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Image courtesy: ShineB (wikipedia)

अग्नि के आविष्कार ने जब आदिमानव की जीवन शैली को अचानक बदला तो कोई नही जानता था, कि पाशविक जीवन शैली में प्रकृति में संघर्ष करता हुआ यह मानव जल्द ही सभ्यता में प्रवेश करने वाला है, अग्नि में ढाले हुए उसके आदिम हथियार तब्दील होने वाले है खेती के औजारों में, शिकार को भुनने और हिमपात में रक्त जमा देने वाली सर्दी से वचाव का यह चमत्कृत अग्नि अस्त्र अब यज्ञ की वेदियों से लपटें निकालने के काम आने वाला है, जो जीवन के लिए जरूरी था अब वह सिर्फ जरुरत भर रहने वाला नहीं सौंदर्य और आडम्बर में तब्दील होने वाला है, अग्नि की परिक्रमा यानि बोन फायर के चारो तरफ नाचते चिल्लाते और गाते स्त्री पुरुष, कुछ ज्यादा अलाहिदा नही है, उन लाखो वर्ष पहले के मानव से बस तब मीलो फैले घने जंगलो जमी हुई बर्फ के मध्य जीवन को अग्नि से ऊर्जा देता हुआ यह आदिम मानव, और मौजूदा वक्त का आउटिंग एवं पिकनिक मनाता माडर्न मानव !, उस आदि मानव के हाथ में अधभुना या पूरा पका हुआ गोस्त और प्राकृतिक मादक पेय होते थे, बजाए, रेस्त्रां व् घर में बने तमाम तरह के लजीज व्यंजन और ब्रांडेड बीयर या व्हिस्की के, कुलमिलाकर शमां एक सा लगेगा इतिहास के इन दो छोरों को एक साथ देखने पर…..आग को सदियों पुराना आदमी मीलों पैदल चलकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता था, जमीन में गड्ढा खोदकर प्राकृतिक ओवन में आग को सरंक्षित करना सीख गया था आदमी,  और आग की अदला बदली करना भी ! अग्नितोत्सव से होलिकोत्सव और फिर रंगों का त्यौहार कैसे बना यह पर्व यह एक लम्बी कहानी है….

