विचार धाराओं का प्रयोग और उन्हे सार्थक बनाने में गांवों की प्रयोगशालाओं की तरह जो भूमिका रही है उसे हम नही भुला सकते, विचार और उनके प्रयोग दोनो के उदाहरण हम बापू, लेनिन, और लातीनी अमेरिका की क्रान्ति मे खोज सकते है।

कल मेरी बात मेरे मित्र सुशान्त जी (जी शब्द से मेरे दक्षिण पंथी होने का अनुमान मत लगाइयेगा) से हो रही थी बावत राहुल गांधी के, वो कुछ लिखना चाह रहे थे, और मै शुरू हो गया जैसा कि हमेशा मेरे साथ होता है दौरा-ए-व्याख्यान  एक………बीमारी

राहुल जिन्हे आप सुल्तान कह सकते हो और भविष्य के प्रायोजित प्रधानमन्त्री किन्तु क्या उनमे वो लक्षण प्रैलक्षित हो रहे है जो किसी मुल्क के लम्बरदार में होने चाहिये, सुल्तान इस लिये कहा कि १९४७ ईस्वी में ब्रिटिश क्राउन के मुलाजिम माउन्टबेटन ने इडिंया को डोमेनियन मुल्क के तौर पर नेहरू के नाम स्थान्तरित किया था उस बिनाह पर ये सुल्तान है भारत के, और वह दस्तावेज़ आज भी भारत के पास मौजूद नही है, यदि हैं तो नागरिकों को उन्हे देखने की इज़ाजत नही, प्रायोजित इस लिये कि आप को जिस तरह पालिश किया जा रहा है तमाम देशी-विदेशी राजिनीतिक महत्माओं द्वारा उसके बावजूद ये पोलिश यही प्रदर्शित कर पा रही है कि साहब ३८-३९ वर्ष की उम्र में भी इन्नोसेन्ट और दुनियादारी से बेखबर है और किशोर-बालक की तरह व्यवहार करते है, यदि यह रणनीति है ऐसी छवि प्रदर्शित करने की तो  तो यकीनन बेमतलब होगी और यदि उनका ऐसा व्यक्तित्व है तो यकीनी तौर पर भारत को ऐसा या किसी मुल्क को ऐसा प्रधानमन्त्री नही चाहिये होगा।

जे०एन०यू और अन्य जगहों पर जहां भारत के ग्रामीण-शहरी, मध्य-निम्न और उच्च तमाम वर्गों के लोग अपने -अपने सवाल करते है तो बड़ी शालीनता से कुछ मीठा जवाब देकर बच-निकलते है अच्छा है इससे छवि भी बरकरार और सवाल से भी पीछा छूट जाता है, पर क्या ये एक राजनीतज्ञ के गुण है।

मुझे शक है कि जनाव ने अपने नाना का भी बेहतरीन साहित्य नही पढ़ा होगा जो उन्हे जमीनी तो नही किन्तु किताबी ही सही हिन्दुस्तान और दुनिया की झलकें दिखा सकता था, और महात्मा का भी नही क्योंकि वो सारी चीज़े नदारत है आप में।

मैं एक बात कहना चाहूंगा कि उन्हे बेनिटों मुसोलीनी, चेग्वेरा, एदोल्फ़ हिटलर, चर्चिल, लेनिन और स्टालिन की आत्मकथा से लेकर भारत के नेहरू, गांधी और रामधारी सिंह दिनकर के भारत को पढ़ना होगा और इन्हे अपने चरित्र में उतारना भी, यहां ये विवाद का विषय हो सकता है कि भाई उपरोक्त तानाशाहों को क्यों तो जवाब हैं हालात बदलते है, मुसोलीनी की बीस वर्ष का अथक संघर्ष रोम के भ्रष्ट राजा और उसकी संसद के खिलाफ़, जातीय हिंसा के खिलाफ़ और पीपल द इटालिया अखबार से इटली के लोगों को अपनी बात बताना और लोगों का उनके साथ आकर रोम की सड़को पर आंदोलन कर देना, ऐसा ही कुछ जर्मनी में था सैनिक मरते वक्त भी जहाजों पर हिटलर और जर्मनी के गीत गाते थे। स्टालिन एक छोटा सा सैनिक जिनका एक हाथ शुरूवाती सैनिक अभियान में बेकार हो गया उसने रूस की सेनाओं का नेतृत्व किया तमाम उदाहरण है हम सभी को तो कम से कम इतना तो सीखना ही चाहिये कि कैसे और किन परिस्थितियों मे ये लोग इतनी बुलन्दी पर पहुंचे और जो गलतियां इनसे हुई उनसे सबक भी।

वैसे तो मै कह सकता हूं कि इतिहासकार का नज़रिया होता है और हम चीज़ों को उसी की नज़र से देखने लगते है और ऐसा ही इंग्लैंड को छोड़कर योरोप के प्रति हमारा है क्योंकि हमने उनकी नज़र से देखा है इन सबकों

इतिहास में क्या हिटलर से अधिक बर्बरता अग्रेजॊं ने नही की हिन्दुस्तानियों लातीनियों और अफ़्रीकियों के साथ और यदि लासे गिन ली जाय तो जिन तानाशाहों के यही लोग दुर्दान्त कहते है तो उनके द्वारा गिराई गई लाशों से सैकड़ो गुना लाशे इनने गिराई है अतीत में।

क्या भारत विभाजन के दौरान जो लाखों लोग मारे गये वो नेहरू और जिन्ना जैसे महत्वाकाक्षी लोगो की देन नही थी!

हम अंग्रेजो को विदेशी शासक मानते है और अपने आप को गुलाम किन्तु हम मुस्लिम शासन को विदेशी शासन नही मानते क्योंकि उनके पास कहने को घर ही नही था खानाबदोशों ने मुल्क को हथिया लिया इन कायर भारतीय रजुल्लों की मदद से और जजिया से लेकर तमाम प्रतिबन्ध लगा दिये गये हम पर वो गुलामी नही है हमारे इतिहासकारों की नज़र में कुछ तो डरते हैं क्योंकि मुस्लिम आबादी मौजूद है किन्तु क्या कोई भारतीय मुसलमान इस गलत बात को सही कहेगा बिल्कुल नही बात धर्म की नही शासन और शासक की हो रही है, हां कुछ तो अल्पसख्यक वोट की वज़ह से चीज़ों को उल्टा करके देख रहे है? चूकि अंग्रेज़ उस वक्त बोरिया-बिस्तर लेकर चले गये थे तो आज़ादी का जोश और इतिहास में उन्हे शैतान और न जाने कितनी गालिया देने का अधिकार पा गये यदि उनमे से १० फ़ीसदी आबादी यहां मौजूद होती तो इतिहास कुछ और लिखा जाता, वज़ह यह है हि हम जिन्दा कौमें नही है।

हां बात नेहरू कि हो रही थी वह एक अच्छे इतिहासकार और मह्त्वाकाक्षी व्यक्ति थे कुशल राजनैतिक व्यक्ति मैं उन्हे नही कह सकता किन्तु शुरूवाती दौर में भारत को हांकने की कोशिश उन्होनें उन्ही लोगो की तरह किया…………………….उनकी १९५५ की रूस यात्रा में मैने उन्हे नाटकीय अंदाज़ में हाथ में रूल लिये देखा जो रूसियों को यह बताना चह रहे थे कि मैं भारत…………..

