India


-कृष्ण कुमार मिश्र

अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं।

गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के लिए- राष्ट्रीय बीमा योजना।

(श्रम एंव नियोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार एंव आई सी आई लोम्बार्ड द्वारा)

भारत की एक बड़ी आबादी जो अपनी उंगलियों के चिन्ह खो चुकी है ये वही चिन्ह है जो सरकारी कार्यों  में व्यक्ति के होने का प्रमाण होते है और भारत की एक आबादी के लिए ये निशान भाग्य की भाषा के शब्द जिनमें ज्योतिषी शंख व चक्र जैसी आकृतियों की बिनाह पर जजमान को उसके जीवन में राज-योग को सुनश्चित करते है,…….!

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश के एक गाँव  में लगाई गयी, मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप के साथ, ताकि वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके और बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली कर ले। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के उपरान्त मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके, एक तरह का वेरीफ़िकेशन……..।

यहां मैं अपने लोगों की जिस जीर्ण-शीर्ण दशा से रूबरू हुआ उसके लिए शायद माकूल शब्द न प्रस्तुत कर पाऊं किन्तु मुझे किसी भी व्यक्ति की उंगलियों के निशान नही मिले जिन्हे स्कैन किया जा सके। गरीबी और शोषण की हर परिस्थिति ने उन्हे नोचा-घसोटा था, कहते हैं, आदमी के हाथो की लकीरे उसका भूत-भविष्य बताती है, तो यकीनन उनके हाथ मुझे उनका भूत-भविष्य और वर्तमान सभी कुछ बता रहे थे, जिसे कोई ज्योतिषी कभी नही पढ़ सकता था, क्योंकि लकीरे नदारत थी उनके हाथों से अगर कुछ था तो समय की मार के चिन्ह फ़टी हुई मोटी व भद्दी हो चुकी बिना रक्त की खाल जो हथेलियों के बचे हुए सख्त मांस व हड्डियों पर चढ़ी भर थीं। जिसे प्रबुद्ध जन कर्म-योग कहते है तो उसकी प्रतिमूर्ति थे,  इस मुल्क के अनियोजित विकास को ढ़ोने में इनके हाथों पर चढ़ी हुई कालिख हमें बता रही थी कि कैसे नगरीय सभ्यता के संभ्रान्त लोगों की तमाम अयास्सियों का भार यह अन्न-दाता ढ़ो रहा है।  लोगों के धूप व मौसम की तल्खियों से बुझे हुए चेहरे और थका हुआ शरीर जिसकी सख्त व काली हो चुकी खाल को फ़ौरी तौर पर देखकर कोई डाक्टर ये नही बता सकता था कि ये भयानक रक्त अल्पता की बीमारी से ग्रसित है, हाँ हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर रहने वाली औरतों की त्वचा स्पष्ट जाहिर कर रही थी कि ये मात्र सूखे मांस और हड्डियों का कंकाल हैं और इस विद्रूप व रूग्ण शरीर की इज्जत इनकी पीली त्वचा जरूर ढ़क रही है।  कुछ-कुछ परदा कहानी के फ़टे हुए परदे की तरह ………………।

