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भारतीय डाक और भारतीय प्रेम!–एक अफ़साना (कृष्ण कुमार मिश्र )

बात पुराणी है पुराने लखनऊ की, एक थे राघव दादा कलेक्टर बनाने की उम्मीद से पढ़ने आये थे लखनऊ, तैयारी कर रहे थे, इसी मध्य उन्हें एक लड़की से इश्क हो गया और कुछ अरसे में इश्क का अंत? भी….. जीवनं अनवरत जारी था अपनी रफ़्तार में तभी एक घटना ने राघव दादा के मुर्दा प्रेम को ज़िंदा करने की सनक पैदा कर दी….दरअसल एक विक्कू नाम का लड़का भी तैयारी कर रहा था सिविल सर्विसेज की थोड़ा हरफन मौला टाइप का मिजाज था उसका.. ज़िंदगी से बड़ी आसानी से दो चार कर लेने के फन में माहिर ! पर दादा ठहरे गहराई पसंद सो मामला पेंचीदा हो गया…विक्कू का कोइ चलताऊ नवयुग का प्रेम अफेयर था मामला डिस्कनेक्ट हो चुका था सो उस युवती को मोबाइल नंबर पहुंचाने की जुगत में लगे थे विक्कू बाबू …बात राघव दादा तक पहुँची …बगल वाले कमरे में तो रहते थे वे …बड़े व्यवहारिक.. उधार ले लेते अपनों से जूनियरस को खिलाने-पिलाने के लिए …बड़ी शिद्दत और जिम्मेदारी से बड़े होने का पालन करते….विक्कू के नवयुग प्रेम से अनिभिग्य दादा ने विक्कू से कहा की मैं तुम्हे एक प्रेमपत्र लिख दूंगा जिसमे शब्द शब्द दर्शन से सने हुए होगे पढ़ते ही वह बालिका तुम्हारे प्रेम के कमरे में दोबारा प्रवेश ले लेगी ….होशियार विक्कू यही तो चाहता था की अपनी हैण्ड राईटिंग में न लिखना पड़े पत्र..कही वह नव विचार युक्त भूमंडलीकृत विचारों से सुशोभित कन्या विक्कू के हस्तलिखित प्रेमपत्र का गलत इस्तेमाल न करदे ….. अंतत: विक्कू के लिए पत्र दादा ने लिखा और बड़प्पन दिखाते हुए कंधे पर हाथ रख कर बोले दे आ समझो वह बालिका फिर से तेरी हुई …..बिक्कू दौड़ता हुआ उस कन्या के कार्यक्षेत्र में पहुंचा जहा आगुन्तको के स्वागत हेतु बैठी बालिका को पत्र थमा का वांछित कन्या को दे देने के लिए कह कर सरपट वापस आ गया …..विक्कू अपने कमरे पर पहुंचा ही था…की नवयुग की कन्या का फोन विक्कू के पास आ गया … दादा भी प्रभाव देखना चाहते थे अपने लेखन के चातुर्य का ……दादा बोले किसका है? बिक्कू ने इशारा किया ..उसी का …दादा बहुत ही प्रसन्न हुए ….किन्तु इस प्रसन्नता ने उन्हें उनके अतीत में धकेल दिया …जहां सिर्फ अन्धेरा था और था मुर्दा प्रेम…..दादा ने उसी वक्त ठान लिया की क्यों न वह अपने शब्द मन्त्रों से खतों की आहुति दे अपने मुर्दा प्रेम पर …वह जाग उठेगा किसी रामसे ब्रदर्स की डरावनी फिल्मों के भूतों की तरह …..राघव दादा ने अब ख़त लिखना शुरू कर दिया अपनी प्रेयसी को ….जवाब नहीं आये तो रजिस्टर्ड डाक का इस्तेमाल किया …ख़त ही वापस आने लगे उनके पास …तो खीझ कर उन्हों ने अपनी प्रेमिका के पड़ोसियों को केयर आफ बनाकर पत्र भेजने शुरू किए ..दो महीने गुजर गए इस ख़त बाज़ी में …दादा के पत्र अभी भी निरूत्तर ही थे … किन्तु एक फर्क आया था उस मोहल्ले में जहां .दादा की प्रेमिका रहती थी ..अब मोहल्ले वाले डाकिए को देखकर अपने दरवाजे बंद कर लेते या राह में डाकिया मिल जाता तो नज़र बचाकर भागने लगे …यह असर जरूर पडा था दादा के खतों का …शब्दों का प्रभाव अभी बाकी था? क्योंकि पत्र पढ़े नहीं गए थे वे तो वापस हो आते थे ! ….दादा का पत्र लेखन जारी था अब तो वह शहर की सीमाए लांघ कर प्रेमिका के रिश्तदारों को ख़त भेजने लगे थे ! …किन्तु जवाब न आने से वह थोड़ा विचलित थे …आखिर कार पांच महीने गुजर गए सब्र का बाँध धाह गया दादा अपनी प्रेयसी के मोहल्ले पहुँच गए …कुछ मलिक्ष मन्त्रों अर्थात गालियों का आह्वाहन किया ..मोहल्ले में लोग बाग़ अपनी अपनी छतो पर सवार पूर्व विदित मामले का जायजा ले रहे थे …तभी धडाम की आवाज आई …और लोग चिल्ला उठे बम…..बम ……!!!!]

