Akbarअकबर-द साइंटिस्ट

जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने ईजाद किया रिफ्रिजरेशन का सिद्धांत …

फ्रिज का प्रवर्तन भारत भूमि से …

मैनहन गाँव के लोगों ने की अविष्कार की पुनरावृत्ति …

रेफ्रीजरेटर का आविष्कार भारत के बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने सन 1585 से पूर्व में किया जब उनकी राजधानी फतेहपुर सीकरी हुआ करती थी, आइन-ए-अकबरी में अबुल फज़ल ने अकबर के पानी ठंडा करने के तरीके को कई मर्तबा लिखा है अपने दस्तावेज में, सबसे ख़ास बात यह है इस दौर में पूरी दुनिया में अकबर द्वारा ईजाद किया हुआ वैज्ञानिक तरीका कहीं और नहीं मिलता, योरोप और अमरीका में भी लोग बाग़ बर्फ से ही पानी व्  खाद्य पदार्थों को ठंडा व् सुरक्षित रखते थे, अगर मौजूदा विज्ञान की बात करें तो लोगों के घरों में बीसवी सदी के पहले दशक में विकसित रेफ्रीजरेटर पहुंचा, किन्तु इसके आविष्कार के लिए जद्दोजहद सन 1750 के आस पास शुरू हो चुकी थी, कहते है बेंजामिन फ्रैंकलिन ने उस वक्त वाष्पीकरण से तापमान पर पड़ने वाले प्रभाव पर प्रयोग शुरू किए थे, अपने एक रसायन विज्ञानी मित्र जान हैडले के साथ, फ्रैंकलिन के प्रयोगों को आगे बढाया अमेरिका के ही एक वैज्ञानिक ने जिसे ऑलिवर एवैंस के नाम से जानते है, वैसे इन्हें सारी दुनिया में भाप के इंजनों की बेहतरी के लिए जाना जाता है, जैकब पार्किंस को सन 1834 में रेफ्रीजरेटर के एक सफल माडल का पेटेंट मिला, एक ब्रिटिश पत्रकार जेम्स हैरिसन ने सन 1856 में रेफ्रीजरेटर के एक माडल को पेटेंट कराया जिसमें वाष्प-दबाव प्रणाली में ईथर, एल्कोहल और अमोनिया का इस्तेमाल होता था, इसके बाद जो मौजूदा फ्रिज हम देखते है वह सन 1913 में फ्रेड डब्ल्यू वाल्फ़ ने विकसित किया, इसके बाद बहुत से संशोधनों से गुजरा है यह ठंडा करने वाला यंत्र……दुनिया आज इन्ही अमरीकी और ब्रिटिश नागरिकों को जानती है इस मशीन के अविष्कारक के तौर पर….और यह रेफ्रीजरेटर शब्द भी इंग्लिश डिक्शनरी में अठारवीं  सदी में शामिल हुआ…जबकि इस मशीन के आविष्कार के अन्वेषण-कर्ताओं में भारत भूमि की पहल रही, जिसे इतिहास के कुछ पुराने और अप्रसांगिक हो चुके दस्तावेजों में कहा गया है.

कहते है की अकबर सिर्फ एक शासक नहीं थे उन्हें कीमियागिरी से लेकर वास्तुशास्त्र और तंत्र-विद्याओं तक में रूचि थी, और वह हमेशा तकनीकी कार्य करने वाले लोगों के मध्य जाकर स्वयं अपने हाथों से बुनाई कताई से लेकर जंगी साजों सामान के निर्माण में अपनी भागीदारी सुनाश्चित करते थे, अपनी गर्मियों की आराम-गाह जोकि बांस की झोपड़ी होती थी, जिसमे चारोतरफ खुशबूदार खस के परदे बांधे जाते थे और उन पर पानी डाला जाता था ताकि उन खस के पर्दों से गुजरने वाली हवाएं ठंडी हो जाए, इसे तब नैबस्त-गाह कहा जाता था, इस तरह यह शुरुवाती कूलर का माडल हुआ जो हिन्दुस्तान के आम व् ख़ास सभी में खूब प्रचलित रहा….

अकबर द्वारा किए गए इस आविष्कार के सन्दर्भ में अबुल फज़ल ने कहा की दूरदर्शी बुद्धि के उमड़ाव् के चलते जहाँपनाह ने पानी ठंडा करने का साधन उसी शोरे अर्थात बारूद से बनाया जो बहुत हलचल पैदा करने वाला है, और उनके इस आविष्कार से आम व् ख़ास सभी बहुत खुश हुए, यह एक नमकीन लोंदा होता है, उसे छलनी में रखा जाता है और उस पर कुछ पानी छिड़का जाता है, मामूली मिट्टी से अलग कर लिया जाता है, छलनी से जो कुछ छान कर नीचे गिरता है, उसे उबाल लिया जाता है, उसमे मौजूद मिट्टी से अलग कर लिया जाता है और उसके स्फटिक(बरबदंद) बना लिए जाते है, कांसा या चांदी या ऐसी किसी धातु की एक बोतल में एक सेर पानी डाला जाता है और उसका मुहं बंद कर दिया जाता है, एक छलनी में ढाई सेर शोरे में पांच सेर पानी मिलाया जाता है और उस मिश्रण में आधी घड़ी अर्थात १२ मिनट तक उस मुहं बंद बोतल को इधर से उधर घुमाया जाता है, बोतल के अन्दर का पानी बहुत ठंडा हो जाता है, एक शख्स एक रुपये में तीन चौथाई मन से लेकर चार मन तक शोरा खरीद सकता है….

भारत के पारंपरिक ज्ञान और उसकी प्राचीन सभ्यताओं में विज्ञान की समृद्धता को कोइ नकार नहीं सकता, दरअसल अबुल फ़जल ने अकबरनामा के तीसरे हिस्से में जिसे आईने अकबरी कहते है, उसमे भारत के प्राचीन विज्ञान का विवरण है, जाहिर है कि अबुल फ़जल अकबर के नवरत्नों में से एक थे और उन्हें अपने मालिक के लिए यह विशाल दस्तावेज तैयार करना था नतीजतन अकबर के किरदार की मुख्यता और भारतीय ज्ञान को अकबर से जोड़ कर प्रस्तुत करना उनके लिए लाजमी था, इतिहास साक्षी है की राजाओं के दरबारी कवियों ने बहुत ही सुन्दर व् ज्ञान से परिपूर्ण रचनाएं लिखी परन्तु उन रचनाओं में राजा के प्रति उस कवि की कर्तव्य-निष्ठा तो रहती ही थी साथ में चापलूसी और अतिशयोक्तियों से भरे अल्फाजों की दास्ताँनें भी, इसलिए निरपेक्षता की उम्मीद कम ही होती थी, इसलिए इन सम्राटों के दरबारी दस्तावेजों में लिखे हुए किस्सों से इतिहास को भांप तो सकते है परन्तु स्पष्ट कुछ भी देख पाना मुमकिन नहीं होता है इसीलिए इतिहास हमेशा से रिसर्च का विषय रहा है, की उस काल के हालातों का निरपेक्षता से जायजा लेकर उसे दोबारा लिखा जाए ताकि लेखक की भावन जो लालच, और अंध-भक्ति से लिपटी हुई हो तो उसे छान कर उस निर्मल अतीत को देखा और गुना जा सके…….

