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….ताजमहल जिसका नामो-निशान मिट जाता !

नष्ट हो जाता मध्य-कालीन भारत का यह अदभुत व सुन्दर अतीत

भारत के इतिहास की एक झांकी ताज के बहाने…

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक

मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से..!

साहिर लुधियानवी (१९२१ – २५ अक्टूबर १९८०) की गज़ल की कुछ लाइनें पेश है, जिन्हे मेरे अजीज नें मुझे भेजी, और मैं बावस्ता हुआ इस एहसास से, उनके शब्दों में मुफ़लिसी की पीड़ा, मायूसियत के भाव, हीनता की विडंबना को बड़ी खूबशूरती से पिरोया है, उनकी इन पंक्तियों के सहारे मुझे खयाल आया कुछ किस्सों का जो जुड़े है इस बेहतरीन इमारत से, और भारतीय पुरातात्विक मसलों सें ।

कौन नही जानता इस कब्र को जिसमें मोहब्बत के एहसासात सफ़ेद मार्बल के तौर पर गुथे हुए हैं इस आलीशान इमारत में, जो आज एक मशहूर पर्यटन स्थल, जिससे जुड़ी है तमाम कहानी किस्से कुछ झूठे कुछ सच्चे ! पर मैं बात करूंगा कुछ चुनिंदा वाकयात की जो अहम हैं।

लार्ड विलियम हेनरी कैन्डेविश बेन्टिक, सती प्रथा, और ताजमहल

ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के गवर्नर जनरल (1828-1835) लार्ड विलियम हेनरी कैन्डेविश बेन्टिक (1774-1839) ने ताजमहल को ढहाने के आदेश जारी कर दिए थे, और उसके निर्माण में लगी तमाम बेशकीमती चीजों को बेच देने की मंशा जाहिर की थी। खासतौर से इमारत में इस्तेमाल हुए संगमरमर को। यह वही शख्स है जिसने भारत में सती प्रथा पर पूर्ण प्रतिबन्ध (बंगाल प्रेसीडेंसी में) का फ़रमान जारी कर दिया था, वह दिन चार दिसम्बर 1929 ई० था। ताजमहल हो नष्ट कर देने की चर्चा उस वक्त इंग्लैंड से लेकर पूरे हिन्दुस्तान में थी, बेन्टिंक ने आगरा फ़ोर्ट में अलग हुए संगमरमर की विक्री कर दी थी, और ताजमहल को एक फ़ालतू इमारत मानते हुए उसे भी ढहा कर संगमरमर की नीलामी का आदेश पारित कर दिया था, बताते है, आगरा में नीलामी को लेकर कुच दिक्कते आई जिसके चलते गवरनर जनरल ले अपना इरादा बदल दिया। इस वाकये का पुख्ता जिक्र ई० वी० हैवल की पुस्तक  “इंण्डियन स्क्लप्चर एंड पेंटिंग” में मिलता है उन्होंने लिखा कि गवर्नर जनरल बेन्टिक पूरी तरह से ताजमहल को तबाह कर उसके संगमरमर को नीलाम कर देना चाहते थे, किन्तु आगरा फ़ोर्ट के संगमरमर की नीलामी से असंतुष्ट होने के कारण उन्होंने अपना इरादा बदला था। जी०टी० गैरट ने हैवल के शब्दों से अधिक तीक्ष्णता से इस बात को कहा। काफ़ी बाद में सन 1948 ई० में एच०जी रालिन्सन ने तो कमाल ही कर दिया, उन्होंने कहा कि कम्पनी सरकार के समय के लोग बिल्कुल असभ्य व मूर्ख थे, नतीजतन उनसे ऐसे ही फ़ैसलों की उम्मीद की जा सकती थी, जो सिर्फ़ सत्ता को स्थापित करने के लिए थी।

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भारतीय पुरातत्व सरंक्षण (ASI)