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****************दूसरी क़िस्त********************

(दादा अब लखनऊ से बरेली आ चुके थे …बरेली जेल …….दरअसल उनहोंने उस रोज अपनी प्रेमिका के घर पर बम फेका था …कोइ हताहत तो नहीं हुआ बस दीवार टूट गयी थी और कुछ लोगों को चोंटे आई थी ….इसी कृत्य के बदले उन्हें यह सरकारी इमदाद मिली की कुछ दिनों तक सरकारी घर और सरकारी भोजन…….दादा अभी भी हार नहीं माने थे …पत्र लेखन जेल से भी जारी था ! इसी बीच उनके सह्बोले सूत्रों ने जेल में खबर पहुंचाई की भौजी की तो शादी हो गयी ! …राघव दादा उस रोज बहुत रोये ….निराशा ने उनके जीवन के इस परम उद्देश्य को बंदी बना लिया …पर बड़ी जीवटता वाले शख्स थे फिर कलम उठाई और शुरू कर दिया अपनी प्रेमिका की ससुराल में पत्र भेजना …ये सारी खबरे विक्कू जैसे उनके तमाम मित्रवत छोटे भाई समय समय पर जेल में पहुंचाते रहते …..पर अबकी बार ख़त वापस नहीं आये यानी वो पढ़े गए …चिट्ठी का असर तो आप सभी लोग देख ही चुके थे पूरा मुहल्ला आतंकित था डाकिए की सूरत देखकर …अब राघव दादा के शब्दों की कारस्तानी बाकी थी वो भी पूरी होने वाली थी अब! ….एक रोज जेल में एक अपरिचित राघव दादा से मिलने की दरयाफ्त लेकर आया …दादा उससे मिले …पता चला वो उनकी प्रेमिका का पति है. उसने ख़त पढ़े थे सो उन्ही शब्दों के असर से बावस्ता होकर वह भागा चला आया था राघव दादा के पास ………अब रूबरू होकर दादा के वाक के चातुर्य से दो चार होने वाला था वो …दादा ने उसे अपने प्रेम प्रसंग की तमाम बारीकियों से परिचित कराया उसे तमाम दलीले दी और सबूतों के मौजूद होने की बात कही ! वह व्यक्ति अवाक सा था ! उसके जहन में सुनामी सी भड़क रही थी और पैर धरती का सहारा लेने में अक्षम से हो रहे थे ऐसा था दादा का दलीलनाम ! …दरअसल दादा ने वकालत की भी पढाई की थी सो प्रेम की वकालत करने में भी वकील होने का पुट पर्याप्त था….यहाँ एक बात बता देना जरूरी है की दादा से उनकी प्रेमिका ने कभी संसर्ग के पश्चात कहा था की तुम्ही मेरे पति हो मेरी मांग भर दो मैं जीवन भर तुम्हारी ही रहूँगी! बस क्या था दादा ने फ़िल्मी अंदाज़ में भावनाओं से सरोबार अपने रक्त की कुछ बूंदों से उसकी मांग भरी थी ….और यही बात उनके मन में पैबस्त हो गयी थी की उसने कहा था ! की मैं तुम्हारी हूँ और जीवन भर तुम्हारी रहूँगी…इस प्रसंग पर दादा अपने सह्बोलो से अक्सर कहते क्यों कहा था? उसने ऐसा फिर क्यों नहीं पूरा किया अपना वादा! …जो मेरे जीवन का उद्देश्य बन चुका था ! ……… खैर कहानी ने यहाँ बड़ा मार्मिक मोड़ लिया दादा की प्रेयसी के पति ने उसे तलाक दे दिया……दादा के प्राइवेट सूत्रों ने ये खुशखबरी दादा को पहुंचाई …एक बार फिर उस मोहल्ले में डाकिए की आमद बढ़ गयी और लोग बाग़ दोबारा विचलित होने लगे ! दादा ने फिर अपनी प्रेयसी के घर पत्र लिखना शुरू कर दिया था क्योंकि उन्हें पता चल चुका था की उनकी प्रेमिका को उसके पति ने छोड़ दिया है! ….किन्तु वह मुर्दा प्रेम इतनी कवायदों पर भी जागृत नहीं हो पा रहा था …..दादा को जमानत मिली वह लखनऊ छोड़ अपने घर जिला शाहपुर वापस आ गए और खेती करने लगे साथ ही वही की डिस्ट्रिक्ट की सिविल कोर्ट में वकालत भी ! राघव दादा अब टूट चुके थे…अपने पुराने प्रेम को शब्दों की अभिव्यक्ति से ख़त के माध्यम से जिलाने में ……जीवन के कई बरस की तहोबाला कर दी थी उन्होंने इस ख़्वाब के लिए की शायद उनकी प्रेयसी दौड़कर उन्हें गले लगा लेगी और सीने में धधकती ज्वालामुखी ठंडी हो जायेगी उस प्रेम की बारिश से …पर ऐसा नहीं हुआ …अक्सर होता भी नहीं है यथार्थ में …टूटे हुए रिश्ते और टूटे हुए धागे रहीम की बहुत मानते है ..चटक जाए तो जुड़ते नहीं जुड़ जाए तो गाँठ ………! दादा ने अपने प्रेम को खो दिया था और शायद हार भी मान चुके थे …परन्तु विक्कू के सतही प्रेम की रवादारी देख उनकी गहरी आँखों में अपने प्रेम को जगा लेने की तमन्ना पैदा हो गयी …सर्वविदित है की गहराई में जाने पर डूबने की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है बजाए सतह पर रहने से …विक्कू आज भी तैर रहा है रंग बिरंगी स्वीमिंग ड्रेस में कभी कभी हलके फुल्के गोते भी लगा लेता है किन्तु गहराई में नहीं जाता कभी !……. .शेष अगली क़िस्त में ..कृष्ण कुमार मिश्र )

