एक तिनका 

अयोध्या  सिंह  उपाध्याय  “हरिऔध”

उपाध्याय जी इस रचना से मैं परिचित हुआ जब मैं बहुत कम उम्र का था शायद पाठशाला जाने की शुरूवात भी नहीं हुई थी , किन्तु अपने पिता जी के मुख से ये गीत कई बार सुना था मायने पता नहीं थे पर बालक मन को इस कविता के अनजाने भावों ? ने प्रभावित जरूर किया था , प्रयोगवादी स्वभाव मुझमे  हमेशा से रहा  जो शायद मुझे विरासत में मिला है ,  यही वजह थी की इस कविता की पंक्तियाँ  जो मुझे याद हो गयी थी  उनका प्रयोग भी मैंने किया था , आप सभी हंस  लोगें  पर मैं बताऊंगा जरूर ….जो  पंक्तिया रटी  थी हमने  …..

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।

 

और मैंने निश्चय किया की इस बार जब आंधी आयेगी तो मैं अपने घर की मुड़ेर पर तन कर जरूर खडा होउंगा  रोआब  से! ऐसा हुआ भी की मैं इस कविता को गाते हुए उस  धुल भरी आंधी में  जीने  की सीढिया  लांघता हुआ दरवाजे के ऊपर अपनी छत पर खडा हुआ “मुझे वही मेरी मुड़ेर  लगी थी ” और आँखों को पूरा खोलकर उस आंधी  की दिशा  की तरफ खडा हुआ  की आखिर कभी न कभी तो कोइ तिनका आँख में गिरेगा …ऐसा हुआ भी आँख दर्द के मारे गुस्से!! में लाल हो गयी मेरी….पर मुझे कोइ तकलीफ नहीं हुई क्योंकि मैं ऐसा चाहता था

 

….आज सोचता  हूँ काश  पिता  जी के मुख से निकली उस कविता को पूरा  कंठस्थ किया होता अर्थ के साथ  तो ऐसा बिलकुल नहीं करता और जिन्दगी का जो बेहतरीन अर्थ उस कविता में है उसे तब ही समझ गया होता  बजाए एक उम्र गुजरने के बाद ! …अधूरे शब्दों  की सार्थकता  और उसका प्रयोग तो हासिल कर लिया था तब मैंने  पर उसके भावों से अपरचित  था ….आज  लगा  की  ये कविता किसी के भी जीवन को सार्थकता  दे सकती है .

 

…अयोध्या सिंह  उपाध्याय  का जिक्र करना भी जरूरी समझता हूँ ..गाजीपुर  की  जमीन  की पैदाइश एक सनाढ्य  ब्राह्मण कुल में , पिता ने पूर्व में ही सिख धर्म को अपनाया था सो  अयोध्या उपाध्याय  के मध्य सिंह  शब्द ने अपनी जगह बना ली …आजादी के पांच महीने पूर्व ही इनका देहावसान हो गया …….

 

इस कविता  ने जीवन के मूल्यों  को जिस  संजीदगी से परिभाषित किया है , उसे समझ लेना और आत्मसात कर लेना ही एक साधारण व्यक्ति को निर्वाण दे सकने में सक्षम है …..

 

इस कविता को मैनहन  के इस  पन्ने  में अंकित कर रहा हूँ , अपने पिता  की स्मृति में ..की जीवन के उस मूल्य को उन्होंने मुझे  मेरे बचपन में ही बता देने की कोशिश  की  थी ..जिसे मैं बहुत  बाद में  शायद समझ  पाया !..कृष्ण

 

चूंकि  ये  दो  पंक्तियाँ  बमुश्किल  मेरी स्मृति में थी मैं पूंछता भी था कभी  कभी अपने मित्रों से पर जवाब नहीं मिलते थे ..कभी बहुत कोशिश भी नहीं की ..अचानक  एक दिन कई बार कुछ शब्दों  के हेर फेर  के साथ  खोजने पर गूगल ने “एक तिनका” मुझे लौटा दिया जो बचपन में कही खो गया था …जी हाँ अयोध्या  सिंह  उपाध्याय  “हरिऔध” का वह एक तिनका …जाहिर हैं खुशी तो होगी और बहुत हुई …आप सभी से भी ये एक तिनका साझा कर रहा  हूँ  इस उम्मीद के साथ की इस तिनके की ताकत कभी न भूलिएगा …..

