History & Environment


IMG_20160427_174611ब्रिटिश इण्डिया का एक स्मारक जहाँ मौजूद है पुस्तकों का खजाना- विलोबी मेमोरियल लाइब्रेरी।

एक किताबघर जहाँ शब्दों के समन्दर से हमने भावनाओं के मोती चुने थे…
यह है मेरी अध्ययन स्थली, विलोबी मेमोरियल हॉल, 1934 के आस पास स्थानीय मुअज्जिज लोगों ने यह भवन डिप्टी कलेक्टर विलियम डगलस विलोबी की हत्या के तकरीबन एक दशक बाद उसकी स्मृति में बनवाया, मौजूदा समय में इसका नाम बदल दिया गया है, जबकि किसी भी मेमोरियल ट्रस्ट व् उसके द्वारा निर्मित भवन आदि के नाम को बदलना कानूनी व् नैतिक तौर पर कहाँ तक उचित है यह विमर्श का मुद्दा है!?☺
ब्रिटिश लाइब्रेरी के इण्डिया ऑफिस में मेरी मित्र कार्ला पॉर्टर ने जो दस्तावेज हमें भेजे उनके अनुसार विलियम डगलस विलोबी सन 1901 में इंग्लैंड से इण्डिया के लिए जहाज से रवाना हुए, और फिर संयुक्त प्रांत में कई जगह ज्वाइंट कमिश्नर के पदों पर कार्य किया, सन 1919 में वह खीरी जनपद के डिप्टी कमिश्नर बनकर आये, और सन 1920 में उनकी हत्या हुई। उस वक्त एक अंग्रेज अफसर की हत्या पर पूरी ब्रिटिश इण्डिया सरकार आग बबूला हो गयी, और खीरी मिलेट्री बटालियनों से भर गया, कहते हैं दंगा और विद्रोह की स्थितियां भी बनी और बापू को भी हस्तक्षेप करना पड़ा, उसी दौर में बापू लखीमपुर भी आये। विलोबी की कब्र लखीमपुर शहर की क्रिश्चियन सिमेट्री में आज भी मौजूद है, कभी लाइब्रेरी में विलोबी का एक तैल चित्र भी हुआ करता था किन्तु अब वह नदारद है। विलयम डगलस विलोबी पुस्तकों के शौक़ीन थे जब यह लाइब्रेरी बनी तब उनकी व्यक्तिगत पुस्तकें भी यहाँ रखी गयी, और बाद के भी डिप्टी कमिश्नरों ने अपना योगदान दिया उसी का नतीजा है की ब्रिटेन से प्रकाशित तमाम प्राचीन पुस्तकों का खज़ाना है यह पुस्तकालय।
एक महत्वपूर्ण दौर फिर आया श्रीमती इंदिरा गांधी का और उस समय उन्होंने पुस्तकालयों की समृद्धि पर अत्यधिक ध्यान दिया, राजा राममोहन राय लाइब्रेरी कलकत्ता से अनुदानित पुस्तकें यहाँ आती रही, जो बाद के वर्षों में बन्द हो गयी, अब न तो मूल्यवान लेखक बचे और न कद्रदान पाठक, बदलते समाज की नियति ने अब इस पुस्तकालय की भी नियति बदल दी।
अभी हालिया गुजरा विश्व पुस्तक दिवस भी सिर्फ औपचारिकता भर था, एक पीढी जो बदल चुकी है किताबें कैद हैं स्मार्टफोन्स की सत्ता में, और मानव दिमाग भी प्राकृतिक सोच के बजाए तकनीकी सरोकारों की गिरफ्त में, ऐसे में अतीत से आती हमारे उस मानव इतिहास की खुशबू से कैसे रूबरू होगी यह नई पीढी जो मुसलसल इंसान से मशीन में तब्दील हो रही है।
एक बात और अब नवीन लेखन व् किताबें संस्कार डालने में भी विफल है, लिखा बहुत जा रहा है कवी कवियत्रियों की बाढ़ सी आ गयी है किन्तु वह् सब सोशल नेट्वर्किंग के दायरे से बाहर नही निकल पा रहें है, अब प्रकाशक भी बहुत हैं और किताबें भी खूब छपती हैं पर वे असरदार नही की समाज पर छाप डाल सके नतीजतन समाज भी अनियोजित विकास की अंधी दौड़ में दौड़ता चला जा रहा है और अब कोई दिनकर नही है और न ही उसकी रश्मिरथी जो इन भटके हुए लोगों को प्रकाश स्तभों की मानिंद राह दिखा सके।

खैर यहाँ स्थापित लाइब्रेरी जो लगभग एक शताब्दी पुरे करने को है, इसमें मौजूद पुस्तके 1850 से लेकर 1940 ईस्वी तक के समय काल में मौजूद हैं साथ ही आजादी के बाद नवीन समय के प्रकाशन भी उपलब्ध है, जब मैं कक्षा 9 में धर्म सभा इंटर कालेज का विद्यार्थी था तब मैं इस जगह से परिचित हुआ, मैनहन गाँव से आने के पश्चात् इस पुरानी ब्रिटिश इण्डिया की इमारत के आकर्षण ने मुझे इस जगह से परिचित कराया, इमारत में मौजूद लाइब्रेरी के संचालक एडवोकेट श्री विनय मिश्र जी मेरे ननिहाल पक्ष के परिचित निकले, इनके नाना इस लाइब्रेरी के संस्थापक लाइब्रेरियन थे, और उस परम्परा को विनय दादा अभी भी निर्वहन कर रहे हैं बड़ी शिद्दत के साथ, यह ट्रस्ट लखीमपुर की प्रतिष्ठित हस्ती से जुड़ा है, उस जमाने मशहूर बैरिस्टर श्री लक्ष्मी नारायण आगा इस ट्रस्ट व् इमारत के संस्थापकों में रहे और मौजूदा वक्त में उनके पौत्र हमारे बड़े भाई जन्तु विज्ञान प्रवक्ता श्री अजय आगा इस ट्रस्ट के सेक्रेटरी है। तमाम सांस्कृतिक गतिविधियों व् धरना प्रदर्शनों का यह मुख्य स्थल है।

