-कृष्ण कुमार मिश्र

अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं।

गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के लिए- राष्ट्रीय बीमा योजना।

(श्रम एंव नियोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार एंव आई सी आई लोम्बार्ड द्वारा)

भारत की एक बड़ी आबादी जो अपनी उंगलियों के चिन्ह खो चुकी है ये वही चिन्ह है जो सरकारी कार्यों  में व्यक्ति के होने का प्रमाण होते है और भारत की एक आबादी के लिए ये निशान भाग्य की भाषा के शब्द जिनमें ज्योतिषी शंख व चक्र जैसी आकृतियों की बिनाह पर जजमान को उसके जीवन में राज-योग को सुनश्चित करते है,…….!

बात साल के आखिरी महीने के आखिरी दिन की है, जब मेरी ड्यूटी उत्तर प्रदेश के एक गाँव  में लगाई गयी, मसला एक प्राइवेट बीमा कम्पनी और भारत सरकार के साझे का था। तमाम अप्रशिक्षित नव-युवकों को ठेकेदारों ने तैनात किया था एक-एक पाइरेटेड माइक्रोसाफ़्ट विन्डोज वाले लैपटाप के साथ, ताकि वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की अंगुलियों के निशान स्कैन कर कम्प्यूटर के डेटावेस में सुरक्षित रख सके और बदले प्रत्येक गरीब से तीस रुपये की वसूली कर ले। एक मास्टर कार्ड मुझे भी दिया गया जिसमें मेरे अगूंठे का निशान सुरक्षित था और प्रत्येक व्यक्ति की अंगुलियों का निशान लेने के उपरान्त मुझे अपना अंगूठा स्कैनर पर रखना पड़ता ताकि उस व्यक्ति पहचान सुनिश्चित की जा सके, एक तरह का वेरीफ़िकेशन……..।

यहां मैं अपने लोगों की जिस जीर्ण-शीर्ण दशा से रूबरू हुआ उसके लिए शायद माकूल शब्द न प्रस्तुत कर पाऊं किन्तु मुझे किसी भी व्यक्ति की उंगलियों के निशान नही मिले जिन्हे स्कैन किया जा सके। गरीबी और शोषण की हर परिस्थिति ने उन्हे नोचा-घसोटा था, कहते हैं, आदमी के हाथो की लकीरे उसका भूत-भविष्य बताती है, तो यकीनन उनके हाथ मुझे उनका भूत-भविष्य और वर्तमान सभी कुछ बता रहे थे, जिसे कोई ज्योतिषी कभी नही पढ़ सकता था, क्योंकि लकीरे नदारत थी उनके हाथों से अगर कुछ था तो समय की मार के चिन्ह फ़टी हुई मोटी व भद्दी हो चुकी बिना रक्त की खाल जो हथेलियों के बचे हुए सख्त मांस व हड्डियों पर चढ़ी भर थीं। जिसे प्रबुद्ध जन कर्म-योग कहते है तो उसकी प्रतिमूर्ति थे,  इस मुल्क के अनियोजित विकास को ढ़ोने में इनके हाथों पर चढ़ी हुई कालिख हमें बता रही थी कि कैसे नगरीय सभ्यता के संभ्रान्त लोगों की तमाम अयास्सियों का भार यह अन्न-दाता ढ़ो रहा है।  लोगों के धूप व मौसम की तल्खियों से बुझे हुए चेहरे और थका हुआ शरीर जिसकी सख्त व काली हो चुकी खाल को फ़ौरी तौर पर देखकर कोई डाक्टर ये नही बता सकता था कि ये भयानक रक्त अल्पता की बीमारी से ग्रसित है, हाँ हमारे घरों की चारदीवारी के भीतर रहने वाली औरतों की त्वचा स्पष्ट जाहिर कर रही थी कि ये मात्र सूखे मांस और हड्डियों का कंकाल हैं और इस विद्रूप व रूग्ण शरीर की इज्जत इनकी पीली त्वचा जरूर ढ़क रही है।  कुछ-कुछ परदा कहानी के फ़टे हुए परदे की तरह ………………।

