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गांवॊं में जो तलाब खुदवाये जा रहे है उनका कोई मानक नही सिवाय एक विशाल गढ्ढा खोद देने के, उन्हे यह भी नही सोचना की तालाब ऐसी जगह पर हो जहां चारों तरफ़ का पानी बहकर इस तालाब में संचित हो, साथ ही खोदी हुई मिट्टी को तालाब के चारो तरफ़ छोड़ दिया जाता है जिससे यदि चारों तरफ़ का बरसाती पानी इस तालब में आना चाहे तो भी नही आ सकता, साथ ही मवेशी इस नरक कुण्ड का इस्तेमाल पानी पीने के लिये भी नही कर सकते, गोलाई मे कुएं की तरह खोदा गया कुण्ड जो नरक कुण्ड बन सकता है जनवरों के लिये यानी एक बार भीतर गये तो वापस चढ़ना मुश्किल! कोई बात नही पहाड़ पर कुआ खोदते जायिये……………

रही बात वनस्पतियों की तो अथाह गहराई होने के कारण उनका उगना संभव नही है सिर्फ़ तैरने वाले पौधें ही पनप सकते है।

एक तालाब उसे कहते है जो समतल भूमि से शुरू होकर धीरे-धीरे गहरा होता जाता हो, जहां कम गहराई वनस्पति भी उग सकती है और गहरे स्थान पर अधिक गहराई में होने वाली वनस्पति भी…… यही स्थिति जीवों पर भी लागू होती है अर्थात एक आदर्श तालाब जिसमे जैव-विविधिता भरपूर हो सके!

ठीक है भाई लोगो का काम गढ्ढा खुदवाना ही है भरत की भूमि पर तो खुदवाईये हमारे लोगों का क्या वो तो खोदते रहेंगे उन्हे जो अपनी दिहाड़ी पूरी करनी है हर शाम को पेट भरने के लिए।

अब तो सरकार को ये नारा बनाना चाहिये……..

चलो चले अनियोजित विकास की ओर……………..नही

चलो चले अगड़म बगड़म विकास की ओर

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७

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वृक्ष:..असना, बहेरा, बकैन, भिलवा, हर्र, कैमा या कैम, कंजी, किरियारी(अमलताश), नेवरा, पियामन, भिल्लर, सिहोरा, तेन्दू, बनबेरा, गोहलौरा, भटवास या कटु, चमरौधा, गन्धैला, झाऊ, करौन्दा, मैनफ़ल, रोहड़ी, रूसा, आइला, बेन्त, दूधीबेल, हडजोड़िया, कंजा, मकोई,

घास:…पनहर या चरनी, सिवरा, मकरा, अकरा, अकसा, मुनुमुन, मड़ौरा, कोदरौली, नागरमोथा या भादा, तिपतिया, हिरनखुरी, कुकुरौधा, झरूआ, मड़ुआ, सिलवारी, नारी, चिन्ना, पसाही, चौधरा, रामबांस

बेल:. कौड़िल्ला, कौआगोड़ी, गुर्च, ,…………………………………..

मेरी मां बताती है कि मैनफ़ल के फ़ल का प्रयोग सिरदर्द में किया जाता है, पियामन की जड़ व हड़जोड़िया के पौधे का औषधीय महत्व है।

ज्ञान की हो रही चोरी या फ़िर हम निकम्में है!

एक बात और हमारी इस प्राकृतिक विरासत का अध्ययन अपनी भाषा में हो और उसे संरक्षित किया जाय ताकि उससे कोई विदेशी चोरी न कर सके, दुनिया को हम बतायें कि हमारे यहां ये वनस्पति है जिसका महत्व फ़ला बीमारी में है जो कि आधुनिक मेडिकल साइन्स में लाइलाज है और इसका पेटेंट भी हमारा हो, किन्तु ऐसा नही है क्योंकि विदेशियों ने हमारे सभी ग्रन्थो का अनुवाद सैकड़ों वर्ष पहले कर लिया और उस ज्ञान का लाभ उठाया, और आज भी हम जो भी कर रहे है उन्ही की भाषा में और हम ठीक से अपनी बात विश्व मंच पर कहे इससे पहले वह इस ज्ञान को अपने तरीके से परिभाषित कर दुनिया के आगे परोस देते हैं।

