मैनहन

उत्तर भारत के एक गाँव की कहानी जो मैनहन विलेज ब्लाग के माध्यम से आप सभी के समक्ष रखने की कोशिश…परंपरा, इतिहास, धर्म, किबदन्तियां, ग्रामीण कहावते, कृषि, पारंपरिक ज्ञान, वनस्पतियां और जीव-जन्तु सभी का सिज़रा पेश करता है- मैनहन विलेज, जिसके बारे में हिन्दुस्तान दैनिक ने कुछ यूँ लिखा है ! 

कृष्ण कुमार मिश्र

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फ़ोटो क्रेडिट: flowersofindia.netअब सुगन्ध व फ़ूलों पर रईसों की बपौती नही रहनी चाहिए!

बात फ़ूलों की करना चाह्ता हूं, चूंकि मसला खूबसूरती और खुशबुओं का है तो थोड़ा हिचक रहा हूं! प्रकृति की अतुलनीय सुन्दरता का बखान करना वर्तमान में मुश्किल और पिछड़ेपन की निशानी है..इन महान साहित्य पुरोधाओं के मध्य…क्योंकि वह समाज की गन्दगी जो उनकी नज़र में पहले से मौजूद है, रिस्तों की कड़वाहट जो उनके घरों में विद्यमान है…दुखों, करूणाओं और प्रेम के तमाम विद्रूप आकार-प्रकारों को (जो उनके मन शाम-सबेरे हर वक्त उपजते रहते हैं) बेचते ये बुद्धि-विद्या के स्वयंभू अब प्रकृति की बात करने में शर्मसार होते है..कारण स्पष्ट है कि रेलवे स्टेशनों, बसड्डों  के बुक स्टाल्स पर प्रकृति  प्रेम नही तलाशा जाता..!.. और राजिनीतिक गलियारों में वोट और गोट की जगह प्रकृति समा ही नही सकती!…फ़िर कौन बेवकूफ़ इन्हे फ़ूल, पत्तियों पर लेखन के लिए पुरस्कृत कर देगा! खैर..मैं लिए चलता हूं कालीदास और उस दौर के…. प्रकृतिकारों का नाम भूल रहा हूं!!!!…..  जब सरोवरों में कमल-कमलिनियां पुष्पित होते थे और राज-कन्यायें उनमें स्नान करने आया करती थी…तो घोड़े पर सवार राज-पुरूषों के घोड़ो को अक्सर उन्ही सरोवरों पर पानी पिलाना आवश्यक होता था !! महलों और बगीचों में युनान,  मंगोलिया, अरब देशो से लाये गये वृक्षों, झाड़ियों, और लताओं की सुनहरी छटाओं का जिक्र रामायण काल से लेकर राज महलों व बौद्ध मठों तक विस्तारित था! मुगलों ने भी दुनियाभर से प्रकृति के विविध रूपों को अपने बगीचों में खूब इकट्ठा किया….फ़ुलवारियों के रूप में!…हाँ हमें अंग्रेजों को कतई नही भूलना हैं जिन्होंने दुनिया में मौजूद अपने सामराज्य के प्रत्येक भू-भाग पर उगने वाली सुन्दरता को भारत में रचा-बसा दिया जिसकी कुछ झलके अभी भी कुछ सरकारी आवासों में दिखाई दे जाती हैं!…मैं आप को याद दिला दूं एडविन लैंडसीयर लुटियन की जिसने नई दिल्ली का निर्माण किया और गवर्नर हाउस, रायसीना हिल जैसी जगहों को प्रकृति के इन रंगो से सरोबार….!! भारत के वन विभाग के पुराने डाक बंग्लों में कुछ योरोपीय व अफ़्रीकी वनस्पतियां अभी भी मिल जायेंगी जिन्हे ये अंग्रेज सुन्दरता और सुगन्ध के लिए इन जगहों पर लगाया था!….एक बात कहना चाहूंगा कि धरती पर कोई प्रजाति देशी-विदेशी नही होती…बशर्ते उसे धरती का वह हिस्सा उस प्रजाति को अपना ले…..! अब भूमिका शायद लम्बी व निरर्थक हो रही तो चलिए आप को ले चलते है उत्तर भारत के मैनहन ग्राम में जहा सरोवर भी है और आम-जामुन व पलाश के बगीचे भी जो धीरे-धीरे पतन की राह पर अग्रसर किए जा रहे हैं! १९८०-९० के भारत में बचपन में मैनें उन्ही गांवों में फ़ुलवारियां देखी जहां कोई मन्दिर मौजूद हुआ और उसके आस-पास पुजारी प्रवृत्ति के लोग…उन्हे रोज जो भगवान को पुष्प अर्पित करने होते थे! सो पुष्प की उप्लब्धता की व्यवस्था इन फ़ुलवारियों के रूप में होती ्थी! नही तो पुष्प व पुष्प-वाटिकायें आदि भारत में राजा-महराजाओं, मध्य भारत में नवाबों और