आदमी ने ये भी नहीं सोचा होगा की उसके अप्रितम आविष्कार अग्नि में जो वह मांस भूनता है, उसी अग्नि में उसकी सन्ततिया अन्न भूनेगी, और सती के नाम पर विधवाओं को भी, मनुष्य मन की ईर्ष्या रुपी अग्नि इतनी वीभत्स हो जाएगी की वह अपने प्रतिद्वंदियों को भी इसी अग्नि में जलाएगा, यही बानगी है इतिहास की, कि वक्त के साथ साथ इसकी नियति भी उलटती है, खंड खंड सा जुदा जुदा सा दिखने वाला अतीत, कही न कही पतले तंतुओं से जुड़ा होता है, इतिहास की यही खासयित सभ्यताओं को आपस में जोड़ती है, और आदमी को आदमी से, इसी एक इतिहास खंड में हिरण्यकश्यप नाम का एक पात्र है, जिसकी राजधानी उत्तर भारत के खीरी-हरदोई जनपद में बताई जाती है, वैष्णवों का घोर विरोधी यह पात्र जो विष्णु की सत्ता का प्रतिकार करता है, और स्वयं को भगवान की पदवी पर आरूढ़ कर लेता है, इसकी एक बहन जिसके पास फायर प्रूफ शाल या चुनरी होने की बात कही गयी है, (शायद कुछ लोग भारतीय विमानन शास्त्र की तरह फायर प्रूफ कपड़ों के अविष्कारक अपने पूर्व कथित भारतीय पूर्वजों को साबित करने में लग जाए! बिना इस बोध के की क्या वो उनके पूर्वज ही थी शैव वैष्णव, आर्य अनार्य आदि का भेद भूलकर, चलिए इन कथित अविष्कारों पर हमारे लोग कम से कम जाति वर्ग और धर्म के भेद भूल जायेगे यही क्या कम है, अनेकता में एकता के लिए), खैर बात हिरण्य कश्यप की हो रही थी, इन महाशय के एक पुत्र भी था प्रह्लाद जिस पर वैष्णवों का पूरा प्रभाव पड़ चुका था, या प्रभाव डाल दिया गया था, वैष्णव मत से वैमनस्य के चलते राजा हिरण्य कश्यप ने अपने पुत्र को अपनी फायर प्रूफ चुनरी वाली बहन के साथ अग्नि में स्थापित करने को कहा, कहते है अग्नि की लपटों ने हिरण्यकश्यप की बहन की चुनरी उड़ गयी, और वह अग्नि में जल गयी तथा  प्रह्लाद को विष्णु ने बचा लिया, आज भी जो लकड़ियों और गाय के गोबर के उपलों के मध्य एक अरण्ड का वृक्ष? गाड़ा जाता है वह प्रह्लाद के चिन्ह के रूप में है, और अग्नि प्रज्वलित करने के बाद लपटों में घिरे उस वृक्ष को सुधीजन बाहर निकाल लेते है और फिर नाचते गाते है, इतिहास के कौन से बारीक तंतु उन काल खण्डों को आपस में जोड़ते है, जब पशुपति नाथ को मानने वाले शैव आहिस्ता आहिस्ता वैष्णव परम्परा में पैबस्त हो गए, और विष्णु का गुणगान करते हुए होलिकोत्सव मनाने लगे उल्ल्हास और श्रद्धा से, यकीनन राजा को देवता बना देने वाली पुरोहितों द्वारा रचाई गयी इस प्रणाली की ही यह देन हो,

सभ्यताओं के मिश्रण ने रीति-रिवाजों में बड़े बदलाव किए कुछ खूबसूरत तो कुछ खराब, इस तरह पता नहीं कब  यह त्यौहार भी आर्य अनार्य, शक हूड कुषाण, मुग़ल और मौजूदा भारतीय समाज में संक्रमित होते हुए काल के इस छोर पर रंगों की होली में तब्दील हुआ हो, ब्रज ने रंग दिए इस होली के पर्व को तो अवध ने संजीदगी, अल्ल्हड़पन भी समावेशित हो गया न जाने कब इस त्यौहार में, एक स्त्री के जलाने की यह प्रक्रिया में कब विष्णु अवतरित हुए और कब प्रह्लाद को जीवन दान देकर वैष्णवों की शक्ति का गुणगान हुआ, यह तो दरबारी पुरोहित और कवि जाने किन्तु मौजूदा समाज ने इसमें जो रंग भरे वो अवश्य अतुलनीय है, स्नेहिल और भाई चारे से युक्त.

एक बात दिमाग में कौंधती है उसका जिक्र किए बगैर इस बोझिल ऐतिहासिक लेख को समाप्त नहीं करूंगा वह बात है “होली के फूल” की, आम की पुरानी बागों में तमाम तरह की झाड़ियां उगती है, जिनमे एक झाडी में सर्प के मुख की भाँति आकृति लिए हुए एक पुष्प खिलता है, इसी होली के त्यौहार के आस पास, जिसके मीठे पराग रस को चूसने न जाने कितने कीट पतंगे इकठ्ठा होते है उन झाड़ियों पर, होली के गाड़ने के बाद से लोग खासतौर से लडकियां इन सफ़ेद पुष्पों को चुन चुन कर सींक में पुहती है और फिर गोबर की छेददार उपलों की माला के साथ इन पुष्पों को भी होली स्थल पर चढ़ा आती है, दरअसल यह सफ़ेद पुष्प वाले पौधे का नाम मालाबार नट है, इसे हिंदी में अडूसा, रूसा या रुसाहा भी कहते है, वैज्ञानिकों ने इसे जस्टिसिया अधाटोडा नाम दिया, भारतीय धरती की यह वनस्पति कई औषधीय गुणों से लबरेज है, मलेरिया, ज्वर, क्षयरोग, मूत्र रोग व् कफ की बीमारियों में इसकी जड़ पत्ते और पुष्पों का इस्तेमाल होता है….इस आदि वनस्पति का मौजूदा मनुष्य से कितनी सदियों या फिर पीढ़ियों का नाता है यह अध्ययन का विषय है, इस पुष्प की और होलिकोत्सव मनाने वाली नस्लों के मध्य का नाता!