तकरीबन ९० फ़ीसदी परिवारों की यही दशा थी जिनमें स्त्री-पुरूषों की दोनों हाथों की सभी उंगलियों के सारे प्रयास निरर्थक हो जा रहे थे। किन्तु स्कैनर एक भी निशान नही खोज पा रहा था। आखिरकार  उनके बच्चों के निशानों को स्कैन कर दिया जाता, जिनके हाथ अभी इस तरूणायी में सुरक्षित थे और शायद तैयारी भी कर रहे थे, अपनी लकीरों के अस्तित्व को खोने के लिए भविष्य में, मानों यही नियति हो इन हाथों की। यदि  नियमों का पालन होता और परिवार के मुखिया के ही निशान स्कैन करने की कवायद की जाती तो शायद दो-चार कार्डों के सिवा ( जुगाड़ द्वारा बनवायें गये अमीरों द्वारा बीपीएल कार्ड धारकों ) सभी को खाली हाथ वापस जाना पड़ता। और उन्हे ये भी दुख होता कि दिन भर की मशक्क्त में दिहाड़ी भी गयी और कार्ड भी नही मिला।  लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि ये कार्ड तो निरर्थक है क्योंकि परिवार के मुखिया के बजाय छोटे बच्चों की उंगलियों के निशान मौजूद है इन कार्डों में? तस्वीर किसी और की और उंगलियों के निशान किसी और के!  और कम्पनी द्वारा तैनात किए गये दैनिक वेतन-भोगियों को भी तो प्रति कार्ड पैसा मिलना था। जितने कार्ड उतना कमीशन। पर क्या कोई विकल्प था, जब गांव के सभी गरीबों के हाथों में तकदीर की रेखायें ही नदारद है। यही स्थित पूरे के पूरे जनपद में। कैसा विकास है यह! इससे बेहतर तो सूदखोरों का दौर था जब इन गरीबों की जमीनों को गिरवी रखते वक्त वह इनके अगूंठे का निशान तो पा जाते थे। यहां एक और स्थिति बनी जो मुझे शर्मसार करती थी बार-बार…..जब भी किसी की उंगलियों का निशान न मिले तो तकनीके खोजी जाय की सिर में अंगूठे को रगड़ों तो यह साफ़ भी हो जायेगा और बालों में लगे तेल से साफ़ व मुलायम भी, पर यहां किसी के सिर में चिकनाई की एक बूंद भी नही थी आखिर में कम्प्यूटर वाला लड़का अपने सिर से उस व्यक्ति का अंगूठा रगड़ता, यदि फ़िर भी काम नही चलता तो हार कर वह अपना अंगूठा रख देता स्कैनर पर, व्यक्ति और अंगूठा किसी और का,… पर  तो कभी कभी यह रगड़ने वाली युक्ति काम आ जाती, पर ज्यों ही मुझे उस व्यक्ति के अंगूठे के निशान को वेरीफ़ाई करने के लिए अपना अंगूठा स्कैनर पर रखता तो झट से कम्प्यूटर  वह निशान ले लेता और अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे  लोगों में एक खुशी की लहर दौड़ जाती कि अरे साहब का की उंगलियों के निशान कितने सुन्दर आ रहे है, झट से…….ले ले रहा है। और यही वह मौका होता जब मेरी गर्दन शर्म से झुक जाती, मुझे सिर्फ़ यही एहसास होता कि ये हमारे लोग है और मैं इन्ही का एक हिस्सा हूं, बिना रेखाओं वाली हथेलियों के मध्य  मेरी हथेली की भाग्य रेखायें मुझ पर मुस्करा रही थी……एक व्यंगात्मक हंसी!

मैं आमंत्रित करता हूं उन सभी भद्र जनों को जो ये हाल देखना चाहते अपने सो-काल्ड विकास का वो उत्तर भारत के किसी गांव में आये और कोशिश कर ले, अंगूठों के निशान पाने की वहा एक काले ठप्पे के सिवा कुछ नही मिलेगा।  जिन्हे ये गरीब या गरीबी रेखा के नीचे, टाइप के वाक्यों से संबोधित करते है।

भयानक ठण्ड और सर्वहारा की उत्सुक भीड़, मुझे बार-बार उनके कुछ पा लेने की लालसा लिए चेहरों में झाकने को विवश करती और मैं उन्हे ठगा हुआ सा पाता। दिन में बमुश्किल तीस ही  रुपया कमाने वाला व्यक्ति जिस पर सारे परिवार की रोटी की जिम्मेदारी हो वह अपने दिन की पूरी कमाई लिए उत्सुक खड़ा था बीमा कार्ड बनवाने के लिए! यहां यह बता देना जरूरी है कि बीमित व्यक्ति की कम से कम दो उंगलियों के निशान और उसके परिवार के किसी अन्य वयस्क सदस्य के निशान लेना जरूरी था। इसके बदले उस परिवार के मुखिया को एक प्लास्टिक कार्ड मिलना था जिसमें उसके अगूंठे और उंगलियों के निशान कैद थे, ताकि जब वह बीमार हो तो उस कम्पनी द्वारा निर्धारित सेन्टर पर जा कर उस कार्ड से अपनी पहचान करा सके कि असल व्यक्ति वही है। हाँ बीमा कम्पनी की शर्ते भी सुन लीजिये, यदि मरीज भर्ती होने की स्थित में नही है तो, नशा आदि के कारण बीमार हुआ है तो, महिला गर्भवती है तो,  इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नही है कि सर्प आदि ने काट लिया है तो, और प्राकृतिक आपदा हुई है तो वह बीमित राशि ३०,००० रुपये का लाभ नही पा सकता। हाँ बड़ी खामी यह कि यदि किसी परिवार के मुखिया न हो, यानी माँ-बाप की मृत्यु हो गयी हो तो अव्यस्क बच्चों के लिए यह बीमा नही हो सकता……..। जिस कुपोषण में महिलायें सिर्फ़ बीमार बच्चों को जन्म देती है वहां इस बीमा की शर्तों के अनुसार किसी जन्म-जात बीमारी का इलाज की सुविधा नही। फ़िर आप बतायें हमारे गांव के आदमी का कौन सा विमान क्रैश या कार दुर्घटनाओं से साबिका पड़ता है जो वह इस बीमित राशि का लाभ ले पायेगा?