सन 1904 में लार्ड कर्जन के भारत आगमन पर पुरातात्विक महत्व की चीजों को पुख्ता सरंक्षण प्राप्त हुआ।, कर्जन स्वयं एक विरासत प्रेमी थे, और उन्होंने स्मारकों (निशानियों, यादगार) के सरंक्षण का कानून पारित किया। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अन्तर्गत कार्य करने वाला संगठन है, जो पुराने स्मारकों के सरंक्षण व संवर्धन में पिछले 100 वर्षों से अधिक समय से कार्य कर रहा है। माना जाता है, ए०एस०आई० की नींव सन 1764 में पुरातत्ववेत्ता विलियम जान के प्रयासों से हुई, जब इन्होंने  एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना की थी। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया की औपचारिक स्थापना सन 1871 में की गयी। इसकी स्थापना का श्रेय अलेक्जेंडर कनिंघम को जाता है, जो उस वक्त ब्रिटिश इण्डिया के बंगाल में इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। और अलेक्जेंडर कनिंघम को ही ए०एस०आई० का प्रथम डाइरेक्टर जनरल बनने का गौरव प्राप्त हुआ, आज से ठीक 140 वर्ष पूर्व। पुराने स्मारकों, नवीन खुदाई स्थलों से प्राप्त जानकारियों के विषय में संकलन व प्रकाशन ए०एस०आई० द्वारा समय समय किया जाता है, इसी संस्था के सन 1924 में डाइरेक्टर जनरल जॉन मार्शल द्वारा सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज की औपचारिक घोषणा सन 1924 में की। यह खोज भारतीय इतिहास की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में से एक थी, इसी खोज ने मार्शल को रातो रात ब्रिटेन और भारत के अतिरिक्त सारी दुनिया में हीरो बना दिया। प्रत्येक राज्य में ए०एस०आई के कार्यालय मौजूद हैं, जहां से सरंक्षण की गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है। सन 1902 में जॉन मार्शल द्वारा पुरातात्विक वस्तुओं के सरंक्षण व संवर्धन में बनाई गयी नीति इतनी बेहतर व दूरगामी सोच का परिणाम थी कि हम सब आज भी उसी निति के कायल है, “किसी भी ध्वंश पुरातात्विक वस्तु का पुनर्निर्माण तब तक वर्जित है, जब तक कुशल कारीगर व तकनीक और उचित निर्माण सामग्री प्राप्त न हो, जो उस ध्वंश प्राचीन वस्तु को हुबहू निर्मित कर दे , अन्यथा उस प्राचीन स्मारक आदि को यथा स्थिति में ही सरंक्षित रखा जाए”।

किन्तु ASI के तमाम नियम कानूनों के बाद ASI द्वारा सरंक्षित स्थलों पर बेन्टिक के उस नीति का खुला उल्लंघन हो रहा है, जो पुरातात्विक महत्व की चीजों के लिए मुफ़ीद है, लखीमपुर खीरी के ओयल (ब्रिटिश-भारत की एक रियासत) द्वारा बनवाये गये विश्व प्रसिद्ध मेढक मन्दिर व अन्य प्राचीन इमारतों के जीर्णोंद्धार के नाम पर सीमेन्ट बालू व मौरंग का प्रयोग कर दिया गया, जो कि उन पदार्थों से बिल्कुल भिन्न है, जिनसे ये दीवारे, कलाकृतियां निर्मित हुई थी, यह मेढ़क मन्दिर उत्तर प्रदेश में पुरातत्व विभाग द्वारा आर्कियोलाजिकल साइट के रूप में दर्ज है। यानि हम सही बात को भी स्वीकार करना नही जानते जो हमारे लिए और हमारे एतिहासिक गौरव के लिए लाभप्रद है।

ऐसे हुआ ब्राह्मी लिपि व सम्राट अशोक के फ़रमानों का पर्दाफ़ास

ब्राह्मी लिपि को पहली बार 1830 में समझा गया,  ए०एस०आई० संस्था के सचिव जेम्स प्रिंसेप द्वारा। इस लिपि को पढ़ लेने व समझनें की खोज से भारतीय अतीत के तमाम रहस्य प्रकाश में आये। सम्राट अशोक के राजाज्ञा को जाना गया इस लिपि को समझने के पश्चात, यह एक अदभुत खोज थी।

