झंडा जो १९२१ ईस्वी में स्वीकार किया गया

१९३१ में इसे आज़ादी की लड़ाई का परचम बनाया गया

बापू का सुदर्शन चक्र

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

झंडा ऊँचा रहे हमारा

— श्यामलाल गुप्त पार्षद जी का प्रिय गीत भारत के प्रत्येक नागरिक के मुहं से कभी न कभी स्फ़ुटित हुआ होगा, और यह गीत मुझे याद दिला जाता है मैनहन की उस झंड़े वाली जगह की ! जहां झंड़े जैसी कोई चीज़ मैने कभी नही देखी ।

यहां ये जिक्र करना जरूरी है कि मै डोमेनियन राज्य भारत के तिरंगे की बात नही कर रहा जिसे २२ जुलाई सन १९४७ में संविधान सभा ने ध्वनि मत से मंजूर किया था, तीन रंगों, केशरिया, सफ़ेद व हरे रंग वाला झंडा जिसके मध्य में अशोक स्थम्भ की २४ तीलियों वाला चक्र था, जो आज़ हमारा राष्ट्रीय ध्वज़ है।

मैं उस तिरंगे की बात कर रहा हूं जिसे सन १९२१ ईस्वी में कांग्रेस कमेटी की विजयवाड़ा बैठक में आन्ध्र प्रदेश के एक युवक ने बापू को एक झंडा दिया था जो लाल हरे रंग का था बापू के सुझाव पर सफ़ेद रंग और जोड़ दिया गया उस झंड़े में

आगे चलकर वही झंडा आज़ादी की लड़ाई का परचम बना, सन १९३१ में अधिकारिक तौर पर इसे अपनाया गया और इसके मध्य में सफ़ेद रंग पर नेवी ब्ल्यू रंग का चरखा बना दिया गया जो बापू का अमोघ अस्त्र था और हर भारतवासी का भी। हां उस बालक का नाम कही प्रकाश में नही आया जिसने उस झंडे का पहला माडल विकसित किया था !

मैनें बचपन में अपने घर पर तकुली, और चरखा दोनों देखे पर तब तक इनका इस्तेमाल होना बन्द हो चुका था तकरीबन वह १९८० के बाद की बात है किन्तु इस बात से पता चलता है बापू के चरखे का जादू कॄष्ण की बासुरी से कही ज्यादा तकतवर था, भारत का प्रत्येक नागरिक उनकी बात सुनता और उस को फ़ौरन अमल में लाता, और वो भी उन दिनों में जब रेडियों के अलावा कोई संचार माध्यम नही था। आज मोटीवेशन के तमाम साधन है कम्प्युटर, लैपटाप, प्रोजेक्टर, टेलीविजन, मोबाइल और न जाने क्या-क्या और लोग चिल्ला -चिल्ला कर मिटते जा रहे है मगर कोई नही सुनता उनकी अमल में लाना तो दूर…………….

खैर बात बापू के चरखे और झंडे की हो रही थी, जब मेरे बाबा व पिता, दाऊ को बाहर से आने में देरी हो जाती तो, मैने अपनी दादी से उन दिनों तमाम बार यह कहते हुए सुना कि झंडा तीर देख आऔ, तुम्हारे दौआ या बाबा, या पिता घर आ रहे हैं कि नही, यह जगह गांव के पश्चिम जहां आबादी समाप्त होती थी वहां थी, एक टीला जहां कुछ लोगो ने झोपड़ी बनाने के लिये खर-पतवार इक्ठ्ठा किए हुए थे और वह टीला भी ढ़ग से नही दिखाई देता था। बचपन की अबुद्धि ने कभी यह मन में विचार नही लाने दिया कि झंडा वाली जगह पर आखिर झंडा क्यो नही!

आज इस बात पर विचार किया तो पता चला उन दिनों भारत के प्रत्येक गांव में झंडा वाली जगहे होती थी और उन पर चरखा वाला तिरंगा लहराया करता था। अम्मा बताती है कि उनके गांव मे भी गावं बाहर एक मिट्टी के टीले पर एक लम्बे बांस में चरखा वाला झंडा फ़हराता था, यह बात शायद १९५५ ईस्वी की रही होगी। यानी आज़ादी की उस सुन्दर कहानी का असर अभी भी यानी आठ वर्ष बाद भी जीवित था।

मुझे याद है सन १९८३-८४ में भी स्कूलों में यही चरखा वाला झंडा फ़हराया जाता था मेरे प्राइमरी स्कूल में भी, या तो झंडे की अनुपलब्धता या जन मानस पर अमिट छाप कुछ भी मान सकते है आप। शायद आज़ादी की लड़ाई के वक्त का ये झंडा अभी भी लोगो के पास सुरक्षित था और आज़ाद भारत के राजसुख में लीन नेता ये भूल गये होगें की अब आज़ाद भारत का एक अलग झंडा है और लोगो तक उसे पहुंचाना है।