हम सभी जानते है की रासायनिक अभिक्रियाओं की शुरुवात उष्मा के फैलाव व् उसके जज्ब होने के कारण होती है, वाष्पन से तापमान परिवर्तित होता है, यह तथ्य भले शहंशाह न जानते हो और न ही वे मैनहन गाँव के किसान पर इस रासायनिक अभिक्रिया से पानी को ठंडा कर लेने की जुगत उन्होंने हासिल की…

  बारूद यानि सल्फर, चारकोल और पोटेशियम नाइट्रेट का मिश्रण, इसका आविष्कार नवी सदी में चाइना में माना जाता है,परन्तु वास्तविकता में साल्टपीटर यानि बारूद का आविष्कार भारत में हुआ, जीन बैपटिस्ट टेवर्नियर ने आसाम में इसके ईजाद की बात कही है…  मुख्यता प्राकृतिक तौर पर यह गुफाओं की दीवारों पर चमगादड़ों की ग्वानों (मल -मुख्यता: यूरिक एसिड) के साथ मिला हुआ होता है, जिसे शुद्ध किया जाता है, ताकि इससे शुद्ध पोटेशियम नाइट्रेट निकाला जा सके और उसे गर्म करके क्रिस्टल्स के तौर पर रखा जा सके, पोटेशियम नाइट्रेट, अमोनियम नाइट्रेट, और यूरिया नाइट्रेट ये सभी विस्फोटक पदार्थ है, सभी में नाइट्रोजन तत्व विद्यमान है किसी न किसी रूप में, अमेरिकन सिविल वार के दौरान वहां लोगों ने एक देशी विधि का इस्तेमाल किया जिसे फ्रेंच मेथड भी कहते है, घरों से कुछ दूर  खाद (पांस), भूसा, और मूत्र मिलाकर कई महीनों के लिए छोड़ देते थे, बाद में राख और पानी से उसे छान कर अलग कर लेते थे….कुलमिलाकर यूरिया का किसी न किसी रूप में बारूद बनाने में इस्तेमाल किया जाता रहा, वही यूरिया जो जीवों की उपापचयी क्रियाओं द्वारा किडनी में अपशिष्ट पदार्थ के तौर पर निर्मित होती है साथ ही कुछ अन्य तत्व पोटेशियम, मैग्नीशियम आदि भी उत्सर्जित होते है जीवों के शरीर से, बताते चले की यह यूरिया एक ऐसा कार्बनिक योगिक है जो प्रयोगशाला में पहली बार बनाया गया बावजूद इस मिथक के की कोई भी कार्बनिक योगिक प्रयोगशाला में निर्मित नहीं हो सकता है, और इस यूरिया को बनाने वाले थे एक जर्मन वैज्ञानिक फ्रेडरिक वोह्लर……

दरअसल पोटेशियम नाइट्रेट, या यूरिया नाइट्रेट ये दोनों विस्फोटक गुणों से युक्त है और इन दोनों के देशी निर्माण की विधियों में यूरिया का प्राकृतिक स्रोत यानि मूत्र का इस्तेमाल होता रहा है, अकबर का बारूद (चारकोल, सल्फर और पोटेशियम नाइट्रेट) और हमारे गाँव के लोग जो यूरिया का इस्तेमाल करते है चीजों को ठंडा करने के लिए, दोनों में नाइट्रोजन तत्व व् वाष्पीकरण से तापमान में परिवर्तन की समानता है….पूरी दुनिया में 1585 के पहले कही भी रासायनिक प्रक्रियाओं से पानी को ठंडा कर पाने की कोइ विधि जानकारी में नहीं है, तो यह साबित हो जाता है की अबुल फ़जल के जहाँपना जलाल्लुद्दीन मुहम्मद अकबर ही इस ईजाद की हुई तकनीक के मालिक है. इसका जिक्र अशोक बाजपेई व् इरफ़ान हबीब ने भी अपने शोध में किया है.

तकनीक ने जब अपने पाँव फैलाए तो हासिए के आदमी तक वह पहुँची, उस तकनीक का लाभ भले वह आर्थिक कारणों से न उठा पा रहा हो किन्तु उसके मष्तिष्क में उस तकनीक का जादू जरूर पैबस्त हो गया, नतीजतन उसने अपने देशी तरीके ईजाद किए उस तकनीक की नक़ल में …जरूरत ईजाद कर लेती है वो तरीके जो आसानी से मुहैया हो सके इंसान को …और इसी जरूरत ने हमारे गाँव के लोगों को प्रेरित किया बिना किसी मशीनी रेफ्रीजरेटर के पानी, कोकोकोला और बेवरेज को ठंडा करने की तकनीक को ईजाद करने के लिए, वे अकबर की तरह शोरा यानि गन पाउडर का इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि वह सर्व सुलभ नहीं, उन्होंने एक नया तरीका खोजा यूरिया से पानी ठंडा करने का, उन्हें उष्मा गतिकी के नियम भले न पता हो और न पता हो पदार्थों के वाष्पीकरण से तापमान में परिवर्तन की प्रक्रिया किन्तु उन्हें यह मालूम चल गया की यूरिया में पानी मिला देने से उसमे बंद बोतल में कोई भी चीज रख दे तो वह कुछ मिनटों में ही ठंडी हो जाती है बर्फ की तरह …जाहिर है ग्रामीण क्षेत्रों में हर किसान के घर यूरिया मौजूद होती है और गर्मियों में गाँव से दूर खेतों में काम करता आदमी जिसे प्यास में ठन्डे पानी की जरूरत भी और इसी जरूरत ने यह तरीका ईजाद करवा दिया !

अकबर की इस खोज में भले उनके किसी जंगी सिपाही की तकरीब हो यह, पर नाम जहाँपनाह का ही जोड़ा जाएगा उनके नवरत्न अबुल फ़जल द्वारा, या फिर यह ईजाद वाकई में जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का ही हो, क्योंकि उनकी बौद्धिक अमीरी का जलवा तो हिन्दुस्तान ही नहीं बल्ख बुखारा से लेकर लंदन तक था, और हमारे गाँव मैनहन के लोगों की यह तरकीब जो मैं आप सब को सुना रहा हूँ, हो सकता है कालान्तर में मेरे नाम से ज्यादा जोड़ दी जाए क्योंकि दस्तावेजीकरण करने वाले या करवाने वाला ही प्रमुख होता है, शुक्र है की मुग़ल शासन में अबुल फ़जल जैसे लेखकों ने अकबरनामा जैसा वृहद दस्तावेज तैयार किया और आज हम इस दस्तावेज के दरीचों से कई सदियों पहले की चीजों को देख सकते है.