गांवों में तो लोग अक्सर भांग-गांजा या बीड़ी आदि के कारण ही दमें आदि बीमारियों से ग्रसित होते है और प्राकृतिक आपदायें ही उनका सर्वस्व नष्ट कर देती है। और वैसे भी वह भर्ती होने वाली दशा तक अस्पताल नही पंहुच पाते है क्योंकि उनका प्राथमिक इलाज़ ही नही हो पाता जो वह भर्ती प्रक्रिया तक अपना दम साधे रहे।

हल्की बीमारी में यह कम्पनी बीमित राशि का लाभ नही देती। एक बात और ये लोग इतने भी सक्षम नही होते कि उन सेन्टरों तक पंहुच कर अपनी बात रख सके फ़िर आखिर ये तमाशा क्यों क्या उस कम्पनी और सरकारों को उनकी हाड़ तोड़ मेहनत के तीस रुपये भर लेने है। अरबो की आबादी वाले प्रदेश व देश के अरबों गरीब लोगों तीस-तीस रुपये का कर! जो खरबों की राशि में इकठ्ठा हो जायेगा। यह सवाल इस लिए और जरूरी हो जाता है कि सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर मौजूद मुफ़्त सेवायें ही इन्हे नसीब नही होती तो फ़िर ये कवायद क्यों!

अपने लोगों की बदहाली के सैकड़ों कारण तो मुझे याद आ रहे है किन्तु बिगड़े हुए इन भयानक हालातों में कौन सी जुगति इन्हे उबार लेगी ये बात अब मेरे मस्तिष्क से परे है……मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ।

यहां प्रश्न ये नही है बीमा कम्पनी से इन्हे लाभ मिलेगा या नही या यह योजना उचित या अनुचित है यहाँ एक भारी प्रश्न तो यह है, उन लोगो के लिए जो दम भरते है विकास है, ताकि वह देखे और सोचे कि हमारे देश का एक हिस्सा जो बद से बदतर हो रहा है, कही अतीत में उसे बेहतर कहा जा सकता है आज की इस विद्रूपता को देखकर।

तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नही होते। ये शेर कह कर मैं रूमानी नही होना चाहता और न ही अपने आप को और उनको झूठी तसल्ली।

क्या हमारा दरिद्र नारायण हमेशा ऐसी दुर्गति के साथ जीता रहेगा। एक भारत में इतनी असमानता क्या यही विविधिता है जिस पर बड़े बुद्धिजीवी गर्व करते है।

कृष्ण कुमार मिश्र

(वन्य-जीव विशेषज्ञ, स्वतन्त्र पत्रकारिता, फ़ोटोग्राफ़ी)

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Helios from the Temple of Athena at Troy( 300 BCE) that located on Pergamum Museum. courtsy: History of Mecedonia. साभार हिस्ट्री आफ़ मेसीडोनिया

……..मकर संक्रान्ति पर आप सभी को शुभकामनायें, आखिर सूरज तमाम झंझावातों के बावजूद अपनी मंजिल तक पहुंच गया, यानी मकर राशि के स्टेशन पर, ..वैसे उसने बड़ी तकलीफ़े झेली, खराब मौसम, नो विजिबिलिटी, पतवार खो गयी थी, नाव डगमगाई थी, पटरी से गाड़ी भी एक बार उतर गयी थी किन्तु उस साहसी ने सफ़र पूरा कर लिया और आ पहुंचा मकर नगर के राशि हवाई अड्डे पर!…..मैनहन टुडे!

