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“Earth provides enough to satisfy every man’s need, but not every man’s greed” —–Mahatma Gandhi

अधिकार

प्रकृति आप को इतना खुशी मन से देगी

मैं पेड़ों को काटने से नही रूकूंगा
भले ही उनमें जीवन हो।मैं पत्तियों को तोड़नेण से नही रूकूंगा
भले ही वे प्रकृति को सौंदर्य प्रदान करती हों।मैं टहनियों को तोड़ने से नही रूकूंगा
भले ही वे वृक्षों की बाजुंए हो।
क्योकि———–
मुझे झोपड़ी बनानी है।
–चेरावंदाराजन राव

मैनहन (भारत), बात सन १९८२-८३ की रही होगी, मुझे ढ़ग से याद नही, उस वक्त  मेरी उम्र छह वर्ष की रही होगी, यही वह वक्त था जब वृक्षों को बचाने के लिये एक आन्दोलन खड़ा हो चुका था पूरे भारत वर्ष में और मैं उसका एक सिपाही हुआ करता था!

वैसे ये एक नई शुरूवात थी किन्तु हमारे अतीत में जो सभ्यतायें रही उन्होने प्रकृति के प्रति आदर व सम्मान रखा और जरूरत से अधिक कुछ नही लिया, फ़िर चाहे वह पितृ प्रधान आर्य सभ्यता हो जिसमें वृक्षों को पूजा गया और उन्हे देवता कहा गया, या फ़िर भारत के वनॊं में रहने वाली मातृ प्रधान संस्कृति के लोग हो जिन्होनें वन देवी के रूप में वनों और वृक्षों को पूजा की !

अतीत के झरोखे में जो पुख्ता बाते पता चली वह यह हैं कि सन १७३० ईंस्वी में अमृता देवी के नेतृत्व में जोधपुर के खेजराली गांव की ३६३ महिलाओं ने अपनी जीवन की परवाह किये बगैर खेजरी Prosopis cineraria वृक्षों की रक्षा करने के लिये आगे आयी और वृक्षो से लिपट गयी, और दूसरी दफ़ा यह क्रान्ति भी महिलाओं ने की मार्च २६, १९७४ में, अबकी बार ये किसान महिलाये चमोली जनपद के हेमवलघाटी की रेनी गांव की थी, १९८० में यह अहिंसक आन्दोलन पूरे भारत में फ़ैल चुका था। वनविभाग द्वारा वनों की अन्धाधुन्ध कटाई के विरोध में। वैसे तो गढ़वाल में यह क्रान्ति १९७० में ही धीरे-धीरे अग्रसर हो रही थी वृहत रूप लेने के लिये।

उपरोक्त किसी बात का मुझे ज्ञान नही था जब मै इत्तफ़ाकन चिपको आंदोलनकारी बना, वह मात्र एक संयोग था जो इस एतिहासिक आंदोलन से मुझे जोड़ता है!

मेरे बग्गर में एक बगीचा था जिसमें तमाम विशाल वृक्षों के अलावा एक महुआ का छोटा वृक्ष था तने में दो शाखायें ऊपर की  तरफ़ रूख किये थे, इन्ही दो शाखाओं के मध्य जो स्थान बना उसे मैं घुड़सवारी के लिये प्रयुक्त करता था, इस वृक्ष के तने के फ़ाड़ में जब मैं बैठता तो मै मान लेता की पीछे वाली हरी पत्तियों वाली खूबसूरत डाल घोड़े की पूंछ है और आगे वाली लम्बी मोटी डाल घोड़े का सिर, इस आगे वाली डाल की एक टहनी पकड़ कर  लगाम की तरह खीचता और वृक्ष को हिलाने का प्रयास करता, मुझे इस वृक्ष से प्रेम हो गया था, क्योकि यह मेरा प्रिय घोड़ा जो बन गया था, खेल-खेल में ही सही उस वृक्ष से मेरे मित्रता के मेरे भाव बहुत गहरायी तक थे कि इस वृक्ष की किसी टहनी को भी छति पहुंचे, यह सोचकर मै दुखी हो जाता। नित्य हम दोनो एक लम्बे सफ़र पर निकलते थे।..काल्पनिक सफ़र….ही सही

एक दिन मैं अपने प्रिय वृक्ष के साथ खेल रहा था तभी मेरे बाबाजी ने मुझे बताया कि यह वृक्ष वह काट देंगे, और इसकी लकड़ी का इस्तेमाल करेंगे मोंगरी बनाने में, मैं एकएक उनके इस निर्णय से अवाक सा रह गया मेरी विकलता बड़ती जा रही थी, अखिरकार मैनें उनसे आग्रह किया कि मेरे उस साथी को छोड़ दे, किन्तु उन्होने इस वृक्ष कॆ बेतुकी जगह पर होने और इसमें वृद्धि न होने की वज़ह का हवाला देते हुए मेरी बात टाल दी।