अब न तो उन्हे याद है और न मुझे मालूम हैं कि अब वह देश प्रेम के जज्बे समाप्त हो गये और लोग राष्ट्रवादी होने के बज़ाय परिवारवादी, जातिवादी, धर्मवादी हो गये और कुछ तो रूसवादी और चीनवादी विचारधारा में जलमग्न होने लगे। चीजे सामुदायिक न होकर व्यक्तिगत हो गयी!

भारत के हर गांव में झंडा जो प्रतीक था उस संघर्ष का, देश का, संस्कृति का और अपने होने का, झंडा, या किला केवल  कपड़े या  ईट-गारे की बनी चीजे नही होती है ये होती खुद के होने का सबूत एक पहचान अपने अस्तित्व की,  और उस वजूद को पहचान दिलाने का ये सफ़ल प्रयास था जिसे पूरे भारत के गांवों, कस्बों और शहरों ने अंगीकार किया था, किन्तु अब वक्त बदल गया है अब हम न तो अपने देश के प्रति गम्भीर है और उसके झंडे के प्रति, इन सब के बिना हम सब की अपने प्रति, कुटुम्ब के प्रति या जाति-धर्म के प्रति गम्भीरता कोई मायने नही रखती।

क्या देश आज़ाद है झंडे के कोई मायने नही रहे, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र के प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नही क्या हमारा उन कुछ लोगों को लाल-बत्ती में बिठा कर देश उनकी जिम्मेदारी समझ कर चैन से सोना उचित है। क्या हम फ़ुरसत पा लेते है उन तमाम कर्तव्यों से ! फ़िर फ़र्क ही क्या रहा गुलाम देश के नागरिक होने और आज़ाद देश के नागरिक होने में। और हम  अपनी जिम्मेदारी से विमुख! उन चन्द लोगों को ये अधिकार देकर, अपने हक की भीख मांगते रहते है जीवन भर,

यदि हर ग्राम प्रधान या उस गांव का कोई व्यक्ति सोच ले कि हमें अपने झडे वाली जगह पर फ़िर से तिरंगा फ़हराना है तो उसे बांस के तने और दो गज खद्दर इकक्ठ्ठा करने में कोई दिक्कत नही होगी।

क्या फ़िर से प्रभात फ़ेरियां निकलेगी हमारे गांवों में क्या फ़िर से झंडे लहरायेगें आसमान में और लोग अगस्त क्रान्ति के वक्त जिस तरह शिरकत करते अपने गांव व शहर की कठिनाइयों को दूर करने के लिये क्या वो हालात वापस नही आ सकते ।

यदि आ जाये तो शायद बापू की आत्मा को शन्ति मिल जायेगी!

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७


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photo courtsy by : K.L. Kamat

डांडी मार्च "फ़ोटो साभार के० एल० कामत"

नमक कानून के साथ टूटा एक मिथक “बिन्नियों वाला मिथक”

६१ वर्ष के युग पुरूष ने जब २४१ मील की लम्बी यात्रा लाखों -करोड़ों भारतीयों के साथ २४ दिनों में पूरी कर अप्रैल सन १९३० के प्रथम सप्ताह में डांडी में बिना टैक्स दिये नमक का निर्माण किया तो पूरी दुनिया इस क्रान्तिकारी कदम से हतप्रभ रह गयी । ब्रिटिश भारत के नमक कानून का उलंघन करके उन्होंने बरतानिया हुकूमत को बता दिया कि अब उनकी पूर्ण स्वराज की मांग को मानना ही होगा,

किन्तु बापू ने उस रोज एक और मान्यता को तोड़ दिया था जो हमारे जनमानस में सैकड़ों वर्षों से व्याप्त थी एक अंधविश्वास की तरह ! लेकिन भारत में कही इस बात पर चर्चा नही हुई जिसे आज मैं जाहिर कर रहा हूं अपनी दादी की जुबानी !!

यह बड़ा अजीब लग रहा होगा कि मेरी दादी और बापू के नमक सत्याग्रह में क्या संबध था ? जवाब हो सकता है कि वह भी हिस्सा थी इस आंदोलन का हर एक भारतीय की तरह !! किन्तु यहां पर मसला ये भी नही है !

