Akbarअकबर-द साइंटिस्ट

जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने ईजाद किया रिफ्रिजरेशन का सिद्धांत …

फ्रिज का प्रवर्तन भारत भूमि से …

मैनहन गाँव के लोगों ने की अविष्कार की पुनरावृत्ति …

रेफ्रीजरेटर का आविष्कार भारत के बादशाह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने सन 1585 से पूर्व में किया जब उनकी राजधानी फतेहपुर सीकरी हुआ करती थी, आइन-ए-अकबरी में अबुल फज़ल ने अकबर के पानी ठंडा करने के तरीके को कई मर्तबा लिखा है अपने दस्तावेज में, सबसे ख़ास बात यह है इस दौर में पूरी दुनिया में अकबर द्वारा ईजाद किया हुआ वैज्ञानिक तरीका कहीं और नहीं मिलता, योरोप और अमरीका में भी लोग बाग़ बर्फ से ही पानी व्  खाद्य पदार्थों को ठंडा व् सुरक्षित रखते थे, अगर मौजूदा विज्ञान की बात करें तो लोगों के घरों में बीसवी सदी के पहले दशक में विकसित रेफ्रीजरेटर पहुंचा, किन्तु इसके आविष्कार के लिए जद्दोजहद सन 1750 के आस पास शुरू हो चुकी थी, कहते है बेंजामिन फ्रैंकलिन ने उस वक्त वाष्पीकरण से तापमान पर पड़ने वाले प्रभाव पर प्रयोग शुरू किए थे, अपने एक रसायन विज्ञानी मित्र जान हैडले के साथ, फ्रैंकलिन के प्रयोगों को आगे बढाया अमेरिका के ही एक वैज्ञानिक ने जिसे ऑलिवर एवैंस के नाम से जानते है, वैसे इन्हें सारी दुनिया में भाप के इंजनों की बेहतरी के लिए जाना जाता है, जैकब पार्किंस को सन 1834 में रेफ्रीजरेटर के एक सफल माडल का पेटेंट मिला, एक ब्रिटिश पत्रकार जेम्स हैरिसन ने सन 1856 में रेफ्रीजरेटर के एक माडल को पेटेंट कराया जिसमें वाष्प-दबाव प्रणाली में ईथर, एल्कोहल और अमोनिया का इस्तेमाल होता था, इसके बाद जो मौजूदा फ्रिज हम देखते है वह सन 1913 में फ्रेड डब्ल्यू वाल्फ़ ने विकसित किया, इसके बाद बहुत से संशोधनों से गुजरा है यह ठंडा करने वाला यंत्र……दुनिया आज इन्ही अमरीकी और ब्रिटिश नागरिकों को जानती है इस मशीन के अविष्कारक के तौर पर….और यह रेफ्रीजरेटर शब्द भी इंग्लिश डिक्शनरी में अठारवीं  सदी में शामिल हुआ…जबकि इस मशीन के आविष्कार के अन्वेषण-कर्ताओं में भारत भूमि की पहल रही, जिसे इतिहास के कुछ पुराने और अप्रसांगिक हो चुके दस्तावेजों में कहा गया है.

कहते है की अकबर सिर्फ एक शासक नहीं थे उन्हें कीमियागिरी से लेकर वास्तुशास्त्र और तंत्र-विद्याओं तक में रूचि थी, और वह हमेशा तकनीकी कार्य करने वाले लोगों के मध्य जाकर स्वयं अपने हाथों से बुनाई कताई से लेकर जंगी साजों सामान के निर्माण में अपनी भागीदारी सुनाश्चित करते थे, अपनी गर्मियों की आराम-गाह जोकि बांस की झोपड़ी होती थी, जिसमे चारोतरफ खुशबूदार खस के परदे बांधे जाते थे और उन पर पानी डाला जाता था ताकि उन खस के पर्दों से गुजरने वाली हवाएं ठंडी हो जाए, इसे तब नैबस्त-गाह कहा जाता था, इस तरह यह शुरुवाती कूलर का माडल हुआ जो हिन्दुस्तान के आम व् ख़ास सभी में खूब प्रचलित रहा….

अकबर द्वारा किए गए इस आविष्कार के सन्दर्भ में अबुल फज़ल ने कहा की दूरदर्शी बुद्धि के उमड़ाव् के चलते जहाँपनाह ने पानी ठंडा करने का साधन उसी शोरे अर्थात बारूद से बनाया जो बहुत हलचल पैदा करने वाला है, और उनके इस आविष्कार से आम व् ख़ास सभी बहुत खुश हुए, यह एक नमकीन लोंदा होता है, उसे छलनी में रखा जाता है और उस पर कुछ पानी छिड़का जाता है, मामूली मिट्टी से अलग कर लिया जाता है, छलनी से जो कुछ छान कर नीचे गिरता है, उसे उबाल लिया जाता है, उसमे मौजूद मिट्टी से अलग कर लिया जाता है और उसके स्फटिक(बरबदंद) बना लिए जाते है, कांसा या चांदी या ऐसी किसी धातु की एक बोतल में एक सेर पानी डाला जाता है और उसका मुहं बंद कर दिया जाता है, एक छलनी में ढाई सेर शोरे में पांच सेर पानी मिलाया जाता है और उस मिश्रण में आधी घड़ी अर्थात १२ मिनट तक उस मुहं बंद बोतल को इधर से उधर घुमाया जाता है, बोतल के अन्दर का पानी बहुत ठंडा हो जाता है, एक शख्स एक रुपये में तीन चौथाई मन से लेकर चार मन तक शोरा खरीद सकता है….