कक्षा 9 में साइकिल से अपने घर से यहाँ तक मैं हर रोज शाम को आता, जाड़ों में 5 से 7 और गर्मियों में 5 से 8:30 तक खुलने का समय था, पर बड़े बुजुर्गों की मौजूदगी में मुबाहिसों के दौर रात के 10 कब बजा देते पता ही नही चलता, यहीं मैं उस किशोरावस्था में परिचित हुआ मोहनदास से, नेहरू से, चर्चिल, व्लादीमिर लेनिन, जोसेफ स्टालिन, बेनिटो मुसोलिनी, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, शरत और बंकिम बाबू से भी बावस्ता हुआ, न जाने कितने नवोदित रचनाकारों को पढ़ने का मौका मिला, और हाँ माडर्न!😊 महिलाओं की लोकप्रिय लेखिका अमृता प्रीतम से भी मुखातिब हुआ यहीं, तमाम अनुभवी ब्रिटिश इण्डिया के दौर के बुजुर्गों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और राजनीतिज्ञों के दर्शन भी हुए इस स्थल पर, कुलमिलाकर तमाम बेहतरीन सरंक्षक व् मार्गदर्शक मिले मुझे इस ऐतिहासिक इमारत से, शब्दों का ताना बाना बुनना भी यहीं से सीखा हमने, और बहुत बाद में कई अखबारों और पत्रिकाओं में इस जगह की खासियतों को लिखकर मैंने आभार प्रगट करने की भी मामूली कोशिशे की, इस पवित्र किताब घर से जहाँ शब्दों के समन्दर में भावनाओं के मोती लगते है उन्हें चुनने में जो सर्वाधिक श्रेय जाता है वह है मेरी माँ और उनके द्वारा दिए हुए वो लाइब्रेरी सदस्यता शुल्क के लिए 100 रूपये जो उस जमाने में किसी बच्चे की जेब में एक बड़ी रकम मानी जाती थी।

कृष्ण कुमार मिश्र (लेखक वन्य जीव विशेषज्ञ, स्वतंत्र पत्रकार एवं दुधवालाइव डॉट कॉम के संस्थापक संपादक है।)

dadi2माँ यथार्थ में…

मैं यानी कृष्ण कुमार मिश्र आज सुबह से ही अपने ग्राम जाने के कार्यक्रम को निर्णय नही दे पा रहा था, क्योंकि यहाँ भी कुछ आवश्यक कार्यों में गतिरोध उत्पन्न हो रहा था, अंततः मैंने निर्णय लिया और अपने पूर्वजों की जमीन पर कदम रखने की कल्पना को लेकर अपनी यात्रा प्रारम्भ कर दी, यात्रा का साधन था बस, सो मैंने बस में प्रवेश किया परन्तु भीड़ से भरी बस में मुझे खड़े रहना पड़ा, बस अपनी चाल में मग्न होकर चल पड़ी, उसे यात्रियों की परेशानियों से क्या मतलब ! थोड़ी दूरी तय करने के बाद बस कुछ खाली हुई, और मुझे बैठने के लिए थोड़ी जगह मिल गयी, बस ने अपनी गति फिर पकड़ ली, कुछ दूरी के बाद बस फिर रुकी, कुछ यात्री उतरे, और कुछ ने बस में प्रवेश किया, उन यात्रियों में एक वृद्धा थी, जिन्होंने मेरी समझ में प्रकृति को काफी कुछ देखकर ऊब चुकी थी, वह दीं-दुनिया से विरक्त, अतिसंवेद्नीय, कुछ कुछ अंतरात्मीय दिख रही थी, मई उन्हें देखे जा रहा था, मुझे उनमे संसार की वास्तविकता दृश्यित हो रही थी, आज ही मेरे साथ ऐसा नहीं हो रहा था, क्योंकि बुजर्गों में मुझे ईश्वर की झलक मिलती है, उनके झुर्रीदार चेहरे में समय के साथ अनुभव और अनुभव से परिपूर्ण शरीर मानों उन्होंने सारी दुनिया को देख लिया हो और उनके देखने के लिए इस संसार में अब कुछ बचा ही न हो, को देखकर मैं सिहर उठता हूँ! और यह वास्तविकता भी है की संसार में ८०-९० बरस देखने के बाद व्यक्ति खुद ब खुद इश्वर के करीब हो जाता है,  उसमे व्याप्त काम क्रोध लोभ इत्यादि का नास होने लगता है, हाँ इसके कुछ बूढ़े अपवाद भी होते है, की अंत तक वह माया मोह से फुर्सत नाहे पाते, परन्तु उनमे भी यह माया मोह अपने स्वार्थ के लिए नही होता है, एक तरीके से यह परस्वार्थ ही है, क्योंकि वह अपने कुटुंब के प्रति चिंतित होते हैं, सो वह अपनी पूंजी को अंतिम समय तक संजोने का प्रयास करते है, और उनमे आने वाला क्रोध भी दुनियादारी से परे होता है, क्योंकि की वह किसी पर झुझलाते है तो अपनी मनोव्यथा के कारण अपने दुःख के कारण किसी स्वार्थ से व्याप्त क्रोध नहीं करते है, अपने आप पर मन ही मन क्रोधित हुआ करते है, अंततोगत्वा यह सिद्ध होता है की वृद्ध व्यक्ति इश्वर में व्याप्त होने के लिए  व्याकुल रहता है,  और इश्वर उस व्यक्ति में व्याप्त होने के लिए आकुल रहता है,  यह बात सर्वथा सत्य है, वृद्ध व्यक्तियों के मुख को देखकर मुझे जितनी शान्ति मिलती है शायद और कहीं नही, मगर कुछ वृद्धों को देखकर क्रोध भी आता है, जो इस बात से परे है और अपवाद भी, जिनमे माया मोह  काम क्रोध का भण्डार है, जो सिर्फ अपने लिए जीते है, वह इस सिद्धांत अर्थात मेरे कथन पर एक कलंक है.

 

गांधी ने भी कहा की भारत गाँवों में बसता है, और भारत की आत्मा भी,  तो मुझे वह वृद्ध देखने में जो गाँवों की भारतीय सभ्यता से परिपोषित और अपने बुजुर्गों की परम्परा को निभाते हुए सर्वप्रथम और साधारण जीवन गामी  है, वह सर्वमान्य और मेरे द्वारा पूज्य है, क्योंकि उनके मुख की सिमतनों को देखने पर मुझे उस मुख में संसार की वास्तविकता नज़र आती है, उनके वृद्ध शरीर को देखकर मुझे उनमे संसार में जीने का तरीका दिखाई पड़ता है, और उनकी मंदगति को देखकर मुझे संसार (प्रकृति) गर्जना नष्ट कर देने वाली ध्वनी सुनाई पड़ती है, क्योंकि जब तक वह तरुण रहे माँ की गोद और पिता के स्नेह से युक्त दैदीप्त्मान रहे, युवा हुए तो जीवन के संघर्ष को झेलते झेलते वृद्ध हो गए और बुढापा उनको अपने में समेटकर प्रकृति की गहरी खाई की दहकती आग में घकेलने को आतुर है, क्या यही है जिन्दगी ?  जिसे तुलसीदास ने सबसे बड़ा और भाग्य से युक्त मनुष्य का जीवन बताया है, अगर यही दुसरे पहलु से देखा जाए तो जीवन में सुख ही सुख है, यही प्रकृति जो उत्पन्न करती है और नष्ट करती है, इससे संघर्ष करते जाओ, लेकिन यह सिलसिला एक दिन आदमी को थका देता है,  और यही थकन एक दिन नष्ट होने को मजबूर कर देती है, जब जब प्रकृति मनुष्य पर हावी रही तब तक मनुष्य दुःख झेलता रहा और अब मनुष्य प्रकृति से आगे निकलना चाहता है तो उसे क्यों रोका जाता है, सुख इसी में है की प्रकृति से लड़ो और आगे निकल जाओ…