*************************तीसरी क़िस्त ***************************

Photo Courtesy: Wikipedia

Photo Courtesy: Wikipedia

…जिला शाहपुर …राघव दादा के नाम से बहुत जल्दी वाकिफ हो चुका था चंद महीनों में ….उनकी यह शोहरत वकालत के लिए नहीं थी और न ही उनकी वह मुर्दा मोहब्बत थी इसकी वजह!

वे लोगों में, मुख्यता: उस जनपद के सरकारी तंत्र में कुख्यात हो चुके थे …वजह थी उनकी पत्र लिखने की आदत जो अभी भी बरकरार थी उनमे, बावजूद इसके की वह अपनी मोहब्बत में पत्राचार करके फेल हो चुके थे…..दरअसल ये सब कमाल था वारेन हेस्टिंग्स की डाक का जी हाँ यही शख्स तो था जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी के गवर्नर जनरल का रूतबा मिलने के बाद अपने शासन में डाक सुविधा को आम जनता को मुहैया कराई और एक डाक की फीस एक आना १०० मील ….यही डाक ने तो राघव दादा को कई रंग दिखाए थे …जिसमे लाल रंग की छटा ज्यादा प्रभाई थी …भारतीय डाक का डाकिया राघव दादा की वजह से उदय प्रकाश के वारेन हेस्टिंग्स का सांड बन चुका था कही उससे भी ज्यादा भयावह ……..

राघव दादा अब भारतीय डाक के उस इम्पेरियल लाल रंग वाले बक्से का पूरा इस्तेमाल अपने गृह जनपद में कर रहे थे …एक लेखपाल की नौकरी ले चुके थे अभी तक खतों के माध्यम से और अब एक डिप्टी कलेक्टर के पीछे पड़े हुए थे …खतों का सिलसिला मुसलसल जारी था और खतों की मंजिल होती थी दस जनपथ और रायसीना हिल ………राघव दादा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से नीचे के ओहदे वालों को अमूनन ख़त नहीं लिखते थे यह विशेषता थी उनकी ! ….शनै: शनै: शाहपुर कचहरी में जब दादा की आमद होती तो वहां के सरकारी अफसर और कर्मचारी राघव दादा को देखकर कन्नी काटने लगते ……ये सब कमाल था दादा के वारेन हेस्टिंग्स के डाक का ! ….इश्क से हाथ धो बैठे थे पर भारतीय डाक का इस्तेमाल करने की आदत अभी भी मौजूं थी और शायद और पैनी हो चुकी थी अब तलक के समयावधि में ……..कभी भारत जैसे देश में हरकहरे एक जगह से सरकारी डाक दूसरी जगह पहुंचाते थे या व्यक्तिगत सूचनाएं लोग बाग़ एक दुसरे के रिश्तेदारों के माध्यम से …कभी कबूतर भी था जो प्रेम संदेशों की अदला बदली कर दिया करता था …लेकिन ये सारे माध्यम खुद सुनसान राहों जंगलों और डाकुओं से डरते थे ….पर वारेन हेस्टिंग्स का डाकिया जब अवतरित होता राघव की डाक लेकर तो बड़े बड़ों की घिग्गियाँ बंध जाती……..