माडर्न ईंडिया में अफ़सरों का विषय ही रहे, एक आम व औसत हिन्दुस्तानी रोटी के जुगाड़ में ही दिन काट रहा होता था उसे तो पेट भरने के लिए रोटी की सुगन्ध ही दरकार रही बेचारा पुष्प और उनकी खुशबुओं से बावस्ता हो इसका न तो उसे कभी मौका मिला और न ही खयाल आ पाया। हाँ इतिहास के पन्नों में जमींदारों और राजाओं की जो फ़ुलवारियां हुआ करती थी उनमें न तो आम हिन्दुस्तानी को जाने की इजाजत थी और न ही उस फ़ुलवारी के किसी पौधें का बीज या कलम किसी अन्य को मिल सकती थी..कारण स्पष्ट था कि आम हिन्दुस्तानी के घरों में पुष्प खिला तो उन जमींदार महाशय के रसूख में धब्बा लग जायेगा….एक वाकया याद आ गया है सुन ले….मेरे जनपद की तहसील मोहम्मदी जो कभी बरतानिया सरकार में  जिला होने का गौरव रख चुका है, वहां दिल्ली सरकार (मुगल) के समय डिप्टी कमिश्नर टाइप की हैसियत से रहने वाले जनाब ने एक बगीचा लगाया था उसमें केतकी (केवड़ा) का पुष्प कहीं से लाया गया, जो इस इलाके भर में अदभुत व अप्राप्त वनस्पति वन कर सैकड़ों सालों तक गौरवान्वित होता रहा…आम हिन्दुस्तानी जिसकी आज भी आदत क्या खून में यह पैबस्त है कि राजा के घर की घास-पूस भी कुछ अतुलनीयता अवश्य रखती है…और वह मूर्ख उस सामान्य बात या वस्तु को असमान्य ढंग से पेश करता हुआ अपने को गौरवान्वित करता आया है….हाँ तो वह साधारण सा केवड़ा केतकी वन सिर उसी बाग में खिलता रहा और हमारे लोग यहाँ तक की मीडिया गौरवगीत गा गा कर भरार्ने लगा….लेकिन सिलसिला नही टूटा….आदत में है जो…..कभी भारत की विविधिता का खयाल भी नही किया कि जहां हर देवता के सहस्र नाम हो, जहं की भाषा पर्यावाचियों से लबलब ठसी हुई हो..जहां एक कोश पर चीजों के नाम बदल जाते हों…इस बारे में भी नही सोचा…..बस केतकी जो वर्ष में एक बार  खिलती है!….दुनिया में सिर्फ़ मोहम्मदी में…संसार में नही होती…फ़लाने हसन द्वारा लाई गयी..केतकी….यह डाकूमेन्टेशन है हमारे मुल्क में…..बहुत जल्दी जहां चीजे बिना सोचे समझे अदभुत हो जाती है…और सरकार व पढ़े लिखे लोग उसे पढ़ते जाते है…बिना सोचे…जाने….साल दर साल केतकी खिलती रही….अभी भी खिलती है…….पूरे संसार में सिर खीरी जिले को यह गौरव प्राप्त है…..आखिर फ़िर वह लाये कहां से थे इस केतकी को?..जब संसार में सिर्फ़…..मजा तो तब आया जब मेरे एक परिचित बुजर्ग ने गर्जना करते हुए मुझसे कहा कि केतकी उनके यहां खिला…..उनकी गर्जना में सदियों से गुलाम रहे हिन्दुस्तानी के भीतर चेतना व आत्म-गौरव का झरना स्फ़ुटित हो रहा था…जैसे वह तोड़ देना चाहते हो उन जंजीरों को जो सिर्फ़ यही कहती हो कि यह पुष्प सिर्फ़ राजा या नवाब के बगीचे में खिलता हो….उन्हे मैं सलाम करता हूं उनके इस जज्बे के लिए….काश…

दरसल वो कही से केतकी का सम्पूर्ण पौधा लाये और उसे रोप दिया…इसमें एक टेक्निकल मामला है, मोहम्मदी वाले केतकी का पौधा जमींदारी रहते तो आम आदमी को अपने घर लगाने की गुस्ताखी नही कर सकता था, लेकिन आजादी के बाद उसने जरूर प्रयास किए..किन्तु इस प्रजाति में नर व मादा पौधे अलग-अलग होते हैम..इसलिए जिसने भी एक पौध उखाड़ कर अपने घरों में लगाई तो नर व मादा में से एक की अनुपस्थिति उसमे पुष्पं के पल्लवन में बाधक बनी रही अंतत: यह मान लिया गया कि यह पौधा उसी बाग में खिल सकता है….नवाब साहब …के बाग …कोई कहता वह पौधे के साथ उस जगह से मिट्टी भी लाये थे..इसीलिए यह उसी बगीचे में खिल सकता है!….या कोई कहता भाई आदमी आदमी की बात होती है, उसके हाथों में…..जस!