भारत के पारंपरिक ज्ञान और उसकी प्राचीन सभ्यताओं में विज्ञान की समृद्धता को कोइ नकार नहीं सकता, दरअसल अबुल फ़जल ने अकबरनामा के तीसरे हिस्से में जिसे आईने अकबरी कहते है, उसमे भारत के प्राचीन विज्ञान का विवरण है, जाहिर है कि अबुल फ़जल अकबर के नवरत्नों में से एक थे और उन्हें अपने मालिक के लिए यह विशाल दस्तावेज तैयार करना था नतीजतन अकबर के किरदार की मुख्यता और भारतीय ज्ञान को अकबर से जोड़ कर प्रस्तुत करना उनके लिए लाजमी था, इतिहास साक्षी है की राजाओं के दरबारी कवियों ने बहुत ही सुन्दर व् ज्ञान से परिपूर्ण रचनाएं लिखी परन्तु उन रचनाओं में राजा के प्रति उस कवि की कर्तव्य-निष्ठा तो रहती ही थी साथ में चापलूसी और अतिशयोक्तियों से भरे अल्फाजों की दास्ताँनें भी, इसलिए निरपेक्षता की उम्मीद कम ही होती थी, इसलिए इन सम्राटों के दरबारी दस्तावेजों में लिखे हुए किस्सों से इतिहास को भांप तो सकते है परन्तु स्पष्ट कुछ भी देख पाना मुमकिन नहीं होता है इसीलिए इतिहास हमेशा से रिसर्च का विषय रहा है, की उस काल के हालातों का निरपेक्षता से जायजा लेकर उसे दोबारा लिखा जाए ताकि लेखक की भावन जो लालच, और अंध-भक्ति से लिपटी हुई हो तो उसे छान कर उस निर्मल अतीत को देखा और गुना जा सके…….

हम सभी जानते है की रासायनिक अभिक्रियाओं की शुरुवात उष्मा के फैलाव व् उसके जज्ब होने के कारण होती है, वाष्पन से तापमान परिवर्तित होता है, यह तथ्य भले शहंशाह न जानते हो और न ही वे मैनहन गाँव के किसान पर इस रासायनिक अभिक्रिया से पानी को ठंडा कर लेने की जुगत उन्होंने हासिल की…

  बारूद यानि सल्फर, चारकोल और पोटेशियम नाइट्रेट का मिश्रण, इसका आविष्कार नवी सदी में चाइना में माना जाता है,परन्तु वास्तविकता में साल्टपीटर यानि बारूद का आविष्कार भारत में हुआ, जीन बैपटिस्ट टेवर्नियर ने आसाम में इसके ईजाद की बात कही है…  मुख्यता प्राकृतिक तौर पर यह गुफाओं की दीवारों पर चमगादड़ों की ग्वानों (मल -मुख्यता: यूरिक एसिड) के साथ मिला हुआ होता है, जिसे शुद्ध किया जाता है, ताकि इससे शुद्ध पोटेशियम नाइट्रेट निकाला जा सके और उसे गर्म करके क्रिस्टल्स के तौर पर रखा जा सके, पोटेशियम नाइट्रेट, अमोनियम नाइट्रेट, और यूरिया नाइट्रेट ये सभी विस्फोटक पदार्थ है, सभी में नाइट्रोजन तत्व विद्यमान है किसी न किसी रूप में, अमेरिकन सिविल वार के दौरान वहां लोगों ने एक देशी विधि का इस्तेमाल किया जिसे फ्रेंच मेथड भी कहते है, घरों से कुछ दूर  खाद (पांस), भूसा, और मूत्र मिलाकर कई महीनों के लिए छोड़ देते थे, बाद में राख और पानी से उसे छान कर अलग कर लेते थे….कुलमिलाकर यूरिया का किसी न किसी रूप में बारूद बनाने में इस्तेमाल किया जाता रहा, वही यूरिया जो जीवों की उपापचयी क्रियाओं द्वारा किडनी में अपशिष्ट पदार्थ के तौर पर निर्मित होती है साथ ही कुछ अन्य तत्व पोटेशियम, मैग्नीशियम आदि भी उत्सर्जित होते है जीवों के शरीर से, बताते चले की यह यूरिया एक ऐसा कार्बनिक योगिक है जो प्रयोगशाला में पहली बार बनाया गया बावजूद इस मिथक के की कोई भी कार्बनिक योगिक प्रयोगशाला में निर्मित नहीं हो सकता है, और इस यूरिया को बनाने वाले थे एक जर्मन वैज्ञानिक फ्रेडरिक वोह्लर……

दरअसल पोटेशियम नाइट्रेट, या यूरिया नाइट्रेट ये दोनों विस्फोटक गुणों से युक्त है और इन दोनों के देशी निर्माण की विधियों में यूरिया का प्राकृतिक स्रोत यानि मूत्र का इस्तेमाल होता रहा है, अकबर का बारूद (चारकोल, सल्फर और पोटेशियम नाइट्रेट) और हमारे गाँव के लोग जो यूरिया का इस्तेमाल करते है चीजों को ठंडा करने के लिए, दोनों में नाइट्रोजन तत्व व् वाष्पीकरण से तापमान में परिवर्तन की समानता है….पूरी दुनिया में 1585 के पहले कही भी रासायनिक प्रक्रियाओं से पानी को ठंडा कर पाने की कोइ विधि जानकारी में नहीं है, तो यह साबित हो जाता है की अबुल फ़जल के जहाँपना जलाल्लुद्दीन मुहम्मद अकबर ही इस ईजाद की हुई तकनीक के मालिक है. इसका जिक्र अशोक बाजपेई व् इरफ़ान हबीब ने भी अपने शोध में किया है.