भारतीय डाक पारस के बादशाहों से लेकर सुल्तानों की सुल्तानी तक के सफ़र के बाद द ग्रेट ईस्ट इंडिया की इन्त्जामियाँ में ख़ास से आम हुई … ब्रिटिश भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की रीढ़ बनी भारतीय डाक …कहते है की १९४२ के दौर में बापू जब क्रान्ति कर रहे थे तो ब्रिटिश भारतीय डाक द्वारा किसी भी चिट्ठी पर सिर्फ गांधी, बापू या महात्मा लिखा होने भर से वह डाक बापू तक पहुँच जाती थी वह चाहे जहां हो पूरे भारत वर्ष में …..ऐसा ही कुछ क्रांतिकारी प्रभाव था राघव दादा में की डाकिया उनकी प्रेमिका के मोहल्ले में पहुंचा नहीं के लोग जान जाते थे की उन्ही का ख़त आया होगा …….ख्याति तो थी बापू विख्यात थे भारत वर्ष में तो चिट्ठी पहुँच जाती थी वो कही भी हो बिना पते के …और दादा कुख्यात थे चिट्ठी पहुँचने से पहले ही डाकिए की सूरत से लोग भांप जाया करते थे! की आ गयी ……..!!१ आज कुछ ऐसा ही शाहपुर के सरकारी तंत्र के लोगों में भय व्याप्त रहता है …अर्दलियों के चिट्ठी देने से पहले अफसर पूंछते की राघव से सम्बंधित तो कोइ पत्र नहीं है ? और अर्दली डाकियों से पूंछते उसका तो नहीं है कुछ? …..

बात इस्तेमाल की है भारतीय डाक ने कई इतिहास रचे ..हर बुरी परिस्थितियों में उस व्यवस्था ने जनमानस का साथ दिया …और आज भी डाकिए मुस्तैद है अपने काम पर सूचनाओं से लैस …इलेक्ट्रानिक संदेशों की व्यवस्था ठप हो जाने पर यह इंसानी मशीनरी हर वक्त काम करती है हर आपदा में …..पत्रों की एक और खासियत है की इनकी सनद ज्यादा पुख्ता रहती है …किसी और सूचना के माध्यम के बजाए …और इनका प्रभाव भी ……

इतिहास सिखाता है दादा ने भी सीखा होगा ….की हर वह व्यक्ति जो जितना अधिक चिट्ठीबाज़ था वह उतना ही अधिक महान हुआ ….मोहनदास नेहरू टैगोर आदि आदि …..पत्रों की रूमानियत और उनकी खासियत तो कोइ दिल वाला ही जान सकता है …दादा ने भी जाना आखिर जो वो दिलदार ठहरे ..पर इस्तेमाल का तरीका ज़रा तिरछा हो गया …! नतीजतन कहानी मोड़ नहीं ले पायी ! ….पर दादा अब भ्रष्टाचार को चुनौती दे रहे है, भारतीय डाक के माध्यम से …उनके जज्बे को सलाम ….की जिन्दगी अब मुसलसल एक रफ़्तार और सीधी राह पर रफ्ता रफ्ता चल रही है …अब गाफिल नहीं है वह !

..राघव दादा की प्रेयसी काश ..खुद डाकिये से यह कह देती की “ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू …वो जान जायेगें ..पहचान जायेंगे ” तो ये डाकिये की डाक वारेन हेस्टिंग्स के सांड की तरह न होती वहां के लोगों में….पर अफसानों का क्या वे किसी पर रहम थोड़े करते है बस बयान कर देते है जस का तस !@

……यकीन मानिए ये वारेन हेस्टिंग्स की डाक लाने वाले डाकिए की सूरत को देखकर राघव दादा की प्रेयसी के उस मोहल्ले के लोग अब भी मुस्करा दिया करते होगे ………..इति

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

उत्तर भारत के एक गाँव की कहानी जो मैनहन विलेज ब्लाग के माध्यम से आप सभी के समक्ष रखने की कोशिश…परंपरा, इतिहास, धर्म, किबदन्तियां, ग्रामीण कहावते, कृषि, पारंपरिक ज्ञान, वनस्पतियां और जीव-जन्तु सभी का सिज़रा पेश करता है- मैनहन विलेज, जिसके बारे में हिन्दुस्तान दैनिक ने कुछ यूँ लिखा है ! 

