है, इस हिन्दी को हम कब तक बचा पायेंगे, हिंग्लिश तो बना ही चुके है कल किसी नयी बयार में हिन्दी की जगह कुछ और बन जायेगा और हम नाव खेते रहेंगे बिना पतवार..बढ़ते रहेंगे..दिशाहीन और अनिश्चित मंजिल की ओर। क्या यही विकास है!

मेरा निशाना फ़िर वही लम्बरदार है जो बड़े औहदों पर बैठे मसलों को सिर्फ़ खाना-पूर्ति की नज़र से देखते है। और हम फ़िसड्डी होते जा रहे है अपने अतीत और अपनी चीज़ों के संरक्षण में, जो  वर्तमान और भविष्य में हमें मज़बूती दे सकती है।

(यह लेख २३ जनवरी सन २०१० को अमृत वर्षा के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है)

कृष्ण कुमार मिश्र

77-कैनाल रोड शिवकालोनी

लखीमपुर खीरी-262701

भारत

सेलुलर-+91-9451925997

अवधी सम्राट पं० बंशीधर शुक्ल

क्यों न हम पं० बंशीधर शुक्ल जी के जन्म-दिवस को विश्व अवधी दिवस के रूप में मनायें।

वो विधायक थे, स्वंतत्रा संग्राम सेनानी थे और हिन्दी अवधी के मर्मग्य, लेकिन फ़िर भी वो जननायक नही थे और न ही नेता, असल में सच्चे हितैषी थे उन सभी प्रजातियों के जो इस धरती पर रहती है। ये सारी बाते उनकी रचनाओं मे परिलक्षित हो रही है, कभी “गरीब की होली”  में उन्होंने सर्वहारा की दारूण कथा का बयान किया  कि कैसे इन गरीबों के घर कुत्ते-बिल्लिया ही घुमड़-घुमड़ कर आते है, जबकि लोग इधर का रूख ही नही करते। तो दूसरी तरफ़ ” बछड़ा धन्य गाय के पूत” लिखकर इन्होंने पूरी मानव जाति को ये एहसास कराने की कोशिश कि कैसे मनुष्य जानवरों का शोषण करता है और बदले में उन्हे तमाम कष्ट और भूखा रखता है……..भयानक गुलामी…..!

इस महान शख्सियत की कुछ बाते ब्लाग पर उकेरने की एक कोशिश!

बसन्तोत्सव के अवसर पर, मैं रूबरू हुआ हिन्दी-अवधी के तमाम पुरोधाओं से, जो संघर्षरत है अपने सीमित संसाधनों के बल पर अपनी भाषा की सेवा के लिए! बसन्त पंचमी के इस अवसर पर मेरा जाना हुआ उस धरती पर जहां सर्वहारा के लिए संघर्ष करने वाले इस नायक का जन्म हुआ। यहां हर वर्ष ये आयोजन होता है जो उनके परिजनों द्वारा संचालित होता है। गांव मे मैं रास्ता पूंछने लगा कुछ बच्चों से कि भैया “कवि वाला कार्यक्रम” कहां हो रहा है तो बच्चे ने इशारे से बताया किन्तु उत्सुकतावश ये पूछने पर कि ये कौन थे……..तो बालक निरुत्तर थे! खैर शुक्ल जी की स्मृति में बनी लाइब्रेरी जिसकी शक्ल गांव की प्राथमिक पाठशालाओं सी थी, में इधर-उधर कुछ कुर्सियों पर लोग छितरे हुए थे मध्य में जमीन पर दरे बिछाये गये थे, शायद ये जहमत बच्चों के बैठने के लिए की गयी थी। किन्तु भारत के भविष्य का एक भी कर्णधार मुझे वहां नही दिखा! न तो ग्रामीणों की सहभागिता थी और न ही जनपद वासियों की, प्रशासन का भी कोई कारिन्दा मौजूद नही था। मंचासीन कवियों व गणमान्य व्यक्तियों की तादाद अधिक थी और स्रोताओं की कम! और उनकी वेशभूषा और शरीर की दशा-व्यथा उनकी भाषा की दशा-व्यथा से पूरी तरह मेल खाती थी। सस्ते व वैवाहिक कार्ड छापने वाले प्रकाशनों से मूल्य आदि चुका कर प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन और उनका मान बढ़ाने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों का सहारा कुछ यूं लग रहा था जैसे हमारे लोग किसी अंग्रेजी पुस्तक के पांच-सितारा होटल में हो रहे एडवरटीजमेन्ट की नकल कर अपनी खीज निकालने की कोशिश कर रहे हो।……..झोलों से निकाल-निकाल कर पुरस्कार वितरण, और कांपते हुए हिन्दी-शरीरों पर शाल डालने की कवायदें।    ……बिडंबना के अतिरिक्त कोई माकूल शब्द नही है मेरे पास।  हाँ कुछ पत्रकार, अवधी प्रेमी और कुछ समय के लिए खीरी के मौजूदा सांसद अवश्य मौजूद थे। मैं यहां ये नही कहूंगा कि मूल्यों में गिरावट हुई है, हाँ मूल्य बदल जरूर रहे है। अगर कुछ नही बदला है तो अतीत की बेहतर चीजों का परंपरा के तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी जिन्दा रखने की हमारी नियति। और इसी नियति ने अवधी को भी जिन्दा रखा है हमारे घरों में……।