खैर अब चलिए मैनहन में जहाँ मैने अपने पूर्वजों के घर के पुनर्निर्माण के साथ-साथ दुआरे पर फ़ुलवारी की परिकल्पना पर काम कर रहा हूं..आखिर आजाद भारत का बाशिन्दा हूं और फ़िजाओं में खुसबूं और सुन्दरता तलाशने का मुझे पूरा हक है! तो मैने पहले चरण में…हरसिंगार, चम्पा, चमेली, रात के रानी, अलमान्डा, बेला, मालती,  के पौधे रोपे हैं, दूसरे चरण में मैं गन्धराज, मौलश्री, जूही, कचनार, बेल का रोपन करूंगा, साथ ही बरगद, सागौन जैसे विशाल वृक्ष भी मेरी कार में सुसज्जित है….जिन्हे कल रोपित किया जायेगा….फ़िलहाल मेरा अगला कदम गाँव के हर व्यक्ति कों तमाम खुशबुओं वाले पौधें भेट करने का निश्चय है!…लेकिन क्रमबृद्ध तरीके से…शायद रात की रानी मिशन…बेला…..चमेली….या फ़िर गन्धराज मिशन…एक वर्ष में प्रत्येक  सगन्ध पुष्प वालें पौधों  में एक सुगन्धित पौधा. वितरित करूंगा..जो हर घर में पल्ल्वित हो…..इसी इरादे के साथ.. पुष्पवाटिकाओं के चलन की शुरूवात करने की कोशिश…शायद रिषियों, और राज-कन्याओं और राज-पुरूषों के शैरगाह की जगहें आम हो सके आम आदमी के मध्य…जमींदारों, नवाबों और नौकरशाहों के बगीचों का मान तोड़ती ये पुष्पवाटिकायें एक औसत हिन्दुस्तानी को अपनी परेशानियों व तंगहालियों की गन्ध के मध्य विविध सुगन्धों का एहसास करा सके…और सुगन्धों व नवाबों के मध्य रिस्तों का मिथक टूट पाये….!

कृष्ण कुमा्र मिश्र

मैनहन-262727

भारतवर्ष

-कृष्ण कुमार मिश्र

अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं।

गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के लिए- राष्ट्रीय बीमा योजना।

(श्रम एंव नियोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार एंव आई सी आई लोम्बार्ड द्वारा)

भारत की एक बड़ी आबादी जो अपनी उंगलियों के चिन्ह खो चुकी है ये वही चिन्ह है जो सरकारी कार्यों  में व्यक्ति के होने का प्रमाण होते है और भारत की एक आबादी के लिए ये निशान भाग्य की भाषा के शब्द जिनमें ज्योतिषी शंख व चक्र जैसी आकृतियों की बिनाह पर जजमान को उसके जीवन में राज-योग को सुनश्चित करते है,…….!

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश के एक गाँव  में लगाई गयी, मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप के साथ, ताकि वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके और बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली कर ले। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के उपरान्त मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके, एक तरह का वेरीफ़िकेशन……..।

यहां मैं अपने लोगों की जिस जीर्ण-शीर्ण दशा से रूबरू हुआ उसके लिए शायद माकूल शब्द न प्रस्तुत कर पाऊं किन्तु मुझे किसी भी व्यक्ति की उंगलियों के निशान नही मिले जिन्हे स्कैन किया जा सके। गरीबी और शोषण की हर परिस्थिति ने उन्हे नोचा-घसोटा था, कहते हैं, आदमी के हाथो की लकीरे उसका भूत-भविष्य बताती है, तो यकीनन उनके हाथ मुझे उनका भूत-भविष्य और वर्तमान सभी कुछ बता रहे थे, जिसे कोई ज्योतिषी कभी नही पढ़ सकता था, क्योंकि लकीरे नदारत थी उनके हाथों से अगर कुछ था तो समय की मार के चिन्ह फ़टी हुई मोटी व भद्दी हो चुकी बिना रक्त की खाल जो हथेलियों के बचे हुए सख्त मांस व हड्डियों पर चढ़ी भर थीं। जिसे प्रबुद्ध जन कर्म-योग कहते है तो उसकी प्रतिमूर्ति थे,  इस मुल्क के अनियोजित विकास को ढ़ोने में इनके हाथों पर चढ़ी हुई कालिख हमें बता रही थी कि कैसे नगरीय सभ्यता के संभ्रान्त लोगों की तमाम अयास्सियों का भार यह अन्न-दाता ढ़ो रहा है।  लोगों के धूप व मौसम की तल्खियों से बुझे हुए चेहरे और थका हुआ शरीर जिसकी सख्त व काली हो चुकी खाल को फ़ौरी तौर पर देखकर कोई डाक्टर ये नही बता सकता था कि ये भयानक रक्त अल्पता की बीमारी से ग्रसित है, हाँ हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर रहने वाली औरतों की त्वचा स्पष्ट जाहिर कर रही थी कि ये मात्र सूखे मांस और हड्डियों का कंकाल हैं और इस विद्रूप व रूग्ण शरीर की इज्जत इनकी पीली त्वचा जरूर ढ़क रही है।  कुछ-कुछ परदा कहानी के फ़टे हुए परदे की तरह ………………।

