मैनहन

उत्तर भारत के एक गाँव की कहानी जो मैनहन विलेज ब्लाग के माध्यम से आप सभी के समक्ष रखने की कोशिश…परंपरा, इतिहास, धर्म, किबदन्तियां, ग्रामीण कहावते, कृषि, पारंपरिक ज्ञान, वनस्पतियां और जीव-जन्तु सभी का सिज़रा पेश करता है- मैनहन विलेज, जिसके बारे में हिन्दुस्तान दैनिक ने कुछ यूँ लिखा है ! 

कृष्ण कुमार मिश्र

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किसी रोज़ एक और भयानक हादसे पर चेतेगा प्रशासन-

मौत का सबब बन सकती है स्टेट हाइवे नम्बर २१ और मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड नम्बर ८६ सी की क्रासिंग।

एक सड़क जिसके नाम से गाफ़िल है खीरी के लोग- SH-21

लखीमपुर से मैंगलगंज तक जाने वाली सड़क ज्यों ही शहर से बाहर गुजरती है,  तो उसे एक लक्ष्मण रेखा पार करनी पड़ती है। जहां कुछ वर्ष पूर्व एक एडवोकेट की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी है। ये लक्ष्मण रेखा है SH-21, जिसे हमारे लोग आसाम रोड, और एल आर पी के नाम से जानते हैं जो कि नार्थ लखीमपुर में स्थित है, पूर्वोत्तर राज्यों में यह सड़क चाइना वार के उपरान्त बनवाई गयी थी। शायद कभी किसी राह चलते मुसाफ़िर ने लखीमपुर नाम सुनते ही इसे आसाम वाले लखीमपुर का स्मरण करते हुए आसम रोड कह दिया, या फ़िर किसी ट्रक वाले ने, जो आज सरकारी कागजो से लेकर आम जनमानस में परचलित शब्द हो गया, अज्ञानता बस बोला गया झूठ दोहराते-दोहराते कथित सच में तब्दील हो गया।

जबकि कथित आसाम रोड (SH-21)  NH-91 से निकलकर गंगा पार करती हुई, बिलग्राम, हरदोई, सीतापुर होते हुए लखीमपुर आती है, यहां से यह गोला होते हुए पीलीभीत में SH-26( SH-26, NH-74 में मिल जाती है) में मिलकर समाप्त हो जाती है।

ये SH-21 को जब शहर के बाहर बाईपास (SH-21)  को    MDR-86C क्रास करती हुई,  मोहम्मदी तक जाती है। यही सड़क जब मितौली कस्बे के आगे MDR-14C में मिलती है जो मैंगलगंज को जोड़ती है|

SH-21 को MDR-86C जब शहर के बाहर क्रास करती है तो वह क्रास इतना खतरनाक हो जाता है कि किसी भी वक्त कोई बड़ी दुर्घटना घट सकती है। वजह है यहां पर बढ़ता रिहाइसी इलाका और इस क्रास यानी चौराहे पर कोई रम्बल स्ट्रिप भी नही है और डिवाइडर भी नही, चूकिं स्टेट हाइवे को एक पतली सड़क पार करती,  आबादी से निकल कर इस लिए इन सड़कों पर गुजरने वाले तेज़ गति के वाहन रफ़्तार धीमी करना मुनासिब नही समझते, यहां किसी तरह की चेतावनी वाला बोर्ड है और न ही लाइट जिससे गुजरने वाले वाहन चालक को यह मालूम हो सके कि वह एक चौराहे को पार कर रहा है।

इसी चौराहे से थोड़ा हटकर राजा  बिजली पासी का स्मारक, यदि यह स्मारक इस चौराहे पर स्थित होता तो वाहनों की बे-रोक-टोक आवाजाही पर रुकावट हो सकती थी।

ऐसे में एक बेहतर विकल्प ये हो सकता है कि व्यवस्था को इस चौराहे पर १८५७ के क्रान्तिकारी राजा लोने सिंह का स्मारक बनवा दे,  राजा लोने सिंह के नाम से इस पूरे जनपद में कोई स्मारक नही है।