बसन्त पंचमी का दिन खीरी जनपद में खासा महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन अवधी सम्राट पं० बंशीधर शुक्ल का जन्म हुआ था। यें वही शख्स है जिनकी रचनाओं ने, सुभाष की आजाद हिन्द फ़ैज़ को लांग मार्च का गीत दिया और बापू के साबरमती आश्रम को भोर की प्रार्थना। सन १९०४ ईस्वी को पं० बंशीधर शुक्ल का जन्म खीरी जिले के मन्योरा ग्राम में हुआ। आप बापू के नमक आंदोलन से लेकर आजाद भारत में लगाई गयी इमेर्जेन्सी में भी जेल यात्रायें की। १९३८ में आप ने लखनऊ में रेडियों में नौकरी भी की, स्वन्त्रता आंन्दोलन के इस सिपाही ने आजाद भारत की नेहरू सरकार की व्यव्स्था से भी विद्रोह किया और कांग्रेस छोड़कर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में चले गये। इसी वक्त उन्होंने लिखा था “ देश का को है जिम्मेदार, चौराहे पर ठाड़ किसनऊ ताकय चरिव वार”। सन १९५७ के उत्तर प्रदेश असेम्बली चुनाव में बंशीधर शुक्ल लखीमपुर से एम०एल०ए० चुने गये। सन १९७८ ईस्वी में शुक्ल जी को उत्तर प्रदेश सरकार के हिन्दी संस्थान ने मलिक मोहम्मद जायसी पुरस्कार से सम्मानित किया। किन्तु शुक्ल जी का सच्चा सम्मान तो जन जन में व्याप्त था उनकी रचनाओं के द्वारा, “कदम-कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा…..”  प्रत्येक सुबह रेडियों पर उन्ही का गीत गूंजता “उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है” जिसे मैने भी अपने बचपन में सुना है। सन १९८० में सच्चे समाजवादी की भूमिका निभाते हुए ७६ वर्ष की आयु में आप का निधन हो गया।

खूनी परचा, राम मड़ैया, किसान की अर्ज़ी, लीडराबाद, राजा की कोठी, बेदखली, सूखा आदि रचनाये उस दौर में जनमानस में खूब प्रचलित रही। पं० बंशीधर शुक्ल के ४८ वें जन्म-दिवस पर उनके गांव मन्योरा में एक अभिनन्दन समारोह हुआ। इसके पश्चात बसन्त पंचमी १ फ़रवरी सन १९७९ में कथा सम्राट अमृत लाल नागर व तत्कालीन उप-मुख्यमन्त्री भगवती सिंह की मौजूदगी में शुक्ल जी का अभिनन्दन उनके गाँव में किया गया। शुक्ल जी के बाद भी तब से आज तक यह सिलसिला जारी है, मन्योरा और जिला खीरी के लोगों द्वारा। शुक्ल जी के नाम पर उनके गांव मन्योरा में एक पुस्तकालय और लखीमपुर रेलवे स्टेशन में एक पुस्तकालय जो हमेशा बन्द रहता है। उस स्वतन्त्रता सेनानी और अवधी के मर्मग्य की बस यही स्मृति शेष है।