तकरीबन ९० फ़ीसदी परिवारों की यही दशा थी जिनमें स्त्री-पुरूषों की दोनों हाथों की सभी उंगलियों के सारे प्रयास निरर्थक हो जा रहे थे। किन्तु स्कैनर एक भी निशान नही खोज पा रहा था। आखिरकार  उनके बच्चों के निशानों को स्कैन कर दिया जाता, जिनके हाथ अभी इस तरूणायी में सुरक्षित थे और शायद तैयारी भी कर रहे थे, अपनी लकीरों के अस्तित्व को खोने के लिए भविष्य में, मानों यही नियति हो इन हाथों की। यदि  नियमों का पालन होता और परिवार के मुखिया के ही निशान स्कैन करने की कवायद की जाती तो शायद दो-चार कार्डों के सिवा ( जुगाड़ द्वारा बनवायें गये अमीरों द्वारा बीपीएल कार्ड धारकों ) सभी को खाली हाथ वापस जाना पड़ता। और उन्हे ये भी दुख होता कि दिन भर की मशक्क्त में दिहाड़ी भी गयी और कार्ड भी नही मिला।  लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि ये कार्ड तो निरर्थक है क्योंकि परिवार के मुखिया के बजाय छोटे बच्चों की उंगलियों के निशान मौजूद है इन कार्डों में? तस्वीर किसी और की और उंगलियों के निशान किसी और के!  और कम्पनी द्वारा तैनात किए गये दैनिक वेतन-भोगियों को भी तो प्रति कार्ड पैसा मिलना था। जितने कार्ड उतना कमीशन। पर क्या कोई विकल्प था, जब गांव के सभी गरीबों के हाथों में तकदीर की रेखायें ही नदारद है। यही स्थित पूरे के पूरे जनपद में। कैसा विकास है यह! इससे बेहतर तो सूदखोरों का दौर था जब इन गरीबों की जमीनों को गिरवी रखते वक्त वह इनके अगूंठे का निशान तो पा जाते थे। यहां एक और स्थिति बनी जो मुझे शर्मसार करती थी बार-बार…..जब भी किसी की उंगलियों का निशान न मिले तो तकनीके खोजी जाय की सिर में अंगूठे को रगड़ों तो यह साफ़ भी हो जायेगा और बालों में लगे तेल से साफ़ व मुलायम भी, पर यहां किसी के सिर में चिकनाई की एक बूंद भी नही थी आखिर में कम्प्यूटर वाला लड़का अपने सिर से उस व्यक्ति का अंगूठा रगड़ता, यदि फ़िर भी काम नही चलता तो हार कर वह अपना अंगूठा रख देता स्कैनर पर, व्यक्ति और अंगूठा किसी और का,… पर  तो कभी कभी यह रगड़ने वाली युक्ति काम आ जाती, पर ज्यों ही मुझे उस व्यक्ति के अंगूठे के निशान को वेरीफ़ाई करने के लिए अपना अंगूठा स्कैनर पर रखता तो झट से कम्प्यूटर  वह निशान ले लेता और अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे  लोगों में एक खुशी की लहर दौड़ जाती कि अरे साहब का की उंगलियों के निशान कितने सुन्दर आ रहे है, झट से…….ले ले रहा है। और यही वह मौका होता जब मेरी गर्दन शर्म से झुक जाती, मुझे सिर्फ़ यही एहसास होता कि ये हमारे लोग है और मैं इन्ही का एक हिस्सा हूं, बिना रेखाओं वाली हथेलियों के मध्य  मेरी हथेली की भाग्य रेखायें मुझ पर मुस्करा रही थी……एक व्यंगात्मक हंसी!

