परिग्रही विचार-कही ये ककरहा  नाम के विशाल तालाबों की तलहटी जो पथरीली है यह  अंतरिक्ष के कंकड़( meteoroid) की वज़ह से तो नही, यह Terrestrial Impact Craters है क्या?

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बचपन में मेरा पंसंदीदा खेल था अपने गांव के ककरहा ताल में तैरना, यहां ये जिक्र करना जरूरी है कि “ककरहा” नाम के ताल आप को कई जगह मिल जायेंगे जिसमें मेरे गांव से १५० कि०मी० दूर स्थित दुधवा नेशनल पार्क जिसमें सोनारीपुर रेन्ज में है विश्व प्रसिद्ध “ककरहा” ताल संरक्षित क्षेत्र होने की वजह से जिसे आज भी यह सौभाग्य प्राप्त है कि इस ताल के जल से गैंडा, तेन्दुआ व बाघ अपनी प्यास बुझाते है।

इसके अलावा मैनहन गांव के पश्चिम में एक ककरहिया तलिया(छोटा ताल) भी है ककरहा का शाब्दिक अर्थ मैं ठीक से नही जान पाया सिवाय इसके कि कंकड़ वाली भूमि में जलाशय होने की वजह से इसे ककरहा कहते ? हों क्योंकि तलाब के तल में कंकड मौजूद है ।

यदि आप को पता चले तो जरूर बताइयेगा।

हां तो मै बात करना चाह रहा हूं ताल और इसकी जलीय वनस्पतियों की जिससे ग्रामीण जीवन पोषित रहा है, तालाब में पाये जाने वाला और पूरे ग्राम के लोगो का इन चीजों पर अधिकार रहता था किन्तु तालाब को भी खेती की तरह प्रयोग में लाने से अब ग्राम का जनमानस वंचित है, तलाब के सरकारी ठेके उठते है और पैसे वाला व्यक्ति जिसका इस गांव से दूर-दूर तलक कोई नाता नही है, तालाब पर अधिकार प्राप्त कर लेता है, और सिघाड़ा या मछली पालन द्वारा जो भी उत्पादन होता है उसे शहरों में अच्छे दामॊं पर बेच दिया जाता है और ह्रदयविदारक बात यह है कि हमारे गांवों का साधारण जन-मानस व्यक्ति सिर्फ़ मुहं ताकता रह जाता है उन व्यापारियों का! ग्राम पंचायत स्तर पर इन नियमों में सुधार जरूरी है और ग्राम की प्राकृतिक संपदा पर गांव के ही व्यक्ति का अधिकार सुनश्चित हो। मेरे बचपन में तालाब का यदि व्यवसायी करण होता था तो उसी व्यक्ति को वह व्यवसाय करने का अधिकार दिया जाता था जो इसके योग्य है और वह विषेश जाति के लोगों को जो सदियों से तालाब की संपदा से अपना भरन-पोषण करते आये है।

अब सवाल यह है कि इन तालाबों में उगने वाली जलीय प्रजातियों की, जो विलुप्त हो रही है एक प्रकार की व्यवसायिक खेती से जैसे सिघाड़ा, इसमे पूरे तालाब की वनस्पतियों का सफ़ाया कर उसमे सिघाड़ा उगाया जाता है और तमाम तरह के जहरीले रसायनों का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण अब इन तालाबों में न उन कीटों के साथ जो सिघाड़े को नुकसान पहुचाते है अन्य उपयोगी कीट, मछलियां व जलीय पौधे नष्ट हो जाते है यही हाल रहा तो हमारी जलीय वनस्पतियों की विविधिता खतरे में पड़ जायेगी। विदेशी मछलियों का भी अन्धाधुन्द उत्पादन हमारे तालाबों की स्थानीय प्रजाति के लिये खतरा है किन्तु न तो सरकार इस तरफ़ ध्यान दे रही है और न ही हम।