एक और सड़क जिसके नाम से गाफ़िल है खीरी के लोग।- MDR-86C यानी राजा लोने सिंह रोड

मेरी इस राय को एक और तथ्य मजबूती देता है, कि जो सड़क SH-21 को पार करती हुई चौराहे को अस्तित्व में लाती है उस सड़क का नाम “राजा लोने सिंह मार्ग” (MDR-86c) है, कभी लखीमपुर रेलवे क्रासिंग पर जहां से इस सड़क का उदगम है, वहां एक शिलालेख हुआ करता था जिस पर राजा लोने सिंह रोड लिखा था। अब न तो वहां कोई शिला बची और न ही लेख। लोग भी भूलते गये इस सड़क के नाम को साथ ही उस क्रान्तिवीर के महान कृत्यों को। वैसे अक्सर इस पुरानी शिला पर विज्ञापन ही चिपके रहते थे सो लेख से शहरवासी महरूम ही रहे, लिहाज़ा इस सड़क का नाम चलताऊ भाषा के अनुसार प्रचलन में आ गया लखीमपुर-मैंगलगंज रोड, या बेहजम रोड (लखीमपुर व मैंगलगंज के मध्य का गांव) इन चलताऊ शब्दों की उत्पत्ति मोटर क्लीनर और कंडक्टरों के मुख से हुई…………मितौली,,,,,,मैंगलगंज….बेहजम……..सवारी……..आदि

चौराहे पर इस महान एतिहासिक नायक की प्रतिमा लग जाने से दो लाभ होगे! एक तो हमारी पीढ़ी जो भूलती जा रही है अपने इस सुन्दर अतीत को, उसे मौका मिलेंगा कुछ जानने का, दूसरा इस बहाने इस सड़क से गुजरने वाले लोगों को अपनी व दूसरों की मौत से दो चार नही होना पड़ेगा, वो भी कुछ ठहरेंगे और शीष भले न नवाये इस स्मारक के समक्ष, किन्तु जिज्ञासा बस इस महान नाम से  परिचित तो ही जायेंगे।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारत

१६ दिसम्बर २००९, खीरी (उत्तर प्रदेश)जनपद का यह वीभत्स हादसा, राजा लोने सिंह मार्ग पर घटित हुआ।  जो तकरीबन ५५ किलोमीटर लम्बा है, लखीमपुर से मैंगलगंज तक। जिसमें पांच यात्रियों की मृत्यु हो गई। जबकि लगभग सभी सवार घायल हुए है जो जिला अस्पताल में भर्ती है, मितौली कस्बे के आगे कठना नदी पर स्थित पुल से पहले ये हादसा हुआ जहां  साइकल सवार को कुचल कर ड्राइबर चलती बस को छोड़ कर कूद गया और बस कठना नदी की कटरी मे पलटती हुई नीचे जा गिरी। ये बात औरंगाबाद निवासी दिलदार और मैनहन निवासी नेतराम मिश्र  ने बताई ये दोनों व्यक्ति  जिला अस्पताल में भर्ती है।

मृतकों में तीन व्यक्ति मितौली थाना क्षेत्र के है, जिसमें अरविन्द मिश्र ग्राम ओदारा, अब्दुल मज़ीद व अर्विन्द सिंह मितौली कस्बे के निवासी थे। जोगेश्वर नाम का व्यक्ति सीतापुर का बताया जा रहा है। जबकि एक व्यक्ति की शिनाख्त अभी नही हो पायी है।

घायलों व स्थानीय प्रत्यक्षदर्शीयों के मुताबिक मृतकों की सख्या अधिक बताई जा रही है।
दोषी परिस्थित है जिसे हमने बनाया है बदहाल सड़के, खटारा बसे, ट्रैफ़िक नियमों का उल्लघन! और इस सड़क के फ़ुटपाथ का गायब हो जाना। लखीमपुर से मैगलगंज(माइकल गंज)  तक के सकरे मार्ग पर यातायात का दबाव, जहां ट्रक, बैलगाड़ी, बस और ट्रैक्टरों की बढ़ती तादाद के बावजूद शासन व जनप्रतिनिधियों ने इस तरफ़ कोई ध्यान नही दिया। कभी सड़कों पर मौजूद गढ़्ढ़ों पर  फ़टी बुशर्ट पर प्योंदें लगाने जैसा फ़र्ज़ी काम हुआ तो कभी सड़क की चौड़ाई बढ़ाने के लिए नाप-जोख। जानकार बताते हैं कि इन गढ़्ढों की मरम्मत में भी पेंच होता है, जहां सड़क ज्यादा खराब होती है उसे नही ठीक किया जाता है, और जहां स्थित थोड़ी ठीक होती है उसमें पच्चीकारी कर दी जाती है ताकि निरीक्षण के दौरान वे उन अधिक टूटी सड़क को दिखा कर बता सके कि ये रोड इतनी खराब थी जिसे उन्होंने ठीक किया हैं। इसके अलावा भारत का नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी को इन अफ़सरों और ठेकेदारों पर डालकर आराम फ़रमाता है, हम किसी भी सरकारी काम में हस्तक्षेप करने से गुरेज करते है लेकिन क्यों?