क्योकि कोई भी वनस्पति संपदा की चोरी कर सकता है किन्तु उस वनस्पति के गुण-दोष को आसानी से नही जान सकता जब तलक हम उसे न बताये और यदि जान भी जाये तो उसका प्रयोग किस तरह और कहां करना है ये वह नही जान सकता बल्कि हमारे पूर्वज सदियो से इन प्रयोगों को दोहरते आयें सफ़लता पूर्वक यानी मेडिसिन टेस्टिंग।

जहां तक मैं सोच पा रहा हूं भारत के गांव, कस्बे व शहरों के नाम उनकी भौगोलिक स्थिति, इतिहास, व वनस्पतियों की बहुतायात में उपलब्धता के आधार पर रखे गये जिसमें गांवों के नाम तो भौगोलिक व पेड़-पौधों की उपस्थिति के आधार पर अधिक आधारित है, जैसे ऊपर दिये गये पौधो व घास के आधार पर यदि मै अपने जनपद व आस-पास के जनपदों के गांवों के नामों का मिलान करे तो क्या महोली, मड़ौरा, कौड़िल्ला, कैमा, आदि ये वनस्पति भी है और गांवों के नाम भी इसके अलावा क्या मैनफ़ल का अपभ्रंस मैनहन नही हो सकता। क्योकि मैं तमाम गांवों को जानता हूं जहां पाई जाने वाली वनस्पति के आधार पर उनके नाम है ये अलग बात कै की कालान्तर में वे प्रजातियां विलुप्त हो गयी, राजा-महाराजा या धर्मिक व्यक्तियों के नाम पर गांव व शहरॊं के नाम रखना काफ़ी बाद में प्रचलित हुआ और कुच नवीन गांवों पर यह बात ज्यादा लागू होती है, अकबरपुर, मोहम्मदपुर, आदि आदि ऐसे भी तमाम गांव मेरे जनपद में है और कुछ तो अधिकारियों के नाम पर भी जैसे सरैया विलियम, थारन्टन स्मिथ आदि आदि।

हमारे जानवर

उपरोक्त में तमाम घासे है जो समाप्त हो चुकी है विकास के नाम पर और वो जगहे भी जहां ये उगती थी और इनमे पौष्टिक तत्वों के अलावा औषधीय तत्व भी थे जो हमारे मवेशियों को ताकत के अतिरिक्त उन्हे स्वस्थ्य भी रखते थी अब सरकार और हमारे लोग कहते है कि दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जाय तो बताइए यह कैसे संभव होगा क्योंकि अब न तो चरागाह और न ये वनस्पतियां जिन्हे जानवर खाते थे।

तो क्या अब दुग्ध व्यवसाय फ़ार्मी मुर्गा पालन की तरफ़ तब्दील हो रहा है सोचिये एक छोटे से दबड़े में बधें ये जीव जिन्हे सूखा भुसा और आक्सीटोसिन का इन्जेक्शन नसीब होता है खाने के नाम पर, सरकार के इस दवा पर रोक लगाने के बावजूद!

ये तमाम नाम जिन्हे अब हमारी नई पीढ़ी नही जनती और ये शब्द स्थानीय होने के कारण आप को किसी अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोष में भी नही मिलेंगे, चूकि आजादी के बाद भारत सरकार ने उन तमाम चीजों का डाकूमेन्टेशन नही किया जिसे अग्रेज करते रहते थे यह एक विडम्बना ही है!

तो अब कैसे पहचानेगें हम इन दुर्लभ पौधों को जो अनगिनत औषधीय गुणों से युक्त है?