तकनीक ने जब अपने पाँव फैलाए तो हासिए के आदमी तक वह पहुँची, उस तकनीक का लाभ भले वह आर्थिक कारणों से न उठा पा रहा हो किन्तु उसके मष्तिष्क में उस तकनीक का जादू जरूर पैबस्त हो गया, नतीजतन उसने अपने देशी तरीके ईजाद किए उस तकनीक की नक़ल में …जरूरत ईजाद कर लेती है वो तरीके जो आसानी से मुहैया हो सके इंसान को …और इसी जरूरत ने हमारे गाँव के लोगों को प्रेरित किया बिना किसी मशीनी रेफ्रीजरेटर के पानी, कोकोकोला और बेवरेज को ठंडा करने की तकनीक को ईजाद करने के लिए, वे अकबर की तरह शोरा यानि गन पाउडर का इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि वह सर्व सुलभ नहीं, उन्होंने एक नया तरीका खोजा यूरिया से पानी ठंडा करने का, उन्हें उष्मा गतिकी के नियम भले न पता हो और न पता हो पदार्थों के वाष्पीकरण से तापमान में परिवर्तन की प्रक्रिया किन्तु उन्हें यह मालूम चल गया की यूरिया में पानी मिला देने से उसमे बंद बोतल में कोई भी चीज रख दे तो वह कुछ मिनटों में ही ठंडी हो जाती है बर्फ की तरह …जाहिर है ग्रामीण क्षेत्रों में हर किसान के घर यूरिया मौजूद होती है और गर्मियों में गाँव से दूर खेतों में काम करता आदमी जिसे प्यास में ठन्डे पानी की जरूरत भी और इसी जरूरत ने यह तरीका ईजाद करवा दिया !

अकबर की इस खोज में भले उनके किसी जंगी सिपाही की तकरीब हो यह, पर नाम जहाँपनाह का ही जोड़ा जाएगा उनके नवरत्न अबुल फ़जल द्वारा, या फिर यह ईजाद वाकई में जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का ही हो, क्योंकि उनकी बौद्धिक अमीरी का जलवा तो हिन्दुस्तान ही नहीं बल्ख बुखारा से लेकर लंदन तक था, और हमारे गाँव मैनहन के लोगों की यह तरकीब जो मैं आप सब को सुना रहा हूँ, हो सकता है कालान्तर में मेरे नाम से ज्यादा जोड़ दी जाए क्योंकि दस्तावेजीकरण करने वाले या करवाने वाला ही प्रमुख होता है, शुक्र है की मुग़ल शासन में अबुल फ़जल जैसे लेखकों ने अकबरनामा जैसा वृहद दस्तावेज तैयार किया और आज हम इस दस्तावेज के दरीचों से कई सदियों पहले की चीजों को देख सकते है.

DSCF3458कृष्ण कुमार मिश्र

संस्थापक संपादक- दुधवा लाइव जर्नल

मैनहन

खीरी

भारत

9451925997

फ़ोटो क्रेडिट: flowersofindia.netअब सुगन्ध व फ़ूलों पर रईसों की बपौती नही रहनी चाहिए!