उत्तर प्रदेश की बढ़ती जनसख्या और यातायात के संसाधन, जिनके लिए अब सड़के और शहर सकरे और छोटे होते जा रहे है किन्तु हमारे मुल्क का अनियोजित विकास समस्याओं को और बढ़ाता जा रहा बज़ाए उन्हे नियोजित करने के।

यहां मैं ईश्वरवादी हो गया!  क्योंकि मैं जानता हूं कि ये मरने वाले आम इन्सान थे, और घटना भी आम, हमारे मुल्क में सड़क दुर्घटना को सामान्य घटना ही माना जाता है, और इनमे मरने वालों के प्रति न तो मन्दिर-मस्ज़िदों मे प्रार्थना होती है और न ही राष्ट्रों के राष्ट्रा्ध्यक्ष शोक सभाओं का आयोजन करते है, क्योंकि ये मौते न तो  २६/११ की तरह किसी आंतकवादी घटना का परिणाम होती है, और न ही साम्प्रदायिक दंगों में। यहां न तो किसी का बल्ला चल रहा होता है, और न ही किसी टी०वी० शो में कम्पटीशन, न ही  कोई नेता या फ़िल्मी स्टार भी पांच सितारा अस्पताल में  होता है ! इनके लिए दुआए सिर्फ़ इनके घर वाले करेंगे न कि………………..!!!

इस लिए मेरे लिए ये जरूरी हो जाता है कि मै ईश्वरवादी हो जाऊ, अपने उन लोगों के लिए, जिनके रंगों में उसी धरती का अन्न, व पानी खून बन कर दौड़ रहा है जो मेरी रंगों में।

मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि उन्हे शान्ति प्रदत्त करे, वे मनुष्य जिन्होंने अपने-अपने परमात्मा को भी जुदा-जुदा कर लिया और दोज़ख व जन्नत को भी, उन सभी के लिए,  उन सभी के ईशों से, मैं कुछ पल हिन्दू तो कुछ पल मुसलमान बनकर, ताकि वह उन सब पर रहम करे, और अपनी शरण में ले। वह सुन्दर रचना करने वाला, अपनी इन रचनाओं को जो घायल और तकलीफ़ में है, उन्हे स्वस्थ्य करे।

मेरी ये प्रार्थना वह जरूर सुनेगा, क्योंकि मैं………………..धर्म जीना सिखाता है और ईश्वर जीवन के रास्ते पर चलने का साहस देता है। एक पिता की तरह।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

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एक जीवित तोप की कहानी

किस्सा १८५७ के गदर का है जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अवध के एनेक्शेसन का फ़रमान जारी किया और राज महाराजाओं की जमीन जायजाद और असलहों आदि का ब्योरा मांगा, राजाओं को जैसे सांप सूघ गया उन्हे उनके अधिकार छिनते नज़र आये, नवाबी राज में जुगाड़ से अपनी आन-बान बचाये और जनता की मेहनत पर सुख भोग रहे ये रजवाड़े अब उदिग्न और दुखी थे तभी उधर सैनिक विद्रोह से मुल्क में एक हलचल सी मच गयी, सब अपने फ़ायदे-नुकसान की जांच-पड़ताल कर इधर-उधर भागने लगे, और जनता किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ये नज़ारा देख रही थी, ज्यादातर रजवाड़ॊ और तालुकेदारों का तो यह हाल था कि जब वह भारी लगते तो क्रान्ति करने लगते और जब अंग्रेज भारी पड़ते तो वह अंग्रेजों की तरफ़दारी में जुट जाते!

अवध में भी कुछ ऐसे हालात थे अहमदुल्ला शाह, बेगमहज़रत महल और कुछ अन्य अति-महात्वाकाक्षी व्यक्ति जिनमे गज़ब की नेतृत्व क्षमता थी इस लड़ाई को आगे ले जा रहे थे, किन्तु हर जनपद में कम्पनी व नवाबी हुकूमत के लोग, अफ़सर व चाटुकार मौजूद थे और गदर की हलचल पर सब नज़र रखे हुए थे, दूर-दराज़ में छोटे राजा और तालुकेदार हरकहरों द्वारा लाई सूचना पर निर्भर थे कोई कहता फ़िरंगी भाग रहे है तो कोई कहता लखनऊ में फ़िर से फ़िरंगी राज कायम हो गया है। और इसी सूचना के आधार पर ये राजा अपना रंग रह –रह कर बदल रहे थे कभी अपने अंग्रेज आकाओं की जीहुजूरी तो कभी नवाबी शासन की तरफ़दारी! जैसे हालात वैसा भेष!