तकरीबन ९० फ़ीसदी परिवारों की यही दशा थी जिनमें स्त्री-पुरूषों की दोनों हाथों की सभी उंगलियों के सारे प्रयास निरर्थक हो जा रहे थे। किन्तु स्कैनर एक भी निशान नही खोज पा रहा था। आखिरकार  उनके बच्चों के निशानों को स्कैन कर दिया जाता, जिनके हाथ अभी इस तरूणायी में सुरक्षित थे और शायद तैयारी भी कर रहे थे, अपनी लकीरों के अस्तित्व को खोने के लिए भविष्य में, मानों यही नियति हो इन हाथों की। यदि  नियमों का पालन होता और परिवार के मुखिया के ही निशान स्कैन करने की कवायद की जाती तो शायद दो-चार कार्डों के सिवा ( जुगाड़ द्वारा बनवायें गये अमीरों द्वारा बीपीएल कार्ड धारकों ) सभी को खाली हाथ वापस जाना पड़ता। और उन्हे ये भी दुख होता कि दिन भर की मशक्क्त में दिहाड़ी भी गयी और कार्ड भी नही मिला।  लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि ये कार्ड तो निरर्थक है क्योंकि परिवार के मुखिया के बजाय छोटे बच्चों की उंगलियों के निशान मौजूद है इन कार्डों में? तस्वीर किसी और की और उंगलियों के निशान किसी और के!  और कम्पनी द्वारा तैनात किए गये दैनिक वेतन-भोगियों को भी तो प्रति कार्ड पैसा मिलना था। जितने कार्ड उतना कमीशन। पर क्या कोई विकल्प था, जब गांव के सभी गरीबों के हाथों में तकदीर की रेखायें ही नदारद है। यही स्थित पूरे के पूरे जनपद में। कैसा विकास है यह! इससे बेहतर तो सूदखोरों का दौर था जब इन गरीबों की जमीनों को गिरवी रखते वक्त वह इनके अगूंठे का निशान तो पा जाते थे। यहां एक और स्थिति बनी जो मुझे शर्मसार करती थी बार-बार…..जब भी किसी की उंगलियों का निशान न मिले तो तकनीके खोजी जाय की सिर में अंगूठे को रगड़ों तो यह साफ़ भी हो जायेगा और बालों में लगे तेल से साफ़ व मुलायम भी, पर यहां किसी के सिर में चिकनाई की एक बूंद भी नही थी आखिर में कम्प्यूटर वाला लड़का अपने सिर से उस व्यक्ति का अंगूठा रगड़ता, यदि फ़िर भी काम नही चलता तो हार कर वह अपना अंगूठा रख देता स्कैनर पर, व्यक्ति और अंगूठा किसी और का,… पर  तो कभी कभी यह रगड़ने वाली युक्ति काम आ जाती, पर ज्यों ही मुझे उस व्यक्ति के अंगूठे के निशान को वेरीफ़ाई करने के लिए अपना अंगूठा स्कैनर पर रखता तो झट से कम्प्यूटर  वह निशान ले लेता और अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे  लोगों में एक खुशी की लहर दौड़ जाती कि अरे साहब का की उंगलियों के निशान कितने सुन्दर आ रहे है, झट से…….ले ले रहा है। और यही वह मौका होता जब मेरी गर्दन शर्म से झुक जाती, मुझे सिर्फ़ यही एहसास होता कि ये हमारे लोग है और मैं इन्ही का एक हिस्सा हूं, बिना रेखाओं वाली हथेलियों के मध्य  मेरी हथेली की भाग्य रेखायें मुझ पर मुस्करा रही थी……एक व्यंगात्मक हंसी!

मैं आमंत्रित करता हूं उन सभी भद्र जनों को जो ये हाल देखना चाहते अपने सो-काल्ड विकास का वो उत्तर भारत के किसी गांव में आये और कोशिश कर ले, अंगूठों के निशान पाने की वहा एक काले ठप्पे के सिवा कुछ नही मिलेगा।  जिन्हे ये गरीब या गरीबी रेखा के नीचे, टाइप के वाक्यों से संबोधित करते है।