मौजूदा समय में एक आकलन के मुताबिक भारत में 50,000 स्मारक है, जबकि  ए०एस०आई० द्वारा चिन्हित व सरंक्षित स्मारकों की संख्या मात्र 7000 (राज्य व केन्द्र द्वारा संयुक्त प्रयास)  हैं। ये दुर्भाग्य ही है कि स्वंत्रता प्राप्ति के 62 वर्षों के उपरान्त भी हम विरासत के सरंक्षण में हम अंग्रेजों से बहुत पीछे हैं। और उन्ही के अध्ययन की बार-बार नकल कर अपने आप को ज्ञानी व इतिहासकार साबित करने की नाकाम कोशिशे करते रहते है !

विरासत के प्रति हमारा यह कैसा मोह है, कि अपने अतीत को महिमा मंडित करने से कही नही चूकते, झूठ पर झूठ बोल कर स्वयं और अपने गरीब व अनपढ़ पूर्वजों को महान बनाने की चेष्टा करते है, बल्कि तमाम खण्ड काव्यों की रचनायेंभी, जिनमे अतिशयोक्ति के अतिरिक्त कुछ नही ! अफ़सोस कि हम ईमानदारी से अतीत को दर्ज करना और उसका सरंक्षण करना आज भी नही सीख पायें, उन मास्टर्स से भी नही जिन्होंने हमारे मुल्क पर सदियों राज किया ।

क्या हम इतिहास की महत्ता को स्वीकार कर कुछ करते है, अपने आस-पास के उस वर्तमान का संकलन, जो कल को इतिहास बनने वाला है ?

जिसका अतीत ही अनिश्चित, अनिर्णित, अस्पष्ट व अज्ञात हो,  उसके वर्तमान व भविष्य का ईश्वर मालिक !

कृष्ण कुमार मिश्र

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन हाउस

77, कैनाल रोड, शिव कालोनी

लखीमपुर खीरी-262701

भारतवर्ष

email- krishna.manhan@gmail.com

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नैनादेवी मन्दिर

१८१७ ई० में कुमायूं के कमिश्नर मिस्टर जी० ड्बल्यू० ट्रैल ने नैनीताल की यात्रा की, किन्तु यह स्थान दुनिया की नज़र में शकर व्यवसायी पी० वैरन के द्वारा सन १९३९ ई० में आया, और इसी व्यक्ति ने यहां योरोपीय उपनिवेशियों की रिहाइस गाह बनाई।

शिवालिक पहाड़ियों पर मौजूद एक कटोरे नुमा झील के चारो तरफ़ बसा ये शहर जनश्रुतियों व पुरानों के मुताबिक शिव पत्नी सती की आंख यानी नैन के गिरने से बनी यह झील ६४ शक्ति पीठों मे से एक माना जाता है। इस झील के उत्तर-पश्चिम किनारे पर नैना देवी का मन्दिर है।

पुराणों मे सप्त रिषियों में से तीन रिषियों का जिक्र भी मिलता है। स्कन्द पुरान में पुलस्त्य, पुलाह और अत्रि के आने का वर्णन है, इन रिषियों की हिमालय यात्रा के दौरान जब प्यास लगी तो उन्होंने यहां एक जलाशय का निर्माण कर उसे मानसरोवर के जल से पवित्र कर तीर्थ में परिवर्तित कर दिया।

अंग्रेजी हुकूमत में, सन १९४१-४२ ई० में  इस सुरम्य पहाड़ी स्थल की चर्चा अग्रेजों की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता से लेकर लन्दन तक में होना शुरू हो गयी थी।

पहाड़ियों से घिरी यह झील और इसके आस-पास की तमाम झीलें आकर्षण का केन्द्र बन गयी और प्रत्येक योरोपीय नागरिक यहां बसने की लालसा लेकर आने लगा। बाद में ब्रिटिश-भारतीय सरकार ने  नैनीताल को यूनाइटेड प्रोविन्सेज की गर्मियों की राजधानी घोषित कर दिया। और इसी दौरान यहां तमाम योरोपीय शैली की इमारतों का निर्माण हुआ, गवर्नर हाऊस और सेन्ट जान चर्च इस निर्माण कला के अदभुत उदाहरण है।