मैं आमंत्रित करता हूं उन सभी भद्र जनों को जो ये हाल देखना चाहते अपने सो-काल्ड विकास का वो उत्तर भारत के किसी गांव में आये और कोशिश कर ले, अंगूठों के निशान पाने की वहा एक काले ठप्पे के सिवा कुछ नही मिलेगा।  जिन्हे ये गरीब या गरीबी रेखा के नीचे, टाइप के वाक्यों से संबोधित करते है।

भयानक ठण्ड और सर्वहारा की उत्सुक भीड़, मुझे बार-बार उनके कुछ पा लेने की लालसा लिए चेहरों में झाकने को विवश करती और मैं उन्हे ठगा हुआ सा पाता। दिन में बमुश्किल तीस ही  रुपया कमाने वाला व्यक्ति जिस पर सारे परिवार की रोटी की जिम्मेदारी हो वह अपने दिन की पूरी कमाई लिए उत्सुक खड़ा था बीमा कार्ड बनवाने के लिए! यहां यह बता देना जरूरी है कि बीमित व्यक्ति की कम से कम दो उंगलियों के निशान और उसके परिवार के किसी अन्य वयस्क सदस्य के निशान लेना जरूरी था। इसके बदले उस परिवार के मुखिया को एक प्लास्टिक कार्ड मिलना था जिसमें उसके अगूंठे और उंगलियों के निशान कैद थे, ताकि जब वह बीमार हो तो उस कम्पनी द्वारा निर्धारित सेन्टर पर जा कर उस कार्ड से अपनी पहचान करा सके कि असल व्यक्ति वही है। हाँ बीमा कम्पनी की शर्ते भी सुन लीजिये, यदि मरीज भर्ती होने की स्थित में नही है तो, नशा आदि के कारण बीमार हुआ है तो, महिला गर्भवती है तो,  इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नही है कि सर्प आदि ने काट लिया है तो, और प्राकृतिक आपदा हुई है तो वह बीमित राशि ३०,००० रुपये का लाभ नही पा सकता। हाँ बड़ी खामी यह कि यदि किसी परिवार के मुखिया न हो, यानी माँ-बाप की मृत्यु हो गयी हो तो अव्यस्क बच्चों के लिए यह बीमा नही हो सकता……..। जिस कुपोषण में महिलायें सिर्फ़ बीमार बच्चों को जन्म देती है वहां इस बीमा की शर्तों के अनुसार किसी जन्म-जात बीमारी का इलाज की सुविधा नही। फ़िर आप बतायें हमारे गांव के आदमी का कौन सा विमान क्रैश या कार दुर्घटनाओं से साबिका पड़ता है जो वह इस बीमित राशि का लाभ ले पायेगा?

गांवों में तो लोग अक्सर भांग-गांजा या बीड़ी आदि के कारण ही दमें आदि बीमारियों से ग्रसित होते है और प्राकृतिक आपदायें ही उनका सर्वस्व नष्ट कर देती है। और वैसे भी वह भर्ती होने वाली दशा तक अस्पताल नही पंहुच पाते है क्योंकि उनका प्राथमिक इलाज़ ही नही हो पाता जो वह भर्ती प्रक्रिया तक अपना दम साधे रहे।

हल्की बीमारी में यह कम्पनी बीमित राशि का लाभ नही देती। एक बात और ये लोग इतने भी सक्षम नही होते कि उन सेन्टरों तक पंहुच कर अपनी बात रख सके फ़िर आखिर ये तमाशा क्यों क्या उस कम्पनी और सरकारों को उनकी हाड़ तोड़ मेहनत के तीस रुपये भर लेने है। अरबो की आबादी वाले प्रदेश व देश के अरबों गरीब लोगों तीस-तीस रुपये का कर! जो खरबों की राशि में इकठ्ठा हो जायेगा। यह सवाल इस लिए और जरूरी हो जाता है कि सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर मौजूद मुफ़्त सेवायें ही इन्हे नसीब नही होती तो फ़िर ये कवायद क्यों!

अपने लोगों की बदहाली के सैकड़ों कारण तो मुझे याद आ रहे है किन्तु बिगड़े हुए इन भयानक हालातों में कौन सी जुगति इन्हे उबार लेगी ये बात अब मेरे मस्तिष्क से परे है……मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ।

यहां प्रश्न ये नही है बीमा कम्पनी से इन्हे लाभ मिलेगा या नही या यह योजना उचित या अनुचित है यहाँ एक भारी प्रश्न तो यह है, उन लोगो के लिए जो दम भरते है विकास है, ताकि वह देखे और सोचे कि हमारे देश का एक हिस्सा जो बद से बदतर हो रहा है, कही अतीत में उसे बेहतर कहा जा सकता है आज की इस विद्रूपता को देखकर।

तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नही होते। ये शेर कह कर मैं रूमानी नही होना चाहता और न ही अपने आप को और उनको झूठी तसल्ली।