 

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मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन सा।
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे।
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया।
तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिये।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा।
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

 

 

कृष्ण कुमार मिश्र  ऑफ़ मैनहन (एक तिनका जो अभी भी है मेरी आँख में ! मैं चाहता भी नहीं की ये निकले, ताकि स्वयं का भान रहे सदैव  ..भूलूं नहीं … )

कृष्ण कुमार मिश्र* बरवर का ध्वस्त साम्राज्य- जो बाछिलों के गौरवशाली अतीत का प्रतीक है

महाभारत काल की प्रसिद्ध विराटपुरी खीरी जनपद के बड़खर को कहां जाता है जहॉं आज भी प्राचीन मूर्तियां, शिवलिंग व ध्वंशावशेष मिलते हैं। मध्य भारत के बाछिल रजवाड़े जो खीरी, पीलीभीत जनपदों पर काबिज थे इन राजाओं की सत्ता का मुख्य केन्द्र था बड़खर जहॉं विशाल किला निर्मित था इनके अन्य सत्ता केन्द्र थे निगोही-शाहजहॉंपुर, दीवाल-पीलीभीत और कैम्प शारदा-खीरी जहॉं से ये अपनी प्रशासनिक कारगुजारियां संचालित करते थे। इसी वक्त का एक भव्य किला था बरवर में वह जगह अब दिलावर नगर के नाम से जानी जाती है। सबसे खास बात यह है कि ये बाछिल क्षत्रिय अपने आप को पौराणिक राजा वेंना का वंशज कहते थे जो महाभारतकालीन राजा विराट के पिता थे। इन बाछिलों का जिक्र एतिहासिक दस्तावेजों में सन 992 ईस्वी तक का ही इतिहास प्राप्य है जब ये खीरी के पश्चिम में पीलीभीत तक अपना साम्राज्य विस्तारित किये हुए थे किन्तु 992 ईस्वी से लेकर सन 1600 ईस्वी तक के मध्य का इतिहास अस्पष्ट है शताब्दियों से शासन कर रहे बाछिल तुगलकशाह व फिरोजशाह की हुकूमत में थोड़ा बहुत अवश्य विचलित किये गये लेकिन शहजहॉं का शासनकाल आते-आते खीरी पर पूर्ण रूप स बाछिलों का आधिपत्य हो चुका था जिसमें धौरहरा, निघासन, भूड़, खैरीगड़ स्टेट (आज का दुधवा नेशनल पार्क) इलाके इनके आधिपत्य में थे पौराणिक राजा विराट के बाद यदि कोई बाछिल राजा महत्व पा सका है तो वह बरवर का  बाछिल राजा छिप्पी खान था असल में छिप्पी खान इस राजा का असली नाम नही था यह नाम तो दिल्ली सरकार द्वारा दी गयी एक उपाधि थी इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है- एक बार कर्रा मानिकपुर में दिल्ली सरकार के विरूद्ध विद्रोह भड़क उठा जिसे कुचलने के लिए शाहजहॉं ने बरवर के बाछिल राजा को भेजा और इस व्यक्ति ने बड़ी बर्बरता  से विद्रोह को कुचला यह राजा कत्ल-ए-आम में माहिर व भयानक कृत्य करता था जिससे इसकी पोशाक रक्त के छींटों से (छीप) रंग जाती थी इन्ही छींटों के कारण यह व्यक्ति दिल्ली राज में व जनमानस में छिप्पी खान के नाम से जाना गया। कहा जाता है कि इस व्यक्ति ने एक-एक विद्रोही के सिर धड़ से अलग किये और तलवार से उनके धड़ों को क्षत-विक्षत कर दिया इस युद्ध में बाछिल राजा की रक्तरजिंत तलवार व रक्त से सने कपड़ो को देखकर शाहजहॉं ने इस योद्धा को छिप्पी खान की उपाधि से नवाजा। इसके बाद छिप्पी खान ने अपने अधिकार में अन्य जागीरें भी शमिल की, एक विशाल जागीर का मालिक बन जाने पर इस राजा के मन में खैराबाद सरकार (दिल्ली सरकार की एक कमिश्नरी) से नाता तोड़ने का खयाल आ गया ताकि वह इस समृद्ध रियासत पर स्वन्तंत्र हुकूमत कर सके इस कारण इसने चौका नदी के घनें जंगलो के मध्य अपना अभेद्यय दुर्ग बनवाया और यहीं से सत्ता का संचालन करने लगा अब तक दिल्ली पर शाहजहॉं का राज खत्म हो चुका था और उसका बेटा औरंगजेब अपने पिता शाहजहॉं को सत्ताच्युत करके खुदमुख्तार बन गया था उसने छिप्पी खान पर कुपित होकर राजपूताना (राजस्थान) के चौहान राजा छत्रभोज को छिप्पी खान को रियासत से बेदखल कर देने का हुख्म जारी कर दिया छत्रभोज ने शाही सेनाओं के साथ बाछिलो के साम्राज्य पर हमला बोल दिया और छिप्पी खान को गिरफ्तार कर लिया इस लड़ाई में छत्रभोज की सेनाओं नें छिप्पी खान के किलों को भी ध्वस्त कर दिया छिप्पी खान को 18 महीनों तक रखा गया और फिर तलवार से उसका सर कलम करने का फरमान जारी किया गया छिप्पी खान की हत्या के बाद  पिहानी के सैयदांे नें छिप्पी खान के सत्ता के हेडक्वार्टर बरवर पर अपना अधिकार कर लिया बाछिल राजा छिप्पी खान के 11 भाई थे जिनमें दिल्ली सरकार के प्रति बहुत आक्रोश था उन्होने बगावत भी की पर वह अपना छिना हुआ साम्राज्य कभी वापस न ले पाए अंततः वह डाकुओं की तरह जीवन यापन करने लगे इनमें से एक भगवन्त सिंह नामीं डाकू हुआ जिसका खौफ कठना नदी के जंगलों में इस कदर था कि अंग्रेज इन्तजामियां भी इससे डरती थी।