आओं हम सब हमारे ब्रह्माण्ड के मुख्य ऊर्जा स्रोत को स्वागत करे, नमन करे!

सूर्य आज यानी १४ जनवरी को धनु राशि से पलायन कर मकर राशि पर पहुंचता है, आज के ही बाद से दिनों में बढ़ोत्तरी शुरू-ए होती है।

हमारे यहां मकर संक्रान्ति को खिचड़ी कह कर संबोधित किया जाता है। इसे पंतगों का त्योहार बनाया, मुगलों और नवाबों ने, अवध की पतंगबाजी बे-मिसाल है पूरे भारत में!  वैसे इस खगोलीय घटना के विविध रूप हैं हमारे भारत में, कहीं पोंगल तो कही लोहड़ी……..किन्तु अभिप्राय एक है…सूरज का मकर राशि में स्वागत करना। एक बात और १२ राशियां बारह संक्रान्ति, पर मकर संक्रान्ति अपना धार्मिक महत्व है। तमाम कथायें भी प्रचलित है इस घतना के सन्दर्भ में।

माघे मासि महादेव यो दाद घृतकंबलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अंते मोक्षं च विंदति॥


आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व मकर सन्क्रान्ति ३१  दिसम्बर को पड़ती थी और आज से ९००० वर्ष बाद ये घटना जू न में घटित होगी। वैसे ये ग्रहों का खेल है। जिसे विज्ञान अपने ढ़ग से समझाती है। पर मैं आप को लिए चलता हूं, मैनहन गांव में जहां ये त्योहार पांरपरिक ढ़ग से मनाया जाता है।

प्रात: ब्रह्म-मुहूर्त में तालाब, नदी या कुएं में स्नान करना शुभ माना जाता है। यहां के तमाम धार्मिक लोग इस रोज नैमिषारण्य के चक्र तीर्थ में स्नान करने जाते है। कुछ गंगा या गोमती में ।

सुबह की स्नान पूजन के बाद तोरई (कुकरबिटेसी) की सूखी लताओं से आग प्रज्वलित की जाती है ताकि सर्द मौसम से बचा जा सके। तोरई की लता को जलाना शुभ माना जाता है।

बच्चों को हमेशा यह कह कर प्रात: स्नान के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि जो सबसे पहले उठ कर तालाब के ठण्डे पानी में नहायेंगा उसे उतनी सुन्दर पत्नी व पति मिलेगा।

इस दिन शिव पूजा का विधान है और लोग स्नान आदि करने के बाद शिव की उपासना करते है उसके उपरान्त सन्तों और भिखारियों को खिचड़ी दान का कार्यक्रम।

इस तरह मनाते है मकर संक्रान्ति हमारे गाव में, हां एक बात तो भूल ही गया, यहां मेरे गाँव के लोग और खास-तौर से मेरी माँ की नज़र में कोई पशु-पक्षी नही छूटता जिसे खिचड़ी का भोग न लगाया जाय।

मकर संक्रान्ति का धार्मिक महत्व

किवदंतियां है कि इस दिन भगवान सूर्य (भास्कर)  अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन को ही चुना था। और इसी दिन को ही गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारत

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वृक्ष:..असना, बहेरा, बकैन, भिलवा, हर्र, कैमा या कैम, कंजी, किरियारी(अमलताश), नेवरा, पियामन, भिल्लर, सिहोरा, तेन्दू, बनबेरा, गोहलौरा, भटवास या कटु, चमरौधा, गन्धैला, झाऊ, करौन्दा, मैनफ़ल, रोहड़ी, रूसा, आइला, बेन्त, दूधीबेल, हडजोड़िया, कंजा, मकोई,

घास:…पनहर या चरनी, सिवरा, मकरा, अकरा, अकसा, मुनुमुन, मड़ौरा, कोदरौली, नागरमोथा या भादा, तिपतिया, हिरनखुरी, कुकुरौधा, झरूआ, मड़ुआ, सिलवारी, नारी, चिन्ना, पसाही, चौधरा, रामबांस

बेल:. कौड़िल्ला, कौआगोड़ी, गुर्च, ,…………………………………..