क्या हमारा दरिद्र नारायण हमेशा ऐसी दुर्गति के साथ जीता रहेगा। एक भारत में इतनी असमानता क्या यही विविधिता है जिस पर बड़े बुद्धिजीवी गर्व करते है।

कृष्ण कुमार मिश्र

(वन्य-जीव विशेषज्ञ, स्वतन्त्र पत्रकारिता, फ़ोटोग्राफ़ी)

अवधी सम्राट पं० बंशीधर शुक्ल

क्यों न हम पं० बंशीधर शुक्ल जी के जन्म-दिवस को विश्व अवधी दिवस के रूप में मनायें।

वो विधायक थे, स्वंतत्रा संग्राम सेनानी थे और हिन्दी अवधी के मर्मग्य, लेकिन फ़िर भी वो जननायक नही थे और न ही नेता, असल में सच्चे हितैषी थे उन सभी प्रजातियों के जो इस धरती पर रहती है। ये सारी बाते उनकी रचनाओं मे परिलक्षित हो रही है, कभी “गरीब की होली”  में उन्होंने सर्वहारा की दारूण कथा का बयान किया  कि कैसे इन गरीबों के घर कुत्ते-बिल्लिया ही घुमड़-घुमड़ कर आते है, जबकि लोग इधर का रूख ही नही करते। तो दूसरी तरफ़ ” बछड़ा धन्य गाय के पूत” लिखकर इन्होंने पूरी मानव जाति को ये एहसास कराने की कोशिश कि कैसे मनुष्य जानवरों का शोषण करता है और बदले में उन्हे तमाम कष्ट और भूखा रखता है……..भयानक गुलामी…..!

इस महान शख्सियत की कुछ बाते ब्लाग पर उकेरने की एक कोशिश!

बसन्तोत्सव के अवसर पर, मैं रूबरू हुआ हिन्दी-अवधी के तमाम पुरोधाओं से, जो संघर्षरत है अपने सीमित संसाधनों के बल पर अपनी भाषा की सेवा के लिए! बसन्त पंचमी के इस अवसर पर मेरा जाना हुआ उस धरती पर जहां सर्वहारा के लिए संघर्ष करने वाले इस नायक का जन्म हुआ। यहां हर वर्ष ये आयोजन होता है जो उनके परिजनों द्वारा संचालित होता है। गांव मे मैं रास्ता पूंछने लगा कुछ बच्चों से कि भैया “कवि वाला कार्यक्रम” कहां हो रहा है तो बच्चे ने इशारे से बताया किन्तु उत्सुकतावश ये पूछने पर कि ये कौन थे……..तो बालक निरुत्तर थे! खैर शुक्ल जी की स्मृति में बनी लाइब्रेरी जिसकी शक्ल गांव की प्राथमिक पाठशालाओं सी थी, में इधर-उधर कुछ कुर्सियों पर लोग छितरे हुए थे मध्य में जमीन पर दरे बिछाये गये थे, शायद ये जहमत बच्चों के बैठने के लिए की गयी थी। किन्तु भारत के भविष्य का एक भी कर्णधार मुझे वहां नही दिखा! न तो ग्रामीणों की सहभागिता थी और न ही जनपद वासियों की, प्रशासन का भी कोई कारिन्दा मौजूद नही था। मंचासीन कवियों व गणमान्य व्यक्तियों की तादाद अधिक थी और स्रोताओं की कम! और उनकी वेशभूषा और शरीर की दशा-व्यथा उनकी भाषा की दशा-व्यथा से पूरी तरह मेल खाती थी। सस्ते व वैवाहिक कार्ड छापने वाले प्रकाशनों से मूल्य आदि चुका कर प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन और उनका मान बढ़ाने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों का सहारा कुछ यूं लग रहा था जैसे हमारे लोग किसी अंग्रेजी पुस्तक के पांच-सितारा होटल में हो रहे एडवरटीजमेन्ट की नकल कर अपनी खीज निकालने की कोशिश कर रहे हो।……..झोलों से निकाल-निकाल कर पुरस्कार वितरण, और कांपते हुए हिन्दी-शरीरों पर शाल डालने की कवायदें।    ……बिडंबना के अतिरिक्त कोई माकूल शब्द नही है मेरे पास।  हाँ कुछ पत्रकार, अवधी प्रेमी और कुछ समय के लिए खीरी के मौजूदा सांसद अवश्य मौजूद थे। मैं यहां ये नही कहूंगा कि मूल्यों में गिरावट हुई है, हाँ मूल्य बदल जरूर रहे है। अगर कुछ नही बदला है तो अतीत की बेहतर चीजों का परंपरा के तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी जिन्दा रखने की हमारी नियति। और इसी नियति ने अवधी को भी जिन्दा रखा है हमारे घरों में……।