DSCF3458कृष्ण कुमार मिश्र

संस्थापक संपादक- दुधवा लाइव जर्नल

मैनहन

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भारत

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[फोटो साभार: हिन्दी विकीपीडिया]

भारतीय डाक और भारतीय प्रेम!–एक अफ़साना (कृष्ण कुमार मिश्र )

बात पुराणी है पुराने लखनऊ की, एक थे राघव दादा कलेक्टर बनाने की उम्मीद से पढ़ने आये थे लखनऊ, तैयारी कर रहे थे, इसी मध्य उन्हें एक लड़की से इश्क हो गया और कुछ अरसे में इश्क का अंत? भी….. जीवनं अनवरत जारी था अपनी रफ़्तार में तभी एक घटना ने राघव दादा के मुर्दा प्रेम को ज़िंदा करने की सनक पैदा कर दी….दरअसल एक विक्कू नाम का लड़का भी तैयारी कर रहा था सिविल सर्विसेज की थोड़ा हरफन मौला टाइप का मिजाज था उसका.. ज़िंदगी से बड़ी आसानी से दो चार कर लेने के फन में माहिर ! पर दादा ठहरे गहराई पसंद सो मामला पेंचीदा हो गया…विक्कू का कोइ चलताऊ नवयुग का प्रेम अफेयर था मामला डिस्कनेक्ट हो चुका था सो उस युवती को मोबाइल नंबर पहुंचाने की जुगत में लगे थे विक्कू बाबू …बात राघव दादा तक पहुँची …बगल वाले कमरे में तो रहते थे वे …बड़े व्यवहारिक.. उधार ले लेते अपनों से जूनियरस को खिलाने-पिलाने के लिए …बड़ी शिद्दत और जिम्मेदारी से बड़े होने का पालन करते….विक्कू के नवयुग प्रेम से अनिभिग्य दादा ने विक्कू से कहा की मैं तुम्हे एक प्रेमपत्र लिख दूंगा जिसमे शब्द शब्द दर्शन से सने हुए होगे पढ़ते ही वह बालिका तुम्हारे प्रेम के कमरे में दोबारा प्रवेश ले लेगी ….होशियार विक्कू यही तो चाहता था की अपनी हैण्ड राईटिंग में न लिखना पड़े पत्र..कही वह नव विचार युक्त भूमंडलीकृत विचारों से सुशोभित कन्या विक्कू के हस्तलिखित प्रेमपत्र का गलत इस्तेमाल न करदे ….. अंतत: विक्कू के लिए पत्र दादा ने लिखा और बड़प्पन दिखाते हुए कंधे पर हाथ रख कर बोले दे आ समझो वह बालिका फिर से तेरी हुई …..बिक्कू दौड़ता हुआ उस कन्या के कार्यक्षेत्र में पहुंचा जहा आगुन्तको के स्वागत हेतु बैठी बालिका को पत्र थमा का वांछित कन्या को दे देने के लिए कह कर सरपट वापस आ गया …..विक्कू अपने कमरे पर पहुंचा ही था…की नवयुग की कन्या का फोन विक्कू के पास आ गया … दादा भी प्रभाव देखना चाहते थे अपने लेखन के चातुर्य का ……दादा बोले किसका है? बिक्कू ने इशारा किया ..उसी का …दादा बहुत ही प्रसन्न हुए ….किन्तु इस प्रसन्नता ने उन्हें उनके अतीत में धकेल दिया …जहां सिर्फ अन्धेरा था और था मुर्दा प्रेम…..दादा ने उसी वक्त ठान लिया की क्यों न वह अपने शब्द मन्त्रों से खतों की आहुति दे अपने मुर्दा प्रेम पर …वह जाग उठेगा किसी रामसे ब्रदर्स की डरावनी फिल्मों के भूतों की तरह …..राघव दादा ने अब ख़त लिखना शुरू कर दिया अपनी प्रेयसी को ….जवाब नहीं आये तो रजिस्टर्ड डाक का इस्तेमाल किया …ख़त ही वापस आने लगे उनके पास …तो खीझ कर उन्हों ने अपनी प्रेमिका के पड़ोसियों को केयर आफ बनाकर पत्र भेजने शुरू किए ..दो महीने गुजर गए इस ख़त बाज़ी में …दादा के पत्र अभी भी निरूत्तर ही थे … किन्तु एक फर्क आया था उस मोहल्ले में जहां .दादा की प्रेमिका रहती थी ..अब मोहल्ले वाले डाकिए को देखकर अपने दरवाजे बंद कर लेते या राह में डाकिया मिल जाता तो नज़र बचाकर भागने लगे …यह असर जरूर पडा था दादा के खतों का …शब्दों का प्रभाव अभी बाकी था? क्योंकि पत्र पढ़े नहीं गए थे वे तो वापस हो आते थे ! ….दादा का पत्र लेखन जारी था अब तो वह शहर की सीमाए लांघ कर प्रेमिका के रिश्तदारों को ख़त भेजने लगे थे ! …किन्तु जवाब न आने से वह थोड़ा विचलित थे …आखिर कार पांच महीने गुजर गए सब्र का बाँध धाह गया दादा अपनी प्रेयसी के मोहल्ले पहुँच गए …कुछ मलिक्ष मन्त्रों अर्थात गालियों का आह्वाहन किया ..मोहल्ले में लोग बाग़ अपनी अपनी छतो पर सवार पूर्व विदित मामले का जायजा ले रहे थे …तभी धडाम की आवाज आई …और लोग चिल्ला उठे बम…..बम ……!!!!]

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****************दूसरी क़िस्त********************