नैनीताल जनपद अब उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत है, और एक बेहतरीन पर्यटन स्थल जहां पूरे वर्ष देश-विदेश के पर्यटकों का आगमन जारी रहता है। यह शहर समुन्द्र तल से १९३४ मीटर की ऊचाई पर स्थित है।

यहां की आबोहवा और सुन्दर प्राकृतिक दृश्य मन को सकून देते ही हैं साथ ही आप की देव भूमि में उपस्थित का एहसास भी कराते हैं।

हांलाकि पर्यटन का बढ़ता दबाव इस शहर के मिज़ाज़ बदल रहा है।  भूस्खलन के कारण पवित्र देवदार, ओक, पांगर, पहाड़ी पीपल, सुरई, कुन्ज, अखरोट, हिसालू, किलमोरा आदि के वृक्षों को जो नुकसान पहुच रहा है उसकी भरपाई पुन: वृक्षारोपण से नही की जा पा रही है।

पहाड़ के इस शहर की सुन्दरता लाजवाब है जिसका जिक्र करने में मैं अपने आप को अक्षम पा रहा हूं, कभी आप आ के खुद महसूस कर लीजिए!

खुरपाताल, नैनीताल

एक बात-चीत नैनीताल के सम्मानित बाशिन्दे से, जिनकी तीन पीढ़िया इस शहर को देखती आई है, जिन्हे अफ़सोस है कि शहर तेज़ी से अपना मिज़ाज़ बदल रहा है जो कि खतरनाक है। वह इसे कु्छ यूं परिभाषित करते है कि इस शहर का अपना कुछ नही, न तो लोग और न ही संस्कृति यानी तहज़ीब!

कुछ भी नही है अपना इस शहर का !!!

कभी विदेशी शासको की एशगाह रही ये नगरी अब भारतीय धनाढ्य वर्ग की रिहाइस गाह बन चुकी है, जिनकी मेट्रोपोलिटन तहज़ीब इस शहर को कुछ भी देने में अक्षम है सिवाय धन के।

मैने उनसे कहा कि कोई भी इन्वैसिव स्पसीज़, नेटिव स्पसीज़ पर डामिनेन्ट होने की क्षमता रखती है फ़िर चाहे वह विदेशी हो या देशी! मेरा मतलब था वे लोग चाहे सात समन्दर पार से आकर कब्ज़ेदार बने हो इस नगर के, या सात सौ कि०मी० से आये हों। सभी ने पहाड़ के स्थानीय निवासियों का शोषण किया, नतीजतन वो आज भी उसी बदहाली में जीने को मज़बूर है जैसे १०० वर्ष पहले अग्रेजी राज में थे।

किन्तु मैं कुछ बसुधैव कुटुम्बकम वाले सिद्धांत का अनुगामी होकर बोला भाई कुछ तो बेहतर है इस नगर में विभिन्न संस्कृतियों के लोग अपने गुणों को भी छोड़ जाते है, बुराईयों के साथ-साथ………..विभिन्नता में एकता……..और विभिन्न तहजीबों का संगम है आप का शहर। पं० नेहरू के उत्तर भारत की तरह विभिन्न संस्कृतियों का कटोरा…!!

तो उनका जवाब था हां मिश्रा जी, बिल्कुल किसी गंदले पानी की तरह!

मैने अब बस इतना ही कहा कि भाई लूट लिया आप ने………………मै लाजवाब था।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारतवर्ष

तोता

यह तस्वीर मैने कतरनियाघाट वाइल्डलाइफ़ सेंक्चुरीं में खीची थी

“एक बालक की सुआ पालने की ख्वाइश जो कभी पूरी नही हो सकी

“क्योँकि आज ये बालक इन परिंदोँ के परोँ को हवा देने की कोशिश कर रहा है जो तड्पते विलखते हुए लोहे के पिँजरोँ मेँ कैद है, क्या आप सब इस मिशन मेँ उसके साथ है”

My first expedition

मेरे जीवन की पहली जंगल यात्रा जो बिल्कुल अलग थी मेरी आज की यात्राओं से….