बसन्त पंचमी का दिन खीरी जनपद में खासा महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन अवधी सम्राट पं० बंशीधर शुक्ल का जन्म हुआ था। यें वही शख्स है जिनकी रचनाओं ने, सुभाष की आजाद हिन्द फ़ैज़ को लांग मार्च का गीत दिया और बापू के साबरमती आश्रम को भोर की प्रार्थना। सन १९०४ ईस्वी को पं० बंशीधर शुक्ल का जन्म खीरी जिले के मन्योरा ग्राम में हुआ। आप बापू के नमक आंदोलन से लेकर आजाद भारत में लगाई गयी इमेर्जेन्सी में भी जेल यात्रायें की। १९३८ में आप ने लखनऊ में रेडियों में नौकरी भी की, स्वन्त्रता आंन्दोलन के इस सिपाही ने आजाद भारत की नेहरू सरकार की व्यव्स्था से भी विद्रोह किया और कांग्रेस छोड़कर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में चले गये। इसी वक्त उन्होंने लिखा था “ देश का को है जिम्मेदार, चौराहे पर ठाड़ किसनऊ ताकय चरिव वार”। सन १९५७ के उत्तर प्रदेश असेम्बली चुनाव में बंशीधर शुक्ल लखीमपुर से एम०एल०ए० चुने गये। सन १९७८ ईस्वी में शुक्ल जी को उत्तर प्रदेश सरकार के हिन्दी संस्थान ने मलिक मोहम्मद जायसी पुरस्कार से सम्मानित किया। किन्तु शुक्ल जी का सच्चा सम्मान तो जन जन में व्याप्त था उनकी रचनाओं के द्वारा, “कदम-कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा…..”  प्रत्येक सुबह रेडियों पर उन्ही का गीत गूंजता “उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है” जिसे मैने भी अपने बचपन में सुना है। सन १९८० में सच्चे समाजवादी की भूमिका निभाते हुए ७६ वर्ष की आयु में आप का निधन हो गया।

खूनी परचा, राम मड़ैया, किसान की अर्ज़ी, लीडराबाद, राजा की कोठी, बेदखली, सूखा आदि रचनाये उस दौर में जनमानस में खूब प्रचलित रही। पं० बंशीधर शुक्ल के ४८ वें जन्म-दिवस पर उनके गांव मन्योरा में एक अभिनन्दन समारोह हुआ। इसके पश्चात बसन्त पंचमी १ फ़रवरी सन १९७९ में कथा सम्राट अमृत लाल नागर व तत्कालीन उप-मुख्यमन्त्री भगवती सिंह की मौजूदगी में शुक्ल जी का अभिनन्दन उनके गाँव में किया गया। शुक्ल जी के बाद भी तब से आज तक यह सिलसिला जारी है, मन्योरा और जिला खीरी के लोगों द्वारा। शुक्ल जी के नाम पर उनके गांव मन्योरा में एक पुस्तकालय और लखीमपुर रेलवे स्टेशन में एक पुस्तकालय जो हमेशा बन्द रहता है। उस स्वतन्त्रता सेनानी और अवधी के मर्मग्य की बस यही स्मृति शेष है।

अन्तता: यही कहा जा सकता है सरकारों को इस देश की माटी के सपूतों के महान प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिए, नही तो तमाम बेहतर व जरूरी चीज़े नष्ट हो जायेगी।

कृष्ण कुमार मिश्र

हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

Mahadeo

Mahadeo

सोने-चाँदी से नहीं किंतु

तुमने मिट्टी से दिया प्यार ।

हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

१९४८ में लिखी गयी ये पंक्तिया हमारे गावॊं के किसानों पर है जो अन्नदाता है समाज का जिसे शत शत नमन!

किन्तु आज मै इतिहास के उस पन्ने पर दृष्टि डाल रहा हूं जो गौर तलब नही है हमारे मध्य मैं उस ग्राम देवता की बात करना चाहता हूं जो हमारे गावों में लोग अपने स्वास्थ्य, बीमारी, चोरी, डाकैती और महामारी से बचने के लिये ग्राम देवता को पूजते है खासकर महिलायें । यहां यह बताना जरूरी है कि महिलायें ही हमारे धर्म, पंरपरा, और रीति – रिवाज की वाहक एवं पोषक होती है एक पीढ़ी से दूसरी .तीसरी……….!  यही सत्य है !

