-कृष्ण कुमार मिश्र

अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं।

गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के लिए- राष्ट्रीय बीमा योजना।

(श्रम एंव नियोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार एंव आई सी आई लोम्बार्ड द्वारा)

भारत की एक बड़ी आबादी जो अपनी उंगलियों के चिन्ह खो चुकी है ये वही चिन्ह है जो सरकारी कार्यों  में व्यक्ति के होने का प्रमाण होते है और भारत की एक आबादी के लिए ये निशान भाग्य की भाषा के शब्द जिनमें ज्योतिषी शंख व चक्र जैसी आकृतियों की बिनाह पर जजमान को उसके जीवन में राज-योग को सुनश्चित करते है,…….!

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश के एक गाँव  में लगाई गयी, मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप के साथ, ताकि वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके और बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली कर ले। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के उपरान्त मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके, एक तरह का वेरीफ़िकेशन……..।

यहां मैं अपने लोगों की जिस जीर्ण-शीर्ण दशा से रूबरू हुआ उसके लिए शायद माकूल शब्द न प्रस्तुत कर पाऊं किन्तु मुझे किसी भी व्यक्ति की उंगलियों के निशान नही मिले जिन्हे स्कैन किया जा सके। गरीबी और शोषण की हर परिस्थिति ने उन्हे नोचा-घसोटा था, कहते हैं, आदमी के हाथो की लकीरे उसका भूत-भविष्य बताती है, तो यकीनन उनके हाथ मुझे उनका भूत-भविष्य और वर्तमान सभी कुछ बता रहे थे, जिसे कोई ज्योतिषी कभी नही पढ़ सकता था, क्योंकि लकीरे नदारत थी उनके हाथों से अगर कुछ था तो समय की मार के चिन्ह फ़टी हुई मोटी व भद्दी हो चुकी बिना रक्त की खाल जो हथेलियों के बचे हुए सख्त मांस व हड्डियों पर चढ़ी भर थीं। जिसे प्रबुद्ध जन कर्म-योग कहते है तो उसकी प्रतिमूर्ति थे,  इस मुल्क के अनियोजित विकास को ढ़ोने में इनके हाथों पर चढ़ी हुई कालिख हमें बता रही थी कि कैसे नगरीय सभ्यता के संभ्रान्त लोगों की तमाम अयास्सियों का भार यह अन्न-दाता ढ़ो रहा है।  लोगों के धूप व मौसम की तल्खियों से बुझे हुए चेहरे और थका हुआ शरीर जिसकी सख्त व काली हो चुकी खाल को फ़ौरी तौर पर देखकर कोई डाक्टर ये नही बता सकता था कि ये भयानक रक्त अल्पता की बीमारी से ग्रसित है, हाँ हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर रहने वाली औरतों की त्वचा स्पष्ट जाहिर कर रही थी कि ये मात्र सूखे मांस और हड्डियों का कंकाल हैं और इस विद्रूप व रूग्ण शरीर की इज्जत इनकी पीली त्वचा जरूर ढ़क रही है।  कुछ-कुछ परदा कहानी के फ़टे हुए परदे की तरह ………………।