मेरी मां बताती है कि मैनफ़ल के फ़ल का प्रयोग सिरदर्द में किया जाता है, पियामन की जड़ व हड़जोड़िया के पौधे का औषधीय महत्व है।

ज्ञान की हो रही चोरी या फ़िर हम निकम्में है!

एक बात और हमारी इस प्राकृतिक विरासत का अध्ययन अपनी भाषा में हो और उसे संरक्षित किया जाय ताकि उससे कोई विदेशी चोरी न कर सके, दुनिया को हम बतायें कि हमारे यहां ये वनस्पति है जिसका महत्व फ़ला बीमारी में है जो कि आधुनिक मेडिकल साइन्स में लाइलाज है और इसका पेटेंट भी हमारा हो, किन्तु ऐसा नही है क्योंकि विदेशियों ने हमारे सभी ग्रन्थो का अनुवाद सैकड़ों वर्ष पहले कर लिया और उस ज्ञान का लाभ उठाया, और आज भी हम जो भी कर रहे है उन्ही की भाषा में और हम ठीक से अपनी बात विश्व मंच पर कहे इससे पहले वह इस ज्ञान को अपने तरीके से परिभाषित कर दुनिया के आगे परोस देते हैं।

क्योकि कोई भी वनस्पति संपदा की चोरी कर सकता है किन्तु उस वनस्पति के गुण-दोष को आसानी से नही जान सकता जब तलक हम उसे न बताये और यदि जान भी जाये तो उसका प्रयोग किस तरह और कहां करना है ये वह नही जान सकता बल्कि हमारे पूर्वज सदियो से इन प्रयोगों को दोहरते आयें सफ़लता पूर्वक यानी मेडिसिन टेस्टिंग।

जहां तक मैं सोच पा रहा हूं भारत के गांव, कस्बे व शहरों के नाम उनकी भौगोलिक स्थिति, इतिहास, व वनस्पतियों की बहुतायात में उपलब्धता के आधार पर रखे गये जिसमें गांवों के नाम तो भौगोलिक व पेड़-पौधों की उपस्थिति के आधार पर अधिक आधारित है, जैसे ऊपर दिये गये पौधो व घास के आधार पर यदि मै अपने जनपद व आस-पास के जनपदों के गांवों के नामों का मिलान करे तो क्या महोली, मड़ौरा, कौड़िल्ला, कैमा, आदि ये वनस्पति भी है और गांवों के नाम भी इसके अलावा क्या मैनफ़ल का अपभ्रंस मैनहन नही हो सकता। क्योकि मैं तमाम गांवों को जानता हूं जहां पाई जाने वाली वनस्पति के आधार पर उनके नाम है ये अलग बात कै की कालान्तर में वे प्रजातियां विलुप्त हो गयी, राजा-महाराजा या धर्मिक व्यक्तियों के नाम पर गांव व शहरॊं के नाम रखना काफ़ी बाद में प्रचलित हुआ और कुच नवीन गांवों पर यह बात ज्यादा लागू होती है, अकबरपुर, मोहम्मदपुर, आदि आदि ऐसे भी तमाम गांव मेरे जनपद में है और कुछ तो अधिकारियों के नाम पर भी जैसे सरैया विलियम, थारन्टन स्मिथ आदि आदि।

हमारे जानवर

उपरोक्त में तमाम घासे है जो समाप्त हो चुकी है विकास के नाम पर और वो जगहे भी जहां ये उगती थी और इनमे पौष्टिक तत्वों के अलावा औषधीय तत्व भी थे जो हमारे मवेशियों को ताकत के अतिरिक्त उन्हे स्वस्थ्य भी रखते थी अब सरकार और हमारे लोग कहते है कि दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जाय तो बताइए यह कैसे संभव होगा क्योंकि अब न तो चरागाह और न ये वनस्पतियां जिन्हे जानवर खाते थे।

तो क्या अब दुग्ध व्यवसाय फ़ार्मी मुर्गा पालन की तरफ़ तब्दील हो रहा है सोचिये एक छोटे से दबड़े में बधें ये जीव जिन्हे सूखा भुसा और आक्सीटोसिन का इन्जेक्शन नसीब होता है खाने के नाम पर, सरकार के इस दवा पर रोक लगाने के बावजूद!