 

खैर इन सब बातों पर चर्चा कभी ख़त्म नही हो सकती अंततोगत्वा अपने यथार्थ में आकर मैं आकर मैं अपनी उस यात्रा का वर्णन करता हूँ, वृद्धा के प्रवेश करने के कुछ क्षणों के उपरान्त बस में स्थान खाली हुआ और परिचालक ने उन्हें सीट पर बैठने का आमंत्रण दिया, वह काफी कमजोर होने के कारण उठ न सकी जोकि बस की जमीन पर बैठी थी, इसलिए उनके सुपुत्र ने उनकी बाहू को पकड़ कर उन्हें सीट पर बैठाने का प्रयास किया किन्तु वह असफल रहे, क्योंकि वह वृद्धा कमजोर होने के कारण गिर पड़ी, वृद्धा की इस विफलता और उनके सुपुत्र की असफलता ने सुपुत्र को काफी झुझला दिया, और वह अपनी माता पर आग बबूला होकर कहने लगा की इतनी कमजोर हो चल भी नहीं सकती और उन्हें वही जमीन पर गिरा छोड़कर आँखें  लाल पीली करने लगा, सभी के कहने पर उसने  सीट पर इस तरह बिठा दिया जैसे कोइ वस्तु पटक दी हो, मैं उस व्यक्ति से ही नहीं जिसने यह अमानवीय और अपने कर्तव्य से च्युत कार्य किया, एनी सब संसार के पुत्रों से कहता हूँ पूंछता हूँ…की बचपन में जब वह गिरे थे तब उनकी माँ ने उन्हें दौड़कर उन्हें उठाकर अपने सीने से नहीं लगाया होगा, और वह एक बार ही नही बार बार गिरते होंगे और उनकी माताएं झट से दौड़कर उन्हें सीने से लागाती होगी, शायद वह यह कभी नहीं कहती होंगी की इतने कमजोर हो गए हो की चल नहीं सकते…

 

कृष्ण कुमार मिश्र

(लेखक वन्य जीव विशेषग्य एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका दुधवा लाइव के संस्थापक संपादक हैं)

(यह शब्द मन में उपजे थे जब मैं स्कूल का विद्यार्थी था, सन १९९५ इस्वी की बात है अपने गाँव मैनहन जाते हुए..एक यात्रा वृतांत जिसे संस्मरण कह सकते हैं!)

Akbarअकबर-द साइंटिस्ट

जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने ईजाद किया रिफ्रिजरेशन का सिद्धांत …

फ्रिज का प्रवर्तन भारत भूमि से …

मैनहन गाँव के लोगों ने की अविष्कार की पुनरावृत्ति …

रेफ्रीजरेटर का आविष्कार भारत के बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने सन 1585 से पूर्व में किया जब उनकी राजधानी फतेहपुर सीकरी हुआ करती थी, आइन-ए-अकबरी में अबुल फज़ल ने अकबर के पानी ठंडा करने के तरीके को कई मर्तबा लिखा है अपने दस्तावेज में, सबसे ख़ास बात यह है इस दौर में पूरी दुनिया में अकबर द्वारा ईजाद किया हुआ वैज्ञानिक तरीका कहीं और नहीं मिलता, योरोप और अमरीका में भी लोग बाग़ बर्फ से ही पानी व्  खाद्य पदार्थों को ठंडा व् सुरक्षित रखते थे, अगर मौजूदा विज्ञान की बात करें तो लोगों के घरों में बीसवी सदी के पहले दशक में विकसित रेफ्रीजरेटर पहुंचा, किन्तु इसके आविष्कार के लिए जद्दोजहद सन 1750 के आस पास शुरू हो चुकी थी, कहते है बेंजामिन फ्रैंकलिन ने उस वक्त वाष्पीकरण से तापमान पर पड़ने वाले प्रभाव पर प्रयोग शुरू किए थे, अपने एक रसायन विज्ञानी मित्र जान हैडले के साथ, फ्रैंकलिन के प्रयोगों को आगे बढाया अमेरिका के ही एक वैज्ञानिक ने जिसे ऑलिवर एवैंस के नाम से जानते है, वैसे इन्हें सारी दुनिया में भाप के इंजनों की बेहतरी के लिए जाना जाता है, जैकब पार्किंस को सन 1834 में रेफ्रीजरेटर के एक सफल माडल का पेटेंट मिला, एक ब्रिटिश पत्रकार जेम्स हैरिसन ने सन 1856 में रेफ्रीजरेटर के एक माडल को पेटेंट कराया जिसमें वाष्प-दबाव प्रणाली में ईथर, एल्कोहल और अमोनिया का इस्तेमाल होता था, इसके बाद जो मौजूदा फ्रिज हम देखते है वह सन 1913 में फ्रेड डब्ल्यू वाल्फ़ ने विकसित किया, इसके बाद बहुत से संशोधनों से गुजरा है यह ठंडा करने वाला यंत्र……दुनिया आज इन्ही अमरीकी और ब्रिटिश नागरिकों को जानती है इस मशीन के अविष्कारक के तौर पर….और यह रेफ्रीजरेटर शब्द भी इंग्लिश डिक्शनरी में अठारवीं  सदी में शामिल हुआ…जबकि इस मशीन के आविष्कार के अन्वेषण-कर्ताओं में भारत भूमि की पहल रही, जिसे इतिहास के कुछ पुराने और अप्रसांगिक हो चुके दस्तावेजों में कहा गया है.

कहते है की अकबर सिर्फ एक शासक नहीं थे उन्हें कीमियागिरी से लेकर वास्तुशास्त्र और तंत्र-विद्याओं तक में रूचि थी, और वह हमेशा तकनीकी कार्य करने वाले लोगों के मध्य जाकर स्वयं अपने हाथों से बुनाई कताई से लेकर जंगी साजों सामान के निर्माण में अपनी भागीदारी सुनाश्चित करते थे, अपनी गर्मियों की आराम-गाह जोकि बांस की झोपड़ी होती थी, जिसमे चारोतरफ खुशबूदार खस के परदे बांधे जाते थे और उन पर पानी डाला जाता था ताकि उन खस के पर्दों से गुजरने वाली हवाएं ठंडी हो जाए, इसे तब नैबस्त-गाह कहा जाता था, इस तरह यह शुरुवाती कूलर का माडल हुआ जो हिन्दुस्तान के आम व् ख़ास सभी में खूब प्रचलित रहा….