अन्तता: यही कहा जा सकता है सरकारों को इस देश की माटी के सपूतों के महान प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिए, नही तो तमाम बेहतर व जरूरी चीज़े नष्ट हो जायेगी।

कृष्ण कुमार मिश्र

Helios from the Temple of Athena at Troy( 300 BCE) that located on Pergamum Museum. courtsy: History of Mecedonia. साभार हिस्ट्री आफ़ मेसीडोनिया

……..मकर संक्रान्ति पर आप सभी को शुभकामनायें, आखिर सूरज तमाम झंझावातों के बावजूद अपनी मंजिल तक पहुंच गया, यानी मकर राशि के स्टेशन पर, ..वैसे उसने बड़ी तकलीफ़े झेली, खराब मौसम, नो विजिबिलिटी, पतवार खो गयी थी, नाव डगमगाई थी, पटरी से गाड़ी भी एक बार उतर गयी थी किन्तु उस साहसी ने सफ़र पूरा कर लिया और आ पहुंचा मकर नगर के राशि हवाई अड्डे पर!…..मैनहन टुडे!

आओं हम सब हमारे ब्रह्माण्ड के मुख्य ऊर्जा स्रोत को स्वागत करे, नमन करे!

सूर्य आज यानी १४ जनवरी को धनु राशि से पलायन कर मकर राशि पर पहुंचता है, आज के ही बाद से दिनों में बढ़ोत्तरी शुरू-ए होती है।

हमारे यहां मकर संक्रान्ति को खिचड़ी कह कर संबोधित किया जाता है। इसे पंतगों का त्योहार बनाया, मुगलों और नवाबों ने, अवध की पतंगबाजी बे-मिसाल है पूरे भारत में!  वैसे इस खगोलीय घटना के विविध रूप हैं हमारे भारत में, कहीं पोंगल तो कही लोहड़ी……..किन्तु अभिप्राय एक है…सूरज का मकर राशि में स्वागत करना। एक बात और १२ राशियां बारह संक्रान्ति, पर मकर संक्रान्ति अपना धार्मिक महत्व है। तमाम कथायें भी प्रचलित है इस घतना के सन्दर्भ में।

माघे मासि महादेव यो दाद घृतकंबलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अंते मोक्षं च विंदति॥


आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व मकर सन्क्रान्ति ३१  दिसम्बर को पड़ती थी और आज से ९००० वर्ष बाद ये घटना जू न में घटित होगी। वैसे ये ग्रहों का खेल है। जिसे विज्ञान अपने ढ़ग से समझाती है। पर मैं आप को लिए चलता हूं, मैनहन गांव में जहां ये त्योहार पांरपरिक ढ़ग से मनाया जाता है।

प्रात: ब्रह्म-मुहूर्त में तालाब, नदी या कुएं में स्नान करना शुभ माना जाता है। यहां के तमाम धार्मिक लोग इस रोज नैमिषारण्य के चक्र तीर्थ में स्नान करने जाते है। कुछ गंगा या गोमती में ।

सुबह की स्नान पूजन के बाद तोरई (कुकरबिटेसी) की सूखी लताओं से आग प्रज्वलित की जाती है ताकि सर्द मौसम से बचा जा सके। तोरई की लता को जलाना शुभ माना जाता है।

बच्चों को हमेशा यह कह कर प्रात: स्नान के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि जो सबसे पहले उठ कर तालाब के ठण्डे पानी में नहायेंगा उसे उतनी सुन्दर पत्नी व पति मिलेगा।