बाछिल राजा छिप्पी खान का वह विशाल किला खण्डहर के रूप में आज भी विद्यमान है बरवर का यह किला जो बाद सैयद राजा मुक्तदी खान जो गोपामऊ के गर्वनर रहे मुर्तजा खान का पोता था, ने अपने कब्जे में ले लिया अब बाछिलों की यह जागीर सैयदों के पास आ गयी थी, यह रियासत सैयद मुर्तजा खान को दिल्ली सरकार ने मालगुजारी से मुक्त (रेन्ट फ्री) कर के दी थी मुक्तदी खान बरवर चतुष्कणीय विशाल किले का निर्माण कराया इसके अलावा बाछिलो के पुरानें किले पर भी निर्माण कार्य कराए गये, आज दिलावर नगर का यह किला अपने वैभवकाल का प्रतीक चिन्ह है इस विशाल दुर्ग का मुख्य दुर्गद्वार अभी भी मौजूद है। सैयदों की शासन व्यवस्था में निर्मित शाही हमाम, कुऑं, व अन्य छोटी इमारतें आज भी सुरक्षित हैं हांलाकि विशाल टीले पर बना यह दुर्ग विभिन्न प्रकार की झाड़ियों, जगली पुष्पों व जीव-जन्तुओं का बसेरा बन चुका है। लेकिन इन झाड़ियों में विलुप्त हो रही गौरैया अच्छी सख्या में दिखायी दी यह बात पंक्षी प्रेमियों के लिए अवश्य सुखद होगी, स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक यहॉं अक्सर लोग खजानें की तलाश में आते हैं और जगह-जगह पर खुदायी करते हैं इस बात के प्रमाण के तौर पर कई स्थानों पर गडढे मौजूद हैं।