अकबर द्वारा किए गए इस आविष्कार के सन्दर्भ में अबुल फज़ल ने कहा की दूरदर्शी बुद्धि के उमड़ाव् के चलते जहाँपनाह ने पानी ठंडा करने का साधन उसी शोरे अर्थात बारूद से बनाया जो बहुत हलचल पैदा करने वाला है, और उनके इस आविष्कार से आम व् ख़ास सभी बहुत खुश हुए, यह एक नमकीन लोंदा होता है, उसे छलनी में रखा जाता है और उस पर कुछ पानी छिड़का जाता है, मामूली मिट्टी से अलग कर लिया जाता है, छलनी से जो कुछ छान कर नीचे गिरता है, उसे उबाल लिया जाता है, उसमे मौजूद मिट्टी से अलग कर लिया जाता है और उसके स्फटिक(बरबदंद) बना लिए जाते है, कांसा या चांदी या ऐसी किसी धातु की एक बोतल में एक सेर पानी डाला जाता है और उसका मुहं बंद कर दिया जाता है, एक छलनी में ढाई सेर शोरे में पांच सेर पानी मिलाया जाता है और उस मिश्रण में आधी घड़ी अर्थात १२ मिनट तक उस मुहं बंद बोतल को इधर से उधर घुमाया जाता है, बोतल के अन्दर का पानी बहुत ठंडा हो जाता है, एक शख्स एक रुपये में तीन चौथाई मन से लेकर चार मन तक शोरा खरीद सकता है….

भारत के पारंपरिक ज्ञान और उसकी प्राचीन सभ्यताओं में विज्ञान की समृद्धता को कोइ नकार नहीं सकता, दरअसल अबुल फ़जल ने अकबरनामा के तीसरे हिस्से में जिसे आईने अकबरी कहते है, उसमे भारत के प्राचीन विज्ञान का विवरण है, जाहिर है कि अबुल फ़जल अकबर के नवरत्नों में से एक थे और उन्हें अपने मालिक के लिए यह विशाल दस्तावेज तैयार करना था नतीजतन अकबर के किरदार की मुख्यता और भारतीय ज्ञान को अकबर से जोड़ कर प्रस्तुत करना उनके लिए लाजमी था, इतिहास साक्षी है की राजाओं के दरबारी कवियों ने बहुत ही सुन्दर व् ज्ञान से परिपूर्ण रचनाएं लिखी परन्तु उन रचनाओं में राजा के प्रति उस कवि की कर्तव्य-निष्ठा तो रहती ही थी साथ में चापलूसी और अतिशयोक्तियों से भरे अल्फाजों की दास्ताँनें भी, इसलिए निरपेक्षता की उम्मीद कम ही होती थी, इसलिए इन सम्राटों के दरबारी दस्तावेजों में लिखे हुए किस्सों से इतिहास को भांप तो सकते है परन्तु स्पष्ट कुछ भी देख पाना मुमकिन नहीं होता है इसीलिए इतिहास हमेशा से रिसर्च का विषय रहा है, की उस काल के हालातों का निरपेक्षता से जायजा लेकर उसे दोबारा लिखा जाए ताकि लेखक की भावन जो लालच, और अंध-भक्ति से लिपटी हुई हो तो उसे छान कर उस निर्मल अतीत को देखा और गुना जा सके…….

हम सभी जानते है की रासायनिक अभिक्रियाओं की शुरुवात उष्मा के फैलाव व् उसके जज्ब होने के कारण होती है, वाष्पन से तापमान परिवर्तित होता है, यह तथ्य भले शहंशाह न जानते हो और न ही वे मैनहन गाँव के किसान पर इस रासायनिक अभिक्रिया से पानी को ठंडा कर लेने की जुगत उन्होंने हासिल की…

  बारूद यानि सल्फर, चारकोल और पोटेशियम नाइट्रेट का मिश्रण, इसका आविष्कार नवी सदी में चाइना में माना जाता है,परन्तु वास्तविकता में साल्टपीटर यानि बारूद का आविष्कार भारत में हुआ, जीन बैपटिस्ट टेवर्नियर ने आसाम में इसके ईजाद की बात कही है…  मुख्यता प्राकृतिक तौर पर यह गुफाओं की दीवारों पर चमगादड़ों की ग्वानों (मल -मुख्यता: यूरिक एसिड) के साथ मिला हुआ होता है, जिसे शुद्ध किया जाता है, ताकि इससे शुद्ध पोटेशियम नाइट्रेट निकाला जा सके और उसे गर्म करके क्रिस्टल्स के तौर पर रखा जा सके, पोटेशियम नाइट्रेट, अमोनियम नाइट्रेट, और यूरिया नाइट्रेट ये सभी विस्फोटक पदार्थ है, सभी में नाइट्रोजन तत्व विद्यमान है किसी न किसी रूप में, अमेरिकन सिविल वार के दौरान वहां लोगों ने एक देशी विधि का इस्तेमाल किया जिसे फ्रेंच मेथड भी कहते है, घरों से कुछ दूर  खाद (पांस), भूसा, और मूत्र मिलाकर कई महीनों के लिए छोड़ देते थे, बाद में राख और पानी से उसे छान कर अलग कर लेते थे….कुलमिलाकर यूरिया का किसी न किसी रूप में बारूद बनाने में इस्तेमाल किया जाता रहा, वही यूरिया जो जीवों की उपापचयी क्रियाओं द्वारा किडनी में अपशिष्ट पदार्थ के तौर पर निर्मित होती है साथ ही कुछ अन्य तत्व पोटेशियम, मैग्नीशियम आदि भी उत्सर्जित होते है जीवों के शरीर से, बताते चले की यह यूरिया एक ऐसा कार्बनिक योगिक है जो प्रयोगशाला में पहली बार बनाया गया बावजूद इस मिथक के की कोई भी कार्बनिक योगिक प्रयोगशाला में निर्मित नहीं हो सकता है, और इस यूरिया को बनाने वाले थे एक जर्मन वैज्ञानिक फ्रेडरिक वोह्लर……

दरअसल पोटेशियम नाइट्रेट, या यूरिया नाइट्रेट ये दोनों विस्फोटक गुणों से युक्त है और इन दोनों के देशी निर्माण की विधियों में यूरिया का प्राकृतिक स्रोत यानि मूत्र का इस्तेमाल होता रहा है, अकबर का बारूद (चारकोल, सल्फर और पोटेशियम नाइट्रेट) और हमारे गाँव के लोग जो यूरिया का इस्तेमाल करते है चीजों को ठंडा करने के लिए, दोनों में नाइट्रोजन तत्व व् वाष्पीकरण से तापमान में परिवर्तन की समानता है….पूरी दुनिया में 1585 के पहले कही भी रासायनिक प्रक्रियाओं से पानी को ठंडा कर पाने की कोइ विधि जानकारी में नहीं है, तो यह साबित हो जाता है की अबुल फ़जल के जहाँपना जलाल्लुद्दीन मुहम्मद अकबर ही इस ईजाद की हुई तकनीक के मालिक है. इसका जिक्र अशोक बाजपेई व् इरफ़ान हबीब ने भी अपने शोध में किया है.