ज्योंही मैने उन्हे पेड़ की तरफ़ धारदार गड़ासे के साथ बढ़ते हुए देखा मै उग्र हो गया और दौड़ कर अपने उस प्रिय वृक्ष से लिपट गया, उनके तमाम प्रयासों के बावजूद मैंने महुआ के उस वृक्ष-मित्र को नही छोड़ा और उसके तने में चिपक कर रोता-चिल्लाता रहा, किन्तु कब तक अखिरकार मेरी जिद मेरे बाबा के निर्णय के आगे हार गयी और वह वृक्ष कट गया। मैने उसे कटते तो नही देखा या न देख पाया हूं, किन्तु दूसरे रोज मै उस जगह की रिक्तता को देखकर बहुत रोया था। और सोचता रहा यह मेरा साथी पेड़ इसी लिये न बढ़ रहा हो क्योकि मै छोटा था और यदि यह वृक्ष वृद्धि करता तो फ़िर मैं कैसे इस पर घुड़सवारी कर पाता !

मै आज शायद जान पाया हूं इन वृक्षों के महत्व को और इनके लिये मेरे मुल्क में किया गया वह संघर्ष, और अब मेरा प्रेम इनके प्रति और गम्भीर हो गया है।

मैने कई प्रजातियों के वृक्ष रोपे है अपने गांव में किन्तु अभी तक वह इच्छा अधूरी है जो मैने बचपन में सोची थी कि इसी जगह फ़िर एक महुआ का वृक्ष होगा !

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७

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बाघ जो जिन्दा रहने के लिये जूझ रहा है मानवजनित..........

बाघ जो जिन्दा रहने के लिये जूझ रहा है मानवजनित.............

 

 

खीरी जनपद के बाघ

एक वक्त था जब उत्तर भारत की इस तराई में बाघ और तेन्दुआ प्रजाति की तादाद बहुत थी यहां धरती पर विशाल नदियों के अलावा छोटी-छोटी जलधारायें खीरी के भूमण्डल को सिंचित करती रही नतीजा नम भूमि में वनों और घास के मैदानॊं का इजाफ़ा होता रहा है । लोग बसते गये, गांव बने, कस्बे और फ़िर शहर, लोग जंगल और इनके जीवों के साथ रहना सीख गये सब कुछ ठीक था पर आदम की जरूरते बढ़ी आबादी के साथ-साथ, नतीजा ये हुआ कि जंगल साफ़ होने लगे और साथ ही उनमे रहने वाले जीव भी ! .गांव बेढ़ंगे हो गये, कस्बे व शहर आदिमियों और उनकी करतूतों से फ़ैली गंदगी से बजबजाने लगे और प्रकृति की दुर्दशा ने उसके संगीत को भी बेसुरा कर दिया जिसे ……….!!!

अब सिर्फ़ इस जनपद में टाईगर व तेन्दुआ, दुधवा टाईगर रिजर्व के संरक्षित क्षेत्र में बचे हुए है, खीरी के अन्य वन-प्रभागों में यह खूबसूरत प्राणी नदारद हो चुका है।

लेकिन मैं यहां एक एतिहासिक दृष्टान्त बयान करना चाहता हूं जो इस बात का गवाह है कि खीरी के उन इलाकों में भी बाघ थे जहां आज सिर्फ़ मनुष्य और उसकी बस्तिया है वनों के नाम पर कुछ नही ! नामों-निशान भी नही, हां गन्ने के खेत जरूर है जो ………….जिन्हे दिल बहलाने के लिये जंगल मान सकते हैं!

आज से तकरीबन १०० वर्ष पूर्व किसी धूर्त और चापलूस भारतीय राजा ने अपने अग्रेंज मालिक के साथ मेरे गांव आया जिसके पश्चिम में महुआ और बरगद, जामुन व पलाश के जंगल थे, और वही एक बाघ न जाने कब से रह रहा था, उन कलुषित व धूर्त मानसिकता वाले लोगो ने उसे मार दिया, ग्रामीण, राजाओ के इस तमाशे को देखने के अतिरिक्त क्या कर सकते थे, उस घटना के बाद इस जगह का नाम पड़ा “बघमरी” या “बाघमरी” । आज इस जगह खेती होती है कुछ दूर पर बस्तियां है और अब जंगल यहां से तकरीबन १०० किलोमीटर दूर यह है विनाश की दर जो मानव जनित है !

पर आज मुझे इस स्थान को देखकर उस अतीत की कल्पना करने का मन होता है जिसे मैने नही जिया, वह पलाश के फ़ूलों से लदे वृक्ष, महुआ के फ़लों की मदहोश करने वाली खुसबू, बरगद के घने जटाओं वाले वृक्ष, अकहोरा की झाड़िया, बेर और न जाने क्या-क्या जो हज़ारों पक्षियों का बसेरा होंगें! मखमली घास और उस पर आश्रित सैकड़ो मवेशी !

और इन झुरमुटों में कुटी बनाये रहते हुए गांव के ही अध्यात्मिक पुरूष  जिनका जिक्र मैने सुना है !

अब यहां सब सुनसान है! सिर्फ़ एक सड़क……………………….

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-262727

भारतवर्ष

सेलुलर- 9451925997