बात मेरे बचपन की है, मै तकरीबन १० वर्ष का रहा हूंगा, मेरे घर से कुछ दूर पर मेरा बग्गर था जहां पालतू जानवर रहते थे, भैसें, बैल आदि, वैसे तो मेरे बाबा और पिता जी का आना-जाना उस जगह पर लगा रहता था, उस जगह एक झोपड़ी जिसमे जानवरों का खाना यानी भूसा इकट्ठा किया जाता था और बग्गर के प्रांगण में महुआं और आम के वृक्ष थे। उस इलाके में रहने वाले बच्चे मेरे दोस्त थे, दरअसल यह बग्गर दलित बस्ती में था चूंकिं ये गांव के उत्तर-पूर्व में बिल्कुल आबादी के आखिरी छोर पर था तो यहां से दूर-दूर तक फ़ैलें खेत और उनमे लहराती फ़सले एक सुन्दर नज़ारा पेश करती थी!

अक्सर मैं उस बस्ती के बच्चों के साथ खेलता था, और उन बच्चों में तमाम मेरे दोस्त थे, इनमे से एक था फ़कुल्ले इसके पारिवारिक परिवेश में जो होता था उसका असर इस बालक में पूर्ण रूप से परिलक्षित होता था जैसे मछली पकड़ने की विभिन्न कलायें, आदिम रहन सहन, मज़दूरी और प्राकृतिक संसाधनॊं पर पूर्ण निर्भरता! गरीबी इसका मुख्य कारण रही ।  मै कभी अपने घर से झूठ बोलकर इसके साथ मछली पकड़ने जाया करता था। और इसकी मदद भी करता तालाब के किनारे जलकुम्भी को ऊपर घसीटने में और जल्कुम्भी की जड़ों में फ़ंसी मछलियों को वह इकट्ठा करता।

हांलाकि उस जमानें में वर्ण भेद ज्यादा ही था किन्तु बच्चे कहां किसी भेद को तरजीह देते है । कभी-कभी  सोचता हूं सारी दुनिया के लोग बच्चे हो जाये !

एक दिन इसने मुझ से कहा चलो आज तोता (parrot) पकड़ते है और इसने तमाम विधियों का बखान भी किया अपने को एक अनुभवी चिड़ीमार साबित करते हुए, रंग-बिरंगे तोते………..मेरे बालमन में तमाम तोता-मैना की कहानियां कौंध गयी, मन अधीर होने लगा कब हम इस मिशन पर निकलेगे!

दूसरे दिन सुबह हम चले पड़े गांव के पश्चिम में स्थित एक निर्जन वन में जिसे बन्जर कहा जाता था, वृक्ष और झाड़ियों का एक बड़ा झुरूमुट इसे आप अंग्रेजी में Grove कह सकते है। को बंजर कहना एकदम विरोधाभाषी बात है किन्तु  बन्जर (non-fertile) इसलिये कहा जाता था कि इस झुरूमुट के आसपास की भूमि बन्जर थी।  यह जगह गांव से काफ़ी दूर थी कम से कम हम बच्चो के लिये तो दूर ही थी।

हमने एक रस्सी, अनाज के दानें, एक डलिया और छोटा सा लकड़ी का टुकड़ा जिसे हम किल्ला कहते थे, के साथ, मेरा मित्र अपने तोता पकड़ने के कौशल को महिमामंडित करते हुए चल रहा था, मैं गौर से यह सब बाते सुनते हुए कल्पना लोक में खोया सा था, अब बन्जर पहुंच गये थे हम लोग, एक जगह खुले मैदान में डलिया को लकड़ी के टुकड़े के सहारे ६० अंश के कोण पर खड़ा किया गया और इस ड्ण्डें मे रस्सी बांध कर हम लोग रस्सी के एक सिरे को अपने हाथ में पकड़ कर कुछ दूर पर एक झाड़ी के पीछे बैठ गये इस इन्तजार में कि डलिया के नीचे पड़े अनाज के दाने को जब भी कोई तोता चुगने आयेगा तो हम रस्सी खींच लेंगे और तोता इस डलिया के नीचे बन्द हो जायेगा!