तकनीक ने जब अपने पाँव फैलाए तो हासिए के आदमी तक वह पहुँची, उस तकनीक का लाभ भले वह आर्थिक कारणों से न उठा पा रहा हो किन्तु उसके मष्तिष्क में उस तकनीक का जादू जरूर पैबस्त हो गया, नतीजतन उसने अपने देशी तरीके ईजाद किए उस तकनीक की नक़ल में …जरूरत ईजाद कर लेती है वो तरीके जो आसानी से मुहैया हो सके इंसान को …और इसी जरूरत ने हमारे गाँव के लोगों को प्रेरित किया बिना किसी मशीनी रेफ्रीजरेटर के पानी, कोकोकोला और बेवरेज को ठंडा करने की तकनीक को ईजाद करने के लिए, वे अकबर की तरह शोरा यानि गन पाउडर का इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि वह सर्व सुलभ नहीं, उन्होंने एक नया तरीका खोजा यूरिया से पानी ठंडा करने का, उन्हें उष्मा गतिकी के नियम भले न पता हो और न पता हो पदार्थों के वाष्पीकरण से तापमान में परिवर्तन की प्रक्रिया किन्तु उन्हें यह मालूम चल गया की यूरिया में पानी मिला देने से उसमे बंद बोतल में कोई भी चीज रख दे तो वह कुछ मिनटों में ही ठंडी हो जाती है बर्फ की तरह …जाहिर है ग्रामीण क्षेत्रों में हर किसान के घर यूरिया मौजूद होती है और गर्मियों में गाँव से दूर खेतों में काम करता आदमी जिसे प्यास में ठन्डे पानी की जरूरत भी और इसी जरूरत ने यह तरीका ईजाद करवा दिया !

अकबर की इस खोज में भले उनके किसी जंगी सिपाही की तकरीब हो यह, पर नाम जहाँपनाह का ही जोड़ा जाएगा उनके नवरत्न अबुल फ़जल द्वारा, या फिर यह ईजाद वाकई में जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का ही हो, क्योंकि उनकी बौद्धिक अमीरी का जलवा तो हिन्दुस्तान ही नहीं बल्ख बुखारा से लेकर लंदन तक था, और हमारे गाँव मैनहन के लोगों की यह तरकीब जो मैं आप सब को सुना रहा हूँ, हो सकता है कालान्तर में मेरे नाम से ज्यादा जोड़ दी जाए क्योंकि दस्तावेजीकरण करने वाले या करवाने वाला ही प्रमुख होता है, शुक्र है की मुग़ल शासन में अबुल फ़जल जैसे लेखकों ने अकबरनामा जैसा वृहद दस्तावेज तैयार किया और आज हम इस दस्तावेज के दरीचों से कई सदियों पहले की चीजों को देख सकते है.

DSCF3458कृष्ण कुमार मिश्र

संस्थापक संपादक- दुधवा लाइव जर्नल

मैनहन

खीरी

भारत

9451925997

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Image courtesy: ShineB (wikipedia)

अग्नि के आविष्कार ने जब आदिमानव की जीवन शैली को अचानक बदला तो कोई नही जानता था, कि पाशविक जीवन शैली में प्रकृति में संघर्ष करता हुआ यह मानव जल्द ही सभ्यता में प्रवेश करने वाला है, अग्नि में ढाले हुए उसके आदिम हथियार तब्दील होने वाले है खेती के औजारों में, शिकार को भुनने और हिमपात में रक्त जमा देने वाली सर्दी से वचाव का यह चमत्कृत अग्नि अस्त्र अब यज्ञ की वेदियों से लपटें निकालने के काम आने वाला है, जो जीवन के लिए जरूरी था अब वह सिर्फ जरुरत भर रहने वाला नहीं सौंदर्य और आडम्बर में तब्दील होने वाला है, अग्नि की परिक्रमा यानि बोन फायर के चारो तरफ नाचते चिल्लाते और गाते स्त्री पुरुष, कुछ ज्यादा अलाहिदा नही है, उन लाखो वर्ष पहले के मानव से बस तब मीलो फैले घने जंगलो जमी हुई बर्फ के मध्य जीवन को अग्नि से ऊर्जा देता हुआ यह आदिम मानव, और मौजूदा वक्त का आउटिंग एवं पिकनिक मनाता माडर्न मानव !, उस आदि मानव के हाथ में अधभुना या पूरा पका हुआ गोस्त और प्राकृतिक मादक पेय होते थे, बजाए, रेस्त्रां व् घर में बने तमाम तरह के लजीज व्यंजन और ब्रांडेड बीयर या व्हिस्की के, कुलमिलाकर शमां एक सा लगेगा इतिहास के इन दो छोरों को एक साथ देखने पर…..आग को सदियों पुराना आदमी मीलों पैदल चलकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता था, जमीन में गड्ढा खोदकर प्राकृतिक ओवन में आग को सरंक्षित करना सीख गया था आदमी,  और आग की अदला बदली करना भी ! अग्नितोत्सव से होलिकोत्सव और फिर रंगों का त्यौहार कैसे बना यह पर्व यह एक लम्बी कहानी है….