बात फ़ूलों की करना चाह्ता हूं, चूंकि मसला खूबसूरती और खुशबुओं का है तो थोड़ा हिचक रहा हूं! प्रकृति की अतुलनीय सुन्दरता का बखान करना वर्तमान में मुश्किल और पिछड़ेपन की निशानी है..इन महान साहित्य पुरोधाओं के मध्य…क्योंकि वह समाज की गन्दगी जो उनकी नज़र में पहले से मौजूद है, रिस्तों की कड़वाहट जो उनके घरों में विद्यमान है…दुखों, करूणाओं और प्रेम के तमाम विद्रूप आकार-प्रकारों को (जो उनके मन शाम-सबेरे हर वक्त उपजते रहते हैं) बेचते ये बुद्धि-विद्या के स्वयंभू अब प्रकृति की बात करने में शर्मसार होते है..कारण स्पष्ट है कि रेलवे स्टेशनों, बसड्डों  के बुक स्टाल्स पर प्रकृति  प्रेम नही तलाशा जाता..!.. और राजिनीतिक गलियारों में वोट और गोट की जगह प्रकृति समा ही नही सकती!…फ़िर कौन बेवकूफ़ इन्हे फ़ूल, पत्तियों पर लेखन के लिए पुरस्कृत कर देगा! खैर..मैं लिए चलता हूं कालीदास और उस दौर के…. प्रकृतिकारों का नाम भूल रहा हूं!!!!…..  जब सरोवरों में कमल-कमलिनियां पुष्पित होते थे और राज-कन्यायें उनमें स्नान करने आया करती थी…तो घोड़े पर सवार राज-पुरूषों के घोड़ो को अक्सर उन्ही सरोवरों पर पानी पिलाना आवश्यक होता था !! महलों और बगीचों में युनान,  मंगोलिया, अरब देशो से लाये गये वृक्षों, झाड़ियों, और लताओं की सुनहरी छटाओं का जिक्र रामायण काल से लेकर राज महलों व बौद्ध मठों तक विस्तारित था! मुगलों ने भी दुनियाभर से प्रकृति के विविध रूपों को अपने बगीचों में खूब इकट्ठा किया….फ़ुलवारियों के रूप में!…हाँ हमें अंग्रेजों को कतई नही भूलना हैं जिन्होंने दुनिया में मौजूद अपने सामराज्य के प्रत्येक भू-भाग पर उगने वाली सुन्दरता को भारत में रचा-बसा दिया जिसकी कुछ झलके अभी भी कुछ सरकारी आवासों में दिखाई दे जाती हैं!…मैं आप को याद दिला दूं एडविन लैंडसीयर लुटियन की जिसने नई दिल्ली का निर्माण किया और गवर्नर हाउस, रायसीना हिल जैसी जगहों को प्रकृति के इन रंगो से सरोबार….!! भारत के वन विभाग के पुराने डाक बंग्लों में कुछ योरोपीय व अफ़्रीकी वनस्पतियां अभी भी मिल जायेंगी जिन्हे ये अंग्रेज सुन्दरता और सुगन्ध के लिए इन जगहों पर लगाया था!….एक बात कहना चाहूंगा कि धरती पर कोई प्रजाति देशी-विदेशी नही होती…बशर्ते उसे धरती का वह हिस्सा उस प्रजाति को अपना ले…..! अब भूमिका शायद लम्बी व निरर्थक हो रही तो चलिए आप को ले चलते है उत्तर भारत के मैनहन ग्राम में जहा सरोवर भी है और आम-जामुन व पलाश के बगीचे भी जो धीरे-धीरे पतन की राह पर अग्रसर किए जा रहे हैं! १९८०-९० के भारत में बचपन में मैनें उन्ही गांवों में फ़ुलवारियां देखी जहां कोई मन्दिर मौजूद हुआ और उसके आस-पास पुजारी प्रवृत्ति के लोग…उन्हे रोज जो भगवान को पुष्प अर्पित करने होते थे! सो पुष्प की उप्लब्धता की व्यवस्था इन फ़ुलवारियों के रूप में होती ्थी! नही तो पुष्प व पुष्प-वाटिकायें आदि भारत में राजा-महराजाओं, मध्य भारत में नवाबों और माडर्न ईंडिया में अफ़सरों का विषय ही रहे, एक आम व औसत हिन्दुस्तानी रोटी के जुगाड़ में ही दिन काट रहा होता था उसे तो पेट भरने के लिए रोटी की सुगन्ध ही दरकार रही बेचारा पुष्प और उनकी खुशबुओं से बावस्ता हो इसका न तो उसे कभी मौका मिला और न ही खयाल आ पाया। हाँ इतिहास के पन्नों में जमींदारों और राजाओं की जो फ़ुलवारियां हुआ करती थी उनमें न तो आम हिन्दुस्तानी को जाने की इजाजत थी और न ही उस फ़ुलवारी के किसी पौधें का बीज या कलम किसी अन्य को मिल सकती थी..कारण स्पष्ट था कि आम हिन्दुस्तानी के घरों में पुष्प खिला तो उन जमींदार महाशय के रसूख में धब्बा लग जायेगा….एक वाकया याद आ गया है सुन ले….मेरे जनपद की तहसील मोहम्मदी जो कभी बरतानिया सरकार में  जिला होने का गौरव रख चुका है, वहां दिल्ली सरकार (मुगल) के समय डिप्टी कमिश्नर टाइप की हैसियत से रहने वाले जनाब ने एक बगीचा लगाया था उसमें केतकी (केवड़ा) का पुष्प कहीं से लाया गया, जो इस इलाके भर में अदभुत व अप्राप्त वनस्पति वन कर सैकड़ों सालों तक गौरवान्वित होता रहा…आम हिन्दुस्तानी जिसकी आज भी आदत क्या खून में यह पैबस्त है कि राजा के घर की घास-पूस भी कुछ अतुलनीयता अवश्य रखती है…और वह मूर्ख उस सामान्य बात या वस्तु को असमान्य ढंग से पेश करता हुआ अपने को गौरवान्वित करता आया है….हाँ तो वह साधारण सा केवड़ा केतकी वन सिर उसी बाग में खिलता रहा और हमारे लोग यहाँ तक की मीडिया गौरवगीत गा गा कर भरार्ने लगा….लेकिन सिलसिला नही टूटा….आदत में है जो…..कभी भारत की विविधिता का खयाल भी नही किया कि जहां हर देवता के सहस्र नाम हो, जहं की भाषा पर्यावाचियों से लबलब ठसी हुई हो..जहां एक कोश पर चीजों के नाम बदल जाते हों…इस बारे में भी नही सोचा…..बस केतकी जो वर्ष में एक बार  खिलती है!….दुनिया में सिर्फ़ मोहम्मदी में…संसार में नही होती…फ़लाने हसन द्वारा लाई गयी..केतकी….यह डाकूमेन्टेशन है हमारे मुल्क में…..बहुत जल्दी जहां चीजे बिना सोचे समझे अदभुत हो जाती है…और सरकार व पढ़े लिखे लोग उसे पढ़ते जाते है…बिना सोचे…जाने….साल दर साल केतकी खिलती रही….अभी भी खिलती है…….पूरे संसार में सिर खीरी जिले को यह गौरव प्राप्त है…..आखिर फ़िर वह लाये कहां से थे इस केतकी को?..जब संसार में सिर्फ़…..मजा तो तब आया जब मेरे एक परिचित बुजर्ग ने गर्जना करते हुए मुझसे कहा कि केतकी उनके यहां खिला…..उनकी गर्जना में सदियों से गुलाम रहे हिन्दुस्तानी के भीतर चेतना व आत्म-गौरव का झरना स्फ़ुटित हो रहा था…जैसे वह तोड़ देना चाहते हो उन जंजीरों को जो सिर्फ़ यही कहती हो कि यह पुष्प सिर्फ़ राजा या नवाब के बगीचे में खिलता हो….उन्हे मैं सलाम करता हूं उनके इस जज्बे के लिए….काश…