(दादा अब लखनऊ से बरेली आ चुके थे …बरेली जेल …….दरअसल उनहोंने उस रोज अपनी प्रेमिका के घर पर बम फेका था …कोइ हताहत तो नहीं हुआ बस दीवार टूट गयी थी और कुछ लोगों को चोंटे आई थी ….इसी कृत्य के बदले उन्हें यह सरकारी इमदाद मिली की कुछ दिनों तक सरकारी घर और सरकारी भोजन…….दादा अभी भी हार नहीं माने थे …पत्र लेखन जेल से भी जारी था ! इसी बीच उनके सह्बोले सूत्रों ने जेल में खबर पहुंचाई की भौजी की तो शादी हो गयी ! …राघव दादा उस रोज बहुत रोये ….निराशा ने उनके जीवन के इस परम उद्देश्य को बंदी बना लिया …पर बड़ी जीवटता वाले शख्स थे फिर कलम उठाई और शुरू कर दिया अपनी प्रेमिका की ससुराल में पत्र भेजना …ये सारी खबरे विक्कू जैसे उनके तमाम मित्रवत छोटे भाई समय समय पर जेल में पहुंचाते रहते …..पर अबकी बार ख़त वापस नहीं आये यानी वो पढ़े गए …चिट्ठी का असर तो आप सभी लोग देख ही चुके थे पूरा मुहल्ला आतंकित था डाकिए की सूरत देखकर …अब राघव दादा के शब्दों की कारस्तानी बाकी थी वो भी पूरी होने वाली थी अब! ….एक रोज जेल में एक अपरिचित राघव दादा से मिलने की दरयाफ्त लेकर आया …दादा उससे मिले …पता चला वो उनकी प्रेमिका का पति है. उसने ख़त पढ़े थे सो उन्ही शब्दों के असर से बावस्ता होकर वह भागा चला आया था राघव दादा के पास ………अब रूबरू होकर दादा के वाक के चातुर्य से दो चार होने वाला था वो …दादा ने उसे अपने प्रेम प्रसंग की तमाम बारीकियों से परिचित कराया उसे तमाम दलीले दी और सबूतों के मौजूद होने की बात कही ! वह व्यक्ति अवाक सा था ! उसके जहन में सुनामी सी भड़क रही थी और पैर धरती का सहारा लेने में अक्षम से हो रहे थे ऐसा था दादा का दलीलनाम ! …दरअसल दादा ने वकालत की भी पढाई की थी सो प्रेम की वकालत करने में भी वकील होने का पुट पर्याप्त था….यहाँ एक बात बता देना जरूरी है की दादा से उनकी प्रेमिका ने कभी संसर्ग के पश्चात कहा था की तुम्ही मेरे पति हो मेरी मांग भर दो मैं जीवन भर तुम्हारी ही रहूँगी! बस क्या था दादा ने फ़िल्मी अंदाज़ में भावनाओं से सरोबार अपने रक्त की कुछ बूंदों से उसकी मांग भरी थी ….और यही बात उनके मन में पैबस्त हो गयी थी की उसने कहा था ! की मैं तुम्हारी हूँ और जीवन भर तुम्हारी रहूँगी…इस प्रसंग पर दादा अपने सह्बोलो से अक्सर कहते क्यों कहा था? उसने ऐसा फिर क्यों नहीं पूरा किया अपना वादा! …जो मेरे जीवन का उद्देश्य बन चुका था ! ……… खैर कहानी ने यहाँ बड़ा मार्मिक मोड़ लिया दादा की प्रेयसी के पति ने उसे तलाक दे दिया……दादा के प्राइवेट सूत्रों ने ये खुशखबरी दादा को पहुंचाई …एक बार फिर उस मोहल्ले में डाकिए की आमद बढ़ गयी और लोग बाग़ दोबारा विचलित होने लगे ! दादा ने फिर अपनी प्रेयसी के घर पत्र लिखना शुरू कर दिया था क्योंकि उन्हें पता चल चुका था की उनकी प्रेमिका को उसके पति ने छोड़ दिया है! ….किन्तु वह मुर्दा प्रेम इतनी कवायदों पर भी जागृत नहीं हो पा रहा था …..दादा को जमानत मिली वह लखनऊ छोड़ अपने घर जिला शाहपुर वापस आ गए और खेती करने लगे साथ ही वही की डिस्ट्रिक्ट की सिविल कोर्ट में वकालत भी ! राघव दादा अब टूट चुके थे…अपने पुराने प्रेम को शब्दों की अभिव्यक्ति से ख़त के माध्यम से जिलाने में ……जीवन के कई बरस की तहोबाला कर दी थी उन्होंने इस ख़्वाब के लिए की शायद उनकी प्रेयसी दौड़कर उन्हें गले लगा लेगी और सीने में धधकती ज्वालामुखी ठंडी हो जायेगी उस प्रेम की बारिश से …पर ऐसा नहीं हुआ …अक्सर होता भी नहीं है यथार्थ में …टूटे हुए रिश्ते और टूटे हुए धागे रहीम की बहुत मानते है ..चटक जाए तो जुड़ते नहीं जुड़ जाए तो गाँठ ………! दादा ने अपने प्रेम को खो दिया था और शायद हार भी मान चुके थे …परन्तु विक्कू के सतही प्रेम की रवादारी देख उनकी गहरी आँखों में अपने प्रेम को जगा लेने की तमन्ना पैदा हो गयी …सर्वविदित है की गहराई में जाने पर डूबने की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है बजाए सतह पर रहने से …विक्कू आज भी तैर रहा है रंग बिरंगी स्वीमिंग ड्रेस में कभी कभी हलके फुल्के गोते भी लगा लेता है किन्तु गहराई में नहीं जाता कभी !……. .शेष अगली क़िस्त में ..कृष्ण कुमार मिश्र )

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Photo Courtesy: Wikipedia

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…जिला शाहपुर …राघव दादा के नाम से बहुत जल्दी वाकिफ हो चुका था चंद महीनों में ….उनकी यह शोहरत वकालत के लिए नहीं थी और न ही उनकी वह मुर्दा मोहब्बत थी इसकी वजह!

वे लोगों में, मुख्यता: उस जनपद के सरकारी तंत्र में कुख्यात हो चुके थे …वजह थी उनकी पत्र लिखने की आदत जो अभी भी बरकरार थी उनमे, बावजूद इसके की वह अपनी मोहब्बत में पत्राचार करके फेल हो चुके थे…..दरअसल ये सब कमाल था वारेन हेस्टिंग्स की डाक का जी हाँ यही शख्स तो था जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी के गवर्नर जनरल का रूतबा मिलने के बाद अपने शासन में डाक सुविधा को आम जनता को मुहैया कराई और एक डाक की फीस एक आना १०० मील ….यही डाक ने तो राघव दादा को कई रंग दिखाए थे …जिसमे लाल रंग की छटा ज्यादा प्रभाई थी …भारतीय डाक का डाकिया राघव दादा की वजह से उदय प्रकाश के वारेन हेस्टिंग्स का सांड बन चुका था कही उससे भी ज्यादा भयावह ……..

राघव दादा अब भारतीय डाक के उस इम्पेरियल लाल रंग वाले बक्से का पूरा इस्तेमाल अपने गृह जनपद में कर रहे थे …एक लेखपाल की नौकरी ले चुके थे अभी तक खतों के माध्यम से और अब एक डिप्टी कलेक्टर के पीछे पड़े हुए थे …खतों का सिलसिला मुसलसल जारी था और खतों की मंजिल होती थी दस जनपथ और रायसीना हिल ………राघव दादा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से नीचे के ओहदे वालों को अमूनन ख़त नहीं लिखते थे यह विशेषता थी उनकी ! ….शनै: शनै: शाहपुर कचहरी में जब दादा की आमद होती तो वहां के सरकारी अफसर और कर्मचारी राघव दादा को देखकर कन्नी काटने लगते ……ये सब कमाल था दादा के वारेन हेस्टिंग्स के डाक का ! ….इश्क से हाथ धो बैठे थे पर भारतीय डाक का इस्तेमाल करने की आदत अभी भी मौजूं थी और शायद और पैनी हो चुकी थी अब तलक के समयावधि में ……..कभी भारत जैसे देश में हरकहरे एक जगह से सरकारी डाक दूसरी जगह पहुंचाते थे या व्यक्तिगत सूचनाएं लोग बाग़ एक दुसरे के रिश्तेदारों के माध्यम से …कभी कबूतर भी था जो प्रेम संदेशों की अदला बदली कर दिया करता था …लेकिन ये सारे माध्यम खुद सुनसान राहों जंगलों और डाकुओं से डरते थे ….पर वारेन हेस्टिंग्स का डाकिया जब अवतरित होता राघव की डाक लेकर तो बड़े बड़ों की घिग्गियाँ बंध जाती……..