ये तमाम नाम जिन्हे अब हमारी नई पीढ़ी नही जनती और ये शब्द स्थानीय होने के कारण आप को किसी अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोष में भी नही मिलेंगे, चूकि आजादी के बाद भारत सरकार ने उन तमाम चीजों का डाकूमेन्टेशन नही किया जिसे अग्रेज करते रहते थे यह एक विडम्बना ही है!

तो अब कैसे पहचानेगें हम इन दुर्लभ पौधों को जो अनगिनत औषधीय गुणों से युक्त है?

क्योंकि अग्रेजों ने जो ग्रन्थ तैयार किये थे वो अब बहुत पुराने हो चुके है और उनमे दिये हुए देशी नाम जो स्थानीय बोलियों में है अब बदल चुके है हमारे जनमानस में जैसे रोहीणी अब रोहनिया हो चुकी है, रूसा रुशाहा, सिहोरा, सिहोरिया, पतेर, पतौरा, और तमाम चीजों के तो नाम ही बदल चुके है हमारी बोली-बानी में, हमें जो बताया गया हमने वो किया सरकार ने कहा हाईब्रिड बीज बोईए तो हमने वही किया, उसने जंगल काटे और विदेशी प्रजातिया रोपी, तालाब पते बिल्डिग बनी, कहा गया कि पेस्टीसाइड का इस्तेमाल करो, फ़र्टिलाइजर डालॊ हमने किया, अब वही लोग कहते है कि देशी फ़सले उगानी चाहिये, कीटनशाक और फ़र्टिलाइज़र का इस्तेमाल नही या कम करना चाहिये, जंगल लगाइए आदि आदि अब हम जब सब खो चुके है कहां है देशी असल बीज जिन्हे हम रोपे, कहां है …………

अब न तो गावों में वनकिया बची है न ही जंगलियां तो फ़िर अचानक वन या जंगल कैसे प्रगट हो जायेगें?

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७

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“Earth provides enough to satisfy every man’s need, but not every man’s greed” —–Mahatma Gandhi

अधिकार

प्रकृति आप को इतना खुशी मन से देगी

मैं पेड़ों को काटने से नही रूकूंगा
भले ही उनमें जीवन हो।मैं पत्तियों को तोड़नेण से नही रूकूंगा
भले ही वे प्रकृति को सौंदर्य प्रदान करती हों।मैं टहनियों को तोड़ने से नही रूकूंगा
भले ही वे वृक्षों की बाजुंए हो।
क्योकि———–
मुझे झोपड़ी बनानी है।
–चेरावंदाराजन राव

मैनहन (भारत), बात सन १९८२-८३ की रही होगी, मुझे ढ़ग से याद नही, उस वक्त  मेरी उम्र छह वर्ष की रही होगी, यही वह वक्त था जब वृक्षों को बचाने के लिये एक आन्दोलन खड़ा हो चुका था पूरे भारत वर्ष में और मैं उसका एक सिपाही हुआ करता था!

वैसे ये एक नई शुरूवात थी किन्तु हमारे अतीत में जो सभ्यतायें रही उन्होने प्रकृति के प्रति आदर व सम्मान रखा और जरूरत से अधिक कुछ नही लिया, फ़िर चाहे वह पितृ प्रधान आर्य सभ्यता हो जिसमें वृक्षों को पूजा गया और उन्हे देवता कहा गया, या फ़िर भारत के वनॊं में रहने वाली मातृ प्रधान संस्कृति के लोग हो जिन्होनें वन देवी के रूप में वनों और वृक्षों को पूजा की !