दरसल वो कही से केतकी का सम्पूर्ण पौधा लाये और उसे रोप दिया…इसमें एक टेक्निकल मामला है, मोहम्मदी वाले केतकी का पौधा जमींदारी रहते तो आम आदमी को अपने घर लगाने की गुस्ताखी नही कर सकता था, लेकिन आजादी के बाद उसने जरूर प्रयास किए..किन्तु इस प्रजाति में नर व मादा पौधे अलग-अलग होते हैम..इसलिए जिसने भी एक पौध उखाड़ कर अपने घरों में लगाई तो नर व मादा में से एक की अनुपस्थिति उसमे पुष्पं के पल्लवन में बाधक बनी रही अंतत: यह मान लिया गया कि यह पौधा उसी बाग में खिल सकता है….नवाब साहब …के बाग …कोई कहता वह पौधे के साथ उस जगह से मिट्टी भी लाये थे..इसीलिए यह उसी बगीचे में खिल सकता है!….या कोई कहता भाई आदमी आदमी की बात होती है, उसके हाथों में…..जस!

खैर अब चलिए मैनहन में जहाँ मैने अपने पूर्वजों के घर के पुनर्निर्माण के साथ-साथ दुआरे पर फ़ुलवारी की परिकल्पना पर काम कर रहा हूं..आखिर आजाद भारत का बाशिन्दा हूं और फ़िजाओं में खुसबूं और सुन्दरता तलाशने का मुझे पूरा हक है! तो मैने पहले चरण में…हरसिंगार, चम्पा, चमेली, रात के रानी, अलमान्डा, बेला, मालती,  के पौधे रोपे हैं, दूसरे चरण में मैं गन्धराज, मौलश्री, जूही, कचनार, बेल का रोपन करूंगा, साथ ही बरगद, सागौन जैसे विशाल वृक्ष भी मेरी कार में सुसज्जित है….जिन्हे कल रोपित किया जायेगा….फ़िलहाल मेरा अगला कदम गाँव के हर व्यक्ति कों तमाम खुशबुओं वाले पौधें भेट करने का निश्चय है!…लेकिन क्रमबृद्ध तरीके से…शायद रात की रानी मिशन…बेला…..चमेली….या फ़िर गन्धराज मिशन…एक वर्ष में प्रत्येक  सगन्ध पुष्प वालें पौधों  में एक सुगन्धित पौधा. वितरित करूंगा..जो हर घर में पल्ल्वित हो…..इसी इरादे के साथ.. पुष्पवाटिकाओं के चलन की शुरूवात करने की कोशिश…शायद रिषियों, और राज-कन्याओं और राज-पुरूषों के शैरगाह की जगहें आम हो सके आम आदमी के मध्य…जमींदारों, नवाबों और नौकरशाहों के बगीचों का मान तोड़ती ये पुष्पवाटिकायें एक औसत हिन्दुस्तानी को अपनी परेशानियों व तंगहालियों की गन्ध के मध्य विविध सुगन्धों का एहसास करा सके…और सुगन्धों व नवाबों के मध्य रिस्तों का मिथक टूट पाये….!

कृष्ण कुमा्र मिश्र

मैनहन-262727

भारतवर्ष

-कृष्ण कुमार मिश्र

अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं।

गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के लिए- राष्ट्रीय बीमा योजना।

(श्रम एंव नियोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार एंव आई सी आई लोम्बार्ड द्वारा)

भारत की एक बड़ी आबादी जो अपनी उंगलियों के चिन्ह खो चुकी है ये वही चिन्ह है जो सरकारी कार्यों  में व्यक्ति के होने का प्रमाण होते है और भारत की एक आबादी के लिए ये निशान भाग्य की भाषा के शब्द जिनमें ज्योतिषी शंख व चक्र जैसी आकृतियों की बिनाह पर जजमान को उसके जीवन में राज-योग को सुनश्चित करते है,…….!

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश के एक गाँव  में लगाई गयी, मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप के साथ, ताकि वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके और बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली कर ले। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के उपरान्त मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके, एक तरह का वेरीफ़िकेशन……..।

यहां मैं अपने लोगों की जिस जीर्ण-शीर्ण दशा से रूबरू हुआ उसके लिए शायद माकूल शब्द न प्रस्तुत कर पाऊं किन्तु मुझे किसी भी व्यक्ति की उंगलियों के निशान नही मिले जिन्हे स्कैन किया जा सके। गरीबी और शोषण की हर परिस्थिति ने उन्हे नोचा-घसोटा था, कहते हैं, आदमी के हाथो की लकीरे उसका भूत-भविष्य बताती है, तो यकीनन उनके हाथ मुझे उनका भूत-भविष्य और वर्तमान सभी कुछ बता रहे थे, जिसे कोई ज्योतिषी कभी नही पढ़ सकता था, क्योंकि लकीरे नदारत थी उनके हाथों से अगर कुछ था तो समय की मार के चिन्ह फ़टी हुई मोटी व भद्दी हो चुकी बिना रक्त की खाल जो हथेलियों के बचे हुए सख्त मांस व हड्डियों पर चढ़ी भर थीं। जिसे प्रबुद्ध जन कर्म-योग कहते है तो उसकी प्रतिमूर्ति थे,  इस मुल्क के अनियोजित विकास को ढ़ोने में इनके हाथों पर चढ़ी हुई कालिख हमें बता रही थी कि कैसे नगरीय सभ्यता के संभ्रान्त लोगों की तमाम अयास्सियों का भार यह अन्न-दाता ढ़ो रहा है।  लोगों के धूप व मौसम की तल्खियों से बुझे हुए चेहरे और थका हुआ शरीर जिसकी सख्त व काली हो चुकी खाल को फ़ौरी तौर पर देखकर कोई डाक्टर ये नही बता सकता था कि ये भयानक रक्त अल्पता की बीमारी से ग्रसित है, हाँ हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर रहने वाली औरतों की त्वचा स्पष्ट जाहिर कर रही थी कि ये मात्र सूखे मांस और हड्डियों का कंकाल हैं और इस विद्रूप व रूग्ण शरीर की इज्जत इनकी पीली त्वचा जरूर ढ़क रही है।  कुछ-कुछ परदा कहानी के फ़टे हुए परदे की तरह ………………।