मानव का प्रकृति से जो रिस्ता है वह रिवाजों में दिखाई देता है, तो हो सकता है कि उत्तर भारत में उस अग्नि में तिरोहित कर दी जाने वाली होलिका के लिए ये श्रद्धा सुमन है या फिर बसंत के आगमन में रची बसी प्रकृति लहलहाती गेहूं की फसलें, खिले हुए आम के बौर और पलाश के फूलों के मध्य यह फाल्गुन का एक पर्व मात्र है, शीत के जाने और उष्ण के आगमन का स्वागत ? या फिर सामूहिक अग्नि की पूजा, या फिर उस प्राचीन व्यवस्था का अंग जब दियासलाई का आविष्कार नहीं हुआ था तब इसी तरह सभी स्त्री पुरुष इसी तरह की अग्नि प्रज्वलित कर अपने अपने घरों में अग्नि को ले जाते थे, और उसे पूरे वर्ष सरंक्षित रखते थे, आज भी यह परम्परा है, लोग होलिका दाह के पश्चात यहां से आग अपने घरों में ले जाते है,… संभव हो की यह कृषि का त्यौहार हो, मानव सभ्यता में कृषि के आविष्कार के बाद जंगली गेहूं से जब उसे मानव द्वारा खेतो में रोपित किया गया तो वह सभ्यता का प्रतीक बना और भरण पोषण का सबसे उम्दा अन्न भी, गेहूं की पकी हुई स्वर्णिम बालियां हमेशा से ऊंचाई से मैदानी क्षेत्रों में आने वाली नस्लों को आकर्षित करती रही है, सभ्यता का यह स्वर्णिम अन्न, इसे भी कथित होलिका दाह की अग्नि में पकाया जाता है और इन बालियों के भुने हुए दानों को घरों में पकाये जाने वाले अन्न में मिलाकर खाया जाता है, यह एक तरह से नव-अन्न के उत्सव का भी दिन है,……रंगों के त्यौहार के यह विविध रंग आदम सभ्यता के कई कालखंडों का ब्यौरा समेटे हुए है उम्मीद है की क्रूरता की कहानी से चलकर रंगो तक के इस सफर में होली अब सिर्फ अपने रंग में रंग गयी है -एकता का रंग !

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन

खीरी
भारत

krishna.manhan@gmail.com

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मैनहन

उत्तर भारत के एक गाँव की कहानी जो मैनहन विलेज ब्लाग के माध्यम से आप सभी के समक्ष रखने की कोशिश…परंपरा, इतिहास, धर्म, किबदन्तियां, ग्रामीण कहावते, कृषि, पारंपरिक ज्ञान, वनस्पतियां और जीव-जन्तु सभी का सिज़रा पेश करता है- मैनहन विलेज, जिसके बारे में हिन्दुस्तान दैनिक ने कुछ यूँ लिखा है ! 