सैयद राजवंश के वर्तमान वारिस नवाब सैयद आरिफ हुसैन ने बताया कि उनके ही खानदान के एक शख्स जो सूफी थे जिनका नाम नवाब अली रजा था इन्होने विवाह नही किया और जीवन पर्यन्त दिलावर नगर के प्राचीन बाछिलों के किले में रहे उनकी मजार भी इसी किले के भीतर ही बनवायी गयी स्थानीय लोग इस मजार पर सजदा करते है नवाब आरिफ हुसैन इस किले को सूफी नवाब अली रजा़ की स्मृति में एक धार्मिक स्थल के रूप में विकसित करना चाहते हैं। मोहम्मदी निवासी फज़लुर रहमान ने बताया कि अब इस स्थान पर लोगो का अतिक्रमण बढ़ रहा है साथ ही साथ पास के साउथ खीरी फारेस्ट की जमीन पर भी लोगों की नजर है

बाछिलों का यह अतीत आज भी इस प्राचीन किले के रूप में सरक्षित है जो ग़दर के वक्त लगभग नष्ट कर दिया गया था बाछिलों के साथ-साथ ग्रेट सैयद फैमिली का रोचक इतिहास भी यह किला अपने में सजोंये हुए है दो संस्कृतियों की यह विरासत यदि पुरातत्व विभाग व स्थानीय इन्तजामिया द्वारा संरक्षित व विकसित न की गयी तो जल्द ही यह हजारों वर्ष का इतिहास गर्त में समा जाएगा और हमारी अगली पीढ़ी अपने इस अतीत से वंछित हो जाएगी हांलाकि यह वह वक्त था जब सत्ता को हासिल करने के लिए सारे वसूल व सम्बंधों को दरकिनार कर दिया जाता था और व्यक्ति सत्ता के लिए किसी का भी कत्ल व किसी से भी बगावत करने में नही चूकता था किन्तु अतीत अपना ही होता है चाहे वो कितना ही बुरा क्यों न हो और अतीत का संरक्षण व अध्ययन हमारे भविष्य का पथ प्रदर्शन में सहायक होता है।  इसलिए धूल की परतों की तरह विभिन्न सभ्यतायें एंव संस्कृतियों की परतों से युक्त हमारा इतिहास जिसे बड़ी जिम्मेंदारी व सावधानी से सहेजकर एक-एक परत का अनावरण कर उन संस्कृतियों को पढ़ना होगा ताकि हमारी बिखरी एतिहासिक कड़ियां आपस में जोड़ी जा सकें।

-कृष्ण कुमार मिश्र
77-शिव कालोनी कैनाल रोड
लखीमपुर-खीरी-262 701
दूरभाष- 05872-263571

09935983464

09451925997

१६ दिसम्बर २००९, खीरी (उत्तर प्रदेश)जनपद का यह वीभत्स हादसा, राजा लोने सिंह मार्ग पर घटित हुआ।  जो तकरीबन ५५ किलोमीटर लम्बा है, लखीमपुर से मैंगलगंज तक। जिसमें पांच यात्रियों की मृत्यु हो गई। जबकि लगभग सभी सवार घायल हुए है जो जिला अस्पताल में भर्ती है, मितौली कस्बे के आगे कठना नदी पर स्थित पुल से पहले ये हादसा हुआ जहां  साइकल सवार को कुचल कर ड्राइबर चलती बस को छोड़ कर कूद गया और बस कठना नदी की कटरी मे पलटती हुई नीचे जा गिरी। ये बात औरंगाबाद निवासी दिलदार और मैनहन निवासी नेतराम मिश्र  ने बताई ये दोनों व्यक्ति  जिला अस्पताल में भर्ती है।