तकरीबन ९० फ़ीसदी परिवारों की यही दशा थी जिनमें स्त्री-पुरूषों की दोनों हाथों की सभी उंगलियों के सारे प्रयास निरर्थक हो जा रहे थे। किन्तु स्कैनर एक भी निशान नही खोज पा रहा था। आखिरकार  उनके बच्चों के निशानों को स्कैन कर दिया जाता, जिनके हाथ अभी इस तरूणायी में सुरक्षित थे और शायद तैयारी भी कर रहे थे, अपनी लकीरों के अस्तित्व को खोने के लिए भविष्य में, मानों यही नियति हो इन हाथों की। यदि  नियमों का पालन होता और परिवार के मुखिया के ही निशान स्कैन करने की कवायद की जाती तो शायद दो-चार कार्डों के सिवा ( जुगाड़ द्वारा बनवायें गये अमीरों द्वारा बीपीएल कार्ड धारकों ) सभी को खाली हाथ वापस जाना पड़ता। और उन्हे ये भी दुख होता कि दिन भर की मशक्क्त में दिहाड़ी भी गयी और कार्ड भी नही मिला।  लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि ये कार्ड तो निरर्थक है क्योंकि परिवार के मुखिया के बजाय छोटे बच्चों की उंगलियों के निशान मौजूद है इन कार्डों में? तस्वीर किसी और की और उंगलियों के निशान किसी और के!  और कम्पनी द्वारा तैनात किए गये दैनिक वेतन-भोगियों को भी तो प्रति कार्ड पैसा मिलना था। जितने कार्ड उतना कमीशन। पर क्या कोई विकल्प था, जब गांव के सभी गरीबों के हाथों में तकदीर की रेखायें ही नदारद है। यही स्थित पूरे के पूरे जनपद में। कैसा विकास है यह! इससे बेहतर तो सूदखोरों का दौर था जब इन गरीबों की जमीनों को गिरवी रखते वक्त वह इनके अगूंठे का निशान तो पा जाते थे। यहां एक और स्थिति बनी जो मुझे शर्मसार करती थी बार-बार…..जब भी किसी की उंगलियों का निशान न मिले तो तकनीके खोजी जाय की सिर में अंगूठे को रगड़ों तो यह साफ़ भी हो जायेगा और बालों में लगे तेल से साफ़ व मुलायम भी, पर यहां किसी के सिर में चिकनाई की एक बूंद भी नही थी आखिर में कम्प्यूटर वाला लड़का अपने सिर से उस व्यक्ति का अंगूठा रगड़ता, यदि फ़िर भी काम नही चलता तो हार कर वह अपना अंगूठा रख देता स्कैनर पर, व्यक्ति और अंगूठा किसी और का,… पर  तो कभी कभी यह रगड़ने वाली युक्ति काम आ जाती, पर ज्यों ही मुझे उस व्यक्ति के अंगूठे के निशान को वेरीफ़ाई करने के लिए अपना अंगूठा स्कैनर पर रखता तो झट से कम्प्यूटर  वह निशान ले लेता और अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे  लोगों में एक खुशी की लहर दौड़ जाती कि अरे साहब का की उंगलियों के निशान कितने सुन्दर आ रहे है, झट से…….ले ले रहा है। और यही वह मौका होता जब मेरी गर्दन शर्म से झुक जाती, मुझे सिर्फ़ यही एहसास होता कि ये हमारे लोग है और मैं इन्ही का एक हिस्सा हूं, बिना रेखाओं वाली हथेलियों के मध्य  मेरी हथेली की भाग्य रेखायें मुझ पर मुस्करा रही थी……एक व्यंगात्मक हंसी!

मैं आमंत्रित करता हूं उन सभी भद्र जनों को जो ये हाल देखना चाहते अपने सो-काल्ड विकास का वो उत्तर भारत के किसी गांव में आये और कोशिश कर ले, अंगूठों के निशान पाने की वहा एक काले ठप्पे के सिवा कुछ नही मिलेगा।  जिन्हे ये गरीब या गरीबी रेखा के नीचे, टाइप के वाक्यों से संबोधित करते है।