भारतीय डाक पारस के बादशाहों से लेकर सुल्तानों की सुल्तानी तक के सफ़र के बाद द ग्रेट ईस्ट इंडिया की इन्त्जामियाँ में ख़ास से आम हुई … ब्रिटिश भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की रीढ़ बनी भारतीय डाक …कहते है की १९४२ के दौर में बापू जब क्रान्ति कर रहे थे तो ब्रिटिश भारतीय डाक द्वारा किसी भी चिट्ठी पर सिर्फ गांधी, बापू या महात्मा लिखा होने भर से वह डाक बापू तक पहुँच जाती थी वह चाहे जहां हो पूरे भारत वर्ष में …..ऐसा ही कुछ क्रांतिकारी प्रभाव था राघव दादा में की डाकिया उनकी प्रेमिका के मोहल्ले में पहुंचा नहीं के लोग जान जाते थे की उन्ही का ख़त आया होगा …….ख्याति तो थी बापू विख्यात थे भारत वर्ष में तो चिट्ठी पहुँच जाती थी वो कही भी हो बिना पते के …और दादा कुख्यात थे चिट्ठी पहुँचने से पहले ही डाकिए की सूरत से लोग भांप जाया करते थे! की आ गयी ……..!!१ आज कुछ ऐसा ही शाहपुर के सरकारी तंत्र के लोगों में भय व्याप्त रहता है …अर्दलियों के चिट्ठी देने से पहले अफसर पूंछते की राघव से सम्बंधित तो कोइ पत्र नहीं है ? और अर्दली डाकियों से पूंछते उसका तो नहीं है कुछ? …..

बात इस्तेमाल की है भारतीय डाक ने कई इतिहास रचे ..हर बुरी परिस्थितियों में उस व्यवस्था ने जनमानस का साथ दिया …और आज भी डाकिए मुस्तैद है अपने काम पर सूचनाओं से लैस …इलेक्ट्रानिक संदेशों की व्यवस्था ठप हो जाने पर यह इंसानी मशीनरी हर वक्त काम करती है हर आपदा में …..पत्रों की एक और खासियत है की इनकी सनद ज्यादा पुख्ता रहती है …किसी और सूचना के माध्यम के बजाए …और इनका प्रभाव भी ……

इतिहास सिखाता है दादा ने भी सीखा होगा ….की हर वह व्यक्ति जो जितना अधिक चिट्ठीबाज़ था वह उतना ही अधिक महान हुआ ….मोहनदास नेहरू टैगोर आदि आदि …..पत्रों की रूमानियत और उनकी खासियत तो कोइ दिल वाला ही जान सकता है …दादा ने भी जाना आखिर जो वो दिलदार ठहरे ..पर इस्तेमाल का तरीका ज़रा तिरछा हो गया …! नतीजतन कहानी मोड़ नहीं ले पायी ! ….पर दादा अब भ्रष्टाचार को चुनौती दे रहे है, भारतीय डाक के माध्यम से …उनके जज्बे को सलाम ….की जिन्दगी अब मुसलसल एक रफ़्तार और सीधी राह पर रफ्ता रफ्ता चल रही है …अब गाफिल नहीं है वह !

..राघव दादा की प्रेयसी काश ..खुद डाकिये से यह कह देती की “ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू …वो जान जायेगें ..पहचान जायेंगे ” तो ये डाकिये की डाक वारेन हेस्टिंग्स के सांड की तरह न होती वहां के लोगों में….पर अफसानों का क्या वे किसी पर रहम थोड़े करते है बस बयान कर देते है जस का तस !@

……यकीन मानिए ये वारेन हेस्टिंग्स की डाक लाने वाले डाकिए की सूरत को देखकर राघव दादा की प्रेयसी के उस मोहल्ले के लोग अब भी मुस्करा दिया करते होगे ………..इति

कृष्ण कुमार मिश्र

नैमिषारण्य, अट्ठासी हजार ऋषियों की पावन तपस्थली

नैमिषारण्य, नैमिष और नीमसार यह एक ही नाम है उस जगह के जहां कभी आर्यों की सबसे बड़ी मिशनरी रही, उत्तर भारत में ऋषियों यानी धर्म-प्ररचारकों का सबसे बड़ा गढ़। आप को बताऊं यह बिल्कुल वैसे ही जैसे अठारवीं सदी में योरोप और अमेरिका से आई ईसाई मिशनरियों ने भारत के जंगलों में रहने वाले लोगों के मध्य अपना धर्म-प्रचार किया और उन्हे ईसाई दीन की शिक्षा-दीक्षा दी, वैसे ही यह आर्य चार-पाँच हज़ार पूर्व आकर इन नदियों के किनारे वनों में अपने धर्म-स्थलों की स्थापना कर जन-मानस पर अपना प्रभाव छोड़ने लगे…धर्म एक व्यवस्था…एक कानून है और यह आसानी से जन-मानस को प्रभावित करता है और उनके मष्तिष्क पर काबू भी ! नतीजतन धर्म के सहारें फ़िर यह धर्माचार्य जनता पर अपना अप्रत्यक्ष शासन चलाना शुरू करते है…उदाहरण बहित है…रोम का पोप…भारत में बौद्ध मठ ….इत्यादि…!

दरअसल ये धर्माचार्य आम मनुष्य के अतिरिक्त सर्वप्रथम राजा पर अपना प्रभाव छोड़ते है, राजा उनका अनुयायी हुआ नही कि जनता अपने आप उनसे अभिशक्त हो जाती है, यदि हम इतिहास में झांके को देखेगे..चन्द्रगुप्त मौर्य पर बौद्ध धर्माचार्यों ने अपना प्रभाव छोड़ना शुरू किया वह आशक्त भी हुआ बौद्ध धर्म से किन्तु चाणक्य के डर से वह बौद्ध नही बन पाया, कनिष्क कुषाण था किन्तु आर्यावर्त के स्नातन धर्माचार्यों के प्रभाव से वह शिव यानी महादेव का उपासक हो गया औय ही हाल तुर्किस्तान से आये शकों का था जो महादेव के अनुवायी बन छोटे छोटे छत्रपों के रूप में उत्तर भारत पर राज्य करते रहे । धर्म का वाहक ऋषि जो गुरू होता था राजा और प्रजा का, राम को ही ले तो दशरथ से ज्यादा हक़ वशिष्ठ और विश्वामित्र का था राम पर….जैसा गुरू कहे राजा वही करता था यानी अप्रत्यक्ष रूप से धर्म का ही शासन…चलो ये भी ठीक धर्म कोई भी हो सही राह दिखाता है….लेकिन यदि धर्म के वाहक ही अधर्म के कैंन्सर से ग्रस्त हो जायें तो उस राज्य और वहां के रहने वालों का ईश्वर मालिक…..।