मृतकों में तीन व्यक्ति मितौली थाना क्षेत्र के है, जिसमें अरविन्द मिश्र ग्राम ओदारा, अब्दुल मज़ीद व अर्विन्द सिंह मितौली कस्बे के निवासी थे। जोगेश्वर नाम का व्यक्ति सीतापुर का बताया जा रहा है। जबकि एक व्यक्ति की शिनाख्त अभी नही हो पायी है।

घायलों व स्थानीय प्रत्यक्षदर्शीयों के मुताबिक मृतकों की सख्या अधिक बताई जा रही है।
दोषी परिस्थित है जिसे हमने बनाया है बदहाल सड़के, खटारा बसे, ट्रैफ़िक नियमों का उल्लघन! और इस सड़क के फ़ुटपाथ का गायब हो जाना। लखीमपुर से मैगलगंज(माइकल गंज)  तक के सकरे मार्ग पर यातायात का दबाव, जहां ट्रक, बैलगाड़ी, बस और ट्रैक्टरों की बढ़ती तादाद के बावजूद शासन व जनप्रतिनिधियों ने इस तरफ़ कोई ध्यान नही दिया। कभी सड़कों पर मौजूद गढ़्ढ़ों पर  फ़टी बुशर्ट पर प्योंदें लगाने जैसा फ़र्ज़ी काम हुआ तो कभी सड़क की चौड़ाई बढ़ाने के लिए नाप-जोख। जानकार बताते हैं कि इन गढ़्ढों की मरम्मत में भी पेंच होता है, जहां सड़क ज्यादा खराब होती है उसे नही ठीक किया जाता है, और जहां स्थित थोड़ी ठीक होती है उसमें पच्चीकारी कर दी जाती है ताकि निरीक्षण के दौरान वे उन अधिक टूटी सड़क को दिखा कर बता सके कि ये रोड इतनी खराब थी जिसे उन्होंने ठीक किया हैं। इसके अलावा भारत का नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी को इन अफ़सरों और ठेकेदारों पर डालकर आराम फ़रमाता है, हम किसी भी सरकारी काम में हस्तक्षेप करने से गुरेज करते है लेकिन क्यों?

उत्तर प्रदेश की बढ़ती जनसख्या और यातायात के संसाधन, जिनके लिए अब सड़के और शहर सकरे और छोटे होते जा रहे है किन्तु हमारे मुल्क का अनियोजित विकास समस्याओं को और बढ़ाता जा रहा बज़ाए उन्हे नियोजित करने के।

यहां मैं ईश्वरवादी हो गया!  क्योंकि मैं जानता हूं कि ये मरने वाले आम इन्सान थे, और घटना भी आम, हमारे मुल्क में सड़क दुर्घटना को सामान्य घटना ही माना जाता है, और इनमे मरने वालों के प्रति न तो मन्दिर-मस्ज़िदों मे प्रार्थना होती है और न ही राष्ट्रों के राष्ट्रा्ध्यक्ष शोक सभाओं का आयोजन करते है, क्योंकि ये मौते न तो  २६/११ की तरह किसी आंतकवादी घटना का परिणाम होती है, और न ही साम्प्रदायिक दंगों में। यहां न तो किसी का बल्ला चल रहा होता है, और न ही किसी टी०वी० शो में कम्पटीशन, न ही  कोई नेता या फ़िल्मी स्टार भी पांच सितारा अस्पताल में  होता है ! इनके लिए दुआए सिर्फ़ इनके घर वाले करेंगे न कि………………..!!!