मुद्दों पर आक्रोश, साहस और जज्बों की कमी किन्तु व्यक्तिगत मसलों में हर वक्त आक्रोस…..साहस सभीकुछ फ़िर चाहे बापू पर चिल्लाना हो, या कांग्रेस के नेताओं पर या फ़िर भारत के लोगो पर जिसे वह अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते थे, १९६२ में चाइना पर आक्रोश, साहस, जज्बा दिखाने की बात आई तो कलई खुल गयी, जनाब लार्ड माउंटबेटेन के तो बिल्कुल शागिर्द थे। एक तस्वीर देखियेगा जिसमें वायसराय अपनी पत्नी एडविना के साथ अपनी नेवी वाली वर्दी में है और नेहरू पीछे एडविना तनी ही सिधे आगे को देखरही हैं किन्तु आप साहब मुगल दरवार के किसी मुलाजिम की तरह झुके हुए बिना मतलब हसंने और कुछ फ़रियाद करने की कोशिश कर रहे है, उन दोनो की थोड़ी सी जर्रानवाजी पाने के लिए मुझे उन कलुषित दिमाग वाले लोगों पर हंसी आती है जो नेहरू-एडविना के प्रेम संबध कायम कराने की आज़ भी कोशिश में जुटे है कि इसी से शायद किताब बिक जाए, एक मालिक और उसके गुलाम मुलाज़िम में प्रेम बहुत अजीब स्थिति में होता हैं डोमेनियन भारत का वायसराय और उसके द्वारा नियुक्त प्रधानमन्त्री।.मालिक-नौकर की प्रेमकहानी.बनाए रहो………..

भारत का अद्वतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी, यह वह व्यक्तित्व था जिसने अपना आक्रोश, साहस जज्बा अपने व्यक्तिगत मामलों के लिए नही बल्कि देश के लिए बचा कर रखा था और आप उनके साहस के उदाहरण पाकिस्तान, चीन आदि के मसलों पर देख सकते हो, एशिया में भारत भले ही महाशक्ति न हो किन्तु उस वक्त वह महिला महाशक्तिनी पूरी दुनिया में अपनी व्यक्तिकत ताकत से भारत की ताकत को परिभाषित करवा रही थीं, क्रेमलिन से लेकर व्हाइट हाउस तक अगर डरते नही थे उनसे तो सहमते जरूर थे। हां इन्दिरा जी के व्यक्तित्व निर्माण में नेहरू का ही योगदान था एक बेहतर पिता के रूप में।

मैं इन्दिरा जी के बाद यदि भारत के किसी बेहतर प्रधानमन्त्री को जानता हूं तो वह चन्द्रशेखर थे उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली के आगे राजीव और अन्य प्रधान्मन्त्री भी फ़ीके थे किन्तु अफ़सोस उन्हे मौका नही मिला….।

एक सत्य और हंसी की बात क्या राहुल में यह क्षमता है कि भारत के राजनैतिक धरातल पर मौजूद बिचेज़ और डेविल्स से मुलाकबला कर सकने की क्षमता है। संसद और उसके बाहर, ताड़ुका, महिषासुर टाईप के नेताओं से।

श्रीमती सोनिया गांधी  एक संक्षम व कुशल राजनैतिक अवश्य है किन्तु भारत के रेसिज्म की अवधारणा से युक्त बीमार लोग उन्हे पसन्द नही करते। 

राहुल को चाहिये वो मुद्दो की लड़ाई जिन्दा लोगों की तरह लड़े ताकि हमारी सोयी हुई कौमें फ़िर से सक्रिय हो, और उनकी यह लड़ाई और ताकत का असली अन्दाजा तो तब लगे जब विपक्ष में आकर इन सबकी लड़ाई लड़े….. गांवों और वहां के अन्नदेवता के अधिकारों और दरिद्रनारायण को रोटी की …………..

फ़िलवक्त मैं भारत में किसी भी प्राइमिनिस्टरियल कन्डीडेट को नही जानता जो हमारे मुल्क का सरबरा बन सके!

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारत वर्ष

कही ककरहा ताल सरोवर निर्माण की अदभुत परंपरा तो नही !

कल रात में खीरी के एक गांव छाऊछ जो शहर से जुड़ा हुआ है, में मैं मेरे मित्र हिमाशु तिवारी के घर पर था, अलाव जल रहा था और मेरी गुफ़्तगू चाचा श्री प्रकाश चन्द्र तिवारी जी से शुरू ए हुई मामला पौराणीक बातो तक गया और फ़िर गहराई लेते हुए महाभारत काल तक, कई चीज़े सामने आई जिनसे मै बिल्कुल अनिभिज्ञ था, इस शब्द के बारे में मेरा मानना है, कि अनिभिज्ञता ही जीवन में उल्लास और संवेदनशीलता लाती है, और जिज्ञाशा भी ! नही तो हम बुद्ध हो जाये और संसार की व्यवस्था देवलोक जैसी किसी व्यवस्था में तब्दील हो जाये और यह भयानक परिवर्तन कैसे परिणाम देंगा यह सोच कर मै विचलित हो जाता हूं खैर बात शब्दों की हो रही है ।

छाऊछ में मध्यकाल के किसी राजा की गढ़ी के अवशेष है किन्तु उनका इतिहास अब विस्मृत हो चुका है।

रानी विजया कुंवरि आफ़ महेवा

यही मुझे मालूम हुआ कि लखिमपुर में बेहजम बस अड्डे के पास एक पक्का तालाब और एक सुन्दर बगीचा जिसमें एक खूबसूरत निवास स्थान बना है आज वह मन्दिर का रूप ले चुका है किन्तु संगमरमर से सजाया ये सरोवर और इमारत कभी महेवा रियासत की रानी विजया कुंवरि का प्रसाद हुआ करता था और यह सरोवर उनके जल क्रीड़ा का स्थान किन्तु उनके बनारस चले जाने के बाद उनकी जमीने जिन्हे उन्होने ने अपने सेवकों के हवाले कर दी थी और एक सन्त ने इसे मन्दिर का रूप दे दिया।

इतिहास की ये झलकियां मुझे और जानने की जिज्ञासा की ओर दौड़ने को कह रही है। मैं जब उस जगह पहुंचूगा तो आप सब को मिलूंगा एक नई कहानी के साथ!

वालदा-

इस शब्द को जानने से पहले बग्गर शब्द को जान लेना जरूरी है, बग्गर गांवों में प्रचलित शब्द है जो उस स्थान को कहा जाता है जहा मवेशी पाले जाते है और उनके खाने आदि की व्यवस्था यह स्थान एक मैदान जो घिरा भी हो सकता है फ़ूस-टटिया से कांटों से या चारदिवारी से मध्य में वृक्ष आदि और एक घारी(कच्ची निट्टी का बना घर ) और उसके आगे छप्पर, घारी में भूसा, चारा वगैरह और कृषि संबधी उपकरण रखे जाते है और उसके आगे के छप्परों में मवेशियों के रहने की व्यवस्था। और इस घारी और छप्पर वाले स्थान को वालदा या वाल्दा कहते है। अर्थात बग्गर में बना मवेशियों का घर वालदा कहलाता है।

छाऊछ में कुछ एतिहासिक प्रमाण_

मै उत्सुक रहता हूं ग्रामीण भाषा के शब्दों और उनके इतिहास को और यही उत्सुकता मुझे ले गयी छाऊछ के कुछ एतिहासिक स्थलों में मेरे यह पूछने पर कि चाचा गांवों में ककरहा नाम ताल क्यों होते है उनका भी जवाब मेरे अनुमान से मिलता जुलता है क्योंकि मैनहन, दुधवा और अन्य स्थानों पर तमाम तालों के नाम ककरहा या इससे मिलते जुलते है और इन सब जगहों से भी मैं परिचित हूं, तालाब की तलहटी में कंकड़ होना ही इस शब्द कि उत्पत्ति का कारक बना, किन्तु इन सभी ककरहा तालों में ये कंकड़ कहां से आये जबकि इनके बिल्कुल समीप के तालों की तलहटी में चिकनी मिट्टी मौजूद है?

