बाघ जो जिन्दा रहने के लिये जूझ रहा है मानवजनित..........

बाघ जो जिन्दा रहने के लिये जूझ रहा है मानवजनित.............

 

 

खीरी जनपद के बाघ

एक वक्त था जब उत्तर भारत की इस तराई में बाघ और तेन्दुआ प्रजाति की तादाद बहुत थी यहां धरती पर विशाल नदियों के अलावा छोटी-छोटी जलधारायें खीरी के भूमण्डल को सिंचित करती रही नतीजा नम भूमि में वनों और घास के मैदानॊं का इजाफ़ा होता रहा है । लोग बसते गये, गांव बने, कस्बे और फ़िर शहर, लोग जंगल और इनके जीवों के साथ रहना सीख गये सब कुछ ठीक था पर आदम की जरूरते बढ़ी आबादी के साथ-साथ, नतीजा ये हुआ कि जंगल साफ़ होने लगे और साथ ही उनमे रहने वाले जीव भी ! .गांव बेढ़ंगे हो गये, कस्बे व शहर आदिमियों और उनकी करतूतों से फ़ैली गंदगी से बजबजाने लगे और प्रकृति की दुर्दशा ने उसके संगीत को भी बेसुरा कर दिया जिसे ……….!!!

अब सिर्फ़ इस जनपद में टाईगर व तेन्दुआ, दुधवा टाईगर रिजर्व के संरक्षित क्षेत्र में बचे हुए है, खीरी के अन्य वन-प्रभागों में यह खूबसूरत प्राणी नदारद हो चुका है।

लेकिन मैं यहां एक एतिहासिक दृष्टान्त बयान करना चाहता हूं जो इस बात का गवाह है कि खीरी के उन इलाकों में भी बाघ थे जहां आज सिर्फ़ मनुष्य और उसकी बस्तिया है वनों के नाम पर कुछ नही ! नामों-निशान भी नही, हां गन्ने के खेत जरूर है जो ………….जिन्हे दिल बहलाने के लिये जंगल मान सकते हैं!

आज से तकरीबन १०० वर्ष पूर्व किसी धूर्त और चापलूस भारतीय राजा ने अपने अग्रेंज मालिक के साथ मेरे गांव आया जिसके पश्चिम में महुआ और बरगद, जामुन व पलाश के जंगल थे, और वही एक बाघ न जाने कब से रह रहा था, उन कलुषित व धूर्त मानसिकता वाले लोगो ने उसे मार दिया, ग्रामीण, राजाओ के इस तमाशे को देखने के अतिरिक्त क्या कर सकते थे, उस घटना के बाद इस जगह का नाम पड़ा “बघमरी” या “बाघमरी” । आज इस जगह खेती होती है कुछ दूर पर बस्तियां है और अब जंगल यहां से तकरीबन १०० किलोमीटर दूर यह है विनाश की दर जो मानव जनित है !

पर आज मुझे इस स्थान को देखकर उस अतीत की कल्पना करने का मन होता है जिसे मैने नही जिया, वह पलाश के फ़ूलों से लदे वृक्ष, महुआ के फ़लों की मदहोश करने वाली खुसबू, बरगद के घने जटाओं वाले वृक्ष, अकहोरा की झाड़िया, बेर और न जाने क्या-क्या जो हज़ारों पक्षियों का बसेरा होंगें! मखमली घास और उस पर आश्रित सैकड़ो मवेशी !

और इन झुरमुटों में कुटी बनाये रहते हुए गांव के ही अध्यात्मिक पुरूष  जिनका जिक्र मैने सुना है !

अब यहां सब सुनसान है! सिर्फ़ एक सड़क……………………….