राजा लोने सिंह आफ़ मितौली जो इस इलाके में बहुत प्रसिद्ध और विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर काबिज़ थे

मोहम्मदी, और शाहजहांपुर से चले अंग्रेज अफ़सर व उनके परिवार जिनका रास्ते में उन्ही के सैनिकों द्वारा कत्ल किया गया जो भाग कर बच निकले उन्हे मितौली के राजा लोने सिंह से शरण मांगी राजा ने उन्हे शरण तो दी किन्तु विद्रोहियों का भी उन्हे डर था, कम्पनी सरकार के खिलाफ़ लोने सिंह ने अवध के सिंहासन पर वाजिद अली शाह के बेटे बिरजिस कद्र की ताज़पोशी के दौरान पांच तोपो की सलामी अपने मितौली किले से दी थी, और विद्रोहीयों को मदद भी।

बाद में जब राजा को कुछ लोगों से सूचना प्राप्त हुई की लखनऊ पर बेगम हज़रत महल का शासन कायम हो गया तो उन्होने इन अग्रेजों को विद्रोहियों के हवाले कर दिया।

अग्रेंज जब दोबारा अवध पर काबिज होने लगे तब अक्टूबर १८५८ में मेजर टाम्ब्स के घुड़सवार व पैदल सैनिकों ने शाहजहांपुर में कम्पनी सरकार के विद्रोहियों का सफ़ाया करते हुए मोहम्मदी, पुवांया, औरगांबाद होते होते हुए ८ नवम्बर १८५८ को मितौली पहुंचे और कहते उन्हे बिना किसी प्रयास के मितौली किले पर फ़तह हासिल हुई, और राजा मितौली फ़रार हो गये।

इस किस्से को कुछ स्थानीय तरीके से पेश किया गया अपने राजा की शान में जो मैनहन में भी प्रचलित है वह १८५७ की क्रान्ति की लड़ाई और उसके शूरवीर।

मेरी दादी बताती है कि जब अंग्रेजों ने मितौली के किले को घेर लिया तो राजा लोने सिंह ने खूब लड़ाई लड़ी, किला चारो तरफ़ से गहरी खाई व बांस क झाड़ियों से सुरक्षित था, अंग्रेजों ने किले का फ़ाटक तोड़ने की कोशिश शुरू की, राजा ने अपनी तोप का खयाल किया, राजा की विशाल तोप जिसका नाम लछमनियां था कुऎं से बाहर आई लेकिन उसने राजा का साथ देने से इनकार कर दिया और चल पड़ी किले के उत्तर में स्थित कठना नदी की तरफ़ राजा निरूपाय देखते रहे, एक झड़ाम की अवाज़ के साथ तोप ने नदी के जल में समाधि ले ली, कहते है यदि तोप ने राजा का साथ दे दिया होता तो अग्रेजों की क्या मज़ाल थी जो किले की तरफ़ आख उठा कर देखते, और राजा विजई होते ! किन्तु उस जियधारी तोप ने लोने सिम्ह का साथ छोड़ दिया, यही नियति को मन्जूर था। फ़िर राजा हताश हो गये और अपने किले से सुरंग द्वारा भाग निकले, जो एक मील की दूरी पर कचियानी गांव में निकलती थी जहां राजा के भाई रहते थे। इस तरह अंग्रेज लाख कोशिश के बावजूद राजा लोने सिंह को नही पकड़ सके।

ये बात प्रचलन में है कि आज भी राजा की वह तोप रोज़ आधी रात में किले तक आती है और वापस कठना नदी में जाकर गिरती है जिसकी झड़ाम की आवाज़ सुनाई देती है

यह किस्सा उस प्रजा का अपने राजा के लिए जो उस राजा को कभी हारते हुए नही देखना चाहती। भले उसने हमेशा अपने को जनता के खून-पसीने से सिंचित कर संमृद्धता, एशो-आराम के सारे सामान जुटाए हो।

मेरे ये पूचने पर की आखिर लछमनिया तोप ने राजा का साथ क्यों नही दिया तो इसका कोई ठीक-ठीक जवाब मेरी दादी के पास नही था सिवाय इसके की नियति नही चाहती थी!

“भारत में यदि जनता ने क्रान्ति में कभी हिस्सा लिया तो वह थी अगस्त क्रान्ति यानी बापू के नेतृत्व में, यह मेरा अपना आंकलन है!”

अगली पोस्ट में मैं आप को ले चलूंगा मैनहन के उस जंगल में जहां १८५७ को अग्रेजं अफ़सर, महिलायें व बच्चे रखे गये थे भयानक जंगली महौल में और उनकी खानाबदोशी का हाल, फ़िर कैसे बैलगाड़ियों से और बेड़िया डालकर उन्हे लखनऊ रवाना किया गया…………………..

कृष्ण कुमार मिश्र

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