इस लिए मेरे लिए ये जरूरी हो जाता है कि मै ईश्वरवादी हो जाऊ, अपने उन लोगों के लिए, जिनके रंगों में उसी धरती का अन्न, व पानी खून बन कर दौड़ रहा है जो मेरी रंगों में।

मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि उन्हे शान्ति प्रदत्त करे, वे मनुष्य जिन्होंने अपने-अपने परमात्मा को भी जुदा-जुदा कर लिया और दोज़ख व जन्नत को भी, उन सभी के लिए,  उन सभी के ईशों से, मैं कुछ पल हिन्दू तो कुछ पल मुसलमान बनकर, ताकि वह उन सब पर रहम करे, और अपनी शरण में ले। वह सुन्दर रचना करने वाला, अपनी इन रचनाओं को जो घायल और तकलीफ़ में है, उन्हे स्वस्थ्य करे।

मेरी ये प्रार्थना वह जरूर सुनेगा, क्योंकि मैं………………..धर्म जीना सिखाता है और ईश्वर जीवन के रास्ते पर चलने का साहस देता है। एक पिता की तरह।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

कही ककरहा ताल सरोवर निर्माण की अदभुत परंपरा तो नही !

कल रात में खीरी के एक गांव छाऊछ जो शहर से जुड़ा हुआ है, में मैं मेरे मित्र हिमाशु तिवारी के घर पर था, अलाव जल रहा था और मेरी गुफ़्तगू चाचा श्री प्रकाश चन्द्र तिवारी जी से शुरू ए हुई मामला पौराणीक बातो तक गया और फ़िर गहराई लेते हुए महाभारत काल तक, कई चीज़े सामने आई जिनसे मै बिल्कुल अनिभिज्ञ था, इस शब्द के बारे में मेरा मानना है, कि अनिभिज्ञता ही जीवन में उल्लास और संवेदनशीलता लाती है, और जिज्ञाशा भी ! नही तो हम बुद्ध हो जाये और संसार की व्यवस्था देवलोक जैसी किसी व्यवस्था में तब्दील हो जाये और यह भयानक परिवर्तन कैसे परिणाम देंगा यह सोच कर मै विचलित हो जाता हूं खैर बात शब्दों की हो रही है ।

छाऊछ में मध्यकाल के किसी राजा की गढ़ी के अवशेष है किन्तु उनका इतिहास अब विस्मृत हो चुका है।

रानी विजया कुंवरि आफ़ महेवा

यही मुझे मालूम हुआ कि लखिमपुर में बेहजम बस अड्डे के पास एक पक्का तालाब और एक सुन्दर बगीचा जिसमें एक खूबसूरत निवास स्थान बना है आज वह मन्दिर का रूप ले चुका है किन्तु संगमरमर से सजाया ये सरोवर और इमारत कभी महेवा रियासत की रानी विजया कुंवरि का प्रसाद हुआ करता था और यह सरोवर उनके जल क्रीड़ा का स्थान किन्तु उनके बनारस चले जाने के बाद उनकी जमीने जिन्हे उन्होने ने अपने सेवकों के हवाले कर दी थी और एक सन्त ने इसे मन्दिर का रूप दे दिया।

इतिहास की ये झलकियां मुझे और जानने की जिज्ञासा की ओर दौड़ने को कह रही है। मैं जब उस जगह पहुंचूगा तो आप सब को मिलूंगा एक नई कहानी के साथ!

वालदा

इस शब्द को जानने से पहले बग्गर शब्द को जान लेना जरूरी है, बग्गर गांवों में प्रचलित शब्द है जो उस स्थान को कहा जाता है जहा मवेशी पाले जाते है और उनके खाने आदि की व्यवस्था यह स्थान एक मैदान जो घिरा भी हो सकता है फ़ूस-टटिया से कांटों से या चारदिवारी से मध्य में वृक्ष आदि और एक घारी(कच्ची निट्टी का बना घर ) और उसके आगे छप्पर, घारी में भूसा, चारा वगैरह और कृषि संबधी उपकरण रखे जाते है और उसके आगे के छप्परों में मवेशियों के रहने की व्यवस्था। और इस घारी और छप्पर वाले स्थान को वालदा या वाल्दा कहते है। अर्थात बग्गर में बना मवेशियों का घर वालदा कहलाता है।