भयानक ठण्ड और सर्वहारा की उत्सुक भीड़, मुझे बार-बार उनके कुछ पा लेने की लालसा लिए चेहरों में झाकने को विवश करती और मैं उन्हे ठगा हुआ सा पाता। दिन में बमुश्किल तीस ही  रुपया कमाने वाला व्यक्ति जिस पर सारे परिवार की रोटी की जिम्मेदारी हो वह अपने दिन की पूरी कमाई लिए उत्सुक खड़ा था बीमा कार्ड बनवाने के लिए! यहां यह बता देना जरूरी है कि बीमित व्यक्ति की कम से कम दो उंगलियों के निशान और उसके परिवार के किसी अन्य वयस्क सदस्य के निशान लेना जरूरी था। इसके बदले उस परिवार के मुखिया को एक प्लास्टिक कार्ड मिलना था जिसमें उसके अगूंठे और उंगलियों के निशान कैद थे, ताकि जब वह बीमार हो तो उस कम्पनी द्वारा निर्धारित सेन्टर पर जा कर उस कार्ड से अपनी पहचान करा सके कि असल व्यक्ति वही है। हाँ बीमा कम्पनी की शर्ते भी सुन लीजिये, यदि मरीज भर्ती होने की स्थित में नही है तो, नशा आदि के कारण बीमार हुआ है तो, महिला गर्भवती है तो,  इस बारे में भी कुछ स्पष्ट नही है कि सर्प आदि ने काट लिया है तो, और प्राकृतिक आपदा हुई है तो वह बीमित राशि ३०,००० रुपये का लाभ नही पा सकता। हाँ बड़ी खामी यह कि यदि किसी परिवार के मुखिया न हो, यानी माँ-बाप की मृत्यु हो गयी हो तो अव्यस्क बच्चों के लिए यह बीमा नही हो सकता……..। जिस कुपोषण में महिलायें सिर्फ़ बीमार बच्चों को जन्म देती है वहां इस बीमा की शर्तों के अनुसार किसी जन्म-जात बीमारी का इलाज की सुविधा नही। फ़िर आप बतायें हमारे गांव के आदमी का कौन सा विमान क्रैश या कार दुर्घटनाओं से साबिका पड़ता है जो वह इस बीमित राशि का लाभ ले पायेगा?

गांवों में तो लोग अक्सर भांग-गांजा या बीड़ी आदि के कारण ही दमें आदि बीमारियों से ग्रसित होते है और प्राकृतिक आपदायें ही उनका सर्वस्व नष्ट कर देती है। और वैसे भी वह भर्ती होने वाली दशा तक अस्पताल नही पंहुच पाते है क्योंकि उनका प्राथमिक इलाज़ ही नही हो पाता जो वह भर्ती प्रक्रिया तक अपना दम साधे रहे।

हल्की बीमारी में यह कम्पनी बीमित राशि का लाभ नही देती। एक बात और ये लोग इतने भी सक्षम नही होते कि उन सेन्टरों तक पंहुच कर अपनी बात रख सके फ़िर आखिर ये तमाशा क्यों क्या उस कम्पनी और सरकारों को उनकी हाड़ तोड़ मेहनत के तीस रुपये भर लेने है। अरबो की आबादी वाले प्रदेश व देश के अरबों गरीब लोगों तीस-तीस रुपये का कर! जो खरबों की राशि में इकठ्ठा हो जायेगा। यह सवाल इस लिए और जरूरी हो जाता है कि सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर मौजूद मुफ़्त सेवायें ही इन्हे नसीब नही होती तो फ़िर ये कवायद क्यों!

अपने लोगों की बदहाली के सैकड़ों कारण तो मुझे याद आ रहे है किन्तु बिगड़े हुए इन भयानक हालातों में कौन सी जुगति इन्हे उबार लेगी ये बात अब मेरे मस्तिष्क से परे है……मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ।

यहां प्रश्न ये नही है बीमा कम्पनी से इन्हे लाभ मिलेगा या नही या यह योजना उचित या अनुचित है यहाँ एक भारी प्रश्न तो यह है, उन लोगो के लिए जो दम भरते है विकास है, ताकि वह देखे और सोचे कि हमारे देश का एक हिस्सा जो बद से बदतर हो रहा है, कही अतीत में उसे बेहतर कहा जा सकता है आज की इस विद्रूपता को देखकर।

तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नही होते। ये शेर कह कर मैं रूमानी नही होना चाहता और न ही अपने आप को और उनको झूठी तसल्ली।

क्या हमारा दरिद्र नारायण हमेशा ऐसी दुर्गति के साथ जीता रहेगा। एक भारत में इतनी असमानता क्या यही विविधिता है जिस पर बड़े बुद्धिजीवी गर्व करते है।

कृष्ण कुमार मिश्र

(वन्य-जीव विशेषज्ञ, स्वतन्त्र पत्रकारिता, फ़ोटोग्राफ़ी)

क्या अवधी को हिन्दी खा गयी!