मुझे केवल ककरहा ताल या मैनहन की चिन्ता नही है यहां मै पूरे भारत के तालों और गावों का प्रतिनिधित्व करवा रहा मैनहन गांव और इस ककरहा ताल से क्योंकि हमारे देश में हर जगह यही कथा-व्यथा है जिसे मै सुनाना चहता हूं।

यहां मै जिक्र कर रहा हूं उन सभी जलीय, अर्ध-जलीय व नम-भूमि पर उगने वाली बन्स्पतियों का सो सदियों से हमारे लोगो, हमारे जानवरों का भरण पोषण में सहायक रही है मैने भारत सरकार और सलीम अली सेन्टर फ़ार ओर्निथोलोजी एन्ड नेचुरल हिस्ट्री के सहयोग से एक प्रोजेक्ट किया था जिसे “Inland Wetlands of India” के नाम से जाना गया था और इसमें तालाबों और उनकी जैव-संपदा का अध्ययन शामिल था, मैनें जो चार जनपदॊं, खीरी, सीतापुर, बहराइच, और हरदोई के तालाबों और उनकी जैव संपदा का अध्ययन किया वह यह साबित करता है कि आज भी तमाम आबादी भोजन के लिये इन्ही जलाशयों की जैव संपदा पर कही-न-कही आश्रित है और औषधि में भी इन वनस्पतियों का इस्तेमाल करती है, किन्तु अब उनसे ये अधिकार छिनते जा रहे है अब न वह मछली, केकड़ा आदि का प्रयोग कर सकते है और न ही वन्स्पतियों यानी कमल, गुजरी, नारी आदि का सब्जी में इस्तेमाल क्योंकि या तो तालाब पाट दिये गये या फ़िर उनका व्यवसाई करन हो चुका है। ये तो सर्वहारा की बात हुई साथ ही इन वनस्पतियों पर निर्भर रहने वाले जीव भी विलुप्त हो रहे है।

कुछ पौधॊं का जिक्र कर रहा हूं इनमें तमाम की हिन्दी मुझे नही मालूम इस लिए अग्रेजी में इनके नाम प्रस्तुत है जो कभी इन तालाबों में थे किन्तु अब नाम मात्र बचे है।

Aquatic Vegetation

Free Floating:

Wolffia, Lemna, Spirodela, Azolla, Eichhornia, Salvinia, pistia etc.

Rooted with floating Leaves: Trapa, Nelumbo, nymphaea, marsilea, Nymphoides, Ipomoea etc.

Submerged floating:

Ceratophyllum, Najas etc.

Rooted submerged:

Hydrilla, Potamogeton, Aponogeton, Isoetes, Vallisneria, Chara, etc.

Rooted emergent:

Oryza, Sagittaria, Phragmites, Ranunculus, Scirpus, Cyperus, Typha, Limnophila, Sachharum etc.

कमल, सुन्दर पुष्प औषधीय गुओं से युक्त व इसके प्राप्त कमल गट्टे का खाने में उपयोग, गुजरी, कमल की ही तरह प्रयुक्त होता है,  बेहया, इसका पुष्प सुन्दर व पत्तियां गठिया या चोट से आई सूजन में प्रयोग की जाती थी, नारी, इसे सब्जी के रूप में, कुम्भी, इसका कार्य जल की शुद्धता व जलीय जीवों व उनके नवजात बच्चों को सूरज की तेज धूप से बचाना, आदि जिनसे मैं बचपन में ही परिचित था अब समाप्ति की ओर है जिसमें कमल हमारा राष्ट्रीय पुष्प है।

Ceratophyllum जो पानी के भीतर लतिकाओं की तरह फ़ैलता था तैरते वक्त मेरे पैरो में फ़स जाया करता था

सवाल ये नही है कि जो वनस्पति उपयोगी हो उसी का सरक्षण हो सवाल ये है कि धरती पर बिना मतलब कुछ भी नही प्रत्येक वस्तु का अपना महत्व है और वह एक श्रखंला की तरह है जिसमें से एक हम भी है यानी होमोसैपियन्स मानव जाति और यदि इस श्रखंला की कोई कड़ी टूटती है तो पूरी श्रखंला प्रभावित हुए बिना नही रह सकती।