छाऊछ में कुछ एतिहासिक प्रमाण_

मै उत्सुक रहता हूं ग्रामीण भाषा के शब्दों और उनके इतिहास को और यही उत्सुकता मुझे ले गयी छाऊछ के कुछ एतिहासिक स्थलों में मेरे यह पूछने पर कि चाचा गांवों में ककरहा नाम ताल क्यों होते है उनका भी जवाब मेरे अनुमान से मिलता जुलता है क्योंकि मैनहन, दुधवा और अन्य स्थानों पर तमाम तालों के नाम ककरहा या इससे मिलते जुलते है और इन सब जगहों से भी मैं परिचित हूं, तालाब की तलहटी में कंकड़ होना ही इस शब्द कि उत्पत्ति का कारक बना, किन्तु इन सभी ककरहा तालों में ये कंकड़ कहां से आये जबकि इनके बिल्कुल समीप के तालों की तलहटी में चिकनी मिट्टी मौजूद है?

मैनहन में ककरहा ताल से जुड़ा हुआ कुण्डा ताल जिसमें चिकनी मिट्टी है और वह ग्रामीणों द्वारा डेहरिया, कच्चे घरों की मरम्मत और मिट्टी के बर्तन बनाने में इस्तेमाल होती रही है।

मैं सोचता हूं कि कही ये तालाब निर्माण की कोई व्यवस्था तो नही थी जिसमें इसकी तलहटी में कंकड़ डाले जाते हों ताकि सोतों से स्वच्छ पानी छन कर आये और उसमे नहाने वाले लोगों के पैर मिट्टी में न धंसे और यदि कोई चीज़ तालाब में गिर जाये तो वह मिट्टी-कीचड़ में पैबस्त न होने पाये बल्कि तलहटी में कंकड़ों पर सुरक्षित रहे। यहां एक बात गौरतलब है कि ये  कंकड़ नुकीले न होकर गोल है ताकि मनुष्य और जानवर दोनों के पैर सुरक्षित रहे, छिद्रदार कंकड़। झाऊ पत्थर के………………।

तालाब निर्माण की तकनीक जो प्रचलित थी हमारी प्राचीन ग्रामीण सभ्यता में। कुछ आप भी सोचिये और बताइये।

और यह तकनीक जोड़ती है उन सब क्षेत्रों को जहां ककरहा ताल है और उन लोगो को भी .ये सभी एक ही परंपरा के लोग रहे होगे।

चाऊछ में भी मुझे पता चला ककरहा ताल के पास मठहा ताल है उसमें कंकड़ नही है और वहां पांच मठ बने हुए है इतिहास में इसके प्रमाण है कि विराटपुरी खीरी जनपद के बड़खर गांव में थी और यह सारे क्षेत्र उसी राज्य की सीमा में थे इस लिये अज्ञातवास के सम्य पाण्डवों के दुर्दिन भी इन तमाम जगहों पर बितीत हे जिनमें छाऊछ का जिक्र मैने पहली बार सुना जबकि आज के दुढवा टाइगर रिजर्व के जंगलों में कई स्थानों पर पाण्डवों के निवास करने की बाते कही जाती है।

इन मठॊ में चार मठ एक स्थान पर और एक थॊड़ा अलग और विशाल, कहते है पांचाली इसी मठ में रहती थी और इस मठ के द्वार पर जिसकी खड़ाऊ मौजूद होती थी तो यह अन्य भाईयों में मान लिया जाता था कि आज द्रौपदी के साथ रात्रि विश्राम कौन कर रहा है!

कोयल बोले या गौरैया अच्छा लगता है
अपने गाँव में सब कुछ भैय्या अच्छा लगता है