भयानक ठण्ड और सर्वहारा की उत्सुक भीड़, मुझे बार-बार उनके कुछ पा लेने की लालसा लिए चेहरों में झाकने को विवश करती और मैं उन्हे ठगा हुआ सा पाता। दिन में बमुश्किल तीस ही  रुपया कमाने वाला व्यक्ति जिस पर सारे परिवार की रोटी की जिम्मेदारी हो वह अपने दिन की पूरी कमाई लिए उत्सुक खड़ा था बीमा कार्ड बनवाने के लिए! यहां यह बता देना जरूरी है कि बीमित व्यक्ति की कम से कम दो उंगलियों के निशान और उसके परिवार के किसी अन्य वयस्क सदस्य के निशान लेना जरूरी था। इसके बदले उस परिवार के मुखिया को एक प्लास्टिक कार्ड मिलना था जिसमें उसके अगूंठे और उंगलियों के निशान कैद थे, ताकि जब वह बीमार हो तो उस कम्पनी द्वारा निर्धारित सेन्टर पर जा कर उस कार्ड से अपनी पहचान करा सके कि असल व्यक्ति वही है। हाँ बीमा कम्पनी की शर्ते भी सुन लीजिये, यदि मरीज भर्ती होने की स्थित में नही है तो, नशा आदि के कारण बीमार हुआ है तो, महिला गर्भवती है तो,  इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नही है कि सर्प आदि ने काट लिया है तो, और प्राकृतिक आपदा हुई है तो वह बीमित राशि ३०,००० रुपये का लाभ नही पा सकता। हाँ बड़ी खामी यह कि यदि किसी परिवार के मुखिया न हो, यानी माँ-बाप की मृत्यु हो गयी हो तो अव्यस्क बच्चों के लिए यह बीमा नही हो सकता……..। जिस कुपोषण में महिलायें सिर्फ़ बीमार बच्चों को जन्म देती है वहां इस बीमा की शर्तों के अनुसार किसी जन्म-जात बीमारी का इलाज की सुविधा नही। फ़िर आप बतायें हमारे गांव के आदमी का कौन सा विमान क्रैश या कार दुर्घटनाओं से साबिका पड़ता है जो वह इस बीमित राशि का लाभ ले पायेगा?

गांवों में तो लोग अक्सर भांग-गांजा या बीड़ी आदि के कारण ही दमें आदि बीमारियों से ग्रसित होते है और प्राकृतिक आपदायें ही उनका सर्वस्व नष्ट कर देती है। और वैसे भी वह भर्ती होने वाली दशा तक अस्पताल नही पंहुच पाते है क्योंकि उनका प्राथमिक इलाज़ ही नही हो पाता जो वह भर्ती प्रक्रिया तक अपना दम साधे रहे।

हल्की बीमारी में यह कम्पनी बीमित राशि का लाभ नही देती। एक बात और ये लोग इतने भी सक्षम नही होते कि उन सेन्टरों तक पंहुच कर अपनी बात रख सके फ़िर आखिर ये तमाशा क्यों क्या उस कम्पनी और सरकारों को उनकी हाड़ तोड़ मेहनत के तीस रुपये भर लेने है। अरबो की आबादी वाले प्रदेश व देश के अरबों गरीब लोगों तीस-तीस रुपये का कर! जो खरबों की राशि में इकठ्ठा हो जायेगा। यह सवाल इस लिए और जरूरी हो जाता है कि सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर मौजूद मुफ़्त सेवायें ही इन्हे नसीब नही होती तो फ़िर ये कवायद क्यों!

अपने लोगों की बदहाली के सैकड़ों कारण तो मुझे याद आ रहे है किन्तु बिगड़े हुए इन भयानक हालातों में कौन सी जुगति इन्हे उबार लेगी ये बात अब मेरे मस्तिष्क से परे है……मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ।

यहां प्रश्न ये नही है बीमा कम्पनी से इन्हे लाभ मिलेगा या नही या यह योजना उचित या अनुचित है यहाँ एक भारी प्रश्न तो यह है, उन लोगो के लिए जो दम भरते है विकास है, ताकि वह देखे और सोचे कि हमारे देश का एक हिस्सा जो बद से बदतर हो रहा है, कही अतीत में उसे बेहतर कहा जा सकता है आज की इस विद्रूपता को देखकर।

तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नही होते। ये शेर कह कर मैं रूमानी नही होना चाहता और न ही अपने आप को और उनको झूठी तसल्ली।

क्या हमारा दरिद्र नारायण हमेशा ऐसी दुर्गति के साथ जीता रहेगा। एक भारत में इतनी असमानता क्या यही विविधिता है जिस पर बड़े बुद्धिजीवी गर्व करते है।

कृष्ण कुमार मिश्र

(वन्य-जीव विशेषज्ञ, स्वतन्त्र पत्रकारिता, फ़ोटोग्राफ़ी)

्मैनहन का जंगली पुष्प जो एक देश का राष्ट्रीय पुष्प भी है

सन १९८२ के आस पास का मसला है, मैं अक्सर मैनहन के दक्खिन बहती नहर में नहाने जाता था, एक दिन एक अदभुत व्यक्तित्व वाला मनुष्य जिसने शरीर को केसरिया रंग के कपड़ों से ढ़्क रखा था, चला आ रहा था मेरी ओर, चूकि बचपन से अभिवादन करने का संस्कार मेरे भीतर पैबस्त किया गया था सो मैं दौड़ा और उस महात्मा के चरण छुए उन्होनें कुछ आशीर्वचन कहे जो मुझे याद नही है अब। लेकिन उनके हाथ में पत्तो से बना हुआ पात्र था और उसमें कुछ पुष्प, रंग-बिरंगे खालिस देशी, भारतीय पुष्प जो गांवों के झुरुमुट में हुआ करते थे। उन्होनें मुझे और मेरे साथियों को पुष्प दिए और चले गये।

चेहरे पर गज़ब का नूर, आकर्षक शख्सियत, और भाषा में गम्भीरता यानी ये सब चीजों से, मैं एक बार फ़िर रूबरू हुआ एक नहर पर जो मेरे ननिहाल की तरफ़ बह रही थी, इसे इत्तफ़ाक कहे या कुछ और, बहती जलधारा के निकट उस सन्त से मेरा दोबारा मिलना, इन कड़ियों को आज़ मैं जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। मेरी इस मुलाकात में मेरे पिता जी और मैं दोनो एक साथ थे। नहर के दोनों तरफ़ सैकड़ों  वनस्पतियां पुष्पित और पल्लवित हो रही थी हरियाली अपने चरम पर थी और मानों वह  झुरूमुट दैवीय आभा से दैदीप्तिमान हो रहा था ।