क्योंकि अग्रेजों ने जो ग्रन्थ तैयार किये थे वो अब बहुत पुराने हो चुके है और उनमे दिये हुए देशी नाम जो स्थानीय बोलियों में है अब बदल चुके है हमारे जनमानस में जैसे रोहीणी अब रोहनिया हो चुकी है, रूसा रुशाहा, सिहोरा, सिहोरिया, पतेर, पतौरा, और तमाम चीजों के तो नाम ही बदल चुके है हमारी बोली-बानी में, हमें जो बताया गया हमने वो किया सरकार ने कहा हाईब्रिड बीज बोईए तो हमने वही किया, उसने जंगल काटे और विदेशी प्रजातिया रोपी, तालाब पते बिल्डिग बनी, कहा गया कि पेस्टीसाइड का इस्तेमाल करो, फ़र्टिलाइजर डालॊ हमने किया, अब वही लोग कहते है कि देशी फ़सले उगानी चाहिये, कीटनशाक और फ़र्टिलाइज़र का इस्तेमाल नही या कम करना चाहिये, जंगल लगाइए आदि आदि अब हम जब सब खो चुके है कहां है देशी असल बीज जिन्हे हम रोपे, कहां है …………

अब न तो गावों में वनकिया बची है न ही जंगलियां तो फ़िर अचानक वन या जंगल कैसे प्रगट हो जायेगें?

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७

परिग्रही विचार-कही ये ककरहा  नाम के विशाल तालाबों की तलहटी जो पथरीली है यह  अंतरिक्ष के कंकड़( meteoroid) की वज़ह से तो नही, यह Terrestrial Impact Craters है क्या?

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बचपन में मेरा पंसंदीदा खेल था अपने गांव के ककरहा ताल में तैरना, यहां ये जिक्र करना जरूरी है कि “ककरहा” नाम के ताल आप को कई जगह मिल जायेंगे जिसमें मेरे गांव से १५० कि०मी० दूर स्थित दुधवा नेशनल पार्क जिसमें सोनारीपुर रेन्ज में है विश्व प्रसिद्ध “ककरहा” ताल संरक्षित क्षेत्र होने की वजह से जिसे आज भी यह सौभाग्य प्राप्त है कि इस ताल के जल से गैंडा, तेन्दुआ व बाघ अपनी प्यास बुझाते है।

इसके अलावा मैनहन गांव के पश्चिम में एक ककरहिया तलिया(छोटा ताल) भी है ककरहा का शाब्दिक अर्थ मैं ठीक से नही जान पाया सिवाय इसके कि कंकड़ वाली भूमि में जलाशय होने की वजह से इसे ककरहा कहते ? हों क्योंकि तलाब के तल में कंकड मौजूद है ।

यदि आप को पता चले तो जरूर बताइयेगा।

हां तो मै बात करना चाह रहा हूं ताल और इसकी जलीय वनस्पतियों की जिससे ग्रामीण जीवन पोषित रहा है, तालाब में पाये जाने वाला और पूरे ग्राम के लोगो का इन चीजों पर अधिकार रहता था किन्तु तालाब को भी खेती की तरह प्रयोग में लाने से अब ग्राम का जनमानस वंचित है, तलाब के सरकारी ठेके उठते है और पैसे वाला व्यक्ति जिसका इस गांव से दूर-दूर तलक कोई नाता नही है, तालाब पर अधिकार प्राप्त कर लेता है, और सिघाड़ा या मछली पालन द्वारा जो भी उत्पादन होता है उसे शहरों में अच्छे दामॊं पर बेच दिया जाता है और ह्रदयविदारक बात यह है कि हमारे गांवों का साधारण जन-मानस व्यक्ति सिर्फ़ मुहं ताकता रह जाता है उन व्यापारियों का! ग्राम पंचायत स्तर पर इन नियमों में सुधार जरूरी है और ग्राम की प्राकृतिक संपदा पर गांव के ही व्यक्ति का अधिकार सुनश्चित हो। मेरे बचपन में तालाब का यदि व्यवसायी करण होता था तो उसी व्यक्ति को वह व्यवसाय करने का अधिकार दिया जाता था जो इसके योग्य है और वह विषेश जाति के लोगों को जो सदियों से तालाब की संपदा से अपना भरन-पोषण करते आये है।