“एक सामान्य सी बात है कि किसी मुल्क के लोगों को अपने आधीन करना हो तो उनकी नितान्त जरूरत की चीजों को अपने अधिकार क्षेत्र में कर लो फ़िर चाहे जैसे ड्राइव करो उस मुल्क की पूरी की पूरी आबादी को ।”

कुछ ऐसा ही किया था अग्रेजों ने हमारे मुल्क में “नमक” एक बुनियादी जरूरत है हमारे हाड़-मांस के शरीर की और इस जरूरत पर ताला लगा हुआ था बरतानिया सरकार का और यही वजह थी कि लोग नमक का इस्तेमाल “ऊंट के मुंह में जीरा” वाली कहावत के मुताबिक इस्तेमाल करते थे, अति आवश्यक वस्तु कि अनुप्लब्धता उस वस्तु को सोने (या कोई भी दुर्लभ व आसानी से न मिलने वाली वस्तु) के समान बना देती है ।

नमक का वितरण भी सरकार के हाथ में था । और लोग पचासों मील की लम्बी यात्रा पैदल तय करते हुये सरकार के मुख्यालयों पर जाते और यदि कही वितरण न हो रहा होता तो बिना नमक वापस होते । और ऐसी स्थिति में लोग एक दूसरे के घरों से नमक मांग कर काम चलाते।

उस दौर में दो बुनियादी चीजों का आदान – प्रदान आपसी सहभागिता-सहकारिता से होता था “आग और नमक”, मेरी दादी बताती थी कि लोग अपने घरों में गाय के गोबर से बने उपलो को जलाते थे और भोजन पकाने के उपरान्त उस बची हुई आग को राख से ढ़क देते थे जिससे आग दूसरी सुबह या शाम तक जीवित रहे । इस तरह जिसके घर राख ढ़कने की प्रक्रिया में अवधान आता है आग बुझ जाती तो वह दूसरे के घर से आग मांग कर अपना काम चलाता, आग को सुरक्षित रखने वाली महिला सुघड़(अच्छी) और आग का सरक्षण न कर पाने वाली महिला फ़ूहड़ (खराब) मानी जाती थी !

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मेरी दादी

खैर बात नमक की हो रही है! मेरी दादी का जन्म सन १९१२ ईस्वी में हुआ यानी सन १९३० ईस्वी में उनकी उम्र १८ वर्ष की रही होगी और सन २००६ ईस्वी में उनका देहावसान हुआ, वह इस धरती और इस मुल्क में कुल मुलाकर ९४ वर्ष रही।

गुलाम भारत और आज़ाद भारत के प्रत्येक अच्छे-बुरे हालात को उन्हो ने जिया और देखा । उनकी एक बात जो बचपन मैं नही समझ सका बड़ा हुआ तो समझ आया वही बयान कर रहा हूं । बचपन में मुझसे जब भी नमक जमीन पर गिर जाये या मै फ़ेक दू तो वह डाट कर कहती ये क्या कर रहा है यह तो अपशगुन है ! मै पूछता ऐसा क्यों ? तो जवाब मिलता कि नमक के जितने दाने जमीन पर गिरते है, गिराने वाले मनुष्य की उतनी बिन्नियां(आंख की पलक के बाल) गिर जाती है ! आज मुझे मेरे लोगो की वह बिडम्बना समझ आयी । जिसे पूर्व की राजशाही और अग्रेजी हुकूमत ने उत्पन्न किया था यानी “नमक पर नियंत्रण” और हमारे लोग इसी लिये उस नमक का एक भी दाना जाया नही करने देना चाहते थे जिसे वह बड़ी मुश्किलात से हासिल करते थे .सैकड़ो मील की पैदल यात्रा और तंगी के बावजूद नमक के बदले लगने वाली लागत ! और उस समस्या नें लोगो को यह धारणा विकसित करने के लिये मजबूर किया, ताकि बहुमूल्य व दुर्लभ नमक का एक कण भी बरबाद न किया जाय, खासतौर से अबोध बच्चो के लिए जो खेल -खेल में नमक की कीमत न समझने के कारण उसे बरबाद कर देते थे !

पर आज़ हमे इस मान्यता, अवधारणा से मुक्ति मिल चुकी है । महात्मा गांधी ने उस रोज़ नमक कानून ही नही तोड़ा भारत के हर घर में प्रचलित इस मजबूरी बस बनायी गयी मान्यता को भी तोड़ दिया वह दिन था “६ अप्रैल १९३० डांड़ी गुजरात भारत।”,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,किन्तु इसका मतलब ये कतई नही कि हम अपनी जरूरत से अधिक चीजो का बेजाइस्तेमाल करे !

अब दादी की बिन्निया गिर जाने वाली कहानी का सच मुझे मालूम है क्या आप को था ?

कृष्ण कुमार मिश्र

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भारतवर्ष