आप सब को इतिहास की इन खिड़कियों में झाकने के लिए विवश करने की वजह थी, मेरा  आर्यावर्त में नैमिष के उस महान स्थल का अवलोकन व विश्लेषण जिसने मुझे स्तब्ध कर दिया ! धर्म के विद्रूप दृष्यों और क्रियाकलापों को देखकर..अब न तो वहां कॊई धर्म का सदगुणी वाहक है और न ही जन-कल्याण की भावना, और न ही कोई ऐसा धर्माचार्य जो मौजूदा लोकतान्त्रिक इन्द्र को यानी लाल-बत्ती वालों को प्रभावित कर अच्छे या बुरे (अपने विचारों के अनुरूप) कार्य करवा सकें…यदि कुछ बचा है तो अतीत का वह रमणीक स्थल जहां कभी कल-कल बहती आदिगंगा गोमती का वह सिकुड़ा हुआ रूप जो एक सूखे नाले में परिवर्तित हो चुका है, घने वनों की जगह मात्र छोटे छोटे स्थल बचे हुए है जहां कुछ वन जैसा प्रतीत हो सकता है ! और ऋषि आश्रमों में जहां हज़ारों गायें विचरण करती थी, हज़ारों बच्चे संस्कृत में वेदों की ऋचाओं का उदघोष करते थे और आचार्य धर्म पर व्याख्यान देते थे…इन सबकी जगह अब वह हमारी निश्छल और गरीब जनता को ठगने और उनका आर्थिक व शारीरिक शोषण करने वाले मनुष्य बचे हुए…गन्दे, भद्दे, मूर्ख, चतुर, कपटी, लोभी, लालची, मनुष्य जो सन्त के चोले में हमारे निश्छल, भोले, सादे, व धर्म भक्ति में डूबे लोगों को वह कपटी, साधनहीन सन्त अपनी जीविका और अय्याशी का साधन बनाने की फ़िराक में तत्पर दिखती है, उनकी आंखों में लोभ की चमक साफ़ दिखती है..! बस वे इसी फ़िराक में रहते है कि कब हमारे गांवों से आये हुए तीर्थ-यात्रियों में से कोई व्यक्ति उनके चंगुल में फ़ंसे…!

यहां एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि अतीत में धर्म के सहारे सीधे या अप्रत्यक्ष रूप पर जनता पर आधिपत्य करने की कोशिश में धर्म कानून की किताब की तरह कार्य करता था, जिसका पालन शासक और शासित दोनो किया करते थे…लोकतन्त्र और शिक्षा के प्रसार ने अब उस धार्मिक शासन ्यव्स्था को ध्वस्त तो कर दिया किन्तु जन-मानस के मस्तिष्क में वह धर्म और उसका डर अभी भी परंपरा के रूप में पीढी दर पीढी चला आ रहा है, हां अब न तो योग्य ऋषि है और न ही अन्वेषणकर्ता मुनि, सन्त इत्यादि बचे है वो लकीर के फ़कीर भी नही है, बस आडम्बर से लबा-लब भरे विषयुक्त ह्रदय वाले मनुष्य धर्म के भेष में शैतान है जिनकी उपमा किसी जानवर से भी नही दी जा सकती..क्योंकि वह जानवर क्रूरता और दुर्दान्तता के शब्दों सेब मानव द्वारा परिभाषित किया जाता है उसके पीछे उसके जीवित रहने की विभीषिका होती है न कि इन कथित सन्तों की तरह कुटिल कूतिनीति, लालच …..

धर्म के नाम पर बड़े बड़े गढ़, आश्रम और तीर्थ, मन्दिर इत्यादि का निर्माण सिर्फ़ व्यक्तिगत महत्वांकाक्षाओं का नतीजा होते है, जन-कल्याण और शिक्षा की भावना गौढ होती है…नतीजतन ये धर्म स्थल व्यक्ति के अंह और उसके द्वारा बनाये गये नियमों को जनता पर थोपने का अड्डा बनते है..तकि धन, एश्वर्य और वासना की पूर्ति कर सके ये कुंठित धर्माधिकारी।

मैने अपनी इस यात्रा में एक हजारों हेक्टेयर में फ़ैले आश्रम को देखा जहां सैकड़ो ऋषि कुटिया बीरान पड़ी, गौशालायें सूनी है, और संस्कृत शिक्षा देने वाले विद्यालयों में ६०-७० बच्चे, जिन्हे ठीक से इस कठित देव-भाषा का भी ज्ञान नही दिया जा सका, उनसे पूछने पर की आगे चलकर क्या बनना चाहोगे तो उन्हे पता नही…हां एक बच्चे ने बड़े गर्व से कहां हम यहां से पढ़ाई करके यज्ञाचार्य, वेदाचार्य और न जाने कौन कौन से चार्य बनने की बात कही..कुल मिलाकर उन्हे भिखारी बनाने की जुगत और बड़े होकर मां बाप को पानी न दे सके इसकी योजना बस यों ही भटकते रहे कि कब कोई धर्म भीर मिले और वे उसे लूट सके…!

जब मैं इस विद्यालय के भीतर घुसा तो बच्चे अपने सिखाये गये तरीको का इस्तेमाल करने लगे…जैसा कि उनके गुरूवों ने बताया होगा कि किसी आगन्तुक की घुसपैठ पर तुम सभी को कैसा व्यवहार करना है..ताकि यह विद्यालय और बालक ऐसे प्रतीत हो सके जैसे की  चौथी- पाचवींं सदी के गुरूकुल या राम की उस कथा के गुरूकुलों की तरह….बच्चे पेड़ो के चारो तरफ़ बने चबूतरे के आस-पास इकट्ठा होने लगे अपने वस्त्र संभालते हुए…एक-दो कमजोर टाइप के बालक (शायद गुरू के आदेश पर जबरू टाइप के बच्चो ने यह मेहनत वाला नाटक करने के लिए कमजोर टाइप के बालकों को चुना होगा)रेत में झाड़ू लगाने लगे..जबकि बुहारने जैसा वहां कुछ नही था…

मैनें उन बच्चों से पूछा की भाई कोई फ़ीस भी पड़ती है..बोले हां ३० रूपये महीना मैने कहां ये तो सरकारी स्कूलों से भी ज्यादा है…तो एक सुधी बालक बड़े संतुष्ट भाव से बोला तीन सौ रूपये में खाना पीना और रहना सब कुछ तो है………

मजे के बात गुरूवों अता पता नही शायद वो सब कही शादी-ब्याह या हवन कराकर अपनी जीविकापार्जन में लगे थे, मैने पूंछा प्रिंसिपल…तो बोले समाधि में है….समाधि में है तो यह सुनकर दो विचार है, कि समाधि दो तरह की होती है..एक मरने के बाद दफ़ना दिए जाने पर और दूसरे जीवित रहकर ध्यान की अवस्था में शिव की तरह…अब मरा हुआ व्यक्ति प्रोसिंपलगिरी तो नही कर सकता सो मैने सोचा आह..क्या बात है अभी भी समाधि लेते है ये महापुरूष..किन्तु..बड़ी देर में पता चला किसी सन्त की समाधि बनी होगी वहा अब बड़ा भवन है पंखा-कूलर इत्यादि से सुसज्जित वही आराम फ़रमा रहे है।

एक बड़े भवन में माइक पर भाषण देता सन्त रूपी मूर्ख चाण्डाल और उसके बीच बैठे कुछ गांव के सीधे-साधे धर्म की पट्टी बाधें गवांर…मुझे उन सब पर बड़ा तरस आया…वह चाण्डाल बार बार माइक पर रटे जा रहा था धर्म पुस्तकों का अध्ययन करो…करो….उन अनपढ़े लोगो से…!