इस दिन शिव पूजा का विधान है और लोग स्नान आदि करने के बाद शिव की उपासना करते है उसके उपरान्त सन्तों और भिखारियों को खिचड़ी दान का कार्यक्रम।

इस तरह मनाते है मकर संक्रान्ति हमारे गाव में, हां एक बात तो भूल ही गया, यहां मेरे गाँव के लोग और खास-तौर से मेरी माँ की नज़र में कोई पशु-पक्षी नही छूटता जिसे खिचड़ी का भोग न लगाया जाय।

मकर संक्रान्ति का धार्मिक महत्व

किवदंतियां है कि इस दिन भगवान सूर्य (भास्कर)  अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन को ही चुना था। और इसी दिन को ही गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारत

परिग्रही विचार-कही ये ककरहा  नाम के विशाल तालाबों की तलहटी जो पथरीली है यह  अंतरिक्ष के कंकड़( meteoroid) की वज़ह से तो नही, यह Terrestrial Impact Craters है क्या?

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बचपन में मेरा पंसंदीदा खेल था अपने गांव के ककरहा ताल में तैरना, यहां ये जिक्र करना जरूरी है कि “ककरहा” नाम के ताल आप को कई जगह मिल जायेंगे जिसमें मेरे गांव से १५० कि०मी० दूर स्थित दुधवा नेशनल पार्क जिसमें सोनारीपुर रेन्ज में है विश्व प्रसिद्ध “ककरहा” ताल संरक्षित क्षेत्र होने की वजह से जिसे आज भी यह सौभाग्य प्राप्त है कि इस ताल के जल से गैंडा, तेन्दुआ व बाघ अपनी प्यास बुझाते है।

इसके अलावा मैनहन गांव के पश्चिम में एक ककरहिया तलिया(छोटा ताल) भी है ककरहा का शाब्दिक अर्थ मैं ठीक से नही जान पाया सिवाय इसके कि कंकड़ वाली भूमि में जलाशय होने की वजह से इसे ककरहा कहते ? हों क्योंकि तलाब के तल में कंकड मौजूद है ।

यदि आप को पता चले तो जरूर बताइयेगा।

हां तो मै बात करना चाह रहा हूं ताल और इसकी जलीय वनस्पतियों की जिससे ग्रामीण जीवन पोषित रहा है, तालाब में पाये जाने वाला और पूरे ग्राम के लोगो का इन चीजों पर अधिकार रहता था किन्तु तालाब को भी खेती की तरह प्रयोग में लाने से अब ग्राम का जनमानस वंचित है, तलाब के सरकारी ठेके उठते है और पैसे वाला व्यक्ति जिसका इस गांव से दूर-दूर तलक कोई नाता नही है, तालाब पर अधिकार प्राप्त कर लेता है, और सिघाड़ा या मछली पालन द्वारा जो भी उत्पादन होता है उसे शहरों में अच्छे दामॊं पर बेच दिया जाता है और ह्रदयविदारक बात यह है कि हमारे गांवों का साधारण जन-मानस व्यक्ति सिर्फ़ मुहं ताकता रह जाता है उन व्यापारियों का! ग्राम पंचायत स्तर पर इन नियमों में सुधार जरूरी है और ग्राम की प्राकृतिक संपदा पर गांव के ही व्यक्ति का अधिकार सुनश्चित हो। मेरे बचपन में तालाब का यदि व्यवसायी करण होता था तो उसी व्यक्ति को वह व्यवसाय करने का अधिकार दिया जाता था जो इसके योग्य है और वह विषेश जाति के लोगों को जो सदियों से तालाब की संपदा से अपना भरन-पोषण करते आये है।

