मैनहन की तमाम सुबहों में मैने वो गीत सुने जिन्हे चुनुवा फ़कीर गाया करते थे। अब वे लोग जैसे विलुप्त हो गये या यूं कहे कि विकास की बलि-वेदीं पर चढ़ा दिए गये। भोर हो नही पाता था पांच या सात की तादाद में ये लोग पीले य सफ़ेद वस्त्रों से आच्छादित, नंगे पैर, और हाथों में कंमडल लिए गांव की फ़ेरी करते, गीत गाते जैसे ग्रामीणों को जगा रहे हो कि अब भोर हो गई है अपनी दिनचर्या शुरू करे !!  जब गांव की परिक्रमा पूरी हो जाती, तो वो गीत गाना बंद कर देते, और फ़िर एक दूसरी परिक्रमा करते और ग्रामीणों के द्वार-द्वार जाकर रुकते, जो कुछ मिलता चुपचाप ले लेते और चले जाते।

…………………………….चुनुवा फ़कीर

बस अन्तिम शब्द याद रहे है मुझे गीत धूमिल हो गया है कभी किसी बुजुर्ग से पूंछूगा और विस्तार से बताऊं गा आखिर कौन थे वे लोग।

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एक जीवित तोप की कहानी

किस्सा १८५७ के गदर का है जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अवध के एनेक्शेसन का फ़रमान जारी किया और राज महाराजाओं की जमीन जायजाद और असलहों आदि का ब्योरा मांगा, राजाओं को जैसे सांप सूघ गया उन्हे उनके अधिकार छिनते नज़र आये, नवाबी राज में जुगाड़ से अपनी आन-बान बचाये और जनता की मेहनत पर सुख भोग रहे ये रजवाड़े अब उदिग्न और दुखी थे तभी उधर सैनिक विद्रोह से मुल्क में एक हलचल सी मच गयी, सब अपने फ़ायदे-नुकसान की जांच-पड़ताल कर इधर-उधर भागने लगे, और जनता किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ये नज़ारा देख रही थी, ज्यादातर रजवाड़ॊ और तालुकेदारों का तो यह हाल था कि जब वह भारी लगते तो क्रान्ति करने लगते और जब अंग्रेज भारी पड़ते तो वह अंग्रेजों की तरफ़दारी में जुट जाते!

अवध में भी कुछ ऐसे हालात थे अहमदुल्ला शाह, बेगमहज़रत महल और कुछ अन्य अति-महात्वाकाक्षी व्यक्ति जिनमे गज़ब की नेतृत्व क्षमता थी इस लड़ाई को आगे ले जा रहे थे, किन्तु हर जनपद में कम्पनी व नवाबी हुकूमत के लोग, अफ़सर व चाटुकार मौजूद थे और गदर की हलचल पर सब नज़र रखे हुए थे, दूर-दराज़ में छोटे राजा और तालुकेदार हरकहरों द्वारा लाई सूचना पर निर्भर थे कोई कहता फ़िरंगी भाग रहे है तो कोई कहता लखनऊ में फ़िर से फ़िरंगी राज कायम हो गया है। और इसी सूचना के आधार पर ये राजा अपना रंग रह –रह कर बदल रहे थे कभी अपने अंग्रेज आकाओं की जीहुजूरी तो कभी नवाबी शासन की तरफ़दारी! जैसे हालात वैसा भेष!

राजा लोने सिंह आफ़ मितौली जो इस इलाके में बहुत प्रसिद्ध और विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर काबिज़ थे

मोहम्मदी, और शाहजहांपुर से चले अंग्रेज अफ़सर व उनके परिवार जिनका रास्ते में उन्ही के सैनिकों द्वारा कत्ल किया गया जो भाग कर बच निकले उन्हे मितौली के राजा लोने सिंह से शरण मांगी राजा ने उन्हे शरण तो दी किन्तु विद्रोहियों का भी उन्हे डर था, कम्पनी सरकार के खिलाफ़ लोने सिंह ने अवध के सिंहासन पर वाजिद अली शाह के बेटे बिरजिस कद्र की ताज़पोशी के दौरान पांच तोपो की सलामी अपने मितौली किले से दी थी, और विद्रोहीयों को मदद भी।