कहते है भगवान विष्णु का चक्र गिरा था तो पाताल तक चला गया और वही पानी निकलता रहता है….!! इस गोलाकार कुऎं रूपी रचना के चारो तरफ़ भी बाउन्ड्री बाल बनाकर चक्र तीर्थ का निर्माण हुआ, यहां प्लास्टिक की थलियाम कड़े और पूजा सामग्री से लबलब भरा यह जल जिसमें श्रद्धालु स्नान कर रहे थे…और उन श्रद्धालुओं से अधिक गोते लगा रहे थे पण्डे (पूजा इत्यादि कराने वाले) क्यों कि जनमानस द्वारा पैसा आदि या चांदी स्वर्ण इत्यादि को चक्र में प्रवाह किया जाता है..जिसे ये लालची पण्डे दिन भर पाने में तैर तैर कर खोजते रहते है……

कुल मिलाकर कभी यह निर्जन स्थान आर्यों के छिपने और बसने की जगह बनी,  पहले से रह रही जातियों और मूल भारतीयों से जिनको इन्होंने राक्षस कह कर पुकारा ! और यही दधीच ऋषि ने इन्ही भारतीयों से लड़ने के लिए गायों से अपने शरीर पर नमक डालकर चटवाकर अपनी हड्डियों से धनुष बनवाने के लिए प्राण त्यागे…यह किवदन्ती है जो भी हो ये ऋषि आर्य राजओं के पक्षधर बन जनता में उनके विश्वास को कायम करने में तल्लीन रहते थे और राजनीति यही संचालित होती थी जैसा कि बाद में बौद्ध मठों में हुआ और कुछ सूफ़ियों ने किया….। सत्ता को हासिल करने में धर्म की तलवार का इस्तेमाल नया नही बहुत पुराना है…ईसाई और मुसलमानों से पहले …बहुत पहले से…!

एक बात और पुराणों के नाम पर बहुत से कलुषित विचारों वाले मूर्ख ऋषियों ने दर्जनों पुस्तकों को बूक डाला और हमारी जनता अन्ध-भक्त बन  देवताओं और महा-मानवो की वासनाओं की कथाये बड़ी भक्ति भाव से आज भी बाच रहा है टीका चन्दन और धूपबत्ती के साथ। यही वह स्थल है जहां मूर्खों ने तमाम मन-गढन्त देवी देवताओं की वासनाओं का लेखन किया जो दरसल लिखने वाले के दिमाग की उपज थी।

उत्तर भारत को इन आर्य आक्रान्ताओं ने इन्ही धर्माचार्यों की मदद से अपने अधिकार में कर लिया और यही कारण था कि भारत में पहले से रह रही जातियां इन आर्यों से अपने छीने हुए अधिकारों और संपदा को वापस लेने के लिए कुटिल ऋषियों को अपना निशाना बनाते थे…ये आर्यों के एजेन्ट ऋषि हवन यग्य आदि के नाम पर अन्न धन बटोरने में जुटे रहते थे भारतवासियों से और आर्य राजाओं की नीतियों को धर्म का जामा पहनाकर जनमानस को मूढ़ बनाते रहते है….

सिन्धुघाटी को नष्ट करते हुए ये आताताई पूरे उत्तर भारत में फ़ैल गये, धर्म के प्रचार-प्रसार की व्यवस्था आज की ईसाई मिशन्रियों से भी अधिक पुख्ता थी, धर्म को कानून बनाकर जनता पर अत्याचार करते हुए इन आर्यों ने हिन्दुस्तान की धरती को पर वर्न्शंकरों की फ़ौज तैयार कर दी, साथ ही पहले से रह रही मूल? जातियों को दक्षिण में खदेड़ दिया, इनकी सत्ता भी ब्रिटिश साम्राज्य की तरह या अरब के खलीफ़ा की तरह थी..वे गुलामों की फ़ौज भेजते और भारत की धरती पर गुलामों की फ़ौज जनता को अपना गुलाम बनाती…यानी पहले दर्जे का गुलाम दोयम दर्जे के गुलाम पर शासन करता है और लूट-मार का सामान लन्दन या बल्क-बुखारा भेजता…यही हाल था इन आर्यों का जो इन्द्र और उनसे भी बड़े किन्तु अघोषित देवताओं की गुलामी करते ये गुलाम भारत भूमि पर आये और यज्ञ्य के नाम पर यानी टेक्स वसूलते और इन्द्र को भेजते …यहां तक कि जबरियन इन्द्र की पूजा कराई जाती … इतना ही नही इन्द्र जैसे शासक अपने ही भेजे गये एजेन्टो यानी ऋषि पत्नियों के साथ बलात्कार भी करते और उस महिला पर चरित्रहीन होने का झूठा आरोप भी लगाते जिसे न चाहते हुए उस महिला के पति और जनता दोनों को मानन पड़ता। अजीब हालात थे..इन हरामखोर देवताओ और इनके गुलामों के…..आप को याद होगा भारत में आर्यों की वर्णशंकर संतानों ने उन्हे चुनौती दी..जैसा कि अमेरिकन ने कभी जंगे आजादी की लड़ाई अपनी ही कौम से लड़ी थी… हां मै बात कर रहा हूं कृष्ण की जिन्होंने इन्द्र पूजा को समाप्त कर गोवर्धन की पोजा करवाई यह इतिहासी शायद पहली लिखित घटना हो आत्म-स्वालम्बन की, स्वन्त्रता की…पराधीनता के खिलाफ़ कृष्ण का यह विद्रोह मन में स्वाधीनता व आत्मनिर्भरता का सुन्दर भान कराता है…एक वाकया और उस राम का जिसे हम आदर्श मानते है, यकीनन वह गर्व करने वाले व्यक्तित्व थे जो अपने पिता के आकाओं के विरूद्ध जाकर एक नारी के चरित्र पर लगे उस झूठे आरोप को मिटा डाला…हालांकि सत्ता के शीर्ष पर बैठे इन्द्र को दण्डित करने का साहस नही दिखा सके किन्तु उस ऋषि पत्नी पर लगे आरोप समाज से बहिष्ख्रुत महिला की दोबारा वापसी का श्रेष्ठ कार्य दशरथ पुत्र राम ने अवश्य किया…..इतिहास की ये घटनायें हमें यह बताती है कि कैसे धर्म कानून बन अत्याचार और शोषण का माध्यम बना…जो आज भी जारी है….

धर्म स्वयं की अभिव्यक्ति है और साधना भी स्वयं की अभिव्यक्ति है और ईश्वर भी ! फ़िर क्यूं अन्यन्त्र खोजते है हम इसे….सद-शिक्षा, सेवा, जन-कल्याण की भावना से किए गये धार्मिक अनुष्ठान तो समझ आते है पर कपटी लम्पट और अति महात्वाकाक्षीं कथित सन्तों के पीछे पीछे झण्डाबरदारी करते हमारे साधारण व आस्थावान लोग जो प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष इन महानुभावों की कीर्ति की बढोत्तरी का साधन मात्र बन कर रह जाते है यह बात मेरी समझ नही आती !

 किसी जाति को गुलाम बनाना हो तो उसकी भाषा, उसका इतिहास और उसका धर्म बदल दो वह जाति आप की अनुयायी हो जायेगी…और आर्यों ने, मुसलमानों ने और  ईसाईयों ने यही किया…और बदल डाला पूरा समाज जो परंपरा के रूप में बचा वह आज भी विद्यमान है कही कही…!