हमें उस सन्त ने आशीर्वाद दिया और पुष्प भी। तब पिता जी ने बताया कि ये फ़ूल बाबा है और इनके दोनें(पत्तियों का बर्तन) में कभी पुष्प समाप्त नही होते। यह आस्था का विषय था।

मैं दुनियां में ज्यों ज्यों वक्त गु्जारने लगा दुनियादारी की समझ भी बढ़ती गयी, और उत्सुकता भी ! और वह फ़ूल वाला साधू भी मुझे याद रहा, इसी कारण जब मैने लोगो से पूछ ताछ की तो उस कड़ी में मेरी मां ने बताया कि एक बार उनके पिता जी यानी मेरे नाना ने फ़ूल बाबा के पुष्प न खत्म होने वाले राज़ को जानने की कोशिश की किन्तु पुष्प समाप्त होने से पहले फ़िर से उस पात्र में भर गये कैसे ? ये किसी को नही पता ।

खैर मुझे इस रहस्य में इतनी दिलचस्पी नही है जितनी उस व्यक्तित्व और उस परंपरा से है, फ़ूल बांटने वाली परंपरा।

पुष्प जो जीवन के उदभव की एक खूबसूरत परिस्थिति है पुष्प जो जीव को रूमानी एहसास कराती है, पुष्प जो प्रत्येक शुभ-अशुभ अवसर का साक्षी बनता है क्योकि यह जीवन को परिभाषित करता है ……….।

मुझे यह भी नही मालूम की उत्तर भारत के इस इलाके के फ़ूल बाबा के अतरिक्त कोई व्यक्ति इस परंपरा का पोषक है या था!

पुष्प जो कहानी बताते है जीवन की, बीज़ से अंकुर, अंकुर से पौधा, और पौधें से विशाल वृक्ष, फ़िर पुष्प की अवस्था जैसे प्रकृति ने देवत्व को प्राप्त कर लिया हो, ऐसी ही परिस्थिति है वनस्पति में पुष्प की, तदपश्चात पुष्प से फ़ल और फ़ल से फ़िर जीवन का बीज़…………………।

मैं अतीत के उन क्षणों को याद करता हूं और सोचता हूं कि फ़िर कोई व्यक्ति फ़ूलों के माध्यम से जीवन की कहानी बताता हुआ किसी मोड़ पर मिल जाए और मैं नतमस्तक हो जाऊ, अपने बचपन के उस वाकए की तरह।

कृष्ण कुमार मिश्र

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मेरे मन बहुत दिनों से एक ख्वाइस थी कि अपने गांव के बारे में कुछ लिखू वहां कि संस्कृति परंपरायें लोक कहानियां, लोक गीत एवं वहां का इतिहास और ऐसा मैं सिर्फ़ अपने गांव के लिये नही सोचता मै उस देश के सारे गांवों के लिये जिस देश को गांवो के देश के नाम से जाना जाता है और यह इस लिये भी जरूरी है की वैदिक काल के बाद जो भी थोड़ा बहुत लिखा गया वह विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा नही है पर इतिहास की तमाम झलकों का जखीरा जरूर है जिसमे से हम अपने जरूरत की चीजे प्राप्त कर सकते है हां चीनी यात्रियों अरबी यात्रियों व हिन्दूस्तान के शासकों के विद्वान दरबारियों ने अवश्य कुछ महत्व पूर्ण दस्तावेज तैयार किये ! बौद्ध साहित्य भी हमारे इतिहास व संस्कृति की तमाम बातें अपने आप में समाहित किये हुये है । किन्तु सबसे प्रभाव शाली और बेह्तरीन अन्वेषण ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज के साहसी अफ़सरों ने किया जिसमे हम अपने २०० वर्षों के भारत का सारा लेखा जोखा देख सकते है ।

यदि हम उत्तर भारत के गांव और उनके साहित्य, इतिहास आदि की बात करे तो मै पं० अमृत लाल नागर का नाम लिये बगैर नही रह सकता इसके अतरिक्त रामधारी सिंह दिनकर,  महापंड़ित राहुल सांकृतायन और पं० नेह्र्रू जिनकी किताबें हमारा मार्गदर्शन करती है पर बिडंबना ये है की नागर जी की तरह या फिर राहुल जी की तरह बहुत कम ही लोग हुये जिन्हों ने गांवों की छोटी बाते और पंरपरायें जो सदियों का इतिहास समेटें है अपने आप में उन्हे करीने से तलाशने की जरूरत है जिस तरह आल्हा खंड के बिखरे शब्दों को गांव गांव तलाश कर चार्ल्स इलियट ने इस काव्य को संकलित किया और दुनिया के सामने रखा बाद मे जार्ज अब्राहम ग्रियर्शन ने बाकायदे इसक अनुवाद कर और ज्यादा बल्लाड इसमेम जोड़े गांव – गांव घूम कर और दुनिया के सामने इसे “The nine lakhs or maro feud (1876)  के रूप मे सामने लाये। इसी तरह नागर जी ने गांव -गांव घूम कर १८५७ का इतिहास संकलित किया  ऐसे तमाम उदाहरण है जो प्रभावित करते है मुझे और इसी कारण मै निरंतर १५ वर्षों से विग्यान का विद्यार्थी होने के बावजूद अपने इतिहास और संस्कृति के बिखरे पन्नों को इन गांवों में तलाश रहा हूं जो अनमोल है आप भी आयिये हमारे साथ और सीखिये इन ग्रामीणों से जो कोइ विश्वविद्यालय आप को नही सिखा सकता।

कृष्ण कुमार मिश्र

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