अफ़सोस इस बात का है कि हिन्दी उत्तर भारत की तमाम बोलियों को खा तो गयी किन्तु हिन्दी हिन्दवी नही बन पायी। यह वाक्य शायद तमाम लोगों को अजीब लगे, पर यह मसला बहस का है। एक समय था जब ब्रज काव्य की भाषा के तौर पर भारत की तमाम भाषाओं की सिरमौर थी और अवधी का दर्जा यकीनन ब्रज के बाद दूसरा था।  पूरी दुनिया में बेहतरीन महाकाव्यों की रचना इन्ही भाषाओं में हुई और धरती पर इन भाषाओं को एक अनोखा रुतवा हासिल है कि कही न कही तुलसी की रामचरित मानस और सूर व मीरा के पदों का गायन न हो रहा, बिना रुके लगातार….. ब्रज-अवधी-बुन्देली सूफ़ियों के गायन से लेकर दिल्ली दरबारों की शोभा बढ़ाती थी। कही ठुमरी तो कही ईश बन्दना को जबान इन्ही भाषाओं ने दी।  जैसे eयहां मैं निश्चित तौर पर अपनी इन्ही भाषाओं (बोलियों) में रचे गये महाकाव्यों की बिनाह पर  ये कह सकता हूं कि काव्य के मसले में हम पूरी दुनियां से अव्वल है। यहां मैं इन भाषाओं को बोलियां नही कह रहा हूं, जैसा की हिन्दी वाले कहते आये है! क्यों कि उन्होंने हिन्दी के उत्थान के लिए इन्ही भाषाओं के खण्डहरों पर हिन्दी की इमारत खड़ी  करने की कोशिश की।

सूफ़ी शिविरों से लेकर दरबारों तक ब्रज में आमिर खुसरो के छाप तिलक सब छीनी गूँज रही तो…. पं० बंशीधर शुक्ल का अवधी गीत  उठ जाग मुसाफ़िर रैन कहां जो सोवत है बापू के साबरमती का भोर का प्रार्थना गीत बना।

इन सब मसायल पर बात कर रहा हूँ क्योंकि आज मैं रूबरू हुआ हिन्दी-अवधी के तमाम पुरोधाओं से, अवधी सम्राट के गाँव मन्योरा में।

पं० बशीधर शुक्ल और अवधी के इस प्रसंगवश जो विचार आये उसका ये अभिप्राय कतई नही है कि मैं किसी विशेष भाषा के उत्थान या अवसान की तरफ़दारी कर रहा हूं। यहां एक ही मलाल और मकसद है कि जिसे हम अपनी राष्ट्र भाषा कहते है उसके प्रति ईमानदार हो न कि सिर्फ़ आयोजन या घोषणाओं से हिन्दी जनों को संतुष्ट करते रहे।