अपनी यात्रा के अन्तिम चरण में आदि देव विशुद्ध भारतीय महादेव देव-देवेश्वर के दर्शन के किए जो नैमिष से कुछ ही किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में गोमती के तट पर एक वन में स्थापित है…प्राचीन शिला का यह शिवलिंग अदभुत है।

इस पूरे तीर्थ स्थल पर मुझे कुछ अच्छा लगा तो वे नि्ष्कपट, आस्थावान, लोगो के  चेहरे जिनमें निश्छलता और धर्म के प्रति अगाध प्रेम साफ़ दिखाई दे रहा था..किसी कपटी सन्त के बजाए मुझे इन चेहरों के दर्शन मेरी इस यात्रा की सफ़लता थे।

कृष्ण कुमार मिश्र

© Krishna Kumar Mishraएक हमारे इलाके की बात याद आ गयी

जब बात चली एक हमारे नजदीकी शख्शियत की जिनका अचानक देहावसान हो गया है, और उनके खानदान के चील-बिल्लौआ टाइप के लोग उनकी अकूत संपत्ति का कैसे उपभोग करेंगे…इस सवाल ने मेरे शातिर दिमाग में एक किस्सा घुमड़ गया…आप सभी सुने…वैसे तो ये किस्सा मैने अपने अनुज समान मित्र को सुनाया था पर जरूरी समझा की आप से भी साझा करू !

सुने….

ध्यान से

कि एक बार मितौली के समीप एक गांव में ठाकुर साहब रहते थे

उनका बकरा कोई उठा ले गया…

ठाकुर साहब का दबदबा था सो

जल्द ही उन्हे पता चल गया

कि बुधुवा पासी ले गया है…..

साला बड़ा खुरापाती था

सामने तो ठाकुर साहब की जी हजूरी करता था

पर मौका लगते हाथ साफ़ कर गया

ठाकुर साहब ने बहुत खोजा न तो साला बुधुवा मिला और

न ही बकरा

अब ठाकुर साहब बहुत परेशान

शाम को खाना न खाये

ठकुराइन थाली लिए- लिए घूमे

जिसमें गोस्त इत्यादि सब था

पर ठाकुर को एक ही बात खाये जा रही थी

जो उन्हे खाने नही दे रही थी

पूछो कौन सी बात ?

वो बोले ठकुराईन

मुझे इस बात का दुख नही कि साला बुधुवा खसी बकरा  चुरा ले गया है…..

मलाल इस बात का है..कि वहु सार बेझरी (चने, बाजरा, मक्का इत्यादि  का आटा)  की रोटी कि साथ मस्त बकरे का गोस्त खाई……

!!!!!!!!!!!!!!!

इति

आप को पता होगा उस दौर में सम्पन्न लोग ही गेहूं की रोटिया खाते थे..गरीबो को बाजरा, जौ, मक्का और चना नसीब होता था

……

कृष्ण कुमार मिश्र

© Krishna Kumar Mishra

© Krishna Kumar Mishra

एक बात जो ठीक से नही कह पा रहा…..

आज गुजरा शहर के कोर एरिया से..तो कुछ अध्यापक बन्धु मिले तो ठहर लिया सड़क के किनारे, तभी एक फ़ल वाला अपनी चलती फ़िरती दुकान को घर ले जाने की तैयारी में था, और उसने कुछ खराब हो चुके अंगूर सड़क के किनारे लगा दिए…मैने सारे मामले को अपने हिसाब से गढ़ लिया ..कि कोई गाय आयेगी और उसे ये अंगूर खाने को मिल जायेगें…तभी एक अधेड़ आदमी उन्हें बटोरने लगा बड़े इत्मिनान से और जब सारे सड़े-गले अंगूर उसकी थैली में समा गये तो वह बड़े इत्मिनान से साईकिल में थैली को टांगकर चल पड़ा…देखिए यह है आवश्यकता का एक रूप जो व्यक्ति और हालात के हिसाब से बदलता रहता है..एक के लिए जो अंगूर खराब हो चुके थे..दूसरे के लिए बेशकीमती थे….इसलिए मित्र संसार में हर वस्तु कीमती है..मोल आप को लगाना है अपनी जरूरत के हिसाब से….आइन्दा से किसी भी चीज को हिकारत से मत देखिएगा…पता नही वह किसी के लिए कितनी कीमती हो..

कृष्ण कुमार मिश्र

13 अप्रैल 2011

हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

Mahadeo

Mahadeo

सोने-चाँदी से नहीं किंतु

तुमने मिट्टी से दिया प्यार ।

हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

१९४८ में लिखी गयी ये पंक्तिया हमारे गावॊं के किसानों पर है जो अन्नदाता है समाज का जिसे शत शत नमन!

किन्तु आज मै इतिहास के उस पन्ने पर दृष्टि डाल रहा हूं जो गौर तलब नही है हमारे मध्य मैं उस ग्राम देवता की बात करना चाहता हूं जो हमारे गावों में लोग अपने स्वास्थ्य, बीमारी, चोरी, डाकैती और महामारी से बचने के लिये ग्राम देवता को पूजते है खासकर महिलायें । यहां यह बताना जरूरी है कि महिलायें ही हमारे धर्म, पंरपरा, और रीति – रिवाज की वाहक एवं पोषक होती है एक पीढ़ी से दूसरी .तीसरी……….!  यही सत्य है !

आज भी ग्रामीण भारत के ग्रामों में स्त्रियां तमाम तरह के पारंपरिक धार्मिक रिति-रिवाजों का आयोजन करती है और इन आयोजनों के विषय में पुरुषों को कोइ खास मालूमात नही है या फ़िर वें यह जानने की कोशिश नही करते ।

कुछ बाते मै यहां बताऊगा जो एतिहासिक महत्व की है जिन्हे मेरी मां ने मुझे बताया, मेरे गांव मैनहन में जो देवता लोगों के द्वारा पूजित होते है वह इस प्रकार है भुइया माता, प्रचीन मंदिर, देवहरा, गोंसाई मंदिर, मेरे घर के सामने २०० वर्ष पुराना नीम जहां शिव भी स्थापित है, मुखिया बाबा के दुआरे का नीम, सत्तिहा खेत (सती पूजन) और एक और स्थान जो गांव के पश्चिम ऊसर भूमि में स्थित है की पूजा होती है मैने अपने जीवन में इन स्थलों पर पुरूषों को पूजा करते नही देखा कुछ वैवाहिक कार्यक्रमों  में शायद मुझे कुछ याद है कि कुछ पूरूष खेत में पूजा करने जाते थे ।

इन सभी स्थलों का अपना इतिहासिक महत्व है जो हज़ारों वर्षो की कहानी कहता है । आज पूरूषों की बात तो छोड़ दे महिलायें भी इन रीति-रिवाज़ों से अलाहिदा हो रही है । शायद कल हमारा ये इतिहास हमारी पीढ़ियों के लिये अनजाना हो ।

विदेशी परंपराओं का प्रभाव हम पर इतना भारी पड़ रह है कि हम अपनी परंपराओं से विमुख होते जा रहे है  ।

क्यों भाई अब आप ही बताइय़े कि एक फ़िल्म से आयातित हुआ वैलेनटाइन डे क्या हमारे गुरू पूर्णिमा पर या किसी अन्य दिवस पर भारी नही है ?

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

09451925997