बाद में जब राजा को कुछ लोगों से सूचना प्राप्त हुई की लखनऊ पर बेगम हज़रत महल का शासन कायम हो गया तो उन्होने इन अग्रेजों को विद्रोहियों के हवाले कर दिया।

अग्रेंज जब दोबारा अवध पर काबिज होने लगे तब अक्टूबर १८५८ में मेजर टाम्ब्स के घुड़सवार व पैदल सैनिकों ने शाहजहांपुर में कम्पनी सरकार के विद्रोहियों का सफ़ाया करते हुए मोहम्मदी, पुवांया, औरगांबाद होते होते हुए ८ नवम्बर १८५८ को मितौली पहुंचे और कहते उन्हे बिना किसी प्रयास के मितौली किले पर फ़तह हासिल हुई, और राजा मितौली फ़रार हो गये।

इस किस्से को कुछ स्थानीय तरीके से पेश किया गया अपने राजा की शान में जो मैनहन में भी प्रचलित है वह १८५७ की क्रान्ति की लड़ाई और उसके शूरवीर।

मेरी दादी बताती है कि जब अंग्रेजों ने मितौली के किले को घेर लिया तो राजा लोने सिंह ने खूब लड़ाई लड़ी, किला चारो तरफ़ से गहरी खाई व बांस क झाड़ियों से सुरक्षित था, अंग्रेजों ने किले का फ़ाटक तोड़ने की कोशिश शुरू की, राजा ने अपनी तोप का खयाल किया, राजा की विशाल तोप जिसका नाम लछमनियां था कुऎं से बाहर आई लेकिन उसने राजा का साथ देने से इनकार कर दिया और चल पड़ी किले के उत्तर में स्थित कठना नदी की तरफ़ राजा निरूपाय देखते रहे, एक झड़ाम की अवाज़ के साथ तोप ने नदी के जल में समाधि ले ली, कहते है यदि तोप ने राजा का साथ दे दिया होता तो अग्रेजों की क्या मज़ाल थी जो किले की तरफ़ आख उठा कर देखते, और राजा विजई होते ! किन्तु उस जियधारी तोप ने लोने सिम्ह का साथ छोड़ दिया, यही नियति को मन्जूर था। फ़िर राजा हताश हो गये और अपने किले से सुरंग द्वारा भाग निकले, जो एक मील की दूरी पर कचियानी गांव में निकलती थी जहां राजा के भाई रहते थे। इस तरह अंग्रेज लाख कोशिश के बावजूद राजा लोने सिंह को नही पकड़ सके।

ये बात प्रचलन में है कि आज भी राजा की वह तोप रोज़ आधी रात में किले तक आती है और वापस कठना नदी में जाकर गिरती है जिसकी झड़ाम की आवाज़ सुनाई देती है

यह किस्सा उस प्रजा का अपने राजा के लिए जो उस राजा को कभी हारते हुए नही देखना चाहती। भले उसने हमेशा अपने को जनता के खून-पसीने से सिंचित कर संमृद्धता, एशो-आराम के सारे सामान जुटाए हो।

मेरे ये पूचने पर की आखिर लछमनिया तोप ने राजा का साथ क्यों नही दिया तो इसका कोई ठीक-ठीक जवाब मेरी दादी के पास नही था सिवाय इसके की नियति नही चाहती थी!

“भारत में यदि जनता ने क्रान्ति में कभी हिस्सा लिया तो वह थी अगस्त क्रान्ति यानी बापू के नेतृत्व में, यह मेरा अपना आंकलन है!”

अगली पोस्ट में मैं आप को ले चलूंगा मैनहन के उस जंगल में जहां १८५७ को अग्रेजं अफ़सर, महिलायें व बच्चे रखे गये थे भयानक जंगली महौल में और उनकी खानाबदोशी का हाल, फ़िर कैसे बैलगाड़ियों से और बेड़िया डालकर उन्हे लखनऊ रवाना किया गया…………………..

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७