अब सवाल यह है कि इन तालाबों में उगने वाली जलीय प्रजातियों की, जो विलुप्त हो रही है एक प्रकार की व्यवसायिक खेती से जैसे सिघाड़ा, इसमे पूरे तालाब की वनस्पतियों का सफ़ाया कर उसमे सिघाड़ा उगाया जाता है और तमाम तरह के जहरीले रसायनों का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण अब इन तालाबों में न उन कीटों के साथ जो सिघाड़े को नुकसान पहुचाते है अन्य उपयोगी कीट, मछलियां व जलीय पौधे नष्ट हो जाते है यही हाल रहा तो हमारी जलीय वनस्पतियों की विविधिता खतरे में पड़ जायेगी। विदेशी मछलियों का भी अन्धाधुन्द उत्पादन हमारे तालाबों की स्थानीय प्रजाति के लिये खतरा है किन्तु न तो सरकार इस तरफ़ ध्यान दे रही है और न ही हम।

मुझे केवल ककरहा ताल या मैनहन की चिन्ता नही है यहां मै पूरे भारत के तालों और गावों का प्रतिनिधित्व करवा रहा मैनहन गांव और इस ककरहा ताल से क्योंकि हमारे देश में हर जगह यही कथा-व्यथा है जिसे मै सुनाना चहता हूं।

यहां मै जिक्र कर रहा हूं उन सभी जलीय, अर्ध-जलीय व नम-भूमि पर उगने वाली बन्स्पतियों का सो सदियों से हमारे लोगो, हमारे जानवरों का भरण पोषण में सहायक रही है मैने भारत सरकार और सलीम अली सेन्टर फ़ार ओर्निथोलोजी एन्ड नेचुरल हिस्ट्री के सहयोग से एक प्रोजेक्ट किया था जिसे “Inland Wetlands of India” के नाम से जाना गया था और इसमें तालाबों और उनकी जैव-संपदा का अध्ययन शामिल था, मैनें जो चार जनपदॊं, खीरी, सीतापुर, बहराइच, और हरदोई के तालाबों और उनकी जैव संपदा का अध्ययन किया वह यह साबित करता है कि आज भी तमाम आबादी भोजन के लिये इन्ही जलाशयों की जैव संपदा पर कही-न-कही आश्रित है और औषधि में भी इन वनस्पतियों का इस्तेमाल करती है, किन्तु अब उनसे ये अधिकार छिनते जा रहे है अब न वह मछली, केकड़ा आदि का प्रयोग कर सकते है और न ही वन्स्पतियों यानी कमल, गुजरी, नारी आदि का सब्जी में इस्तेमाल क्योंकि या तो तालाब पाट दिये गये या फ़िर उनका व्यवसाई करन हो चुका है। ये तो सर्वहारा की बात हुई साथ ही इन वनस्पतियों पर निर्भर रहने वाले जीव भी विलुप्त हो रहे है।

कुछ पौधॊं का जिक्र कर रहा हूं इनमें तमाम की हिन्दी मुझे नही मालूम इस लिए अग्रेजी में इनके नाम प्रस्तुत है जो कभी इन तालाबों में थे किन्तु अब नाम मात्र बचे है।

Aquatic Vegetation

Free Floating:

Wolffia, Lemna, Spirodela, Azolla, Eichhornia, Salvinia, pistia etc.

Rooted with floating Leaves: Trapa, Nelumbo, nymphaea, marsilea, Nymphoides, Ipomoea etc.

Submerged floating:

Ceratophyllum, Najas etc.

Rooted submerged:

Hydrilla, Potamogeton, Aponogeton, Isoetes, Vallisneria, Chara, etc.

Rooted emergent:

Oryza, Sagittaria, Phragmites, Ranunculus, Scirpus, Cyperus, Typha, Limnophila, Sachharum etc.