यदि बरगद, पीपल के फ़लॊ को खाने वाली चिड़ियां न हो तो ये वृक्ष प्राकृतिक रूप से धरती पर नही उग सकते, कारन यह कि जब कोई चिड़िया इन फ़लों को खाती है तो उपापचय की क्रिया से गुजरने के बाद इनके मल के साथ निकलने वाले कोमल बीज जो मल के पोषक तत्वों के साथ होते है वही अंकुरित होते है अन्यथा नही !

हां एक बात और अब गांव का बच्चा  तैरने के अनुभव से वंछित है, क्योंकि स्वीमिंग पूल की व्यवस्था गांव में है नही और ये तालाब व्यवसायीकरण का शिकार हो चुके है। तैरने का सुखद खेल व बेहतरीन कसरत अब गांवों में गुजरे दिनों की बात हो चुकी है।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन -२६२७२७

भारतवर्ष

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तोता

यह तस्वीर मैने कतरनियाघाट वाइल्डलाइफ़ सेंक्चुरीं में खीची थी

“एक बालक की सुआ पालने की ख्वाइश जो कभी पूरी नही हो सकी

“क्योँकि आज ये बालक इन परिंदोँ के परोँ को हवा देने की कोशिश कर रहा है जो तड्पते विलखते हुए लोहे के पिँजरोँ मेँ कैद है, क्या आप सब इस मिशन मेँ उसके साथ है”

My first expedition

मेरे जीवन की पहली जंगल यात्रा जो बिल्कुल अलग थी मेरी आज की यात्राओं से….

बात मेरे बचपन की है, मै तकरीबन १० वर्ष का रहा हूंगा, मेरे घर से कुछ दूर पर मेरा बग्गर था जहां पालतू जानवर रहते थे, भैसें, बैल आदि, वैसे तो मेरे बाबा और पिता जी का आना-जाना उस जगह पर लगा रहता था, उस जगह एक झोपड़ी जिसमे जानवरों का खाना यानी भूसा इकट्ठा किया जाता था और बग्गर के प्रांगण में महुआं और आम के वृक्ष थे। उस इलाके में रहने वाले बच्चे मेरे दोस्त थे, दरअसल यह बग्गर दलित बस्ती में था चूंकिं ये गांव के उत्तर-पूर्व में बिल्कुल आबादी के आखिरी छोर पर था तो यहां से दूर-दूर तक फ़ैलें खेत और उनमे लहराती फ़सले एक सुन्दर नज़ारा पेश करती थी!

अक्सर मैं उस बस्ती के बच्चों के साथ खेलता था, और उन बच्चों में तमाम मेरे दोस्त थे, इनमे से एक था फ़कुल्ले इसके पारिवारिक परिवेश में जो होता था उसका असर इस बालक में पूर्ण रूप से परिलक्षित होता था जैसे मछली पकड़ने की विभिन्न कलायें, आदिम रहन सहन, मज़दूरी और प्राकृतिक संसाधनॊं पर पूर्ण निर्भरता! गरीबी इसका मुख्य कारण रही ।  मै कभी अपने घर से झूठ बोलकर इसके साथ मछली पकड़ने जाया करता था। और इसकी मदद भी करता तालाब के किनारे जलकुम्भी को ऊपर घसीटने में और जल्कुम्भी की जड़ों में फ़ंसी मछलियों को वह इकट्ठा करता।

हांलाकि उस जमानें में वर्ण भेद ज्यादा ही था किन्तु बच्चे कहां किसी भेद को तरजीह देते है । कभी-कभी  सोचता हूं सारी दुनिया के लोग बच्चे हो जाये !

एक दिन इसने मुझ से कहा चलो आज तोता (parrot) पकड़ते है और इसने तमाम विधियों का बखान भी किया अपने को एक अनुभवी चिड़ीमार साबित करते हुए, रंग-बिरंगे तोते………..मेरे बालमन में तमाम तोता-मैना की कहानियां कौंध गयी, मन अधीर होने लगा कब हम इस मिशन पर निकलेगे!

दूसरे दिन सुबह हम चले पड़े गांव के पश्चिम में स्थित एक निर्जन वन में जिसे बन्जर कहा जाता था, वृक्ष और झाड़ियों का एक बड़ा झुरूमुट इसे आप अंग्रेजी में Grove कह सकते है। को बंजर कहना एकदम विरोधाभाषी बात है किन्तु  बन्जर (non-fertile) इसलिये कहा जाता था कि इस झुरूमुट के आसपास की भूमि बन्जर थी।  यह जगह गांव से काफ़ी दूर थी कम से कम हम बच्चो के लिये तो दूर ही थी।

हमने एक रस्सी, अनाज के दानें, एक डलिया और छोटा सा लकड़ी का टुकड़ा जिसे हम किल्ला कहते थे, के साथ, मेरा मित्र अपने तोता पकड़ने के कौशल को महिमामंडित करते हुए चल रहा था, मैं गौर से यह सब बाते सुनते हुए कल्पना लोक में खोया सा था, अब बन्जर पहुंच गये थे हम लोग, एक जगह खुले मैदान में डलिया को लकड़ी के टुकड़े के सहारे ६० अंश के कोण पर खड़ा किया गया और इस ड्ण्डें मे रस्सी बांध कर हम लोग रस्सी के एक सिरे को अपने हाथ में पकड़ कर कुछ दूर पर एक झाड़ी के पीछे बैठ गये इस इन्तजार में कि डलिया के नीचे पड़े अनाज के दाने को जब भी कोई तोता चुगने आयेगा तो हम रस्सी खींच लेंगे और तोता इस डलिया के नीचे बन्द हो जायेगा!

मुझे याद है कि उस जगह टेशू, बेर, बबूल, और तमाम झाड़ियों पर तमाम रंग-बिरंगे तोते आवाजे करते हुए इधर-उधर आ जा रहे थे! कुछ समय बाद तोतो ने हमारे बनाये चक्रव्यूह की तरफ़ आकर्षित होने लगे! एक तोता ज्यों ही डलिया के नीचे आया हमने रस्सी खींच ली पर डलिया के नीचे गिरने से पहले ही वह जमीन से उड़ कर आकाश मे पहुंच चुका था।

ऐसा तकरीबन कई बार हुआ और हर बार हमें लगता अब सफ़लता मिली कि अब…………..

ऐसा होते-होते दोपहर हो गयी और सूरज दक्षिण से पश्चिम की तरफ़ रुख करने लगा, आज मेरे जीवन का पहला दिन था जब मै घर से इतनी दूर अकेले और इतने अधिक समय तक रहा।

जब हम पूरी तरह असफ़ल और निराश हो गये तो घर वापसी का निर्णय हुआ उन यन्त्र-तंत्रों के साथ जो मेरे कुछ काम नही आये थे, प्यास और भूख भी अपना असर दिखाने लगे थे। अभी हम गांव की तरफ़ चलते हुए आधी दूरी भी तय नही कर पाये थे की प्यास ने हमें बेहाल सा कर दिया, रास्ते में एक जामुन की बाग थी और उसमे पीपल के वृक्ष के नीचे एक कुआं जो कि पता नही कितने वर्षों से इस्तेमाल नही किया गया था, यह कुआं मेढ़क व अन्य छोटे जीवों की रिहाइस बन चुका था, प्यास की बेहाली के बावजूद दिमाग अभी भी काम कर रहा था सो हमने एक जुगत भिड़ाई टेशू के पत्तों को झाड़ियों की पतली टहनियों से गूंथ कर कटोरी नुमा दुनका बनाया और तोता पकड़ने वाली रस्सी में बांधकर उस दुनके को कुंए में डाल दिया किस्मत से रस्सी ने जल को छू लिया था किन्तु ऊपर खीचने पर दुनके का अधिकतर पानी छलक जा रहा था । लेकिन प्यासे को पानी कि एक बूंद बहुत ……………कई प्रयासो के बाद हमारे हलक कुछ नम हुए और जीवन शक्ति ने अपनी वापसी करनी शुरू कर दी थी पर प्यास का बुझना जिसे कहते है वैसी स्थित नही बन पाई, खैर अब जब हम सामान्य हुए और घर की तरफ़ चले तो तो दिमाग ये जवाब तलाश रहा था कि मां से क्या कहूंगा कि इतनी देर कहां था मै?

सरपट घर आया और नल से पानी निकाल कर पूरा एक लोटा या उससे अधिक गटक गया और घर के बरामदे में जमीन पर लेट गया क्योकि खाली पेट इतना पानी पीने पर पेट मे दर्द शुरू ए हो गया था ! मां खाना बना रही थी रसोई में उन्होने डाटकर पूछा कि कहा थे ? …………..मेरा जवाब था बग्गर में खेल रहा था, कुछ डाट सुनने के बाद मामला रफ़ा दफ़ा हो गया और मैने उस दिन भरपेट खाना खाया जो मुझे बहुत स्वादिष्ट भी लगा …अब मन और आत्मा दोनो संतृप्त थी।

तोते पकड़ने वाली बात मां को मैने बहुत बाद में बताई शायद कई वर्षों बाद ।

आज मै किसी भी जीव को कैद में नही देखना चाहता यहां तक कि चिड़ियाघरॊं के कान्सेप्ट को पूरी तौर से खारिज़ करता हूं किन्तु बचपन की वह सुआ पालने की इच्छा और किये गये प्रयास आज भी मुझे गुदगुदा जाते हैं।

अब वह बंजर भी नही बचा सिर्फ़ मैदान है वहां अब न तो वहां कोई पुष्प खिलता है और न ही तोते चहचाते है सिर्फ़ हवा का सन्नाटा……………

बंजर अभी कुछ वर्ष पूर्व उस जमीन के मालिक ने कटवा दिया मुझे जानकारी मिली तो वनाधिकारी (DFO) को सूचित किया, अखबार में भी प्रकाशित कराया, वनाधिकारी के कहने पर वह व्यक्ति गिरफ़्तार भी हुआ किन्तु निचले स्तर के अधिकारियों ने पैसे लेकर छोड़ दिया।

अब मेरे बचपन की यह कहानी या खेल अब गांव का कोई दूसरा बच्चा नही दुहरा पायेगा क्यो कि अब वहां कुछ नही बचा है सिवाय बंजर भूमि के वास्तव में अब वह जगह  अपने नाम के अनुरूप हुई है.बंजर………सिर्फ़ बंजर ।

खीरी जनपद में तोतों की तमाम प्रजातियां  थी जिनमे से तमाम मैने स्यंम देखी और उनक जिक्र ब्रिटिश भारत के गजेटियर में भी है किन्तु अब प्रजातियां ही नष्ट नही हुई बची हुई प्रजातियों की आबादी भी खतरनाक ढ़्ग से कम हो रही हैं,  गांवों मे फ़लदार वृक्षो की कटाई और नये वृक्षों  का रोपण न करना इसका मुख्य कारण है कि जहां मै अपनी छत से २० वर्ष पूर्व दसियों हज़ार तोतों के झूण्ड आकाश में उड़ते देखता था, वही आज मुझे  कभी-कभी १० या १५ तोते आसमान में उड़ते दिखाई पड़ते है! प्रजातियां ही नही तोतो की तादाद भी कम हुई है वह  भी इतनी कम की इस जीव के धरती से नष्ट हो जाने  के रास्ते पर शने: शने: लिये जा रही है। परिस्थितियां हमने बनाई है। तो क्या हम परिस्थिति को सुधार नही सकते बरगद, पीपल, महुआ, और पाकड़ के वृक्ष लगाकर।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-262727

भारतवर्ष

सेलुलर- 9451925997