अब सवाल यह है कि इन तालाबों में उगने वाली जलीय प्रजातियों की, जो विलुप्त हो रही है एक प्रकार की व्यवसायिक खेती से जैसे सिघाड़ा, इसमे पूरे तालाब की वनस्पतियों का सफ़ाया कर उसमे सिघाड़ा उगाया जाता है और तमाम तरह के जहरीले रसायनों का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण अब इन तालाबों में न उन कीटों के साथ जो सिघाड़े को नुकसान पहुचाते है अन्य उपयोगी कीट, मछलियां व जलीय पौधे नष्ट हो जाते है यही हाल रहा तो हमारी जलीय वनस्पतियों की विविधिता खतरे में पड़ जायेगी। विदेशी मछलियों का भी अन्धाधुन्द उत्पादन हमारे तालाबों की स्थानीय प्रजाति के लिये खतरा है किन्तु न तो सरकार इस तरफ़ ध्यान दे रही है और न ही हम।

मुझे केवल ककरहा ताल या मैनहन की चिन्ता नही है यहां मै पूरे भारत के तालों और गावों का प्रतिनिधित्व करवा रहा मैनहन गांव और इस ककरहा ताल से क्योंकि हमारे देश में हर जगह यही कथा-व्यथा है जिसे मै सुनाना चहता हूं।

यहां मै जिक्र कर रहा हूं उन सभी जलीय, अर्ध-जलीय व नम-भूमि पर उगने वाली बन्स्पतियों का सो सदियों से हमारे लोगो, हमारे जानवरों का भरण पोषण में सहायक रही है मैने भारत सरकार और सलीम अली सेन्टर फ़ार ओर्निथोलोजी एन्ड नेचुरल हिस्ट्री के सहयोग से एक प्रोजेक्ट किया था जिसे “Inland Wetlands of India” के नाम से जाना गया था और इसमें तालाबों और उनकी जैव-संपदा का अध्ययन शामिल था, मैनें जो चार जनपदॊं, खीरी, सीतापुर, बहराइच, और हरदोई के तालाबों और उनकी जैव संपदा का अध्ययन किया वह यह साबित करता है कि आज भी तमाम आबादी भोजन के लिये इन्ही जलाशयों की जैव संपदा पर कही-न-कही आश्रित है और औषधि में भी इन वनस्पतियों का इस्तेमाल करती है, किन्तु अब उनसे ये अधिकार छिनते जा रहे है अब न वह मछली, केकड़ा आदि का प्रयोग कर सकते है और न ही वन्स्पतियों यानी कमल, गुजरी, नारी आदि का सब्जी में इस्तेमाल क्योंकि या तो तालाब पाट दिये गये या फ़िर उनका व्यवसाई करन हो चुका है। ये तो सर्वहारा की बात हुई साथ ही इन वनस्पतियों पर निर्भर रहने वाले जीव भी विलुप्त हो रहे है।

कुछ पौधॊं का जिक्र कर रहा हूं इनमें तमाम की हिन्दी मुझे नही मालूम इस लिए अग्रेजी में इनके नाम प्रस्तुत है जो कभी इन तालाबों में थे किन्तु अब नाम मात्र बचे है।

Aquatic Vegetation

Free Floating:

Wolffia, Lemna, Spirodela, Azolla, Eichhornia, Salvinia, pistia etc.

Rooted with floating Leaves: Trapa, Nelumbo, nymphaea, marsilea, Nymphoides, Ipomoea etc.

Submerged floating:

Ceratophyllum, Najas etc.

Rooted submerged:

Hydrilla, Potamogeton, Aponogeton, Isoetes, Vallisneria, Chara, etc.

Rooted emergent:

Oryza, Sagittaria, Phragmites, Ranunculus, Scirpus, Cyperus, Typha, Limnophila, Sachharum etc.

कमल, सुन्दर पुष्प औषधीय गुओं से युक्त व इसके प्राप्त कमल गट्टे का खाने में उपयोग, गुजरी, कमल की ही तरह प्रयुक्त होता है,  बेहया, इसका पुष्प सुन्दर व पत्तियां गठिया या चोट से आई सूजन में प्रयोग की जाती थी, नारी, इसे सब्जी के रूप में, कुम्भी, इसका कार्य जल की शुद्धता व जलीय जीवों व उनके नवजात बच्चों को सूरज की तेज धूप से बचाना, आदि जिनसे मैं बचपन में ही परिचित था अब समाप्ति की ओर है जिसमें कमल हमारा राष्ट्रीय पुष्प है।