आदमी ने ये भी नहीं सोचा होगा की उसके अप्रितम आविष्कार अग्नि में जो वह मांस भूनता है, उसी अग्नि में उसकी सन्ततिया अन्न भूनेगी, और सती के नाम पर विधवाओं को भी, मनुष्य मन की ईर्ष्या रुपी अग्नि इतनी वीभत्स हो जाएगी की वह अपने प्रतिद्वंदियों को भी इसी अग्नि में जलाएगा, यही बानगी है इतिहास की, कि वक्त के साथ साथ इसकी नियति भी उलटती है, खंड खंड सा जुदा जुदा सा दिखने वाला अतीत, कही न कही पतले तंतुओं से जुड़ा होता है, इतिहास की यही खासयित सभ्यताओं को आपस में जोड़ती है, और आदमी को आदमी से, इसी एक इतिहास खंड में हिरण्यकश्यप नाम का एक पात्र है, जिसकी राजधानी उत्तर भारत के खीरी-हरदोई जनपद में बताई जाती है, वैष्णवों का घोर विरोधी यह पात्र जो विष्णु की सत्ता का प्रतिकार करता है, और स्वयं को भगवान की पदवी पर आरूढ़ कर लेता है, इसकी एक बहन जिसके पास फायर प्रूफ शाल या चुनरी होने की बात कही गयी है, (शायद कुछ लोग भारतीय विमानन शास्त्र की तरह फायर प्रूफ कपड़ों के अविष्कारक अपने पूर्व कथित भारतीय पूर्वजों को साबित करने में लग जाए! बिना इस बोध के की क्या वो उनके पूर्वज ही थी शैव वैष्णव, आर्य अनार्य आदि का भेद भूलकर, चलिए इन कथित अविष्कारों पर हमारे लोग कम से कम जाति वर्ग और धर्म के भेद भूल जायेगे यही क्या कम है, अनेकता में एकता के लिए), खैर बात हिरण्य कश्यप की हो रही थी, इन महाशय के एक पुत्र भी था प्रह्लाद जिस पर वैष्णवों का पूरा प्रभाव पड़ चुका था, या प्रभाव डाल दिया गया था, वैष्णव मत से वैमनस्य के चलते राजा हिरण्य कश्यप ने अपने पुत्र को अपनी फायर प्रूफ चुनरी वाली बहन के साथ अग्नि में स्थापित करने को कहा, कहते है अग्नि की लपटों ने हिरण्यकश्यप की बहन की चुनरी उड़ गयी, और वह अग्नि में जल गयी तथा  प्रह्लाद को विष्णु ने बचा लिया, आज भी जो लकड़ियों और गाय के गोबर के उपलों के मध्य एक अरण्ड का वृक्ष? गाड़ा जाता है वह प्रह्लाद के चिन्ह के रूप में है, और अग्नि प्रज्वलित करने के बाद लपटों में घिरे उस वृक्ष को सुधीजन बाहर निकाल लेते है और फिर नाचते गाते है, इतिहास के कौन से बारीक तंतु उन काल खण्डों को आपस में जोड़ते है, जब पशुपति नाथ को मानने वाले शैव आहिस्ता आहिस्ता वैष्णव परम्परा में पैबस्त हो गए, और विष्णु का गुणगान करते हुए होलिकोत्सव मनाने लगे उल्ल्हास और श्रद्धा से, यकीनन राजा को देवता बना देने वाली पुरोहितों द्वारा रचाई गयी इस प्रणाली की ही यह देन हो,

सभ्यताओं के मिश्रण ने रीति-रिवाजों में बड़े बदलाव किए कुछ खूबसूरत तो कुछ खराब, इस तरह पता नहीं कब  यह त्यौहार भी आर्य अनार्य, शक हूड कुषाण, मुग़ल और मौजूदा भारतीय समाज में संक्रमित होते हुए काल के इस छोर पर रंगों की होली में तब्दील हुआ हो, ब्रज ने रंग दिए इस होली के पर्व को तो अवध ने संजीदगी, अल्ल्हड़पन भी समावेशित हो गया न जाने कब इस त्यौहार में, एक स्त्री के जलाने की यह प्रक्रिया में कब विष्णु अवतरित हुए और कब प्रह्लाद को जीवन दान देकर वैष्णवों की शक्ति का गुणगान हुआ, यह तो दरबारी पुरोहित और कवि जाने किन्तु मौजूदा समाज ने इसमें जो रंग भरे वो अवश्य अतुलनीय है, स्नेहिल और भाई चारे से युक्त.

एक बात दिमाग में कौंधती है उसका जिक्र किए बगैर इस बोझिल ऐतिहासिक लेख को समाप्त नहीं करूंगा वह बात है “होली के फूल” की, आम की पुरानी बागों में तमाम तरह की झाड़ियां उगती है, जिनमे एक झाडी में सर्प के मुख की भाँति आकृति लिए हुए एक पुष्प खिलता है, इसी होली के त्यौहार के आस पास, जिसके मीठे पराग रस को चूसने न जाने कितने कीट पतंगे इकठ्ठा होते है उन झाड़ियों पर, होली के गाड़ने के बाद से लोग खासतौर से लडकियां इन सफ़ेद पुष्पों को चुन चुन कर सींक में पुहती है और फिर गोबर की छेददार उपलों की माला के साथ इन पुष्पों को भी होली स्थल पर चढ़ा आती है, दरअसल यह सफ़ेद पुष्प वाले पौधे का नाम मालाबार नट है, इसे हिंदी में अडूसा, रूसा या रुसाहा भी कहते है, वैज्ञानिकों ने इसे जस्टिसिया अधाटोडा नाम दिया, भारतीय धरती की यह वनस्पति कई औषधीय गुणों से लबरेज है, मलेरिया, ज्वर, क्षयरोग, मूत्र रोग व् कफ की बीमारियों में इसकी जड़ पत्ते और पुष्पों का इस्तेमाल होता है….इस आदि वनस्पति का मौजूदा मनुष्य से कितनी सदियों या फिर पीढ़ियों का नाता है यह अध्ययन का विषय है, इस पुष्प की और होलिकोत्सव मनाने वाली नस्लों के मध्य का नाता!

मानव का प्रकृति से जो रिस्ता है वह रिवाजों में दिखाई देता है, तो हो सकता है कि उत्तर भारत में उस अग्नि में तिरोहित कर दी जाने वाली होलिका के लिए ये श्रद्धा सुमन है या फिर बसंत के आगमन में रची बसी प्रकृति लहलहाती गेहूं की फसलें, खिले हुए आम के बौर और पलाश के फूलों के मध्य यह फाल्गुन का एक पर्व मात्र है, शीत के जाने और उष्ण के आगमन का स्वागत ? या फिर सामूहिक अग्नि की पूजा, या फिर उस प्राचीन व्यवस्था का अंग जब दियासलाई का आविष्कार नहीं हुआ था तब इसी तरह सभी स्त्री पुरुष इसी तरह की अग्नि प्रज्वलित कर अपने अपने घरों में अग्नि को ले जाते थे, और उसे पूरे वर्ष सरंक्षित रखते थे, आज भी यह परम्परा है, लोग होलिका दाह के पश्चात यहां से आग अपने घरों में ले जाते है,… संभव हो की यह कृषि का त्यौहार हो, मानव सभ्यता में कृषि के आविष्कार के बाद जंगली गेहूं से जब उसे मानव द्वारा खेतो में रोपित किया गया तो वह सभ्यता का प्रतीक बना और भरण पोषण का सबसे उम्दा अन्न भी, गेहूं की पकी हुई स्वर्णिम बालियां हमेशा से ऊंचाई से मैदानी क्षेत्रों में आने वाली नस्लों को आकर्षित करती रही है, सभ्यता का यह स्वर्णिम अन्न, इसे भी कथित होलिका दाह की अग्नि में पकाया जाता है और इन बालियों के भुने हुए दानों को घरों में पकाये जाने वाले अन्न में मिलाकर खाया जाता है, यह एक तरह से नव-अन्न के उत्सव का भी दिन है,……रंगों के त्यौहार के यह विविध रंग आदम सभ्यता के कई कालखंडों का ब्यौरा समेटे हुए है उम्मीद है की क्रूरता की कहानी से चलकर रंगो तक के इस सफर में होली अब सिर्फ अपने रंग में रंग गयी है -एकता का रंग !