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-262727

भारतवर्ष

सेलुलर- 9451925997

 

 

 

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PALLAS5

पलाश का पुष्प

भारत वर्ष का एक  गांव जो इतिहास में कोसल राज्य के अंतर्गत था बाद में अवध के नबाबी राज्य  का हिस्सा, और अब स्वतंत्र भारत के उत्तर प्रदेश में जिला खीरी का एक गांव है “मैनहन” । खास बात ये कि यह गांव नैमिषारण्य क्षेत्र के धार्मिक सीमा में है ।

 

इस ग्राम के उत्तर में एक प्राचीन नदी है पिरई जो कभी जंगलों के मध्य थी और सदानीरा भी किन्तु अब यह सिर्फ़ बरसाती दिनों में जल युक्त होती है, जंगल भी बढती मानव-आबादी के कारण नष्ट कर दिये गये है और खेती में इस भूमि का इस्ते माल होता है

दक्षिण दिशा में ब्रिटिश-भारत सरकार द्वारा निर्मित नहर जो सिचाई का मुख्य साधन है!

पश्चिम में कभी तेंदू और पलाश, शाखू, महुआ, बरगद, पीपल, बेर, अकहोरा आदि के जंगल हुआ करते थे किन्तु मानव की आवश्यक्ताओं की भेट चढ़ चुके है अब रेगिस्तान सा माहौल है और इस रेहू यानी क्षारीय मिट्टी  का प्रयोग मेरे बचपन तक लोग कपड़े धुलने व महिलायें बाल धोने में प्रयुक्त करती थी।

1857 के गदर के दौरान अग्रेज अफ़सरान अपनी औरतों और बच्चों के साथ बन्दी बनाकर मेरे इसी गांव के जंगली रास्ते से होकर लखनऊ ले जाये गये थे।

गांव के पूरब दिशा में बाग-बगीचें , खलिहान और विशाल “कबुलहा” ताल से लगा हुआ चरागाह था जिसमे तमाम पशु-पक्षी शरण स्थल बनाये हुए थे मेरे पिता जी के बाल्यकाल में इस ताल में हज़ारों विदेशी पक्षी सर्दियों में आया करते थे और महिलाये तालाब के घाटों पर पड़े काठ के कठ्ठॊम पर स्नान करने जाया करती थी अब यहां भी ऐसा कुछ नही बचा सिर्फ़ तालाब है जिसका इस्तेमाल धन उगाही के लिये होता है यानी मछली पालान या सिघाड़ा की खेती जैव-रसायनों के प्रयोग के साथ…प्रकृति का दोहन जारी है जमीन, हवा, और जल यानी धरती के हर हिस्से में मानव को लाभ देने वाले उद्योग !!!

अब बगीचे तो है किन्तु उनमें फ़ल नही लगते क्योकि वह बूढ़े हो चले है कुछ काट दिये गये है, और अब न तो इन विशाल वृक्षों पर फ़ैलने वाली पुष्प-लतिकायें हि बची है तमाम झाड़ियां जो पुष्पो से आच्छादित होती थी जिनका धार्मिक महत्व के साथ साथ औषधीय महत्व भी था उजाड़ दी गयी है!

चरागाह कृषि-भूमि में तब्दील हो चुका है तालाब प्रदूषित……………………..

गांव के मिट्टी के घर पक्की ईटों के मिश्रित निर्माण के कारण बेढ़गें से हो गये है तमाम छोटे तालाब पटाई करने के बाद कृषि भूमि मे तब्दील, विशाल वृक्ष काट दिये गये जिन पर हज़ारों तोतें चहचहाया करते थे कुछ बचे हुए विशाल वृक्ष

उजाड़ भूमि में ऐसे खड़े हुए है …..खण्डहर बता रहे है कि इमारत बुलन्द थी…………….

खलिहान, चरागाह और बागीचों के विलुप्त होने के साथ वो सभी सामुदायिक गतिविधियां व्भी समाप्त हो चली है जो यहां के लोगों में समरसता, प्रेम और सभ्यता को पोषित करती थी !

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-262727

भारतवर्ष