तकरीबन ९० फ़ीसदी परिवारों की यही दशा थी जिनमें स्त्री-पुरूषों की दोनों हाथों की सभी उंगलियों के सारे प्रयास निरर्थक हो जा रहे थे। किन्तु स्कैनर एक भी निशान नही खोज पा रहा था। आखिरकार  उनके बच्चों के निशानों को स्कैन कर दिया जाता, जिनके हाथ अभी इस तरूणायी में सुरक्षित थे और शायद तैयारी भी कर रहे थे, अपनी लकीरों के अस्तित्व को खोने के लिए भविष्य में, मानों यही नियति हो इन हाथों की। यदि  नियमों का पालन होता और परिवार के मुखिया के ही निशान स्कैन करने की कवायद की जाती तो शायद दो-चार कार्डों के सिवा ( जुगाड़ द्वारा बनवायें गये अमीरों द्वारा बीपीएल कार्ड धारकों ) सभी को खाली हाथ वापस जाना पड़ता। और उन्हे ये भी दुख होता कि दिन भर की मशक्क्त में दिहाड़ी भी गयी और कार्ड भी नही मिला।  लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि ये कार्ड तो निरर्थक है क्योंकि परिवार के मुखिया के बजाय छोटे बच्चों की उंगलियों के निशान मौजूद है इन कार्डों में? तस्वीर किसी और की और उंगलियों के निशान किसी और के!  और कम्पनी द्वारा तैनात किए गये दैनिक वेतन-भोगियों को भी तो प्रति कार्ड पैसा मिलना था। जितने कार्ड उतना कमीशन। पर क्या कोई विकल्प था, जब गांव के सभी गरीबों के हाथों में तकदीर की रेखायें ही नदारद है। यही स्थित पूरे के पूरे जनपद में। कैसा विकास है यह! इससे बेहतर तो सूदखोरों का दौर था जब इन गरीबों की जमीनों को गिरवी रखते वक्त वह इनके अगूंठे का निशान तो पा जाते थे। यहां एक और स्थिति बनी जो मुझे शर्मसार करती थी बार-बार…..जब भी किसी की उंगलियों का निशान न मिले तो तकनीके खोजी जाय की सिर में अंगूठे को रगड़ों तो यह साफ़ भी हो जायेगा और बालों में लगे तेल से साफ़ व मुलायम भी, पर यहां किसी के सिर में चिकनाई की एक बूंद भी नही थी आखिर में कम्प्यूटर वाला लड़का अपने सिर से उस व्यक्ति का अंगूठा रगड़ता, यदि फ़िर भी काम नही चलता तो हार कर वह अपना अंगूठा रख देता स्कैनर पर, व्यक्ति और अंगूठा किसी और का,… पर  तो कभी कभी यह रगड़ने वाली युक्ति काम आ जाती, पर ज्यों ही मुझे उस व्यक्ति के अंगूठे के निशान को वेरीफ़ाई करने के लिए अपना अंगूठा स्कैनर पर रखता तो झट से कम्प्यूटर  वह निशान ले लेता और अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे  लोगों में एक खुशी की लहर दौड़ जाती कि अरे साहब का की उंगलियों के निशान कितने सुन्दर आ रहे है, झट से…….ले ले रहा है। और यही वह मौका होता जब मेरी गर्दन शर्म से झुक जाती, मुझे सिर्फ़ यही एहसास होता कि ये हमारे लोग है और मैं इन्ही का एक हिस्सा हूं, बिना रेखाओं वाली हथेलियों के मध्य  मेरी हथेली की भाग्य रेखायें मुझ पर मुस्करा रही थी……एक व्यंगात्मक हंसी!

मैं आमंत्रित करता हूं उन सभी भद्र जनों को जो ये हाल देखना चाहते अपने सो-काल्ड विकास का वो उत्तर भारत के किसी गांव में आये और कोशिश कर ले, अंगूठों के निशान पाने की वहा एक काले ठप्पे के सिवा कुछ नही मिलेगा।  जिन्हे ये गरीब या गरीबी रेखा के नीचे, टाइप के वाक्यों से संबोधित करते है।

भयानक ठण्ड और सर्वहारा की उत्सुक भीड़, मुझे बार-बार उनके कुछ पा लेने की लालसा लिए चेहरों में झाकने को विवश करती और मैं उन्हे ठगा हुआ सा पाता। दिन में बमुश्किल तीस ही  रुपया कमाने वाला व्यक्ति जिस पर सारे परिवार की रोटी की जिम्मेदारी हो वह अपने दिन की पूरी कमाई लिए उत्सुक खड़ा था बीमा कार्ड बनवाने के लिए! यहां यह बता देना जरूरी है कि बीमित व्यक्ति की कम से कम दो उंगलियों के निशान और उसके परिवार के किसी अन्य वयस्क सदस्य के निशान लेना जरूरी था। इसके बदले उस परिवार के मुखिया को एक प्लास्टिक कार्ड मिलना था जिसमें उसके अगूंठे और उंगलियों के निशान कैद थे, ताकि जब वह बीमार हो तो उस कम्पनी द्वारा निर्धारित सेन्टर पर जा कर उस कार्ड से अपनी पहचान करा सके कि असल व्यक्ति वही है। हाँ बीमा कम्पनी की शर्ते भी सुन लीजिये, यदि मरीज भर्ती होने की स्थित में नही है तो, नशा आदि के कारण बीमार हुआ है तो, महिला गर्भवती है तो,  इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नही है कि सर्प आदि ने काट लिया है तो, और प्राकृतिक आपदा हुई है तो वह बीमित राशि ३०,००० रुपये का लाभ नही पा सकता। हाँ बड़ी खामी यह कि यदि किसी परिवार के मुखिया न हो, यानी माँ-बाप की मृत्यु हो गयी हो तो अव्यस्क बच्चों के लिए यह बीमा नही हो सकता……..। जिस कुपोषण में महिलायें सिर्फ़ बीमार बच्चों को जन्म देती है वहां इस बीमा की शर्तों के अनुसार किसी जन्म-जात बीमारी का इलाज की सुविधा नही। फ़िर आप बतायें हमारे गांव के आदमी का कौन सा विमान क्रैश या कार दुर्घटनाओं से साबिका पड़ता है जो वह इस बीमित राशि का लाभ ले पायेगा?