Ceratophyllum जो पानी के भीतर लतिकाओं की तरह फ़ैलता था तैरते वक्त मेरे पैरो में फ़स जाया करता था

सवाल ये नही है कि जो वनस्पति उपयोगी हो उसी का सरक्षण हो सवाल ये है कि धरती पर बिना मतलब कुछ भी नही प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व है और वह एक श्रखंला की तरह है जिसमें से एक हम भी है यानी होमोसैपियन्स मानव जाति और यदि इस श्रखंला की कोई कड़ी टूटती है तो पूरी श्रखंला प्रभावित हुए बिना नही रह सकती।

यदि बरगद, पीपल के फ़लॊ को खाने वाली चिड़ियां न हो तो ये वृक्ष प्राकृतिक रूप से धरती पर नही उग सकते, कारन यह कि जब कोई चिड़िया इन फ़लों को खाती है तो उपापचय की क्रिया से गुजरने के बाद इनके मल के साथ निकलने वाले कोमल बीज जो मल के पोषक तत्वों के साथ होते है वही अंकुरित होते है अन्यथा नही !

हां एक बात और अब गांव का बच्चा  तैरने के अनुभव से वंछित है, क्योंकि स्वीमिंग पूल की व्यवस्था गांव में है नही और ये तालाब व्यवसायीकरण का शिकार हो चुके है। तैरने का सुखद खेल व बेहतरीन कसरत अब गांवों में गुजरे दिनों की बात हो चुकी है।

कृष्ण कुमार मिश्र

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भारतवर्ष

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“Earth provides enough to satisfy every man’s need, but not every man’s greed” —–Mahatma Gandhi

अधिकार

प्रकृति आप को इतना खुशी मन से देगी

मैं पेड़ों को काटने से नही रूकूंगा
भले ही उनमें जीवन हो।मैं पत्तियों को तोड़नेण से नही रूकूंगा
भले ही वे प्रकृति को सौंदर्य प्रदान करती हों।मैं टहनियों को तोड़ने से नही रूकूंगा
भले ही वे वृक्षों की बाजुंए हो।
क्योकि———–
मुझे झोपड़ी बनानी है।
–चेरावंदाराजन राव

मैनहन (भारत), बात सन १९८२-८३ की रही होगी, मुझे ढ़ग से याद नही, उस वक्त  मेरी उम्र छह वर्ष की रही होगी, यही वह वक्त था जब वृक्षों को बचाने के लिये एक आन्दोलन खड़ा हो चुका था पूरे भारत वर्ष में और मैं उसका एक सिपाही हुआ करता था!

वैसे ये एक नई शुरूवात थी किन्तु हमारे अतीत में जो सभ्यतायें रही उन्होने प्रकृति के प्रति आदर व सम्मान रखा और जरूरत से अधिक कुछ नही लिया, फ़िर चाहे वह पितृ प्रधान आर्य सभ्यता हो जिसमें वृक्षों को पूजा गया और उन्हे देवता कहा गया, या फ़िर भारत के वनॊं में रहने वाली मातृ प्रधान संस्कृति के लोग हो जिन्होनें वन देवी के रूप में वनों और वृक्षों को पूजा की !

अतीत के झरोखे में जो पुख्ता बाते पता चली वह यह हैं कि सन १७३० ईंस्वी में अमृता देवी के नेतृत्व में जोधपुर के खेजराली गांव की ३६३ महिलाओं ने अपनी जीवन की परवाह किये बगैर खेजरी Prosopis cineraria वृक्षों की रक्षा करने के लिये आगे आयी और वृक्षो से लिपट गयी, और दूसरी दफ़ा यह क्रान्ति भी महिलाओं ने की मार्च २६, १९७४ में, अबकी बार ये किसान महिलाये चमोली जनपद के हेमवलघाटी की रेनी गांव की थी, १९८० में यह अहिंसक आन्दोलन पूरे भारत में फ़ैल चुका था। वनविभाग द्वारा वनों की अन्धाधुन्ध कटाई के विरोध में। वैसे तो गढ़वाल में यह क्रान्ति १९७० में ही धीरे-धीरे अग्रसर हो रही थी वृहत रूप लेने के लिये।

उपरोक्त किसी बात का मुझे ज्ञान नही था जब मै इत्तफ़ाकन चिपको आंदोलनकारी बना, वह मात्र एक संयोग था जो इस एतिहासिक आंदोलन से मुझे जोड़ता है!