कृष्ण कुमार मिश्र

्मैनहन का जंगली पुष्प जो एक देश का राष्ट्रीय पुष्प भी है

सन १९८२ के आस पास का मसला है, मैं अक्सर मैनहन के दक्खिन बहती नहर में नहाने जाता था, एक दिन एक अदभुत व्यक्तित्व वाला मनुष्य जिसने शरीर को केसरिया रंग के कपड़ों से ढ़्क रखा था, चला आ रहा था मेरी ओर, चूकि बचपन से अभिवादन करने का संस्कार मेरे भीतर पैबस्त किया गया था सो मैं दौड़ा और उस महात्मा के चरण छुए उन्होनें कुछ आशीर्वचन कहे जो मुझे याद नही है अब। लेकिन उनके हाथ में पत्तो से बना हुआ पात्र था और उसमें कुछ पुष्प, रंग-बिरंगे खालिस देशी, भारतीय पुष्प जो गांवों के झुरुमुट में हुआ करते थे। उन्होनें मुझे और मेरे साथियों को पुष्प दिए और चले गये।

चेहरे पर गज़ब का नूर, आकर्षक शख्सियत, और भाषा में गम्भीरता यानी ये सब चीजों से, मैं एक बार फ़िर रूबरू हुआ एक नहर पर जो मेरे ननिहाल की तरफ़ बह रही थी, इसे इत्तफ़ाक कहे या कुछ और, बहती जलधारा के निकट उस सन्त से मेरा दोबारा मिलना, इन कड़ियों को आज़ मैं जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। मेरी इस मुलाकात में मेरे पिता जी और मैं दोनो एक साथ थे। नहर के दोनों तरफ़ सैकड़ों  वनस्पतियां पुष्पित और पल्लवित हो रही थी हरियाली अपने चरम पर थी और मानों वह  झुरूमुट दैवीय आभा से दैदीप्तिमान हो रहा था ।

हमें उस सन्त ने आशीर्वाद दिया और पुष्प भी। तब पिता जी ने बताया कि ये फ़ूल बाबा है और इनके दोनें(पत्तियों का बर्तन) में कभी पुष्प समाप्त नही होते। यह आस्था का विषय था।

मैं दुनियां में ज्यों ज्यों वक्त गु्जारने लगा दुनियादारी की समझ भी बढ़ती गयी, और उत्सुकता भी ! और वह फ़ूल वाला साधू भी मुझे याद रहा, इसी कारण जब मैने लोगो से पूछ ताछ की तो उस कड़ी में मेरी मां ने बताया कि एक बार उनके पिता जी यानी मेरे नाना ने फ़ूल बाबा के पुष्प न खत्म होने वाले राज़ को जानने की कोशिश की किन्तु पुष्प समाप्त होने से पहले फ़िर से उस पात्र में भर गये कैसे ? ये किसी को नही पता ।

खैर मुझे इस रहस्य में इतनी दिलचस्पी नही है जितनी उस व्यक्तित्व और उस परंपरा से है, फ़ूल बांटने वाली परंपरा।

पुष्प जो जीवन के उदभव की एक खूबसूरत परिस्थिति है पुष्प जो जीव को रूमानी एहसास कराती है, पुष्प जो प्रत्येक शुभ-अशुभ अवसर का साक्षी बनता है क्योकि यह जीवन को परिभाषित करता है ……….।

मुझे यह भी नही मालूम की उत्तर भारत के इस इलाके के फ़ूल बाबा के अतरिक्त कोई व्यक्ति इस परंपरा का पोषक है या था!

पुष्प जो कहानी बताते है जीवन की, बीज़ से अंकुर, अंकुर से पौधा, और पौधें से विशाल वृक्ष, फ़िर पुष्प की अवस्था जैसे प्रकृति ने देवत्व को प्राप्त कर लिया हो, ऐसी ही परिस्थिति है वनस्पति में पुष्प की, तदपश्चात पुष्प से फ़ल और फ़ल से फ़िर जीवन का बीज़…………………।

मैं अतीत के उन क्षणों को याद करता हूं और सोचता हूं कि फ़िर कोई व्यक्ति फ़ूलों के माध्यम से जीवन की कहानी बताता हुआ किसी मोड़ पर मिल जाए और मैं नतमस्तक हो जाऊ, अपने बचपन के उस वाकए की तरह।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-9451925997