गांवों में तो लोग अक्सर भांग-गांजा या बीड़ी आदि के कारण ही दमें आदि बीमारियों से ग्रसित होते है और प्राकृतिक आपदायें ही उनका सर्वस्व नष्ट कर देती है। और वैसे भी वह भर्ती होने वाली दशा तक अस्पताल नही पंहुच पाते है क्योंकि उनका प्राथमिक इलाज़ ही नही हो पाता जो वह भर्ती प्रक्रिया तक अपना दम साधे रहे।

हल्की बीमारी में यह कम्पनी बीमित राशि का लाभ नही देती। एक बात और ये लोग इतने भी सक्षम नही होते कि उन सेन्टरों तक पंहुच कर अपनी बात रख सके फ़िर आखिर ये तमाशा क्यों क्या उस कम्पनी और सरकारों को उनकी हाड़ तोड़ मेहनत के तीस रुपये भर लेने है। अरबो की आबादी वाले प्रदेश व देश के अरबों गरीब लोगों तीस-तीस रुपये का कर! जो खरबों की राशि में इकठ्ठा हो जायेगा। यह सवाल इस लिए और जरूरी हो जाता है कि सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर मौजूद मुफ़्त सेवायें ही इन्हे नसीब नही होती तो फ़िर ये कवायद क्यों!

अपने लोगों की बदहाली के सैकड़ों कारण तो मुझे याद आ रहे है किन्तु बिगड़े हुए इन भयानक हालातों में कौन सी जुगति इन्हे उबार लेगी ये बात अब मेरे मस्तिष्क से परे है……मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ।

यहां प्रश्न ये नही है बीमा कम्पनी से इन्हे लाभ मिलेगा या नही या यह योजना उचित या अनुचित है यहाँ एक भारी प्रश्न तो यह है, उन लोगो के लिए जो दम भरते है विकास है, ताकि वह देखे और सोचे कि हमारे देश का एक हिस्सा जो बद से बदतर हो रहा है, कही अतीत में उसे बेहतर कहा जा सकता है आज की इस विद्रूपता को देखकर।

तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नही होते। ये शेर कह कर मैं रूमानी नही होना चाहता और न ही अपने आप को और उनको झूठी तसल्ली।

क्या हमारा दरिद्र नारायण हमेशा ऐसी दुर्गति के साथ जीता रहेगा। एक भारत में इतनी असमानता क्या यही विविधिता है जिस पर बड़े बुद्धिजीवी गर्व करते है।

कृष्ण कुमार मिश्र

(वन्य-जीव विशेषज्ञ, स्वतन्त्र पत्रकारिता, फ़ोटोग्राफ़ी)

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बात पुरानी है लेकिन सुनाना जरूरी है

मैनहन में वृक्षारोपड़ करते हुए

आपरेशन ग्रीन कार्यक्रम मैनहन

३१ अगस्त,सन २००१, मैनहन (खीरी)

सरकार के एक कार्यक्रम आपरेशन ग्रीन के तहत मैने अपने गांव में तकरीबन १००० वृक्षॊं की रोपाई की, इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के वन-निगम के प्रबन्ध-निदेशक श्री आर०पी० सिंह ने अध्यक्षता की उनकी मौजूदगी नें खेरी के वन-विभाग को सक्रिय कर दिया था और सभी आला अफ़सरान मैनहन में पहले से उपस्थित थे, गांव के प्राथमिक विद्यालय में इस विशाल सभा का आयोजन हुआ और मितौली से मैनहन तक स्वागत द्वार बनाये गये, यह सारी व्यवस्था मेरे जिम्मे थी, कार्यक्रम की शुरूवात सरस्वती वंदना से हुई और फ़िर सभी आगुन्तको ने हमारे गांव के लोगों को संबोधित किया, वृक्षारोपण के मह्त्व बताये और वन-विभाग के सभी अधिकारियों व कर्मचारियों ने पौधे रोपे, एक नीम का वृक्ष प्रबन्ध निदेशक ने रोपित किया और उस पेड़ की जगह एक पट्टिका लगवाई गई जिसे मै शहर से बनवाकर ले गया था उस पर महोदय का नाम लिखा हुआ था, स्कूल से पौधारोपड़ की शुरूवात हुई और फ़िर मेरी तमाम जगहों मे पौधे रोपे गये, जिनमें आम, नीम, सेमल आदि थे, सेमल के अधिक वृक्ष मुझे प्रदान किए गये थे चूकिं इनका व्यवसायिक महत्व है सो मैने तमाम वृक्ष वितिरित कर दिए।