कमल, सुन्दर पुष्प औषधीय गुओं से युक्त व इसके प्राप्त कमल गट्टे का खाने में उपयोग, गुजरी, कमल की ही तरह प्रयुक्त होता है,  बेहया, इसका पुष्प सुन्दर व पत्तियां गठिया या चोट से आई सूजन में प्रयोग की जाती थी, नारी, इसे सब्जी के रूप में, कुम्भी, इसका कार्य जल की शुद्धता व जलीय जीवों व उनके नवजात बच्चों को सूरज की तेज धूप से बचाना, आदि जिनसे मैं बचपन में ही परिचित था अब समाप्ति की ओर है जिसमें कमल हमारा राष्ट्रीय पुष्प है।

Ceratophyllum जो पानी के भीतर लतिकाओं की तरह फ़ैलता था तैरते वक्त मेरे पैरो में फ़स जाया करता था

सवाल ये नही है कि जो वनस्पति उपयोगी हो उसी का सरक्षण हो सवाल ये है कि धरती पर बिना मतलब कुछ भी नही प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व है और वह एक श्रखंला की तरह है जिसमें से एक हम भी है यानी होमोसैपियन्स मानव जाति और यदि इस श्रखंला की कोई कड़ी टूटती है तो पूरी श्रखंला प्रभावित हुए बिना नही रह सकती।

यदि बरगद, पीपल के फ़लॊ को खाने वाली चिड़ियां न हो तो ये वृक्ष प्राकृतिक रूप से धरती पर नही उग सकते, कारन यह कि जब कोई चिड़िया इन फ़लों को खाती है तो उपापचय की क्रिया से गुजरने के बाद इनके मल के साथ निकलने वाले कोमल बीज जो मल के पोषक तत्वों के साथ होते है वही अंकुरित होते है अन्यथा नही !

हां एक बात और अब गांव का बच्चा  तैरने के अनुभव से वंछित है, क्योंकि स्वीमिंग पूल की व्यवस्था गांव में है नही और ये तालाब व्यवसायीकरण का शिकार हो चुके है। तैरने का सुखद खेल व बेहतरीन कसरत अब गांवों में गुजरे दिनों की बात हो चुकी है।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन -२६२७२७

भारतवर्ष

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“Earth provides enough to satisfy every man’s need, but not every man’s greed” —–Mahatma Gandhi

अधिकार

प्रकृति आप को इतना खुशी मन से देगी

मैं पेड़ों को काटने से नही रूकूंगा
भले ही उनमें जीवन हो।मैं पत्तियों को तोड़नेण से नही रूकूंगा
भले ही वे प्रकृति को सौंदर्य प्रदान करती हों।मैं टहनियों को तोड़ने से नही रूकूंगा
भले ही वे वृक्षों की बाजुंए हो।
क्योकि———–
मुझे झोपड़ी बनानी है।
–चेरावंदाराजन राव

मैनहन (भारत), बात सन १९८२-८३ की रही होगी, मुझे ढ़ग से याद नही, उस वक्त  मेरी उम्र छह वर्ष की रही होगी, यही वह वक्त था जब वृक्षों को बचाने के लिये एक आन्दोलन खड़ा हो चुका था पूरे भारत वर्ष में और मैं उसका एक सिपाही हुआ करता था!

वैसे ये एक नई शुरूवात थी किन्तु हमारे अतीत में जो सभ्यतायें रही उन्होने प्रकृति के प्रति आदर व सम्मान रखा और जरूरत से अधिक कुछ नही लिया, फ़िर चाहे वह पितृ प्रधान आर्य सभ्यता हो जिसमें वृक्षों को पूजा गया और उन्हे देवता कहा गया, या फ़िर भारत के वनॊं में रहने वाली मातृ प्रधान संस्कृति के लोग हो जिन्होनें वन देवी के रूप में वनों और वृक्षों को पूजा की !

अतीत के झरोखे में जो पुख्ता बाते पता चली वह यह हैं कि सन १७३० ईंस्वी में अमृता देवी के नेतृत्व में जोधपुर के खेजराली गांव की ३६३ महिलाओं ने अपनी जीवन की परवाह किये बगैर खेजरी Prosopis cineraria वृक्षों की रक्षा करने के लिये आगे आयी और वृक्षो से लिपट गयी, और दूसरी दफ़ा यह क्रान्ति भी महिलाओं ने की मार्च २६, १९७४ में, अबकी बार ये किसान महिलाये चमोली जनपद के हेमवलघाटी की रेनी गांव की थी, १९८० में यह अहिंसक आन्दोलन पूरे भारत में फ़ैल चुका था। वनविभाग द्वारा वनों की अन्धाधुन्ध कटाई के विरोध में। वैसे तो गढ़वाल में यह क्रान्ति १९७० में ही धीरे-धीरे अग्रसर हो रही थी वृहत रूप लेने के लिये।

उपरोक्त किसी बात का मुझे ज्ञान नही था जब मै इत्तफ़ाकन चिपको आंदोलनकारी बना, वह मात्र एक संयोग था जो इस एतिहासिक आंदोलन से मुझे जोड़ता है!