मुझे याद है कि उस जगह टेशू, बेर, बबूल, और तमाम झाड़ियों पर तमाम रंग-बिरंगे तोते आवाजे करते हुए इधर-उधर आ जा रहे थे! कुछ समय बाद तोतो ने हमारे बनाये चक्रव्यूह की तरफ़ आकर्षित होने लगे! एक तोता ज्यों ही डलिया के नीचे आया हमने रस्सी खींच ली पर डलिया के नीचे गिरने से पहले ही वह जमीन से उड़ कर आकाश मे पहुंच चुका था।

ऐसा तकरीबन कई बार हुआ और हर बार हमें लगता अब सफ़लता मिली कि अब…………..

ऐसा होते-होते दोपहर हो गयी और सूरज दक्षिण से पश्चिम की तरफ़ रुख करने लगा, आज मेरे जीवन का पहला दिन था जब मै घर से इतनी दूर अकेले और इतने अधिक समय तक रहा।

जब हम पूरी तरह असफ़ल और निराश हो गये तो घर वापसी का निर्णय हुआ उन यन्त्र-तंत्रों के साथ जो मेरे कुछ काम नही आये थे, प्यास और भूख भी अपना असर दिखाने लगे थे। अभी हम गांव की तरफ़ चलते हुए आधी दूरी भी तय नही कर पाये थे की प्यास ने हमें बेहाल सा कर दिया, रास्ते में एक जामुन की बाग थी और उसमे पीपल के वृक्ष के नीचे एक कुआं जो कि पता नही कितने वर्षों से इस्तेमाल नही किया गया था, यह कुआं मेढ़क व अन्य छोटे जीवों की रिहाइस बन चुका था, प्यास की बेहाली के बावजूद दिमाग अभी भी काम कर रहा था सो हमने एक जुगत भिड़ाई टेशू के पत्तों को झाड़ियों की पतली टहनियों से गूंथ कर कटोरी नुमा दुनका बनाया और तोता पकड़ने वाली रस्सी में बांधकर उस दुनके को कुंए में डाल दिया किस्मत से रस्सी ने जल को छू लिया था किन्तु ऊपर खीचने पर दुनके का अधिकतर पानी छलक जा रहा था । लेकिन प्यासे को पानी कि एक बूंद बहुत ……………कई प्रयासो के बाद हमारे हलक कुछ नम हुए और जीवन शक्ति ने अपनी वापसी करनी शुरू कर दी थी पर प्यास का बुझना जिसे कहते है वैसी स्थित नही बन पाई, खैर अब जब हम सामान्य हुए और घर की तरफ़ चले तो तो दिमाग ये जवाब तलाश रहा था कि मां से क्या कहूंगा कि इतनी देर कहां था मै?

सरपट घर आया और नल से पानी निकाल कर पूरा एक लोटा या उससे अधिक गटक गया और घर के बरामदे में जमीन पर लेट गया क्योकि खाली पेट इतना पानी पीने पर पेट मे दर्द शुरू ए हो गया था ! मां खाना बना रही थी रसोई में उन्होने डाटकर पूछा कि कहा थे ? …………..मेरा जवाब था बग्गर में खेल रहा था, कुछ डाट सुनने के बाद मामला रफ़ा दफ़ा हो गया और मैने उस दिन भरपेट खाना खाया जो मुझे बहुत स्वादिष्ट भी लगा …अब मन और आत्मा दोनो संतृप्त थी।

तोते पकड़ने वाली बात मां को मैने बहुत बाद में बताई शायद कई वर्षों बाद ।

आज मै किसी भी जीव को कैद में नही देखना चाहता यहां तक कि चिड़ियाघरॊं के कान्सेप्ट को पूरी तौर से खारिज़ करता हूं किन्तु बचपन की वह सुआ पालने की इच्छा और किये गये प्रयास आज भी मुझे गुदगुदा जाते हैं।

अब वह बंजर भी नही बचा सिर्फ़ मैदान है वहां अब न तो वहां कोई पुष्प खिलता है और न ही तोते चहचाते है सिर्फ़ हवा का सन्नाटा……………