मेरे गांव में मेरे द्वारा आयोजित यह प्रथम कार्यक्रम था, शुरूवात में तो लोग कौतूहल पूर्वक मेरी गतिविधि देख रहे थे कि आखिर रोज़-रोज़ वन-विभाग के अफ़सर क्यों आते है क्या तैयारिया हो रही है किन्तु उन्होने कुछ ज्यादा उत्सुकता नही दिखाई किन्तु जब आयोजन की सभी तैयारिया पूर्ण हो गयी तो सभी ने प्रेम से शिरकत की और मुझे उत्साहित भी किया,  ग्रामीणों का सहयोग भी मुझे मिला।  यहां यह बताना जरूरी है कि इस कार्यक्रम के तहत रोपे गये तकरीबन १००० पौधों में से मात्र ४०-५० पौधे ही आज विकसित हो पाये, इसे मै अपनी असफ़लता ही कहूंगा।

हां और वह पट्टिका जो प्रंबध-निदेशक जी के सम्मान में लाई गयी थी, मुझसे कहा गया कि इसे अभी उखाड लो पेड़ जब बड़ा हो जाये तो लगा देना किन्तु कुछ दिन बाद वह पेड़ ही वहा से उखड़ गया जिसे महोदय ने रोपा था तो पट्टिका कहां लगे और पट्टिका आज भी जंग लगी हुई मेरे गांव के घर मेम रखी है उसे जब देखता हूं तो………………

यहां श्रीमती इन्दिरा गांधी की एक बात याद आती है ।

“A nation’s strength ultimately consists in what it can do on its own, and not in what it can borrow from others.”

स्कूल में रोपे गये पौधे सुरक्षा के अभाव में ग्रामीणॊं व उनके मवेशियों द्वारा नष्ट कर दिये गये क्योकि उनकी उचित देखभाल नही हो सकी, जबकि सार्वजनिक स्थल पर लगे इन पौधों की सुरक्षा सबकी जिम्मेवारी थी।

खैर मेरी व्यक्तिगत भूमि पर जो पौधे लगाये गयें खेतों आदि में उन्हे पड़ोसी किसानों ने नीलगाय पर तोहमत लगाकर उखाड दिया गया ताकि पड़ॊसी के खेत में छाया न लगे और फ़सल प्रभावित न हो, लेकिन सेमल के पौधे इतना नही छितरते की वह सूरज की रोशनी को रोक सके। किन्तु मुझे इस बात की खुशी है कि जिन आस-पास के गांव वालों ने इन पेड़ों को मेरे खेतो से उखाड़ कर अपने घर-दुआर में रोपित किया और इनकी देखभाल की और वह पौधे अब वृक्ष में तब्दील हो गये है, यह जानकर प्रसन्नता होती है और मैं अपने आप को कुछ-कुछ सफ़ल पाता हूं। मुझे उनकी यह चोरी बड़ी सुन्दर लगी।

इस बेहतरीन कार्य में मेरा सहयोग देने वालों में मेरे गांव के लोगों में बड़े भाई श्री सुधाकर शुक्ल जी, दाऊ श्री रामावध शुक्ल जी, दाऊश्री परमेश्वरदीन जी, दाऊ श्री(स्व०) बेंचेलाल पाण्डेय जी (पूर्व प्रधान), दाऊ श्री शिवदयाल मिश्र जी, बाबा (स्व०)मुन्ना लाल शुक्ल जी, इसके अलावा मेरे कार्यकर्ता जिन्होने शारीरिक श्रम का योगदान दिया, और मेरे सभी मित्र गण जिनकी भागीदारी महत्वपूर्ण रही। मैनहन के अतिरिक्त तमाम गांवों के लोगो ने जो शिरकत की उनमें चाचा श्री बलबीर सिंह(पूर्व ब्लाक प्रमुख), गुरू जी श्री वी०पी० सिंह जी, कविवर कंटक जी, वनाधिकारी नकवी जी, उदयभान सिंह जी, मित्र श्री अमित श्रीवास्तव जी, अमित गुप्ता जी, विद्यालय के अद्यायपक गण आदि का मै कृतज्ञ हूं।

इस कार्यक्रम का मुझे जो सबसे ज्यादा फ़ायदा मिला वह यह कि सभी आदरणीय ग्रामजनों की उपस्थित और उनकी शक्लॊं का कैमरे में कैद हो जाना, इस आनी-जानी दुनिया में वो चेहरे मेरे पास जीवित रहेंगे उन तस्वीरों के रूप में।

अब मैने वृहद स्तर पर यह कार्य न करके प्रत्येक वर्ष कुछ प्रजातियों का रोपण करता हूं, और उनमें से अधिकतर पौधे लगातार वृद्धि कर रहे है, मेरी पहली पसन्द है बरगद, पीपल, पाकड़, उसके बाद कुछ और………..और यही वृक्ष मेरी मां को भी पसन्द है।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष