नैमिषारण्य, अट्ठासी हजार ऋषियों की पावन तपस्थली

नैमिषारण्य, नैमिष और नीमसार यह एक ही नाम है उस जगह के जहां कभी आर्यों की सबसे बड़ी मिशनरी रही, उत्तर भारत में ऋषियों यानी धर्म-प्ररचारकों का सबसे बड़ा गढ़। आप को बताऊं यह बिल्कुल वैसे ही जैसे अठारवीं सदी में योरोप और अमेरिका से आई ईसाई मिशनरियों ने भारत के जंगलों में रहने वाले लोगों के मध्य अपना धर्म-प्रचार किया और उन्हे ईसाई दीन की शिक्षा-दीक्षा दी, वैसे ही यह आर्य चार-पाँच हज़ार पूर्व आकर इन नदियों के किनारे वनों में अपने धर्म-स्थलों की स्थापना कर जन-मानस पर अपना प्रभाव छोड़ने लगे…धर्म एक व्यवस्था…एक कानून है और यह आसानी से जन-मानस को प्रभावित करता है और उनके मष्तिष्क पर काबू भी ! नतीजतन धर्म के सहारें फ़िर यह धर्माचार्य जनता पर अपना अप्रत्यक्ष शासन चलाना शुरू करते है…उदाहरण बहित है…रोम का पोप…भारत में बौद्ध मठ ….इत्यादि…!

दरअसल ये धर्माचार्य आम मनुष्य के अतिरिक्त सर्वप्रथम राजा पर अपना प्रभाव छोड़ते है, राजा उनका अनुयायी हुआ नही कि जनता अपने आप उनसे अभिशक्त हो जाती है, यदि हम इतिहास में झांके को देखेगे..चन्द्रगुप्त मौर्य पर बौद्ध धर्माचार्यों ने अपना प्रभाव छोड़ना शुरू किया वह आशक्त भी हुआ बौद्ध धर्म से किन्तु चाणक्य के डर से वह बौद्ध नही बन पाया, कनिष्क कुषाण था किन्तु आर्यावर्त के स्नातन धर्माचार्यों के प्रभाव से वह शिव यानी महादेव का उपासक हो गया औय ही हाल तुर्किस्तान से आये शकों का था जो महादेव के अनुवायी बन छोटे छोटे छत्रपों के रूप में उत्तर भारत पर राज्य करते रहे । धर्म का वाहक ऋषि जो गुरू होता था राजा और प्रजा का, राम को ही ले तो दशरथ से ज्यादा हक़ वशिष्ठ और विश्वामित्र का था राम पर….जैसा गुरू कहे राजा वही करता था यानी अप्रत्यक्ष रूप से धर्म का ही शासन…चलो ये भी ठीक धर्म कोई भी हो सही राह दिखाता है….लेकिन यदि धर्म के वाहक ही अधर्म के कैंन्सर से ग्रस्त हो जायें तो उस राज्य और वहां के रहने वालों का ईश्वर मालिक…..।

आप सब को इतिहास की इन खिड़कियों में झाकने के लिए विवश करने की वजह थी, मेरा  आर्यावर्त में नैमिष के उस महान स्थल का अवलोकन व विश्लेषण जिसने मुझे स्तब्ध कर दिया ! धर्म के विद्रूप दृष्यों और क्रियाकलापों को देखकर..अब न तो वहां कॊई धर्म का सदगुणी वाहक है और न ही जन-कल्याण की भावना, और न ही कोई ऐसा धर्माचार्य जो मौजूदा लोकतान्त्रिक इन्द्र को यानी लाल-बत्ती वालों को प्रभावित कर अच्छे या बुरे (अपने विचारों के अनुरूप) कार्य करवा सकें…यदि कुछ बचा है तो अतीत का वह रमणीक स्थल जहां कभी कल-कल बहती आदिगंगा गोमती का वह सिकुड़ा हुआ रूप जो एक सूखे नाले में परिवर्तित हो चुका है, घने वनों की जगह मात्र छोटे छोटे स्थल बचे हुए है जहां कुछ वन जैसा प्रतीत हो सकता है ! और ऋषि आश्रमों में जहां हज़ारों गायें विचरण करती थी, हज़ारों बच्चे संस्कृत में वेदों की ऋचाओं का उदघोष करते थे और आचार्य धर्म पर व्याख्यान देते थे…इन सबकी जगह अब वह हमारी निश्छल और गरीब जनता को ठगने और उनका आर्थिक व शारीरिक शोषण करने वाले मनुष्य बचे हुए…गन्दे, भद्दे, मूर्ख, चतुर, कपटी, लोभी, लालची, मनुष्य जो सन्त के चोले में हमारे निश्छल, भोले, सादे, व धर्म भक्ति में डूबे लोगों को वह कपटी, साधनहीन सन्त अपनी जीविका और अय्याशी का साधन बनाने की फ़िराक में तत्पर दिखती है, उनकी आंखों में लोभ की चमक साफ़ दिखती है..! बस वे इसी फ़िराक में रहते है कि कब हमारे गांवों से आये हुए तीर्थ-यात्रियों में से कोई व्यक्ति उनके चंगुल में फ़ंसे…!

यहां एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि अतीत में धर्म के सहारे सीधे या अप्रत्यक्ष रूप पर जनता पर आधिपत्य करने की कोशिश में धर्म कानून की किताब की तरह कार्य करता था, जिसका पालन शासक और शासित दोनो किया करते थे…लोकतन्त्र और शिक्षा के प्रसार ने अब उस धार्मिक शासन ्यव्स्था को ध्वस्त तो कर दिया किन्तु जन-मानस के मस्तिष्क में वह धर्म और उसका डर अभी भी परंपरा के रूप में पीढी दर पीढी चला आ रहा है, हां अब न तो योग्य ऋषि है और न ही अन्वेषणकर्ता मुनि, सन्त इत्यादि बचे है वो लकीर के फ़कीर भी नही है, बस आडम्बर से लबा-लब भरे विषयुक्त ह्रदय वाले मनुष्य धर्म के भेष में शैतान है जिनकी उपमा किसी जानवर से भी नही दी जा सकती..क्योंकि वह जानवर क्रूरता और दुर्दान्तता के शब्दों सेब मानव द्वारा परिभाषित किया जाता है उसके पीछे उसके जीवित रहने की विभीषिका होती है न कि इन कथित सन्तों की तरह कुटिल कूतिनीति, लालच …..

धर्म के नाम पर बड़े बड़े गढ़, आश्रम और तीर्थ, मन्दिर इत्यादि का निर्माण सिर्फ़ व्यक्तिगत महत्वांकाक्षाओं का नतीजा होते है, जन-कल्याण और शिक्षा की भावना गौढ होती है…नतीजतन ये धर्म स्थल व्यक्ति के अंह और उसके द्वारा बनाये गये नियमों को जनता पर थोपने का अड्डा बनते है..तकि धन, एश्वर्य और वासना की पूर्ति कर सके ये कुंठित धर्माधिकारी।

मैने अपनी इस यात्रा में एक हजारों हेक्टेयर में फ़ैले आश्रम को देखा जहां सैकड़ो ऋषि कुटिया बीरान पड़ी, गौशालायें सूनी है, और संस्कृत शिक्षा देने वाले विद्यालयों में ६०-७० बच्चे, जिन्हे ठीक से इस कठित देव-भाषा का भी ज्ञान नही दिया जा सका, उनसे पूछने पर की आगे चलकर क्या बनना चाहोगे तो उन्हे पता नही…हां एक बच्चे ने बड़े गर्व से कहां हम यहां से पढ़ाई करके यज्ञाचार्य, वेदाचार्य और न जाने कौन कौन से चार्य बनने की बात कही..कुल मिलाकर उन्हे भिखारी बनाने की जुगत और बड़े होकर मां बाप को पानी न दे सके इसकी योजना बस यों ही भटकते रहे कि कब कोई धर्म भीर मिले और वे उसे लूट सके…!

जब मैं इस विद्यालय के भीतर घुसा तो बच्चे अपने सिखाये गये तरीको का इस्तेमाल करने लगे…जैसा कि उनके गुरूवों ने बताया होगा कि किसी आगन्तुक की घुसपैठ पर तुम सभी को कैसा व्यवहार करना है..ताकि यह विद्यालय और बालक ऐसे प्रतीत हो सके जैसे की  चौथी- पाचवींं सदी के गुरूकुल या राम की उस कथा के गुरूकुलों की तरह….बच्चे पेड़ो के चारो तरफ़ बने चबूतरे के आस-पास इकट्ठा होने लगे अपने वस्त्र संभालते हुए…एक-दो कमजोर टाइप के बालक (शायद गुरू के आदेश पर जबरू टाइप के बच्चो ने यह मेहनत वाला नाटक करने के लिए कमजोर टाइप के बालकों को चुना होगा)रेत में झाड़ू लगाने लगे..जबकि बुहारने जैसा वहां कुछ नही था…

मैनें उन बच्चों से पूछा की भाई कोई फ़ीस भी पड़ती है..बोले हां ३० रूपये महीना मैने कहां ये तो सरकारी स्कूलों से भी ज्यादा है…तो एक सुधी बालक बड़े संतुष्ट भाव से बोला तीन सौ रूपये में खाना पीना और रहना सब कुछ तो है………

मजे के बात गुरूवों अता पता नही शायद वो सब कही शादी-ब्याह या हवन कराकर अपनी जीविकापार्जन में लगे थे, मैने पूंछा प्रिंसिपल…तो बोले समाधि में है….समाधि में है तो यह सुनकर दो विचार है, कि समाधि दो तरह की होती है..एक मरने के बाद दफ़ना दिए जाने पर और दूसरे जीवित रहकर ध्यान की अवस्था में शिव की तरह…अब मरा हुआ व्यक्ति प्रोसिंपलगिरी तो नही कर सकता सो मैने सोचा आह..क्या बात है अभी भी समाधि लेते है ये महापुरूष..किन्तु..बड़ी देर में पता चला किसी सन्त की समाधि बनी होगी वहा अब बड़ा भवन है पंखा-कूलर इत्यादि से सुसज्जित वही आराम फ़रमा रहे है।

एक बड़े भवन में माइक पर भाषण देता सन्त रूपी मूर्ख चाण्डाल और उसके बीच बैठे कुछ गांव के सीधे-साधे धर्म की पट्टी बाधें गवांर…मुझे उन सब पर बड़ा तरस आया…वह चाण्डाल बार बार माइक पर रटे जा रहा था धर्म पुस्तकों का अध्ययन करो…करो….उन अनपढ़े लोगो से…!

कहते है भगवान विष्णु का चक्र गिरा था तो पाताल तक चला गया और वही पानी निकलता रहता है….!! इस गोलाकार कुऎं रूपी रचना के चारो तरफ़ भी बाउन्ड्री बाल बनाकर चक्र तीर्थ का निर्माण हुआ, यहां प्लास्टिक की थलियाम कड़े और पूजा सामग्री से लबलब भरा यह जल जिसमें श्रद्धालु स्नान कर रहे थे…और उन श्रद्धालुओं से अधिक गोते लगा रहे थे पण्डे (पूजा इत्यादि कराने वाले) क्यों कि जनमानस द्वारा पैसा आदि या चांदी स्वर्ण इत्यादि को चक्र में प्रवाह किया जाता है..जिसे ये लालची पण्डे दिन भर पाने में तैर तैर कर खोजते रहते है……

कुल मिलाकर कभी यह निर्जन स्थान आर्यों के छिपने और बसने की जगह बनी,  पहले से रह रही जातियों और मूल भारतीयों से जिनको इन्होंने राक्षस कह कर पुकारा ! और यही दधीच ऋषि ने इन्ही भारतीयों से लड़ने के लिए गायों से अपने शरीर पर नमक डालकर चटवाकर अपनी हड्डियों से धनुष बनवाने के लिए प्राण त्यागे…यह किवदन्ती है जो भी हो ये ऋषि आर्य राजओं के पक्षधर बन जनता में उनके विश्वास को कायम करने में तल्लीन रहते थे और राजनीति यही संचालित होती थी जैसा कि बाद में बौद्ध मठों में हुआ और कुछ सूफ़ियों ने किया….। सत्ता को हासिल करने में धर्म की तलवार का इस्तेमाल नया नही बहुत पुराना है…ईसाई और मुसलमानों से पहले …बहुत पहले से…!

एक बात और पुराणों के नाम पर बहुत से कलुषित विचारों वाले मूर्ख ऋषियों ने दर्जनों पुस्तकों को बूक डाला और हमारी जनता अन्ध-भक्त बन  देवताओं और महा-मानवो की वासनाओं की कथाये बड़ी भक्ति भाव से आज भी बाच रहा है टीका चन्दन और धूपबत्ती के साथ। यही वह स्थल है जहां मूर्खों ने तमाम मन-गढन्त देवी देवताओं की वासनाओं का लेखन किया जो दरसल लिखने वाले के दिमाग की उपज थी।

उत्तर भारत को इन आर्य आक्रान्ताओं ने इन्ही धर्माचार्यों की मदद से अपने अधिकार में कर लिया और यही कारण था कि भारत में पहले से रह रही जातियां इन आर्यों से अपने छीने हुए अधिकारों और संपदा को वापस लेने के लिए कुटिल ऋषियों को अपना निशाना बनाते थे…ये आर्यों के एजेन्ट ऋषि हवन यग्य आदि के नाम पर अन्न धन बटोरने में जुटे रहते थे भारतवासियों से और आर्य राजाओं की नीतियों को धर्म का जामा पहनाकर जनमानस को मूढ़ बनाते रहते है….

सिन्धुघाटी को नष्ट करते हुए ये आताताई पूरे उत्तर भारत में फ़ैल गये, धर्म के प्रचार-प्रसार की व्यवस्था आज की ईसाई मिशन्रियों से भी अधिक पुख्ता थी, धर्म को कानून बनाकर जनता पर अत्याचार करते हुए इन आर्यों ने हिन्दुस्तान की धरती को पर वर्न्शंकरों की फ़ौज तैयार कर दी, साथ ही पहले से रह रही मूल? जातियों को दक्षिण में खदेड़ दिया, इनकी सत्ता भी ब्रिटिश साम्राज्य की तरह या अरब के खलीफ़ा की तरह थी..वे गुलामों की फ़ौज भेजते और भारत की धरती पर गुलामों की फ़ौज जनता को अपना गुलाम बनाती…यानी पहले दर्जे का गुलाम दोयम दर्जे के गुलाम पर शासन करता है और लूट-मार का सामान लन्दन या बल्क-बुखारा भेजता…यही हाल था इन आर्यों का जो इन्द्र और उनसे भी बड़े किन्तु अघोषित देवताओं की गुलामी करते ये गुलाम भारत भूमि पर आये और यज्ञ्य के नाम पर यानी टेक्स वसूलते और इन्द्र को भेजते …यहां तक कि जबरियन इन्द्र की पूजा कराई जाती … इतना ही नही इन्द्र जैसे शासक अपने ही भेजे गये एजेन्टो यानी ऋषि पत्नियों के साथ बलात्कार भी करते और उस महिला पर चरित्रहीन होने का झूठा आरोप भी लगाते जिसे न चाहते हुए उस महिला के पति और जनता दोनों को मानन पड़ता। अजीब हालात थे..इन हरामखोर देवताओ और इनके गुलामों के…..आप को याद होगा भारत में आर्यों की वर्णशंकर संतानों ने उन्हे चुनौती दी..जैसा कि अमेरिकन ने कभी जंगे आजादी की लड़ाई अपनी ही कौम से लड़ी थी… हां मै बात कर रहा हूं कृष्ण की जिन्होंने इन्द्र पूजा को समाप्त कर गोवर्धन की पोजा करवाई यह इतिहासी शायद पहली लिखित घटना हो आत्म-स्वालम्बन की, स्वन्त्रता की…पराधीनता के खिलाफ़ कृष्ण का यह विद्रोह मन में स्वाधीनता व आत्मनिर्भरता का सुन्दर भान कराता है…एक वाकया और उस राम का जिसे हम आदर्श मानते है, यकीनन वह गर्व करने वाले व्यक्तित्व थे जो अपने पिता के आकाओं के विरूद्ध जाकर एक नारी के चरित्र पर लगे उस झूठे आरोप को मिटा डाला…हालांकि सत्ता के शीर्ष पर बैठे इन्द्र को दण्डित करने का साहस नही दिखा सके किन्तु उस ऋषि पत्नी पर लगे आरोप समाज से बहिष्ख्रुत महिला की दोबारा वापसी का श्रेष्ठ कार्य दशरथ पुत्र राम ने अवश्य किया…..इतिहास की ये घटनायें हमें यह बताती है कि कैसे धर्म कानून बन अत्याचार और शोषण का माध्यम बना…जो आज भी जारी है….

धर्म स्वयं की अभिव्यक्ति है और साधना भी स्वयं की अभिव्यक्ति है और ईश्वर भी ! फ़िर क्यूं अन्यन्त्र खोजते है हम इसे….सद-शिक्षा, सेवा, जन-कल्याण की भावना से किए गये धार्मिक अनुष्ठान तो समझ आते है पर कपटी लम्पट और अति महात्वाकाक्षीं कथित सन्तों के पीछे पीछे झण्डाबरदारी करते हमारे साधारण व आस्थावान लोग जो प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष इन महानुभावों की कीर्ति की बढोत्तरी का साधन मात्र बन कर रह जाते है यह बात मेरी समझ नही आती !

 किसी जाति को गुलाम बनाना हो तो उसकी भाषा, उसका इतिहास और उसका धर्म बदल दो वह जाति आप की अनुयायी हो जायेगी…और आर्यों ने, मुसलमानों ने और  ईसाईयों ने यही किया…और बदल डाला पूरा समाज जो परंपरा के रूप में बचा वह आज भी विद्यमान है कही कही…!

अपनी यात्रा के अन्तिम चरण में आदि देव विशुद्ध भारतीय महादेव देव-देवेश्वर के दर्शन के किए जो नैमिष से कुछ ही किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में गोमती के तट पर एक वन में स्थापित है…प्राचीन शिला का यह शिवलिंग अदभुत है।

इस पूरे तीर्थ स्थल पर मुझे कुछ अच्छा लगा तो वे नि्ष्कपट, आस्थावान, लोगो के  चेहरे जिनमें निश्छलता और धर्म के प्रति अगाध प्रेम साफ़ दिखाई दे रहा था..किसी कपटी सन्त के बजाए मुझे इन चेहरों के दर्शन मेरी इस यात्रा की सफ़लता थे।

कृष्ण कुमार मिश्र

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© Krishna Kumar Mishra

© Krishna Kumar Mishra

एक बात जो ठीक से नही कह पा रहा…..

आज गुजरा शहर के कोर एरिया से..तो कुछ अध्यापक बन्धु मिले तो ठहर लिया सड़क के किनारे, तभी एक फ़ल वाला अपनी चलती फ़िरती दुकान को घर ले जाने की तैयारी में था, और उसने कुछ खराब हो चुके अंगूर सड़क के किनारे लगा दिए…मैने सारे मामले को अपने हिसाब से गढ़ लिया ..कि कोई गाय आयेगी और उसे ये अंगूर खाने को मिल जायेगें…तभी एक अधेड़ आदमी उन्हें बटोरने लगा बड़े इत्मिनान से और जब सारे सड़े-गले अंगूर उसकी थैली में समा गये तो वह बड़े इत्मिनान से साईकिल में थैली को टांगकर चल पड़ा…देखिए यह है आवश्यकता का एक रूप जो व्यक्ति और हालात के हिसाब से बदलता रहता है..एक के लिए जो अंगूर खराब हो चुके थे..दूसरे के लिए बेशकीमती थे….इसलिए मित्र संसार में हर वस्तु कीमती है..मोल आप को लगाना है अपनी जरूरत के हिसाब से….आइन्दा से किसी भी चीज को हिकारत से मत देखिएगा…पता नही वह किसी के लिए कितनी कीमती हो..

कृष्ण कुमार मिश्र

13 अप्रैल 2011

-कृष्ण कुमार मिश्र

अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं।

गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के लिए- राष्ट्रीय बीमा योजना।

(श्रम एंव नियोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार एंव आई सी आई लोम्बार्ड द्वारा)

भारत की एक बड़ी आबादी जो अपनी उंगलियों के चिन्ह खो चुकी है ये वही चिन्ह है जो सरकारी कार्यों  में व्यक्ति के होने का प्रमाण होते है और भारत की एक आबादी के लिए ये निशान भाग्य की भाषा के शब्द जिनमें ज्योतिषी शंख व चक्र जैसी आकृतियों की बिनाह पर जजमान को उसके जीवन में राज-योग को सुनश्चित करते है,…….!

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश के एक गाँव  में लगाई गयी, मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप के साथ, ताकि वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके और बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली कर ले। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के उपरान्त मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके, एक तरह का वेरीफ़िकेशन……..।

यहां मैं अपने लोगों की जिस जीर्ण-शीर्ण दशा से रूबरू हुआ उसके लिए शायद माकूल शब्द न प्रस्तुत कर पाऊं किन्तु मुझे किसी भी व्यक्ति की उंगलियों के निशान नही मिले जिन्हे स्कैन किया जा सके। गरीबी और शोषण की हर परिस्थिति ने उन्हे नोचा-घसोटा था, कहते हैं, आदमी के हाथो की लकीरे उसका भूत-भविष्य बताती है, तो यकीनन उनके हाथ मुझे उनका भूत-भविष्य और वर्तमान सभी कुछ बता रहे थे, जिसे कोई ज्योतिषी कभी नही पढ़ सकता था, क्योंकि लकीरे नदारत थी उनके हाथों से अगर कुछ था तो समय की मार के चिन्ह फ़टी हुई मोटी व भद्दी हो चुकी बिना रक्त की खाल जो हथेलियों के बचे हुए सख्त मांस व हड्डियों पर चढ़ी भर थीं। जिसे प्रबुद्ध जन कर्म-योग कहते है तो उसकी प्रतिमूर्ति थे,  इस मुल्क के अनियोजित विकास को ढ़ोने में इनके हाथों पर चढ़ी हुई कालिख हमें बता रही थी कि कैसे नगरीय सभ्यता के संभ्रान्त लोगों की तमाम अयास्सियों का भार यह अन्न-दाता ढ़ो रहा है।  लोगों के धूप व मौसम की तल्खियों से बुझे हुए चेहरे और थका हुआ शरीर जिसकी सख्त व काली हो चुकी खाल को फ़ौरी तौर पर देखकर कोई डाक्टर ये नही बता सकता था कि ये भयानक रक्त अल्पता की बीमारी से ग्रसित है, हाँ हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर रहने वाली औरतों की त्वचा स्पष्ट जाहिर कर रही थी कि ये मात्र सूखे मांस और हड्डियों का कंकाल हैं और इस विद्रूप व रूग्ण शरीर की इज्जत इनकी पीली त्वचा जरूर ढ़क रही है।  कुछ-कुछ परदा कहानी के फ़टे हुए परदे की तरह ………………।

तकरीबन ९० फ़ीसदी परिवारों की यही दशा थी जिनमें स्त्री-पुरूषों की दोनों हाथों की सभी उंगलियों के सारे प्रयास निरर्थक हो जा रहे थे। किन्तु स्कैनर एक भी निशान नही खोज पा रहा था। आखिरकार  उनके बच्चों के निशानों को स्कैन कर दिया जाता, जिनके हाथ अभी इस तरूणायी में सुरक्षित थे और शायद तैयारी भी कर रहे थे, अपनी लकीरों के अस्तित्व को खोने के लिए भविष्य में, मानों यही नियति हो इन हाथों की। यदि  नियमों का पालन होता और परिवार के मुखिया के ही निशान स्कैन करने की कवायद की जाती तो शायद दो-चार कार्डों के सिवा ( जुगाड़ द्वारा बनवायें गये अमीरों द्वारा बीपीएल कार्ड धारकों ) सभी को खाली हाथ वापस जाना पड़ता। और उन्हे ये भी दुख होता कि दिन भर की मशक्क्त में दिहाड़ी भी गयी और कार्ड भी नही मिला।  लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि ये कार्ड तो निरर्थक है क्योंकि परिवार के मुखिया के बजाय छोटे बच्चों की उंगलियों के निशान मौजूद है इन कार्डों में? तस्वीर किसी और की और उंगलियों के निशान किसी और के!  और कम्पनी द्वारा तैनात किए गये दैनिक वेतन-भोगियों को भी तो प्रति कार्ड पैसा मिलना था। जितने कार्ड उतना कमीशन। पर क्या कोई विकल्प था, जब गांव के सभी गरीबों के हाथों में तकदीर की रेखायें ही नदारद है। यही स्थित पूरे के पूरे जनपद में। कैसा विकास है यह! इससे बेहतर तो सूदखोरों का दौर था जब इन गरीबों की जमीनों को गिरवी रखते वक्त वह इनके अगूंठे का निशान तो पा जाते थे। यहां एक और स्थिति बनी जो मुझे शर्मसार करती थी बार-बार…..जब भी किसी की उंगलियों का निशान न मिले तो तकनीके खोजी जाय की सिर में अंगूठे को रगड़ों तो यह साफ़ भी हो जायेगा और बालों में लगे तेल से साफ़ व मुलायम भी, पर यहां किसी के सिर में चिकनाई की एक बूंद भी नही थी आखिर में कम्प्यूटर वाला लड़का अपने सिर से उस व्यक्ति का अंगूठा रगड़ता, यदि फ़िर भी काम नही चलता तो हार कर वह अपना अंगूठा रख देता स्कैनर पर, व्यक्ति और अंगूठा किसी और का,… पर  तो कभी कभी यह रगड़ने वाली युक्ति काम आ जाती, पर ज्यों ही मुझे उस व्यक्ति के अंगूठे के निशान को वेरीफ़ाई करने के लिए अपना अंगूठा स्कैनर पर रखता तो झट से कम्प्यूटर  वह निशान ले लेता और अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे  लोगों में एक खुशी की लहर दौड़ जाती कि अरे साहब का की उंगलियों के निशान कितने सुन्दर आ रहे है, झट से…….ले ले रहा है। और यही वह मौका होता जब मेरी गर्दन शर्म से झुक जाती, मुझे सिर्फ़ यही एहसास होता कि ये हमारे लोग है और मैं इन्ही का एक हिस्सा हूं, बिना रेखाओं वाली हथेलियों के मध्य  मेरी हथेली की भाग्य रेखायें मुझ पर मुस्करा रही थी……एक व्यंगात्मक हंसी!

मैं आमंत्रित करता हूं उन सभी भद्र जनों को जो ये हाल देखना चाहते अपने सो-काल्ड विकास का वो उत्तर भारत के किसी गांव में आये और कोशिश कर ले, अंगूठों के निशान पाने की वहा एक काले ठप्पे के सिवा कुछ नही मिलेगा।  जिन्हे ये गरीब या गरीबी रेखा के नीचे, टाइप के वाक्यों से संबोधित करते है।

भयानक ठण्ड और सर्वहारा की उत्सुक भीड़, मुझे बार-बार उनके कुछ पा लेने की लालसा लिए चेहरों में झाकने को विवश करती और मैं उन्हे ठगा हुआ सा पाता। दिन में बमुश्किल तीस ही  रुपया कमाने वाला व्यक्ति जिस पर सारे परिवार की रोटी की जिम्मेदारी हो वह अपने दिन की पूरी कमाई लिए उत्सुक खड़ा था बीमा कार्ड बनवाने के लिए! यहां यह बता देना जरूरी है कि बीमित व्यक्ति की कम से कम दो उंगलियों के निशान और उसके परिवार के किसी अन्य वयस्क सदस्य के निशान लेना जरूरी था। इसके बदले उस परिवार के मुखिया को एक प्लास्टिक कार्ड मिलना था जिसमें उसके अगूंठे और उंगलियों के निशान कैद थे, ताकि जब वह बीमार हो तो उस कम्पनी द्वारा निर्धारित सेन्टर पर जा कर उस कार्ड से अपनी पहचान करा सके कि असल व्यक्ति वही है। हाँ बीमा कम्पनी की शर्ते भी सुन लीजिये, यदि मरीज भर्ती होने की स्थित में नही है तो, नशा आदि के कारण बीमार हुआ है तो, महिला गर्भवती है तो,  इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नही है कि सर्प आदि ने काट लिया है तो, और प्राकृतिक आपदा हुई है तो वह बीमित राशि ३०,००० रुपये का लाभ नही पा सकता। हाँ बड़ी खामी यह कि यदि किसी परिवार के मुखिया न हो, यानी माँ-बाप की मृत्यु हो गयी हो तो अव्यस्क बच्चों के लिए यह बीमा नही हो सकता……..। जिस कुपोषण में महिलायें सिर्फ़ बीमार बच्चों को जन्म देती है वहां इस बीमा की शर्तों के अनुसार किसी जन्म-जात बीमारी का इलाज की सुविधा नही। फ़िर आप बतायें हमारे गांव के आदमी का कौन सा विमान क्रैश या कार दुर्घटनाओं से साबिका पड़ता है जो वह इस बीमित राशि का लाभ ले पायेगा?

गांवों में तो लोग अक्सर भांग-गांजा या बीड़ी आदि के कारण ही दमें आदि बीमारियों से ग्रसित होते है और प्राकृतिक आपदायें ही उनका सर्वस्व नष्ट कर देती है। और वैसे भी वह भर्ती होने वाली दशा तक अस्पताल नही पंहुच पाते है क्योंकि उनका प्राथमिक इलाज़ ही नही हो पाता जो वह भर्ती प्रक्रिया तक अपना दम साधे रहे।

हल्की बीमारी में यह कम्पनी बीमित राशि का लाभ नही देती। एक बात और ये लोग इतने भी सक्षम नही होते कि उन सेन्टरों तक पंहुच कर अपनी बात रख सके फ़िर आखिर ये तमाशा क्यों क्या उस कम्पनी और सरकारों को उनकी हाड़ तोड़ मेहनत के तीस रुपये भर लेने है। अरबो की आबादी वाले प्रदेश व देश के अरबों गरीब लोगों तीस-तीस रुपये का कर! जो खरबों की राशि में इकठ्ठा हो जायेगा। यह सवाल इस लिए और जरूरी हो जाता है कि सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर मौजूद मुफ़्त सेवायें ही इन्हे नसीब नही होती तो फ़िर ये कवायद क्यों!

अपने लोगों की बदहाली के सैकड़ों कारण तो मुझे याद आ रहे है किन्तु बिगड़े हुए इन भयानक हालातों में कौन सी जुगति इन्हे उबार लेगी ये बात अब मेरे मस्तिष्क से परे है……मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ।

यहां प्रश्न ये नही है बीमा कम्पनी से इन्हे लाभ मिलेगा या नही या यह योजना उचित या अनुचित है यहाँ एक भारी प्रश्न तो यह है, उन लोगो के लिए जो दम भरते है विकास है, ताकि वह देखे और सोचे कि हमारे देश का एक हिस्सा जो बद से बदतर हो रहा है, कही अतीत में उसे बेहतर कहा जा सकता है आज की इस विद्रूपता को देखकर।

तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नही होते। ये शेर कह कर मैं रूमानी नही होना चाहता और न ही अपने आप को और उनको झूठी तसल्ली।

क्या हमारा दरिद्र नारायण हमेशा ऐसी दुर्गति के साथ जीता रहेगा। एक भारत में इतनी असमानता क्या यही विविधिता है जिस पर बड़े बुद्धिजीवी गर्व करते है।

कृष्ण कुमार मिश्र

(वन्य-जीव विशेषज्ञ, स्वतन्त्र पत्रकारिता, फ़ोटोग्राफ़ी)