बंजर अभी कुछ वर्ष पूर्व उस जमीन के मालिक ने कटवा दिया मुझे जानकारी मिली तो वनाधिकारी (DFO) को सूचित किया, अखबार में भी प्रकाशित कराया, वनाधिकारी के कहने पर वह व्यक्ति गिरफ़्तार भी हुआ किन्तु निचले स्तर के अधिकारियों ने पैसे लेकर छोड़ दिया।

अब मेरे बचपन की यह कहानी या खेल अब गांव का कोई दूसरा बच्चा नही दुहरा पायेगा क्यो कि अब वहां कुछ नही बचा है सिवाय बंजर भूमि के वास्तव में अब वह जगह  अपने नाम के अनुरूप हुई है.बंजर………सिर्फ़ बंजर ।

खीरी जनपद में तोतों की तमाम प्रजातियां  थी जिनमे से तमाम मैने स्यंम देखी और उनक जिक्र ब्रिटिश भारत के गजेटियर में भी है किन्तु अब प्रजातियां ही नष्ट नही हुई बची हुई प्रजातियों की आबादी भी खतरनाक ढ़्ग से कम हो रही हैं,  गांवों मे फ़लदार वृक्षो की कटाई और नये वृक्षों  का रोपण न करना इसका मुख्य कारण है कि जहां मै अपनी छत से २० वर्ष पूर्व दसियों हज़ार तोतों के झूण्ड आकाश में उड़ते देखता था, वही आज मुझे  कभी-कभी १० या १५ तोते आसमान में उड़ते दिखाई पड़ते है! प्रजातियां ही नही तोतो की तादाद भी कम हुई है वह  भी इतनी कम की इस जीव के धरती से नष्ट हो जाने  के रास्ते पर शने: शने: लिये जा रही है। परिस्थितियां हमने बनाई है। तो क्या हम परिस्थिति को सुधार नही सकते बरगद, पीपल, महुआ, और पाकड़ के वृक्ष लगाकर।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-262727

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सेलुलर- 9451925997

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डांडी मार्च "फ़ोटो साभार के० एल० कामत"

नमक कानून के साथ टूटा एक मिथक “बिन्नियों वाला मिथक”

६१ वर्ष के युग पुरूष ने जब २४१ मील की लम्बी यात्रा लाखों -करोड़ों भारतीयों के साथ २४ दिनों में पूरी कर अप्रैल सन १९३० के प्रथम सप्ताह में डांडी में बिना टैक्स दिये नमक का निर्माण किया तो पूरी दुनिया इस क्रान्तिकारी कदम से हतप्रभ रह गयी । ब्रिटिश भारत के नमक कानून का उलंघन करके उन्होंने बरतानिया हुकूमत को बता दिया कि अब उनकी पूर्ण स्वराज की मांग को मानना ही होगा,

किन्तु बापू ने उस रोज एक और मान्यता को तोड़ दिया था जो हमारे जनमानस में सैकड़ों वर्षों से व्याप्त थी एक अंधविश्वास की तरह ! लेकिन भारत में कही इस बात पर चर्चा नही हुई जिसे आज मैं जाहिर कर रहा हूं अपनी दादी की जुबानी !!

यह बड़ा अजीब लग रहा होगा कि मेरी दादी और बापू के नमक सत्याग्रह में क्या संबध था ? जवाब हो सकता है कि वह भी हिस्सा थी इस आंदोलन का हर एक भारतीय की तरह !! किन्तु यहां पर मसला ये भी नही है !

“एक सामान्य सी बात है कि किसी मुल्क के लोगों को अपने आधीन करना हो तो उनकी नितान्त जरूरत की चीजों को अपने अधिकार क्षेत्र में कर लो फ़िर चाहे जैसे ड्राइव करो उस मुल्क की पूरी की पूरी आबादी को ।”

कुछ ऐसा ही किया था अग्रेजों ने हमारे मुल्क में “नमक” एक बुनियादी जरूरत है हमारे हाड़-मांस के शरीर की और इस जरूरत पर ताला लगा हुआ था बरतानिया सरकार का और यही वजह थी कि लोग नमक का इस्तेमाल “ऊंट के मुंह में जीरा” वाली कहावत के मुताबिक इस्तेमाल करते थे, अति आवश्यक वस्तु कि अनुप्लब्धता उस वस्तु को सोने (या कोई भी दुर्लभ व आसानी से न मिलने वाली वस्तु) के समान बना देती है ।