अतीत के झरोखे में जो पुख्ता बाते पता चली वह यह हैं कि सन १७३० ईंस्वी में अमृता देवी के नेतृत्व में जोधपुर के खेजराली गांव की ३६३ महिलाओं ने अपनी जीवन की परवाह किये बगैर खेजरी Prosopis cineraria वृक्षों की रक्षा करने के लिये आगे आयी और वृक्षो से लिपट गयी, और दूसरी दफ़ा यह क्रान्ति भी महिलाओं ने की मार्च २६, १९७४ में, अबकी बार ये किसान महिलाये चमोली जनपद के हेमवलघाटी की रेनी गांव की थी, १९८० में यह अहिंसक आन्दोलन पूरे भारत में फ़ैल चुका था। वनविभाग द्वारा वनों की अन्धाधुन्ध कटाई के विरोध में। वैसे तो गढ़वाल में यह क्रान्ति १९७० में ही धीरे-धीरे अग्रसर हो रही थी वृहत रूप लेने के लिये।

उपरोक्त किसी बात का मुझे ज्ञान नही था जब मै इत्तफ़ाकन चिपको आंदोलनकारी बना, वह मात्र एक संयोग था जो इस एतिहासिक आंदोलन से मुझे जोड़ता है!

मेरे बग्गर में एक बगीचा था जिसमें तमाम विशाल वृक्षों के अलावा एक महुआ का छोटा वृक्ष था तने में दो शाखायें ऊपर की  तरफ़ रूख किये थे, इन्ही दो शाखाओं के मध्य जो स्थान बना उसे मैं घुड़सवारी के लिये प्रयुक्त करता था, इस वृक्ष के तने के फ़ाड़ में जब मैं बैठता तो मै मान लेता की पीछे वाली हरी पत्तियों वाली खूबसूरत डाल घोड़े की पूंछ है और आगे वाली लम्बी मोटी डाल घोड़े का सिर, इस आगे वाली डाल की एक टहनी पकड़ कर  लगाम की तरह खीचता और वृक्ष को हिलाने का प्रयास करता, मुझे इस वृक्ष से प्रेम हो गया था, क्योकि यह मेरा प्रिय घोड़ा जो बन गया था, खेल-खेल में ही सही उस वृक्ष से मेरे मित्रता के मेरे भाव बहुत गहरायी तक थे कि इस वृक्ष की किसी टहनी को भी छति पहुंचे, यह सोचकर मै दुखी हो जाता। नित्य हम दोनो एक लम्बे सफ़र पर निकलते थे।..काल्पनिक सफ़र….ही सही

एक दिन मैं अपने प्रिय वृक्ष के साथ खेल रहा था तभी मेरे बाबाजी ने मुझे बताया कि यह वृक्ष वह काट देंगे, और इसकी लकड़ी का इस्तेमाल करेंगे मोंगरी बनाने में, मैं एकएक उनके इस निर्णय से अवाक सा रह गया मेरी विकलता बड़ती जा रही थी, अखिरकार मैनें उनसे आग्रह किया कि मेरे उस साथी को छोड़ दे, किन्तु उन्होने इस वृक्ष कॆ बेतुकी जगह पर होने और इसमें वृद्धि न होने की वज़ह का हवाला देते हुए मेरी बात टाल दी।

ज्योंही मैने उन्हे पेड़ की तरफ़ धारदार गड़ासे के साथ बढ़ते हुए देखा मै उग्र हो गया और दौड़ कर अपने उस प्रिय वृक्ष से लिपट गया, उनके तमाम प्रयासों के बावजूद मैंने महुआ के उस वृक्ष-मित्र को नही छोड़ा और उसके तने में चिपक कर रोता-चिल्लाता रहा, किन्तु कब तक अखिरकार मेरी जिद मेरे बाबा के निर्णय के आगे हार गयी और वह वृक्ष कट गया। मैने उसे कटते तो नही देखा या न देख पाया हूं, किन्तु दूसरे रोज मै उस जगह की रिक्तता को देखकर बहुत रोया था। और सोचता रहा यह मेरा साथी पेड़ इसी लिये न बढ़ रहा हो क्योकि मै छोटा था और यदि यह वृक्ष वृद्धि करता तो फ़िर मैं कैसे इस पर घुड़सवारी कर पाता !

मै आज शायद जान पाया हूं इन वृक्षों के महत्व को और इनके लिये मेरे मुल्क में किया गया वह संघर्ष, और अब मेरा प्रेम इनके प्रति और गम्भीर हो गया है।

मैने कई प्रजातियों के वृक्ष रोपे है अपने गांव में किन्तु अभी तक वह इच्छा अधूरी है जो मैने बचपन में सोची थी कि इसी जगह फ़िर एक महुआ का वृक्ष होगा !

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७