मेरे बग्गर में एक बगीचा था जिसमें तमाम विशाल वृक्षों के अलावा एक महुआ का छोटा वृक्ष था तने में दो शाखायें ऊपर की  तरफ़ रूख किये थे, इन्ही दो शाखाओं के मध्य जो स्थान बना उसे मैं घुड़सवारी के लिये प्रयुक्त करता था, इस वृक्ष के तने के फ़ाड़ में जब मैं बैठता तो मै मान लेता की पीछे वाली हरी पत्तियों वाली खूबसूरत डाल घोड़े की पूंछ है और आगे वाली लम्बी मोटी डाल घोड़े का सिर, इस आगे वाली डाल की एक टहनी पकड़ कर  लगाम की तरह खीचता और वृक्ष को हिलाने का प्रयास करता, मुझे इस वृक्ष से प्रेम हो गया था, क्योकि यह मेरा प्रिय घोड़ा जो बन गया था, खेल-खेल में ही सही उस वृक्ष से मेरे मित्रता के मेरे भाव बहुत गहरायी तक थे कि इस वृक्ष की किसी टहनी को भी छति पहुंचे, यह सोचकर मै दुखी हो जाता। नित्य हम दोनो एक लम्बे सफ़र पर निकलते थे।..काल्पनिक सफ़र….ही सही

एक दिन मैं अपने प्रिय वृक्ष के साथ खेल रहा था तभी मेरे बाबाजी ने मुझे बताया कि यह वृक्ष वह काट देंगे, और इसकी लकड़ी का इस्तेमाल करेंगे मोंगरी बनाने में, मैं एकएक उनके इस निर्णय से अवाक सा रह गया मेरी विकलता बड़ती जा रही थी, अखिरकार मैनें उनसे आग्रह किया कि मेरे उस साथी को छोड़ दे, किन्तु उन्होने इस वृक्ष कॆ बेतुकी जगह पर होने और इसमें वृद्धि न होने की वज़ह का हवाला देते हुए मेरी बात टाल दी।

ज्योंही मैने उन्हे पेड़ की तरफ़ धारदार गड़ासे के साथ बढ़ते हुए देखा मै उग्र हो गया और दौड़ कर अपने उस प्रिय वृक्ष से लिपट गया, उनके तमाम प्रयासों के बावजूद मैंने महुआ के उस वृक्ष-मित्र को नही छोड़ा और उसके तने में चिपक कर रोता-चिल्लाता रहा, किन्तु कब तक अखिरकार मेरी जिद मेरे बाबा के निर्णय के आगे हार गयी और वह वृक्ष कट गया। मैने उसे कटते तो नही देखा या न देख पाया हूं, किन्तु दूसरे रोज मै उस जगह की रिक्तता को देखकर बहुत रोया था। और सोचता रहा यह मेरा साथी पेड़ इसी लिये न बढ़ रहा हो क्योकि मै छोटा था और यदि यह वृक्ष वृद्धि करता तो फ़िर मैं कैसे इस पर घुड़सवारी कर पाता !

मै आज शायद जान पाया हूं इन वृक्षों के महत्व को और इनके लिये मेरे मुल्क में किया गया वह संघर्ष, और अब मेरा प्रेम इनके प्रति और गम्भीर हो गया है।

मैने कई प्रजातियों के वृक्ष रोपे है अपने गांव में किन्तु अभी तक वह इच्छा अधूरी है जो मैने बचपन में सोची थी कि इसी जगह फ़िर एक महुआ का वृक्ष होगा !

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७