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन

खीरी
भारत

krishna.manhan@gmail.com

एक तिनका 

अयोध्या  सिंह  उपाध्याय  “हरिऔध”

उपाध्याय जी इस रचना से मैं परिचित हुआ जब मैं बहुत कम उम्र का था शायद पाठशाला जाने की शुरूवात भी नहीं हुई थी , किन्तु अपने पिता जी के मुख से ये गीत कई बार सुना था मायने पता नहीं थे पर बालक मन को इस कविता के अनजाने भावों ? ने प्रभावित जरूर किया था , प्रयोगवादी स्वभाव मुझमे  हमेशा से रहा  जो शायद मुझे विरासत में मिला है ,  यही वजह थी की इस कविता की पंक्तियाँ  जो मुझे याद हो गयी थी  उनका प्रयोग भी मैंने किया था , आप सभी हंस  लोगें  पर मैं बताऊंगा जरूर ….जो  पंक्तिया रटी  थी हमने  …..

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।

 

और मैंने निश्चय किया की इस बार जब आंधी आयेगी तो मैं अपने घर की मुड़ेर पर तन कर जरूर खडा होउंगा  रोआब  से! ऐसा हुआ भी की मैं इस कविता को गाते हुए उस  धुल भरी आंधी में  जीने  की सीढिया  लांघता हुआ दरवाजे के ऊपर अपनी छत पर खडा हुआ “मुझे वही मेरी मुड़ेर  लगी थी ” और आँखों को पूरा खोलकर उस आंधी  की दिशा  की तरफ खडा हुआ  की आखिर कभी न कभी तो कोइ तिनका आँख में गिरेगा …ऐसा हुआ भी आँख दर्द के मारे गुस्से!! में लाल हो गयी मेरी….पर मुझे कोइ तकलीफ नहीं हुई क्योंकि मैं ऐसा चाहता था

 

….आज सोचता  हूँ काश  पिता  जी के मुख से निकली उस कविता को पूरा  कंठस्थ किया होता अर्थ के साथ  तो ऐसा बिलकुल नहीं करता और जिन्दगी का जो बेहतरीन अर्थ उस कविता में है उसे तब ही समझ गया होता  बजाए एक उम्र गुजरने के बाद ! …अधूरे शब्दों  की सार्थकता  और उसका प्रयोग तो हासिल कर लिया था तब मैंने  पर उसके भावों से अपरचित  था ….आज  लगा  की  ये कविता किसी के भी जीवन को सार्थकता  दे सकती है .

 

…अयोध्या सिंह  उपाध्याय  का जिक्र करना भी जरूरी समझता हूँ ..गाजीपुर  की  जमीन  की पैदाइश एक सनाढ्य  ब्राह्मण कुल में , पिता ने पूर्व में ही सिख धर्म को अपनाया था सो  अयोध्या उपाध्याय  के मध्य सिंह  शब्द ने अपनी जगह बना ली …आजादी के पांच महीने पूर्व ही इनका देहावसान हो गया …….

 

इस कविता  ने जीवन के मूल्यों  को जिस  संजीदगी से परिभाषित किया है , उसे समझ लेना और आत्मसात कर लेना ही एक साधारण व्यक्ति को निर्वाण दे सकने में सक्षम है …..

 

इस कविता को मैनहन  के इस  पन्ने  में अंकित कर रहा हूँ , अपने पिता  की स्मृति में ..की जीवन के उस मूल्य को उन्होंने मुझे  मेरे बचपन में ही बता देने की कोशिश  की  थी ..जिसे मैं बहुत  बाद में  शायद समझ  पाया !..कृष्ण

 

चूंकि  ये  दो  पंक्तियाँ  बमुश्किल  मेरी स्मृति में थी मैं पूंछता भी था कभी  कभी अपने मित्रों से पर जवाब नहीं मिलते थे ..कभी बहुत कोशिश भी नहीं की ..अचानक  एक दिन कई बार कुछ शब्दों  के हेर फेर  के साथ  खोजने पर गूगल ने “एक तिनका” मुझे लौटा दिया जो बचपन में कही खो गया था …जी हाँ अयोध्या  सिंह  उपाध्याय  “हरिऔध” का वह एक तिनका …जाहिर हैं खुशी तो होगी और बहुत हुई …आप सभी से भी ये एक तिनका साझा कर रहा  हूँ  इस उम्मीद के साथ की इस तिनके की ताकत कभी न भूलिएगा …..

 

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मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन सा।
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे।
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया।
तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिये।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा।
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

 

 

कृष्ण कुमार मिश्र  ऑफ़ मैनहन (एक तिनका जो अभी भी है मेरी आँख में ! मैं चाहता भी नहीं की ये निकले, ताकि स्वयं का भान रहे सदैव  ..भूलूं नहीं … )

एक खूबसूरत औरत- जिसे अब याद नही किया जाता..

…जिसे इस रंगीन दुनिया ने बे-आबरू किया ..?