कृष्ण कुमार मिश्र

्मैनहन का जंगली पुष्प जो एक देश का राष्ट्रीय पुष्प भी है

सन १९८२ के आस पास का मसला है, मैं अक्सर मैनहन के दक्खिन बहती नहर में नहाने जाता था, एक दिन एक अदभुत व्यक्तित्व वाला मनुष्य जिसने शरीर को केसरिया रंग के कपड़ों से ढ़्क रखा था, चला आ रहा था मेरी ओर, चूकि बचपन से अभिवादन करने का संस्कार मेरे भीतर पैबस्त किया गया था सो मैं दौड़ा और उस महात्मा के चरण छुए उन्होनें कुछ आशीर्वचन कहे जो मुझे याद नही है अब। लेकिन उनके हाथ में पत्तो से बना हुआ पात्र था और उसमें कुछ पुष्प, रंग-बिरंगे खालिस देशी, भारतीय पुष्प जो गांवों के झुरुमुट में हुआ करते थे। उन्होनें मुझे और मेरे साथियों को पुष्प दिए और चले गये।

चेहरे पर गज़ब का नूर, आकर्षक शख्सियत, और भाषा में गम्भीरता यानी ये सब चीजों से, मैं एक बार फ़िर रूबरू हुआ एक नहर पर जो मेरे ननिहाल की तरफ़ बह रही थी, इसे इत्तफ़ाक कहे या कुछ और, बहती जलधारा के निकट उस सन्त से मेरा दोबारा मिलना, इन कड़ियों को आज़ मैं जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। मेरी इस मुलाकात में मेरे पिता जी और मैं दोनो एक साथ थे। नहर के दोनों तरफ़ सैकड़ों  वनस्पतियां पुष्पित और पल्लवित हो रही थी हरियाली अपने चरम पर थी और मानों वह  झुरूमुट दैवीय आभा से दैदीप्तिमान हो रहा था ।

हमें उस सन्त ने आशीर्वाद दिया और पुष्प भी। तब पिता जी ने बताया कि ये फ़ूल बाबा है और इनके दोनें(पत्तियों का बर्तन) में कभी पुष्प समाप्त नही होते। यह आस्था का विषय था।

मैं दुनियां में ज्यों ज्यों वक्त गु्जारने लगा दुनियादारी की समझ भी बढ़ती गयी, और उत्सुकता भी ! और वह फ़ूल वाला साधू भी मुझे याद रहा, इसी कारण जब मैने लोगो से पूछ ताछ की तो उस कड़ी में मेरी मां ने बताया कि एक बार उनके पिता जी यानी मेरे नाना ने फ़ूल बाबा के पुष्प न खत्म होने वाले राज़ को जानने की कोशिश की किन्तु पुष्प समाप्त होने से पहले फ़िर से उस पात्र में भर गये कैसे ? ये किसी को नही पता ।

खैर मुझे इस रहस्य में इतनी दिलचस्पी नही है जितनी उस व्यक्तित्व और उस परंपरा से है, फ़ूल बांटने वाली परंपरा।

पुष्प जो जीवन के उदभव की एक खूबसूरत परिस्थिति है पुष्प जो जीव को रूमानी एहसास कराती है, पुष्प जो प्रत्येक शुभ-अशुभ अवसर का साक्षी बनता है क्योकि यह जीवन को परिभाषित करता है ……….।

मुझे यह भी नही मालूम की उत्तर भारत के इस इलाके के फ़ूल बाबा के अतरिक्त कोई व्यक्ति इस परंपरा का पोषक है या था!

पुष्प जो कहानी बताते है जीवन की, बीज़ से अंकुर, अंकुर से पौधा, और पौधें से विशाल वृक्ष, फ़िर पुष्प की अवस्था जैसे प्रकृति ने देवत्व को प्राप्त कर लिया हो, ऐसी ही परिस्थिति है वनस्पति में पुष्प की, तदपश्चात पुष्प से फ़ल और फ़ल से फ़िर जीवन का बीज़…………………।

मैं अतीत के उन क्षणों को याद करता हूं और सोचता हूं कि फ़िर कोई व्यक्ति फ़ूलों के माध्यम से जीवन की कहानी बताता हुआ किसी मोड़ पर मिल जाए और मैं नतमस्तक हो जाऊ, अपने बचपन के उस वाकए की तरह।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-9451925997