नमक का वितरण भी सरकार के हाथ में था । और लोग पचासों मील की लम्बी यात्रा पैदल तय करते हुये सरकार के मुख्यालयों पर जाते और यदि कही वितरण न हो रहा होता तो बिना नमक वापस होते । और ऐसी स्थिति में लोग एक दूसरे के घरों से नमक मांग कर काम चलाते।

उस दौर में दो बुनियादी चीजों का आदान – प्रदान आपसी सहभागिता-सहकारिता से होता था “आग और नमक”, मेरी दादी बताती थी कि लोग अपने घरों में गाय के गोबर से बने उपलो को जलाते थे और भोजन पकाने के उपरान्त उस बची हुई आग को राख से ढ़क देते थे जिससे आग दूसरी सुबह या शाम तक जीवित रहे । इस तरह जिसके घर राख ढ़कने की प्रक्रिया में अवधान आता है आग बुझ जाती तो वह दूसरे के घर से आग मांग कर अपना काम चलाता, आग को सुरक्षित रखने वाली महिला सुघड़(अच्छी) और आग का सरक्षण न कर पाने वाली महिला फ़ूहड़ (खराब) मानी जाती थी !

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मेरी दादी

खैर बात नमक की हो रही है! मेरी दादी का जन्म सन १९१२ ईस्वी में हुआ यानी सन १९३० ईस्वी में उनकी उम्र १८ वर्ष की रही होगी और सन २००६ ईस्वी में उनका देहावसान हुआ, वह इस धरती और इस मुल्क में कुल मुलाकर ९४ वर्ष रही।

गुलाम भारत और आज़ाद भारत के प्रत्येक अच्छे-बुरे हालात को उन्हो ने जिया और देखा । उनकी एक बात जो बचपन मैं नही समझ सका बड़ा हुआ तो समझ आया वही बयान कर रहा हूं । बचपन में मुझसे जब भी नमक जमीन पर गिर जाये या मै फ़ेक दू तो वह डाट कर कहती ये क्या कर रहा है यह तो अपशगुन है ! मै पूछता ऐसा क्यों ? तो जवाब मिलता कि नमक के जितने दाने जमीन पर गिरते है, गिराने वाले मनुष्य की उतनी बिन्नियां(आंख की पलक के बाल) गिर जाती है ! आज मुझे मेरे लोगो की वह बिडम्बना समझ आयी । जिसे पूर्व की राजशाही और अग्रेजी हुकूमत ने उत्पन्न किया था यानी “नमक पर नियंत्रण” और हमारे लोग इसी लिये उस नमक का एक भी दाना जाया नही करने देना चाहते थे जिसे वह बड़ी मुश्किलात से हासिल करते थे .सैकड़ो मील की पैदल यात्रा और तंगी के बावजूद नमक के बदले लगने वाली लागत ! और उस समस्या नें लोगो को यह धारणा विकसित करने के लिये मजबूर किया, ताकि बहुमूल्य व दुर्लभ नमक का एक कण भी बरबाद न किया जाय, खासतौर से अबोध बच्चो के लिए जो खेल -खेल में नमक की कीमत न समझने के कारण उसे बरबाद कर देते थे !

पर आज़ हमे इस मान्यता, अवधारणा से मुक्ति मिल चुकी है । महात्मा गांधी ने उस रोज़ नमक कानून ही नही तोड़ा भारत के हर घर में प्रचलित इस मजबूरी बस बनायी गयी मान्यता को भी तोड़ दिया वह दिन था “६ अप्रैल १९३० डांड़ी गुजरात भारत।”,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,किन्तु इसका मतलब ये कतई नही कि हम अपनी जरूरत से अधिक चीजो का बेजाइस्तेमाल करे !

अब दादी की बिन्निया गिर जाने वाली कहानी का सच मुझे मालूम है क्या आप को था ?

कृष्ण कुमार मिश्र

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