मैनहन में ककरहा ताल से जुड़ा हुआ कुण्डा ताल जिसमें चिकनी मिट्टी है और वह ग्रामीणों द्वारा डेहरिया, कच्चे घरों की मरम्मत और मिट्टी के बर्तन बनाने में इस्तेमाल होती रही है।

मैं सोचता हूं कि कही ये तालाब निर्माण की कोई व्यवस्था तो नही थी जिसमें इसकी तलहटी में कंकड़ डाले जाते हों ताकि सोतों से स्वच्छ पानी छन कर आये और उसमे नहाने वाले लोगों के पैर मिट्टी में न धंसे और यदि कोई चीज़ तालाब में गिर जाये तो वह मिट्टी-कीचड़ में पैबस्त न होने पाये बल्कि तलहटी में कंकड़ों पर सुरक्षित रहे। यहां एक बात गौरतलब है कि ये  कंकड़ नुकीले न होकर गोल है ताकि मनुष्य और जानवर दोनों के पैर सुरक्षित रहे, छिद्रदार कंकड़। झाऊ पत्थर के………………।

तालाब निर्माण की तकनीक जो प्रचलित थी हमारी प्राचीन ग्रामीण सभ्यता में। कुछ आप भी सोचिये और बताइये।

और यह तकनीक जोड़ती है उन सब क्षेत्रों को जहां ककरहा ताल है और उन लोगो को भी .ये सभी एक ही परंपरा के लोग रहे होगे।

चाऊछ में भी मुझे पता चला ककरहा ताल के पास मठहा ताल है उसमें कंकड़ नही है और वहां पांच मठ बने हुए है इतिहास में इसके प्रमाण है कि विराटपुरी खीरी जनपद के बड़खर गांव में थी और यह सारे क्षेत्र उसी राज्य की सीमा में थे इस लिये अज्ञातवास के सम्य पाण्डवों के दुर्दिन भी इन तमाम जगहों पर बितीत हे जिनमें छाऊछ का जिक्र मैने पहली बार सुना जबकि आज के दुढवा टाइगर रिजर्व के जंगलों में कई स्थानों पर पाण्डवों के निवास करने की बाते कही जाती है।

इन मठॊ में चार मठ एक स्थान पर और एक थॊड़ा अलग और विशाल, कहते है पांचाली इसी मठ में रहती थी और इस मठ के द्वार पर जिसकी खड़ाऊ मौजूद होती थी तो यह अन्य भाईयों में मान लिया जाता था कि आज द्रौपदी के साथ रात्रि विश्राम कौन कर रहा है!

झंडा जो १९२१ ईस्वी में स्वीकार किया गया

१९३१ में इसे आज़ादी की लड़ाई का परचम बनाया गया

बापू का सुदर्शन चक्र

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

झंडा ऊँचा रहे हमारा

— श्यामलाल गुप्त पार्षद जी का प्रिय गीत भारत के प्रत्येक नागरिक के मुहं से कभी न कभी स्फ़ुटित हुआ होगा, और यह गीत मुझे याद दिला जाता है मैनहन की उस झंड़े वाली जगह की ! जहां झंड़े जैसी कोई चीज़ मैने कभी नही देखी ।

यहां ये जिक्र करना जरूरी है कि मै डोमेनियन राज्य भारत के तिरंगे की बात नही कर रहा जिसे २२ जुलाई सन १९४७ में संविधान सभा ने ध्वनि मत से मंजूर किया था, तीन रंगों, केशरिया, सफ़ेद व हरे रंग वाला झंडा जिसके मध्य में अशोक स्थम्भ की २४ तीलियों वाला चक्र था, जो आज़ हमारा राष्ट्रीय ध्वज़ है।

मैं उस तिरंगे की बात कर रहा हूं जिसे सन १९२१ ईस्वी में कांग्रेस कमेटी की विजयवाड़ा बैठक में आन्ध्र प्रदेश के एक युवक ने बापू को एक झंडा दिया था जो लाल हरे रंग का था बापू के सुझाव पर सफ़ेद रंग और जोड़ दिया गया उस झंड़े में

आगे चलकर वही झंडा आज़ादी की लड़ाई का परचम बना, सन १९३१ में अधिकारिक तौर पर इसे अपनाया गया और इसके मध्य में सफ़ेद रंग पर नेवी ब्ल्यू रंग का चरखा बना दिया गया जो बापू का अमोघ अस्त्र था और हर भारतवासी का भी। हां उस बालक का नाम कही प्रकाश में नही आया जिसने उस झंडे का पहला माडल विकसित किया था !

मैनें बचपन में अपने घर पर तकुली, और चरखा दोनों देखे पर तब तक इनका इस्तेमाल होना बन्द हो चुका था तकरीबन वह १९८० के बाद की बात है किन्तु इस बात से पता चलता है बापू के चरखे का जादू कॄष्ण की बासुरी से कही ज्यादा तकतवर था, भारत का प्रत्येक नागरिक उनकी बात सुनता और उस को फ़ौरन अमल में लाता, और वो भी उन दिनों में जब रेडियों के अलावा कोई संचार माध्यम नही था। आज मोटीवेशन के तमाम साधन है कम्प्युटर, लैपटाप, प्रोजेक्टर, टेलीविजन, मोबाइल और न जाने क्या-क्या और लोग चिल्ला -चिल्ला कर मिटते जा रहे है मगर कोई नही सुनता उनकी अमल में लाना तो दूर…………….

खैर बात बापू के चरखे और झंडे की हो रही थी, जब मेरे बाबा व पिता, दाऊ को बाहर से आने में देरी हो जाती तो, मैने अपनी दादी से उन दिनों तमाम बार यह कहते हुए सुना कि झंडा तीर देख आऔ, तुम्हारे दौआ या बाबा, या पिता घर आ रहे हैं कि नही, यह जगह गांव के पश्चिम जहां आबादी समाप्त होती थी वहां थी, एक टीला जहां कुछ लोगो ने झोपड़ी बनाने के लिये खर-पतवार इक्ठ्ठा किए हुए थे और वह टीला भी ढ़ग से नही दिखाई देता था। बचपन की अबुद्धि ने कभी यह मन में विचार नही लाने दिया कि झंडा वाली जगह पर आखिर झंडा क्यो नही!

आज इस बात पर विचार किया तो पता चला उन दिनों भारत के प्रत्येक गांव में झंडा वाली जगहे होती थी और उन पर चरखा वाला तिरंगा लहराया करता था। अम्मा बताती है कि उनके गांव मे भी गावं बाहर एक मिट्टी के टीले पर एक लम्बे बांस में चरखा वाला झंडा फ़हराता था, यह बात शायद १९५५ ईस्वी की रही होगी। यानी आज़ादी की उस सुन्दर कहानी का असर अभी भी यानी आठ वर्ष बाद भी जीवित था।

मुझे याद है सन १९८३-८४ में भी स्कूलों में यही चरखा वाला झंडा फ़हराया जाता था मेरे प्राइमरी स्कूल में भी, या तो झंडे की अनुपलब्धता या जन मानस पर अमिट छाप कुछ भी मान सकते है आप। शायद आज़ादी की लड़ाई के वक्त का ये झंडा अभी भी लोगो के पास सुरक्षित था और आज़ाद भारत के राजसुख में लीन नेता ये भूल गये होगें की अब आज़ाद भारत का एक अलग झंडा है और लोगो तक उसे पहुंचाना है।

अब न तो उन्हे याद है और न मुझे मालूम हैं कि अब वह देश प्रेम के जज्बे समाप्त हो गये और लोग राष्ट्रवादी होने के बज़ाय परिवारवादी, जातिवादी, धर्मवादी हो गये और कुछ तो रूसवादी और चीनवादी विचारधारा में जलमग्न होने लगे। चीजे सामुदायिक न होकर व्यक्तिगत हो गयी!

भारत के हर गांव में झंडा जो प्रतीक था उस संघर्ष का, देश का, संस्कृति का और अपने होने का, झंडा, या किला केवल  कपड़े या  ईट-गारे की बनी चीजे नही होती है ये होती खुद के होने का सबूत एक पहचान अपने अस्तित्व की,  और उस वजूद को पहचान दिलाने का ये सफ़ल प्रयास था जिसे पूरे भारत के गांवों, कस्बों और शहरों ने अंगीकार किया था, किन्तु अब वक्त बदल गया है अब हम न तो अपने देश के प्रति गम्भीर है और उसके झंडे के प्रति, इन सब के बिना हम सब की अपने प्रति, कुटुम्ब के प्रति या जाति-धर्म के प्रति गम्भीरता कोई मायने नही रखती।

क्या देश आज़ाद है झंडे के कोई मायने नही रहे, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र के प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नही क्या हमारा उन कुछ लोगों को लाल-बत्ती में बिठा कर देश उनकी जिम्मेदारी समझ कर चैन से सोना उचित है। क्या हम फ़ुरसत पा लेते है उन तमाम कर्तव्यों से ! फ़िर फ़र्क ही क्या रहा गुलाम देश के नागरिक होने और आज़ाद देश के नागरिक होने में। और हम  अपनी जिम्मेदारी से विमुख! उन चन्द लोगों को ये अधिकार देकर, अपने हक की भीख मांगते रहते है जीवन भर,

यदि हर ग्राम प्रधान या उस गांव का कोई व्यक्ति सोच ले कि हमें अपने झडे वाली जगह पर फ़िर से तिरंगा फ़हराना है तो उसे बांस के तने और दो गज खद्दर इकक्ठ्ठा करने में कोई दिक्कत नही होगी।

क्या फ़िर से प्रभात फ़ेरियां निकलेगी हमारे गांवों में क्या फ़िर से झंडे लहरायेगें आसमान में और लोग अगस्त क्रान्ति के वक्त जिस तरह शिरकत करते अपने गांव व शहर की कठिनाइयों को दूर करने के लिये क्या वो हालात वापस नही आ सकते ।

यदि आ जाये तो शायद बापू की आत्मा को शन्ति मिल जायेगी!

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७


म्मैनहन गांव का नक्शा, परगना-कस्ता, तहसील-मोहम्मदी, जिला-खीरीnaksha 001

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बात पुरानी है लेकिन सुनाना जरूरी है

मैनहन में वृक्षारोपड़ करते हुए

आपरेशन ग्रीन कार्यक्रम मैनहन

३१ अगस्त,सन २००१, मैनहन (खीरी)

सरकार के एक कार्यक्रम आपरेशन ग्रीन के तहत मैने अपने गांव में तकरीबन १००० वृक्षॊं की रोपाई की, इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के वन-निगम के प्रबन्ध-निदेशक श्री आर०पी० सिंह ने अध्यक्षता की उनकी मौजूदगी नें खेरी के वन-विभाग को सक्रिय कर दिया था और सभी आला अफ़सरान मैनहन में पहले से उपस्थित थे, गांव के प्राथमिक विद्यालय में इस विशाल सभा का आयोजन हुआ और मितौली से मैनहन तक स्वागत द्वार बनाये गये, यह सारी व्यवस्था मेरे जिम्मे थी, कार्यक्रम की शुरूवात सरस्वती वंदना से हुई और फ़िर सभी आगुन्तको ने हमारे गांव के लोगों को संबोधित किया, वृक्षारोपण के मह्त्व बताये और वन-विभाग के सभी अधिकारियों व कर्मचारियों ने पौधे रोपे, एक नीम का वृक्ष प्रबन्ध निदेशक ने रोपित किया और उस पेड़ की जगह एक पट्टिका लगवाई गई जिसे मै शहर से बनवाकर ले गया था उस पर महोदय का नाम लिखा हुआ था, स्कूल से पौधारोपड़ की शुरूवात हुई और फ़िर मेरी तमाम जगहों मे पौधे रोपे गये, जिनमें आम, नीम, सेमल आदि थे, सेमल के अधिक वृक्ष मुझे प्रदान किए गये थे चूकिं इनका व्यवसायिक महत्व है सो मैने तमाम वृक्ष वितिरित कर दिए।

मेरे गांव में मेरे द्वारा आयोजित यह प्रथम कार्यक्रम था, शुरूवात में तो लोग कौतूहल पूर्वक मेरी गतिविधि देख रहे थे कि आखिर रोज़-रोज़ वन-विभाग के अफ़सर क्यों आते है क्या तैयारिया हो रही है किन्तु उन्होने कुछ ज्यादा उत्सुकता नही दिखाई किन्तु जब आयोजन की सभी तैयारिया पूर्ण हो गयी तो सभी ने प्रेम से शिरकत की और मुझे उत्साहित भी किया,  ग्रामीणों का सहयोग भी मुझे मिला।  यहां यह बताना जरूरी है कि इस कार्यक्रम के तहत रोपे गये तकरीबन १००० पौधों में से मात्र ४०-५० पौधे ही आज विकसित हो पाये, इसे मै अपनी असफ़लता ही कहूंगा।

हां और वह पट्टिका जो प्रंबध-निदेशक जी के सम्मान में लाई गयी थी, मुझसे कहा गया कि इसे अभी उखाड लो पेड़ जब बड़ा हो जाये तो लगा देना किन्तु कुछ दिन बाद वह पेड़ ही वहा से उखड़ गया जिसे महोदय ने रोपा था तो पट्टिका कहां लगे और पट्टिका आज भी जंग लगी हुई मेरे गांव के घर मेम रखी है उसे जब देखता हूं तो………………

यहां श्रीमती इन्दिरा गांधी की एक बात याद आती है ।

“A nation’s strength ultimately consists in what it can do on its own, and not in what it can borrow from others.”

स्कूल में रोपे गये पौधे सुरक्षा के अभाव में ग्रामीणॊं व उनके मवेशियों द्वारा नष्ट कर दिये गये क्योकि उनकी उचित देखभाल नही हो सकी, जबकि सार्वजनिक स्थल पर लगे इन पौधों की सुरक्षा सबकी जिम्मेवारी थी।

खैर मेरी व्यक्तिगत भूमि पर जो पौधे लगाये गयें खेतों आदि में उन्हे पड़ोसी किसानों ने नीलगाय पर तोहमत लगाकर उखाड दिया गया ताकि पड़ॊसी के खेत में छाया न लगे और फ़सल प्रभावित न हो, लेकिन सेमल के पौधे इतना नही छितरते की वह सूरज की रोशनी को रोक सके। किन्तु मुझे इस बात की खुशी है कि जिन आस-पास के गांव वालों ने इन पेड़ों को मेरे खेतो से उखाड़ कर अपने घर-दुआर में रोपित किया और इनकी देखभाल की और वह पौधे अब वृक्ष में तब्दील हो गये है, यह जानकर प्रसन्नता होती है और मैं अपने आप को कुछ-कुछ सफ़ल पाता हूं। मुझे उनकी यह चोरी बड़ी सुन्दर लगी।

इस बेहतरीन कार्य में मेरा सहयोग देने वालों में मेरे गांव के लोगों में बड़े भाई श्री सुधाकर शुक्ल जी, दाऊ श्री रामावध शुक्ल जी, दाऊश्री परमेश्वरदीन जी, दाऊ श्री(स्व०) बेंचेलाल पाण्डेय जी (पूर्व प्रधान), दाऊ श्री शिवदयाल मिश्र जी, बाबा (स्व०)मुन्ना लाल शुक्ल जी, इसके अलावा मेरे कार्यकर्ता जिन्होने शारीरिक श्रम का योगदान दिया, और मेरे सभी मित्र गण जिनकी भागीदारी महत्वपूर्ण रही। मैनहन के अतिरिक्त तमाम गांवों के लोगो ने जो शिरकत की उनमें चाचा श्री बलबीर सिंह(पूर्व ब्लाक प्रमुख), गुरू जी श्री वी०पी० सिंह जी, कविवर कंटक जी, वनाधिकारी नकवी जी, उदयभान सिंह जी, मित्र श्री अमित श्रीवास्तव जी, अमित गुप्ता जी, विद्यालय के अद्यायपक गण आदि का मै कृतज्ञ हूं।

इस कार्यक्रम का मुझे जो सबसे ज्यादा फ़ायदा मिला वह यह कि सभी आदरणीय ग्रामजनों की उपस्थित और उनकी शक्लॊं का कैमरे में कैद हो जाना, इस आनी-जानी दुनिया में वो चेहरे मेरे पास जीवित रहेंगे उन तस्वीरों के रूप में।

अब मैने वृहद स्तर पर यह कार्य न करके प्रत्येक वर्ष कुछ प्रजातियों का रोपण करता हूं, और उनमें से अधिकतर पौधे लगातार वृद्धि कर रहे है, मेरी पहली पसन्द है बरगद, पीपल, पाकड़, उसके बाद कुछ और………..और यही वृक्ष मेरी मां को भी पसन्द है।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

गांव का कच्ची मिट्टी का घर ऐर उसके सामने विचरण करते क्रौंच

मैनहन, खीरी, उत्तर प्रदेश भारत

क्योंकि अब वहा पेड़ नही बचे, लपचू एक ऐसा खेल है जिसमे खिलाड़ियों की तादाद पर कोई प्रतिबन्ध नही है, सब एक वृक्ष के नीचे इकठ्ठे होते फ़िर टास जैसा बात होती और एक बच्चे को बैटिंग करने का मौका दिया जाता बल्ले की नाम पर एक लगदा यानी बेहया या लकड़ी का टुकड़ा , जो भी इफ़रात में मौजूद हो वहां, करीब दो फ़ीट लम्बा यह लगदा(डंडा) फ़ेका जाता और जब तक वह बच्चा उसे उठा कर लाता सभी पेड़ पर चढ़ जाते, फ़िर वह जमीन पर मौजूद बच्चा उस डंडे को जमीन पर रख कर पेड़ पर चढ़ता उन सभी बच्चों में से किसी एक को पकड़ लेने या छू लेने के लिये, और जिसे भी वह छू लेता फ़िर उसे वह डंडा ऊठाना पड़ता और यह प्रक्रिया दोहरानी पड़ती जब तक की वह किसी को शिकार न बना ले यानी छू ले।

इस खेल के पीछे यदि कॊइ बेहतरीन भावना छुपी है तो वह बच्चो को विशाल वृक्षों पर चढ़ने की कला का प्रशिक्षण और वह मनोरंजन के साथ यानी शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ मानसिक प्रसन्नता की अनुभुति।

किन्तु अब हमारे गांवों के बच्चे लपचू नही खेलते क्योंकि गांव में विशाल वृक्ष ही नही बचे कलमी बघीचों ने उनकी जगह ली जिसकी जो भी डाल पकड़ ली जाय तो उसमे लटकने वाला बच्चा धराशायी……….इसके अलावा गांवों की बदलती संस्कृति जिसमें बचपन से ही बच्चे को विद्द्वान बनाने की जी तोड़ कोशिश शामिल है ये ऐसा युद्ध है जिसमे गार्जियन बच्चों के साथ-साथ युद्ध लड़ते है । रही सही कसर डीवीडी और सीडी ने पूरी कर दी है, ग्रामीण खेलॊं की विलुप्ति का एक और मुख्य कार्ण मेरी समझ में आ रहा है वह है आर्थिक सुरक्षा, इस अनियोजित विकास की दौड़ में मेहनत करने के बाद रोटी नसीब हो रही है किन्तु सकून नही।

लुक्काचोर_

यह खेल भी बहुत मज़ेदार है बचपन में मैनें इन सब खेलों के साथ जो आंनद की अनुभूति की है उसका वैसा बयान तो नही कर सकता। इस खेल में एक बच्चे को चोर मान कर उससे आंखे बन्द करने को कहा जाता है और फ़िर सारे बच्चे दौड़कर मिट्टी की घारियों, छप्पर की झोपड़ियों व धान के पैरा (पुवाल) की बनी विशालकाय चट्टों में छूप जाते थे, फिर वह बालक आखे खोलता तो सभी गायब और वह जुट जाता उनमें से किसी एक को खोजने में यदि कोई दिखाई भी पड़ जाय तो उस बालक को चोर बनने से मुक्ति मिल जाती और जो बच्चा उसके द्वारा खोजा जाता उसे चोर बनना पड़ता इस तरह खेल दूसरा राउड़ शुरू ए हो जाता,  ये खेल अंधेरा होने के बाद तक भी चलता रहता था क्योंकि गांव में कोल्हू होते थे जिनकी भट्टियों मे आग जलती और लोगों की मौजऊदगी से चहल-पहल हुआ करती थी,   यहां एक बात मेरे दिल में आती है जब मैं शहर के कुत्तों और उनके नवजात शिशुओं यानी पिल्लों को ठ्ण्ड मे ठिठुरते देखता हूं, जब लुक्काचोर खेल के दौरान मै किसी मिट्टी की घारी में छुपता जिसमें मवेशी या फ़िर उनके खाने का सामान भूसा आदि रखा जाता था, तो उसमे किसी कुतिया को अपने बच्चों के साथ पुवाल या भूसा पर बैठे पाता जो उस चारों तरफ़ से घिरे स्थान में ठंड में भी पुवाल की गर्माहट का आंनद ले रही होती थी, या फ़िर किसी पुआल(धान निकालने के बाद बचे हुए सूखे पौधे जो जानवर के खाने व मनुष्यों द्वारा जलानें में प्रयुक्त होता है) के चट्टे में  पिल्लों की मां द्वारा

खोड़ बनाई गयी होती थी उसमेम छुपता था गुदगुदे पुवाल की गर्माहट कभी-कभी अधिक देर छुपे रहने को मज़बूर करती भले ेल समाप्त हो जाये। अब खेतों में ही पुवाल की बिक्री कर दी जाती, या मशीन द्वारा धान-गेहूं आदि निकलवाने से उससे प्राप्त होने वाला पुवाल व भूसा खेत में ही नष्ट हो जाता है। अब गांवों में बच्चे लुक्काचोर नही खेल पाते, अब वह क्रिकेट खेलते है भले बल्ले के नाम पर लकड़ी का डंडा प्रयोग में लाया जा रहा हो, और अब उनके छुपने की जगहे भी समाप्त हो गयी चरागाह समाप्त होने से अब हर आम व्यक्ति मवेशी नही पाल सकता क्योकि उसके पास खेत नही और न ही वह घारी बना सकता है क्योकि अब गांवों में मिट्टी भी मोल मिलती है और घारी छाने के लिये पुवाल और खर-पतवार भी।

चीजे बदल रही है और उनके साथ-साथ मूल्य भी। मैं यह नही जानता आगे का भविष्य कैसा होगा पर आज़ के हालात बताते हैं कि माज़रा ठीक नही लगता ।

कृष्न कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

चरागाहों का खत्म होना भी इसका मुख्य कारण है जहां ये बच्चे टोलियों में अपने मवेशियों के साथ जाते और उन्हे चरने के लिये छोड़कर लपचू, सटर्रा, कबड्डी आदि खेलों में व्यस्त हो जाते…एक स्वस्थ्य मनोरंजन।

अब या तो गांव का बच्चा भारी-भरकम बस्ता लादता है या फ़िर सिर पर बोझा !

कृष्ण कुमार मिश्र

अंग्रेजी में Grove कहते है उस स्थान को जहां वृक्ष, झाड़ी, लतिकायें, और खर-फ़ूस सब हो एक छोटे क्षेत्रफ़ल में, हमारे ग्रामीण इस स्थान को अलाहिदा नामों से जानते रहे है, और इन नामॊं में वनकिया यानी वन का छोटा रूप, या जंगलिया के नाम से ज्यादा प्रचिलित है। इन्ही स्थानों मे तमाम जंगली पुष्प व फ़लों वाले पेड़-झाड़ी और लतायें मौजूद होती थी जिन न जाने कितनी तरह की चिड़िया, कीट-पतंगे, तितलिया मड़राती थी और मनुष्य भी अपनी रोज़मर्रा की तमाम जरूरते इन्ही जगहों से पूरी करता था जैसे लकड़ी, जानवरों की चराई और कुछ जंगली फ़लों का प्रयोग खाने में करते आये है। यह दुखद है कि अब ये वनकिया-जंगलिया समाप्त हो चुकी है और इन स्थानों पर विदेशी प्रजाति के पौधे लगायें जाते है जिससे विविधिता तो नष्ट ही होती है और ये व्यवसायिक इस्तेमाल के लायक ही होते है ग्रामीण जनमानस को इनसे कोई लाभ नही मिलता, केवल व्यक्तिगत लाभ………….

मैनहन में जंगल समाप्त होने के बाद भी मेरे बचपन में तमाम छोटी वनकिया थी किन्तु अब वह नस्ते-नाबूद कर दी गई है और साथ ही इनके साथ वह रंग-बिरंगे जीव भी समाप्त हो चुके है जिनका ये वनकिया घर हुआ करती थी।

एक बात और जो महत्वपूर्ण है, कि अब गांवों में सिर्फ़ कुछ गिनी-चुनी फ़सले बोई जा रही है जिनका आर्थिक महत्व अधिक है या सरकार -बाज़ार द्वारा किसानों को ऐसा करने पर मजबूर किया गया है इसके चलते अब वह सब घासे, नष्ट हो गयी है जो इन फ़सलों के साथ होती थी जिन्हे आप खरपतवार या वीड्स नही कह सकते क्योंकि ये घासे पशुओं व मनुष्यों दोनो के द्वारा खाने में भी प्रयुक्त होती थी, भारत की गरीब जनता का तो बहुत मदद मिलती थी इन वनस्पतियों से क्योंकि खेत के मालिक को कोई एतराज़ नही होता था इस बिना बोई प्रजाति का इस्तेमाल दूसरे द्वारा किये जानें में।

इसका उदाहरण है चना के साथ उगने वाली अकसा घास जिसे लोग कभी-कभी खाने में प्रयुक्त करते थे, गन्ने में होने वाली कोदरौली, हिरनखुरी, झरुआ आदि जिसे जानवर बड़े चाव से खाते थे, मड़ुआ घास को तो जानवर और आदमी दोनो बहुत ज्यादा पसन्द करते आयें अब ये विलुप्त हो चुकी है या धीरे-धीरे हो रही है और इनके साथ भी इन पर आश्रित कीट, पक्षी आदि भी समाप्त हो रहे है कोंकि अब हर किसान घास-नासक जहर का अंधाधुन्ध प्रयोग कर रहा है, जबकि इन घासों के सहारे जो जीव चिड़िया आदि इन खेतों मे रहते थे तो वह उस फ़सल में लगने वाले खिटों को भी अपना भोजन बनाकर संतुलन कायम रखते थे, यानी उस जीव ने आप के खेत की फ़सल के जितने दाने खाता था उसका कर्ज भी वह जाने-अनजाने अदा करता रहता था “इसे ही प्राकृतिक संतुलन कहते है लेकिन हमने उसे बिगाड़ दिया जो अब जल्द सुधर नही सकता”

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

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एक जीवित तोप की कहानी

किस्सा १८५७ के गदर का है जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अवध के एनेक्शेसन का फ़रमान जारी किया और राज महाराजाओं की जमीन जायजाद और असलहों आदि का ब्योरा मांगा, राजाओं को जैसे सांप सूघ गया उन्हे उनके अधिकार छिनते नज़र आये, नवाबी राज में जुगाड़ से अपनी आन-बान बचाये और जनता की मेहनत पर सुख भोग रहे ये रजवाड़े अब उदिग्न और दुखी थे तभी उधर सैनिक विद्रोह से मुल्क में एक हलचल सी मच गयी, सब अपने फ़ायदे-नुकसान की जांच-पड़ताल कर इधर-उधर भागने लगे, और जनता किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ये नज़ारा देख रही थी, ज्यादातर रजवाड़ॊ और तालुकेदारों का तो यह हाल था कि जब वह भारी लगते तो क्रान्ति करने लगते और जब अंग्रेज भारी पड़ते तो वह अंग्रेजों की तरफ़दारी में जुट जाते!

अवध में भी कुछ ऐसे हालात थे अहमदुल्ला शाह, बेगमहज़रत महल और कुछ अन्य अति-महात्वाकाक्षी व्यक्ति जिनमे गज़ब की नेतृत्व क्षमता थी इस लड़ाई को आगे ले जा रहे थे, किन्तु हर जनपद में कम्पनी व नवाबी हुकूमत के लोग, अफ़सर व चाटुकार मौजूद थे और गदर की हलचल पर सब नज़र रखे हुए थे, दूर-दराज़ में छोटे राजा और तालुकेदार हरकहरों द्वारा लाई सूचना पर निर्भर थे कोई कहता फ़िरंगी भाग रहे है तो कोई कहता लखनऊ में फ़िर से फ़िरंगी राज कायम हो गया है। और इसी सूचना के आधार पर ये राजा अपना रंग रह –रह कर बदल रहे थे कभी अपने अंग्रेज आकाओं की जीहुजूरी तो कभी नवाबी शासन की तरफ़दारी! जैसे हालात वैसा भेष!

राजा लोने सिंह आफ़ मितौली जो इस इलाके में बहुत प्रसिद्ध और विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर काबिज़ थे

मोहम्मदी, और शाहजहांपुर से चले अंग्रेज अफ़सर व उनके परिवार जिनका रास्ते में उन्ही के सैनिकों द्वारा कत्ल किया गया जो भाग कर बच निकले उन्हे मितौली के राजा लोने सिंह से शरण मांगी राजा ने उन्हे शरण तो दी किन्तु विद्रोहियों का भी उन्हे डर था, कम्पनी सरकार के खिलाफ़ लोने सिंह ने अवध के सिंहासन पर वाजिद अली शाह के बेटे बिरजिस कद्र की ताज़पोशी के दौरान पांच तोपो की सलामी अपने मितौली किले से दी थी, और विद्रोहीयों को मदद भी।

बाद में जब राजा को कुछ लोगों से सूचना प्राप्त हुई की लखनऊ पर बेगम हज़रत महल का शासन कायम हो गया तो उन्होने इन अग्रेजों को विद्रोहियों के हवाले कर दिया।

अग्रेंज जब दोबारा अवध पर काबिज होने लगे तब अक्टूबर १८५८ में मेजर टाम्ब्स के घुड़सवार व पैदल सैनिकों ने शाहजहांपुर में कम्पनी सरकार के विद्रोहियों का सफ़ाया करते हुए मोहम्मदी, पुवांया, औरगांबाद होते होते हुए ८ नवम्बर १८५८ को मितौली पहुंचे और कहते उन्हे बिना किसी प्रयास के मितौली किले पर फ़तह हासिल हुई, और राजा मितौली फ़रार हो गये।

इस किस्से को कुछ स्थानीय तरीके से पेश किया गया अपने राजा की शान में जो मैनहन में भी प्रचलित है वह १८५७ की क्रान्ति की लड़ाई और उसके शूरवीर।

मेरी दादी बताती है कि जब अंग्रेजों ने मितौली के किले को घेर लिया तो राजा लोने सिंह ने खूब लड़ाई लड़ी, किला चारो तरफ़ से गहरी खाई व बांस क झाड़ियों से सुरक्षित था, अंग्रेजों ने किले का फ़ाटक तोड़ने की कोशिश शुरू की, राजा ने अपनी तोप का खयाल किया, राजा की विशाल तोप जिसका नाम लछमनियां था कुऎं से बाहर आई लेकिन उसने राजा का साथ देने से इनकार कर दिया और चल पड़ी किले के उत्तर में स्थित कठना नदी की तरफ़ राजा निरूपाय देखते रहे, एक झड़ाम की अवाज़ के साथ तोप ने नदी के जल में समाधि ले ली, कहते है यदि तोप ने राजा का साथ दे दिया होता तो अग्रेजों की क्या मज़ाल थी जो किले की तरफ़ आख उठा कर देखते, और राजा विजई होते ! किन्तु उस जियधारी तोप ने लोने सिम्ह का साथ छोड़ दिया, यही नियति को मन्जूर था। फ़िर राजा हताश हो गये और अपने किले से सुरंग द्वारा भाग निकले, जो एक मील की दूरी पर कचियानी गांव में निकलती थी जहां राजा के भाई रहते थे। इस तरह अंग्रेज लाख कोशिश के बावजूद राजा लोने सिंह को नही पकड़ सके।

ये बात प्रचलन में है कि आज भी राजा की वह तोप रोज़ आधी रात में किले तक आती है और वापस कठना नदी में जाकर गिरती है जिसकी झड़ाम की आवाज़ सुनाई देती है

यह किस्सा उस प्रजा का अपने राजा के लिए जो उस राजा को कभी हारते हुए नही देखना चाहती। भले उसने हमेशा अपने को जनता के खून-पसीने से सिंचित कर संमृद्धता, एशो-आराम के सारे सामान जुटाए हो।

मेरे ये पूचने पर की आखिर लछमनिया तोप ने राजा का साथ क्यों नही दिया तो इसका कोई ठीक-ठीक जवाब मेरी दादी के पास नही था सिवाय इसके की नियति नही चाहती थी!

“भारत में यदि जनता ने क्रान्ति में कभी हिस्सा लिया तो वह थी अगस्त क्रान्ति यानी बापू के नेतृत्व में, यह मेरा अपना आंकलन है!”

अगली पोस्ट में मैं आप को ले चलूंगा मैनहन के उस जंगल में जहां १८५७ को अग्रेजं अफ़सर, महिलायें व बच्चे रखे गये थे भयानक जंगली महौल में और उनकी खानाबदोशी का हाल, फ़िर कैसे बैलगाड़ियों से और बेड़िया डालकर उन्हे लखनऊ रवाना किया गया…………………..

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

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गांवॊं में जो तलाब खुदवाये जा रहे है उनका कोई मानक नही सिवाय एक विशाल गढ्ढा खोद देने के, उन्हे यह भी नही सोचना की तालाब ऐसी जगह पर हो जहां चारों तरफ़ का पानी बहकर इस तालाब में संचित हो, साथ ही खोदी हुई मिट्टी को तालाब के चारो तरफ़ छोड़ दिया जाता है जिससे यदि चारों तरफ़ का बरसाती पानी इस तालब में आना चाहे तो भी नही आ सकता, साथ ही मवेशी इस नरक कुण्ड का इस्तेमाल पानी पीने के लिये भी नही कर सकते, गोलाई मे कुएं की तरह खोदा गया कुण्ड जो नरक कुण्ड बन सकता है जनवरों के लिये यानी एक बार भीतर गये तो वापस चढ़ना मुश्किल! कोई बात नही पहाड़ पर कुआ खोदते जायिये……………

रही बात वनस्पतियों की तो अथाह गहराई होने के कारण उनका उगना संभव नही है सिर्फ़ तैरने वाले पौधें ही पनप सकते है।

एक तालाब उसे कहते है जो समतल भूमि से शुरू होकर धीरे-धीरे गहरा होता जाता हो, जहां कम गहराई वनस्पति भी उग सकती है और गहरे स्थान पर अधिक गहराई में होने वाली वनस्पति भी…… यही स्थिति जीवों पर भी लागू होती है अर्थात एक आदर्श तालाब जिसमे जैव-विविधिता भरपूर हो सके!

ठीक है भाई लोगो का काम गढ्ढा खुदवाना ही है भरत की भूमि पर तो खुदवाईये हमारे लोगों का क्या वो तो खोदते रहेंगे उन्हे जो अपनी दिहाड़ी पूरी करनी है हर शाम को पेट भरने के लिए।

अब तो सरकार को ये नारा बनाना चाहिये……..

चलो चले अनियोजित विकास की ओर……………..नही

चलो चले अगड़म बगड़म विकास की ओर

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७

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वृक्ष:..असना, बहेरा, बकैन, भिलवा, हर्र, कैमा या कैम, कंजी, किरियारी(अमलताश), नेवरा, पियामन, भिल्लर, सिहोरा, तेन्दू, बनबेरा, गोहलौरा, भटवास या कटु, चमरौधा, गन्धैला, झाऊ, करौन्दा, मैनफ़ल, रोहड़ी, रूसा, आइला, बेन्त, दूधीबेल, हडजोड़िया, कंजा, मकोई,

घास:…पनहर या चरनी, सिवरा, मकरा, अकरा, अकसा, मुनुमुन, मड़ौरा, कोदरौली, नागरमोथा या भादा, तिपतिया, हिरनखुरी, कुकुरौधा, झरूआ, मड़ुआ, सिलवारी, नारी, चिन्ना, पसाही, चौधरा, रामबांस

बेल:. कौड़िल्ला, कौआगोड़ी, गुर्च, ,…………………………………..

मेरी मां बताती है कि मैनफ़ल के फ़ल का प्रयोग सिरदर्द में किया जाता है, पियामन की जड़ व हड़जोड़िया के पौधे का औषधीय महत्व है।

ज्ञान की हो रही चोरी या फ़िर हम निकम्में है!

एक बात और हमारी इस प्राकृतिक विरासत का अध्ययन अपनी भाषा में हो और उसे संरक्षित किया जाय ताकि उससे कोई विदेशी चोरी न कर सके, दुनिया को हम बतायें कि हमारे यहां ये वनस्पति है जिसका महत्व फ़ला बीमारी में है जो कि आधुनिक मेडिकल साइन्स में लाइलाज है और इसका पेटेंट भी हमारा हो, किन्तु ऐसा नही है क्योंकि विदेशियों ने हमारे सभी ग्रन्थो का अनुवाद सैकड़ों वर्ष पहले कर लिया और उस ज्ञान का लाभ उठाया, और आज भी हम जो भी कर रहे है उन्ही की भाषा में और हम ठीक से अपनी बात विश्व मंच पर कहे इससे पहले वह इस ज्ञान को अपने तरीके से परिभाषित कर दुनिया के आगे परोस देते हैं।

क्योकि कोई भी वनस्पति संपदा की चोरी कर सकता है किन्तु उस वनस्पति के गुण-दोष को आसानी से नही जान सकता जब तलक हम उसे न बताये और यदि जान भी जाये तो उसका प्रयोग किस तरह और कहां करना है ये वह नही जान सकता बल्कि हमारे पूर्वज सदियो से इन प्रयोगों को दोहरते आयें सफ़लता पूर्वक यानी मेडिसिन टेस्टिंग।

जहां तक मैं सोच पा रहा हूं भारत के गांव, कस्बे व शहरों के नाम उनकी भौगोलिक स्थिति, इतिहास, व वनस्पतियों की बहुतायात में उपलब्धता के आधार पर रखे गये जिसमें गांवों के नाम तो भौगोलिक व पेड़-पौधों की उपस्थिति के आधार पर अधिक आधारित है, जैसे ऊपर दिये गये पौधो व घास के आधार पर यदि मै अपने जनपद व आस-पास के जनपदों के गांवों के नामों का मिलान करे तो क्या महोली, मड़ौरा, कौड़िल्ला, कैमा, आदि ये वनस्पति भी है और गांवों के नाम भी इसके अलावा क्या मैनफ़ल का अपभ्रंस मैनहन नही हो सकता। क्योकि मैं तमाम गांवों को जानता हूं जहां पाई जाने वाली वनस्पति के आधार पर उनके नाम है ये अलग बात कै की कालान्तर में वे प्रजातियां विलुप्त हो गयी, राजा-महाराजा या धर्मिक व्यक्तियों के नाम पर गांव व शहरॊं के नाम रखना काफ़ी बाद में प्रचलित हुआ और कुच नवीन गांवों पर यह बात ज्यादा लागू होती है, अकबरपुर, मोहम्मदपुर, आदि आदि ऐसे भी तमाम गांव मेरे जनपद में है और कुछ तो अधिकारियों के नाम पर भी जैसे सरैया विलियम, थारन्टन स्मिथ आदि आदि।

हमारे जानवर

उपरोक्त में तमाम घासे है जो समाप्त हो चुकी है विकास के नाम पर और वो जगहे भी जहां ये उगती थी और इनमे पौष्टिक तत्वों के अलावा औषधीय तत्व भी थे जो हमारे मवेशियों को ताकत के अतिरिक्त उन्हे स्वस्थ्य भी रखते थी अब सरकार और हमारे लोग कहते है कि दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जाय तो बताइए यह कैसे संभव होगा क्योंकि अब न तो चरागाह और न ये वनस्पतियां जिन्हे जानवर खाते थे।

तो क्या अब दुग्ध व्यवसाय फ़ार्मी मुर्गा पालन की तरफ़ तब्दील हो रहा है सोचिये एक छोटे से दबड़े में बधें ये जीव जिन्हे सूखा भुसा और आक्सीटोसिन का इन्जेक्शन नसीब होता है खाने के नाम पर, सरकार के इस दवा पर रोक लगाने के बावजूद!

ये तमाम नाम जिन्हे अब हमारी नई पीढ़ी नही जनती और ये शब्द स्थानीय होने के कारण आप को किसी अन्तर्राष्ट्रीय शब्दकोष में भी नही मिलेंगे, चूकि आजादी के बाद भारत सरकार ने उन तमाम चीजों का डाकूमेन्टेशन नही किया जिसे अग्रेज करते रहते थे यह एक विडम्बना ही है!

तो अब कैसे पहचानेगें हम इन दुर्लभ पौधों को जो अनगिनत औषधीय गुणों से युक्त है?

क्योंकि अग्रेजों ने जो ग्रन्थ तैयार किये थे वो अब बहुत पुराने हो चुके है और उनमे दिये हुए देशी नाम जो स्थानीय बोलियों में है अब बदल चुके है हमारे जनमानस में जैसे रोहीणी अब रोहनिया हो चुकी है, रूसा रुशाहा, सिहोरा, सिहोरिया, पतेर, पतौरा, और तमाम चीजों के तो नाम ही बदल चुके है हमारी बोली-बानी में, हमें जो बताया गया हमने वो किया सरकार ने कहा हाईब्रिड बीज बोईए तो हमने वही किया, उसने जंगल काटे और विदेशी प्रजातिया रोपी, तालाब पते बिल्डिग बनी, कहा गया कि पेस्टीसाइड का इस्तेमाल करो, फ़र्टिलाइजर डालॊ हमने किया, अब वही लोग कहते है कि देशी फ़सले उगानी चाहिये, कीटनशाक और फ़र्टिलाइज़र का इस्तेमाल नही या कम करना चाहिये, जंगल लगाइए आदि आदि अब हम जब सब खो चुके है कहां है देशी असल बीज जिन्हे हम रोपे, कहां है …………

अब न तो गावों में वनकिया बची है न ही जंगलियां तो फ़िर अचानक वन या जंगल कैसे प्रगट हो जायेगें?

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

सेलुलर-९४५१९२५९९७

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