आज भी ग्रामीण भारत के ग्रामों में स्त्रियां तमाम तरह के पारंपरिक धार्मिक रिति-रिवाजों का आयोजन करती है और इन आयोजनों के विषय में पुरुषों को कोइ खास मालूमात नही है या फ़िर वें यह जानने की कोशिश नही करते ।

कुछ बाते मै यहां बताऊगा जो एतिहासिक महत्व की है जिन्हे मेरी मां ने मुझे बताया, मेरे गांव मैनहन में जो देवता लोगों के द्वारा पूजित होते है वह इस प्रकार है भुइया माता, प्रचीन मंदिर, देवहरा, गोंसाई मंदिर, मेरे घर के सामने २०० वर्ष पुराना नीम जहां शिव भी स्थापित है, मुखिया बाबा के दुआरे का नीम, सत्तिहा खेत (सती पूजन) और एक और स्थान जो गांव के पश्चिम ऊसर भूमि में स्थित है की पूजा होती है मैने अपने जीवन में इन स्थलों पर पुरूषों को पूजा करते नही देखा कुछ वैवाहिक कार्यक्रमों  में शायद मुझे कुछ याद है कि कुछ पूरूष खेत में पूजा करने जाते थे ।

इन सभी स्थलों का अपना इतिहासिक महत्व है जो हज़ारों वर्षो की कहानी कहता है । आज पूरूषों की बात तो छोड़ दे महिलायें भी इन रीति-रिवाज़ों से अलाहिदा हो रही है । शायद कल हमारा ये इतिहास हमारी पीढ़ियों के लिये अनजाना हो ।

विदेशी परंपराओं का प्रभाव हम पर इतना भारी पड़ रह है कि हम अपनी परंपराओं से विमुख होते जा रहे है  ।

क्यों भाई अब आप ही बताइय़े कि एक फ़िल्म से आयातित हुआ वैलेनटाइन डे क्या हमारे गुरू पूर्णिमा पर या किसी अन्य दिवस पर भारी नही है ?

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

09451925997

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मेरे मन बहुत दिनों से एक ख्वाइस थी कि अपने गांव के बारे में कुछ लिखू वहां कि संस्कृति परंपरायें लोक कहानियां, लोक गीत एवं वहां का इतिहास और ऐसा मैं सिर्फ़ अपने गांव के लिये नही सोचता मै उस देश के सारे गांवों के लिये जिस देश को गांवो के देश के नाम से जाना जाता है और यह इस लिये भी जरूरी है की वैदिक काल के बाद जो भी थोड़ा बहुत लिखा गया वह विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा नही है पर इतिहास की तमाम झलकों का जखीरा जरूर है जिसमे से हम अपने जरूरत की चीजे प्राप्त कर सकते है हां चीनी यात्रियों अरबी यात्रियों व हिन्दूस्तान के शासकों के विद्वान दरबारियों ने अवश्य कुछ महत्व पूर्ण दस्तावेज तैयार किये ! बौद्ध साहित्य भी हमारे इतिहास व संस्कृति की तमाम बातें अपने आप में समाहित किये हुये है । किन्तु सबसे प्रभाव शाली और बेह्तरीन अन्वेषण ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज के साहसी अफ़सरों ने किया जिसमे हम अपने २०० वर्षों के भारत का सारा लेखा जोखा देख सकते है ।

यदि हम उत्तर भारत के गांव और उनके साहित्य, इतिहास आदि की बात करे तो मै पं० अमृत लाल नागर का नाम लिये बगैर नही रह सकता इसके अतरिक्त रामधारी सिंह दिनकर,  महापंड़ित राहुल सांकृतायन और पं० नेह्र्रू जिनकी किताबें हमारा मार्गदर्शन करती है पर बिडंबना ये है की नागर जी की तरह या फिर राहुल जी की तरह बहुत कम ही लोग हुये जिन्हों ने गांवों की छोटी बाते और पंरपरायें जो सदियों का इतिहास समेटें है अपने आप में उन्हे करीने से तलाशने की जरूरत है जिस तरह आल्हा खंड के बिखरे शब्दों को गांव गांव तलाश कर चार्ल्स इलियट ने इस काव्य को संकलित किया और दुनिया के सामने रखा बाद मे जार्ज अब्राहम ग्रियर्शन ने बाकायदे इसक अनुवाद कर और ज्यादा बल्लाड इसमेम जोड़े गांव – गांव घूम कर और दुनिया के सामने इसे “The nine lakhs or maro feud (1876)  के रूप मे सामने लाये। इसी तरह नागर जी ने गांव -गांव घूम कर १८५७ का इतिहास संकलित किया  ऐसे तमाम उदाहरण है जो प्रभावित करते है मुझे और इसी कारण मै निरंतर १५ वर्षों से विग्यान का विद्यार्थी होने के बावजूद अपने इतिहास और संस्कृति के बिखरे पन्नों को इन गांवों में तलाश रहा हूं जो अनमोल है आप भी आयिये हमारे साथ और सीखिये इन ग्रामीणों से जो कोइ विश्वविद्यालय आप को नही सिखा सकता।

कृष्ण कुमार मिश्र

09451925997

मैनहन-262727

खीरी

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