मेरे बग्गर में एक बगीचा था जिसमें तमाम विशाल वृक्षों के अलावा एक महुआ का छोटा वृक्ष था तने में दो शाखायें ऊपर की  तरफ़ रूख किये थे, इन्ही दो शाखाओं के मध्य जो स्थान बना उसे मैं घुड़सवारी के लिये प्रयुक्त करता था, इस वृक्ष के तने के फ़ाड़ में जब मैं बैठता तो मै मान लेता की पीछे वाली हरी पत्तियों वाली खूबसूरत डाल घोड़े की पूंछ है और आगे वाली लम्बी मोटी डाल घोड़े का सिर, इस आगे वाली डाल की एक टहनी पकड़ कर  लगाम की तरह खीचता और वृक्ष को हिलाने का प्रयास करता, मुझे इस वृक्ष से प्रेम हो गया था, क्योकि यह मेरा प्रिय घोड़ा जो बन गया था, खेल-खेल में ही सही उस वृक्ष से मेरे मित्रता के मेरे भाव बहुत गहरायी तक थे कि इस वृक्ष की किसी टहनी को भी छति पहुंचे, यह सोचकर मै दुखी हो जाता। नित्य हम दोनो एक लम्बे सफ़र पर निकलते थे।..काल्पनिक सफ़र….ही सही

एक दिन मैं अपने प्रिय वृक्ष के साथ खेल रहा था तभी मेरे बाबाजी ने मुझे बताया कि यह वृक्ष वह काट देंगे, और इसकी लकड़ी का इस्तेमाल करेंगे मोंगरी बनाने में, मैं एकएक उनके इस निर्णय से अवाक सा रह गया मेरी विकलता बड़ती जा रही थी, अखिरकार मैनें उनसे आग्रह किया कि मेरे उस साथी को छोड़ दे, किन्तु उन्होने इस वृक्ष कॆ बेतुकी जगह पर होने और इसमें वृद्धि न होने की वज़ह का हवाला देते हुए मेरी बात टाल दी।

ज्योंही मैने उन्हे पेड़ की तरफ़ धारदार गड़ासे के साथ बढ़ते हुए देखा मै उग्र हो गया और दौड़ कर अपने उस प्रिय वृक्ष से लिपट गया, उनके तमाम प्रयासों के बावजूद मैंने महुआ के उस वृक्ष-मित्र को नही छोड़ा और उसके तने में चिपक कर रोता-चिल्लाता रहा, किन्तु कब तक अखिरकार मेरी जिद मेरे बाबा के निर्णय के आगे हार गयी और वह वृक्ष कट गया। मैने उसे कटते तो नही देखा या न देख पाया हूं, किन्तु दूसरे रोज मै उस जगह की रिक्तता को देखकर बहुत रोया था। और सोचता रहा यह मेरा साथी पेड़ इसी लिये न बढ़ रहा हो क्योकि मै छोटा था और यदि यह वृक्ष वृद्धि करता तो फ़िर मैं कैसे इस पर घुड़सवारी कर पाता !

मै आज शायद जान पाया हूं इन वृक्षों के महत्व को और इनके लिये मेरे मुल्क में किया गया वह संघर्ष, और अब मेरा प्रेम इनके प्रति और गम्भीर हो गया है।

मैने कई प्रजातियों के वृक्ष रोपे है अपने गांव में किन्तु अभी तक वह इच्छा अधूरी है जो मैने बचपन में सोची थी कि इसी जगह फ़िर एक महुआ का वृक्ष होगा !

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

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सेलुलर-९४५१९२५९९७