एक रोज उत्तर भारत के चाकू वाले मशहूर शहर के बस-स्टैंड पर खड़ा था, रात के दो बज चुके थे, तभी एक पान की दुकान पर एक गीत बज़ता हुई सुनाई दिया..झूम के गा यूं आज मेरे दिल रात जो गुजरे सुबह न आये…जैसे कोई बचपन की कहानी…गीत कर्ण-प्रिय लगा तो पान वाले से वही सी डी देने को कहा बड़ी मुश्किल में वह राज़ी हुआ…बात गुजर गयी..काफ़ी दिनों तक वह कार के म्युजिक सिस्टम में नाचती रही…गीत तो मानो सफ़र तय करने का जरिया थे, अपनी जिन्दगी के गीतों से ही फ़ुरसत कहा  थी..गीत भी सब तरह के दुख-सुख, उत्साह-उल्हास लिए हुए..बस इसलिए गीत सुनना एक शगल सा रह गया है, पर अभी एक दिन लखनऊ से वाअपस आते वक्त एक गीत का मुखड़ा बज़ा सी डी और आगे नाची तो अन्तरा आ गया…ढीला ढीला कुर्ता है पजामा तंग तंग है, ….फ़िर दसरा अन्तरा आया… गेसुओं में रात खोई दिल भी मेरा खो गया…कोई तेरा हो न हो दिल मेरा तेरा हो गया…रफ़ी की प्रत्येक अक्षर में स्पष्टता व गूंजती हुई आवाज…ऐसा अम्मा ने बोला जो सफ़र में मेरे साथ थी…अक्सर वो पूंछती है कौन है इस गीत में…मैं नही बता पाया…वो बोली शम्मी कपूर और सायरा बानों…पर इस बार उनका फ़िल्मी ज्ञान उन्हे धोखा दे गया….गीत को कई बार  सुना …घर पहुंच कर इस गीत का वीडियो देखा तो नायक-नायिका के तौर पर  शशी कपूर व विमी थे…विमी का नाम देखते ही…मन में उत्कंठा जागी की इस हसीन अदाकारा के बारे में तो मैने कही पढ़ा सुना नही…कौन है ये ?…बस और उसी उत्कंठा ने विमी को मुझसे परिचित कराया…रामपुर की उस अंधेरी रात से शुरू हुआ सिलसिला अब यहां तक आ पहुंचा…आप भी जानिए विमी को…जो असफ़लता और पारिवारिक जीवन की राहो में विफ़ल हो गयी और एक दिन….

एक बहुत ही खूबसूरत और आजाद खयाल महिला जो एक पंजाबी परिवार से थी, अपने परिवार के मर्जी के खिलाफ़ इन्होने कलकत्ता के एक मारवाड़ी व्यवसायी से शादी की, म्युजीसियन रवी ने विमी को मुंबई लाकर बी आर चोपड़ा से मिलाया, और यही से शुरू हुआ इस महिला का फ़िल्मी सफ़र..फ़िल्म हमराज़ से..इन्होने वचन, पतंगा और आबरू जैसी बेहतरीन फ़िल्मों में काम किया..लेकिन इन्हे इच्छित ख्याति नही मिली..सुन्दरता के गुमान और महात्वाकांक्षाओं ने विमी को फ़िल्मों ऐसे शॉट देने के लिए प्रेरित किया जो उस वक्त सामाजिक दायरे से बाहर थे..किन्तु फ़िर चाहत पूरी न हुई, इनके पति ने भी इस बात का विरोध किया, अंतत: इनके पति मुम्बई छोड़ कलकत्ता वापस आ गये, अत्यधिक खर्चीली जीवनशैली ने विमी को गरीब बना दिया.. विमी ने जॉली नाम के प्रोड्युसर के साथ रहने लगी, उसने भी विमी की खूबसूरती के आकर्षण में विमी का साथ किया..लेकिन विमी फ़िल्मी दुनियां में लम्बी दौड़ नही दौड़ पाईं, आखिरकार  तनाव और तंगहाली ने विमी को शराब का लती बना दिया, और जॉली ने भी उनका साथ छोड़ दिया, कहते हैं विमी शराब की चाहत में वैश्यावृत्ति भी करने लगी थी, अब न तो वह अपने घर पंजाब वापस जा सकती थी क्योंकि उसने घर वालो से बगावत करके कलकत्ता के व्यवसायी से शादी की और न ही अपने पति के पास..क्योंकि उसने अपने पति का मान भी नही रखा इस चकचौंध कर देने वाली दुनिया में शोहरत पाने के लिए…और अपने दूर होते गये, गैर नज़दीक आते गये..जिन्हे सिर्फ़ विमी के सौन्दर्य का आक्रषण उनके नज़दीक लाने को विवश करता था…और विमी गफ़लत में आगे बढ़ती गयी अपना सब पीछे छोड़ते हुए… अन्तिम दिनों में सस्ती और घटिया शराब पीने के कारण वह बीमार हो रहने लगी, और फ़िर एक दिन इस खूबसूरत फ़िल्मी नायिका दुनिया को अलविदा कह गयी। कहते है, विमी की अन्तिम यात्रा में शरीक होने वाले चार-पांच लोग ही थे और उन्हे एक ठेले पर डालकर कब्रिस्तान तक ले जाया गया…अफ़सोस..विमी अपने पीछे बहुत से सवाल छोड़ गयी..कलकारों की दुनिया में स्वार्थ, सफ़लता और धन और महात्वाकांक्षाओं के मध्य जहां इन्सानी जिन्दगी कोई मायने नही रखती, उस गन्दगी की परिणिति थी विमी का जीवन..एक सुन्दर महिला…जिसका खुद पर गरूर और सामाजिक दायरों को तोड़ने का दुस्साहस, शोहरत का दीवानापन..जिसने वास्तविक जीवन और यथार्थ को बेदखल कर दिया था विमी के जीवन से..वह जान नही पाई कौन वास्तव में उसका था कौन नही..वह मंजिल की राह पर तो थी पर मंजिल कौन सी है, कैसी है, कहां है, शायद उन्हे नही पता था…और दूषित पुरूषत्व से लबा-लब भरी इस दुनिया में वह खिलौना बन गयी.विमी…. कहते है जमीन छोड़कर आसमान पाने वालों का यही हर्ष होत है, क्योंकि आसमान अनन्त है और अभी तक बहुत कुछ काल्पनिक…किन्तु धरती यथार्थ है..  इस बेहतरीन नायिका को मेरी श्रद्धांजली….अगर आप सब को इनके बारे में जादा मालूमात हो तो जरूर खबर करिएगा..

विमी ने इन बेहतरीन फ़िल्मों में काम किया…

हमराज़ (1967)
आबरू (1968)
पंतगा (1971)
वचन (1974)

यह गीत अवश्य सुने..विमी और शशि कपूर

न सर झुका के जियो…

कृष्ण कुमार मिश्र
9451925997


मैनहन

उत्तर भारत के एक गाँव की कहानी जो मैनहन विलेज ब्लाग के माध्यम से आप सभी के समक्ष रखने की कोशिश…परंपरा, इतिहास, धर्म, किबदन्तियां, ग्रामीण कहावते, कृषि, पारंपरिक ज्ञान, वनस्पतियां और जीव-जन्तु सभी का सिज़रा पेश करता है- मैनहन विलेज, जिसके बारे में हिन्दुस्तान दैनिक ने कुछ यूँ लिखा है ! 

कृष्ण कुमार मिश्र

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