हम स्थापित करने के बजाय प्रयोगों में विश्वास अधिक रखते है और यही कारण है कि हिन्दुस्तानी को हमने हिन्दी बनाया फ़िर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी बनाने के लिए कमर तोड़ दी, लेकिन हिन्दी हिन्दुस्तानी की तरह प्रचलित होती गयी, आज कामिर्शिलाइज्ड हिन्दी यानी हिंग्लिश के स्वरूप और उसका बढ़ता चलन हमें लुभा रहा है। लेकिन अफ़सोस हम इसे स्वरूप नही दे पाये, ये काल और परिस्थित की गुलाम होकर डगमगाती हुई आगे बढ़ रही है…..इसकी वजह है इन्तजामियां का विमुख होना अपनी भाषा से, और कथित बुद्धिजीवीयों का दुख दर्द और दहाड़ पूर्ण कविता व कहानियों में माथा-पच्ची करते रहना, एक होड़ सी मची है कि कौन लेखक महाशय अपनी कविता की करुण? क्रन्दना से या कहानी से पाठक को इतना रुला दे कि उसकी छाती बैठ जाय और रचना बेस्ट-सेलर हो जाय…..हिन्दी में दर्द, कथित प्रेम और समाज़ कि कुरूपता बेचने की कवायद! यदि हम रामधारी सिंह दिनकर की संस्कृति के चार अध्याय, अमृत लाल नागर की गदर के फ़ूल, राहुल सांकृतायन की वोल्गा से गंगा………….आदि-आदि पुस्तको को छोड़ दे, तो इतिहास में जो भी हिन्दी भाषा के शोध है वे या तो नकल है अंग्रेजी पुस्तकों के या सिर्फ़ किस्सागोई। हम सिर्फ़ अपनी भाषा में सौन्दर्य ही लिखते रहे भूगोल, इतिहास, विज्ञान जैसे विषयों भूल ही गये जिसे पढ़ कर हमारी नई पीढ़ियां दुनिया को जान सके और देश व समाज़ के लिए कुछ करने लायक बन सके,……किन्तु कदाचित ऐसा नही है। इन्होने तो बिल्कुल ऐसा माहौल बना दिया है जिसे श्रीलाल शुक्ल ने कुछ यूं कहां, कि भागला नागर बाँध को देखकर अनायास ये लोग इसे ईश्वर की अदभुत रचना मान ले या स्ट्रेचर पर पड़ी बीमार युवती में भी इन्हे सौन्दर्य बोध हो और ये कवितायें करने लगे।

भाषा की समृद्धता इस बात पर निर्भर करती है कि उस भाषा में विश्व का कितना ज्ञान उपलब्ध है। और इस मामले में हम सबसे फ़िसड्डी है। सोवियत युनियन के दिनों में मास्को हिन्दी प्रकाशन ने रूस के बेहतरीन साहित्य का परिचय हमें कराया, उससे अब हमारी नयी हिन्दी भाषी पीढ़िया अनिभिज्ञ ही रहेगी, क्यों कि अब यह प्रकाशन बन्द हो चुका है।

जब सारी दुनियाबी बातें हमारी भाषा को अलंकृत करेगी तो हमारी भाषा से प्रत्येक जिज्ञासु अलंकृत होना चाहेगा बजाय इसके की वह उस इल्म को ढ़ूड़ने के लिए किसी और भाषा के दरवाजे पर दस्तक दे।

मध्य कालीन गुलामी ने प्राकृत के सभी प्रकारों को लगभग विलुप्त कर दिया, फ़ारसी ने राज-दरबारों की शोभा बढ़ाई और रियासतों के काम वहां की स्थानीय भाषा में शुरू हुए, जिसे हम हिन्दुस्तान कहते है उसमे उर्दू प्रमुख भाषा थी राज-काज की। इन्तजामियां बदली तो फ़ारसी की जगह अंग्रेजी ने ले ली और रियासती काम उर्दू में ही जारी रहे। भारत आजाद हुआ तो हिन्दी को राज भाषा तो बना दिया गया किन्तु भाषा के प्रति जिम्मेदारी से अलाहिदा ही रही सरकारें! बुजर्वा वर्ग अंग्रेजी को अपनी भाषा बना चुका था सो आज भी जारी है और वह अंग्रेजी भाषा के महा-भंडार से ज्ञान की चुस्कियां लेलेकर सर्वहारा पर अपनी लम्बरदारी जाहिर कर रहे है। और कविता कहानी पढ़ पढ़ कर हमारे लोगों का सौन्दर्य बोध, करुणा, उत्साह आदि तत्वों का मात्रात्मक स्वरूप तो बढ़ता गया किन्तु दुनियाबी मामलो से हम दूर होते गये और इसी के साथ साथ हिन्दी भाषी और हिन्दी लेखक हीन होता गया।

एक जिक्र जरूरी है,  शासन-सत्ता की जबानों ने हमेशा प्रगति की, फ़िर चाहे वह महाभारत काल हो, मोर्य काल हो या कनिष्क का शासन हो राजा के पश्रय में संस्कृत और पाली में आयुर्विज्ञान से लेकर खगोल शास्त्र तक लिखे गये, यदि इसी तरह अवधी और ब्रज आदि भाषाओं को भी राज प्रश्रय मिलता तो काव्य के अतिरिक्त भी तमाम इल्म का समावेश इनमें हो जाता है। क्योंकि इल्म पर परोक्ष अपरोक्ष नियन्त्रण सरकारों का ही रहता है, इनकी अनुमति के बिना कोई अप्लीकेशन संभव नही है। गुलामी के दिनों में यह द्वितीयक नागिरिको वाली बोलियों के तौर पर देखी जाती थी और आज आजादी के बाद भी वही व्यवहार जारी है। ब्रज़ की आवै-जावै, अवधी की आइब-जाइब को हिन्दी में आये-जाये बना देने से कुछ नही होता है।

भाषा विकास में अब अहम जरूरत है, कि हिन्दी में अनुवाद को प्राथमिकता दी जाय और हम अपनी भाषा में प्रत्येक उस विधा को शामिल कर ले, जो दुनिया की तमाम भाषाओं में है। सरकारों को बेहतर व सस्ते प्रकाशन मुहैया कराने चाहिए। और अच्छी पुस्तकों के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी भी, ताकि बड़े व्यापारिक घरानों द्वारा परोसी जा रही मनमानी चीज़ों के आगे हमारे बेहतर लेखन को भी जगह मिल सके। और जब ये ज्ञान हमारे अपने लोगों के बीच उन्ही की अपनी भाषा में पहुंचेगा तो यकीन मानियें ये लोग भांगला नागर बांध को देखकर ईश्वर की अदभुत रचना नही कहेगे बल्कि इसकी इन्जीनियरिंग की तारीफ़ करेगे और बीमार युवती को देखकर सौन्दर्य बोध के या करुणा( प्रेम की जड़) के बजाय उसकी बीमारी का कारण व इलाज़ बता देंगें।

आज भाषा, नदियां, तालाब, संस्कृतियां, और प्रजातियां सभी कुछ तो विलुप्त हो रहा है, इस हिन्दी को हम कब तक बचा पायेंगे, हिंग्लिश तो बना ही चुके है कल किसी नयी बयार में हिन्दी की जगह कुछ और बन जायेगा और हम नाव खेते रहेंगे बिना पतवार..बढ़ते रहेंगे..दिशाहीन और अनिश्चित मंजिल की ओर। क्या यही विकास है!

मेरा निशाना फ़िर वही लम्बरदार है जो बड़े औहदों पर बैठे मसलों को सिर्फ़ खाना-पूर्ति की नज़र से देखते है। और हम फ़िसड्डी होते जा रहे है अपने अतीत और अपनी चीज़ों के संरक्षण में, जो  वर्तमान और भविष्य में हमें मज़बूती दे सकती है।

(यह लेख २३ जनवरी सन २०१० को अमृत वर्षा के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है)

कृष्ण कुमार मिश्र

कृष्ण कुमार मिश्र

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अवधी सम्राट पं० बंशीधर शुक्ल

क्यों न हम पं० बंशीधर शुक्ल जी के जन्म-दिवस को विश्व अवधी दिवस के रूप में मनायें।

वो विधायक थे, स्वंतत्रा संग्राम सेनानी थे और हिन्दी अवधी के मर्मग्य, लेकिन फ़िर भी वो जननायक नही थे और न ही नेता, असल में सच्चे हितैषी थे उन सभी प्रजातियों के जो इस धरती पर रहती है। ये सारी बाते उनकी रचनाओं मे परिलक्षित हो रही है, कभी “गरीब की होली”  में उन्होंने सर्वहारा की दारूण कथा का बयान किया  कि कैसे इन गरीबों के घर कुत्ते-बिल्लिया ही घुमड़-घुमड़ कर आते है, जबकि लोग इधर का रूख ही नही करते। तो दूसरी तरफ़ ” बछड़ा धन्य गाय के पूत” लिखकर इन्होंने पूरी मानव जाति को ये एहसास कराने की कोशिश कि कैसे मनुष्य जानवरों का शोषण करता है और बदले में उन्हे तमाम कष्ट और भूखा रखता है……..भयानक गुलामी…..!

इस महान शख्सियत की कुछ बाते ब्लाग पर उकेरने की एक कोशिश!

बसन्तोत्सव के अवसर पर, मैं रूबरू हुआ हिन्दी-अवधी के तमाम पुरोधाओं से, जो संघर्षरत है अपने सीमित संसाधनों के बल पर अपनी भाषा की सेवा के लिए! बसन्त पंचमी के इस अवसर पर मेरा जाना हुआ उस धरती पर जहां सर्वहारा के लिए संघर्ष करने वाले इस नायक का जन्म हुआ। यहां हर वर्ष ये आयोजन होता है जो उनके परिजनों द्वारा संचालित होता है। गांव मे मैं रास्ता पूंछने लगा कुछ बच्चों से कि भैया “कवि वाला कार्यक्रम” कहां हो रहा है तो बच्चे ने इशारे से बताया किन्तु उत्सुकतावश ये पूछने पर कि ये कौन थे……..तो बालक निरुत्तर थे! खैर शुक्ल जी की स्मृति में बनी लाइब्रेरी जिसकी शक्ल गांव की प्राथमिक पाठशालाओं सी थी, में इधर-उधर कुछ कुर्सियों पर लोग छितरे हुए थे मध्य में जमीन पर दरे बिछाये गये थे, शायद ये जहमत बच्चों के बैठने के लिए की गयी थी। किन्तु भारत के भविष्य का एक भी कर्णधार मुझे वहां नही दिखा! न तो ग्रामीणों की सहभागिता थी और न ही जनपद वासियों की, प्रशासन का भी कोई कारिन्दा मौजूद नही था। मंचासीन कवियों व गणमान्य व्यक्तियों की तादाद अधिक थी और स्रोताओं की कम! और उनकी वेशभूषा और शरीर की दशा-व्यथा उनकी भाषा की दशा-व्यथा से पूरी तरह मेल खाती थी। सस्ते व वैवाहिक कार्ड छापने वाले प्रकाशनों से मूल्य आदि चुका कर प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन और उनका मान बढ़ाने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों का सहारा कुछ यूं लग रहा था जैसे हमारे लोग किसी अंग्रेजी पुस्तक के पांच-सितारा होटल में हो रहे एडवरटीजमेन्ट की नकल कर अपनी खीज निकालने की कोशिश कर रहे हो।……..झोलों से निकाल-निकाल कर पुरस्कार वितरण, और कांपते हुए हिन्दी-शरीरों पर शाल डालने की कवायदें।    ……बिडंबना के अतिरिक्त कोई माकूल शब्द नही है मेरे पास।  हाँ कुछ पत्रकार, अवधी प्रेमी और कुछ समय के लिए खीरी के मौजूदा सांसद अवश्य मौजूद थे। मैं यहां ये नही कहूंगा कि मूल्यों में गिरावट हुई है, हाँ मूल्य बदल जरूर रहे है। अगर कुछ नही बदला है तो अतीत की बेहतर चीजों का परंपरा के तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी जिन्दा रखने की हमारी नियति। और इसी नियति ने अवधी को भी जिन्दा रखा है हमारे घरों में……।

बसन्त पंचमी का दिन खीरी जनपद में खासा महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन अवधी सम्राट पं० बंशीधर शुक्ल का जन्म हुआ था। यें वही शख्स है जिनकी रचनाओं ने, सुभाष की आजाद हिन्द फ़ैज़ को लांग मार्च का गीत दिया और बापू के साबरमती आश्रम को भोर की प्रार्थना। सन १९०४ ईस्वी को पं० बंशीधर शुक्ल का जन्म खीरी जिले के मन्योरा ग्राम में हुआ। आप बापू के नमक आंदोलन से लेकर आजाद भारत में लगाई गयी इमेर्जेन्सी में भी जेल यात्रायें की। १९३८ में आप ने लखनऊ में रेडियों में नौकरी भी की, स्वन्त्रता आंन्दोलन के इस सिपाही ने आजाद भारत की नेहरू सरकार की व्यव्स्था से भी विद्रोह किया और कांग्रेस छोड़कर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में चले गये। इसी वक्त उन्होंने लिखा था “ देश का को है जिम्मेदार, चौराहे पर ठाड़ किसनऊ ताकय चरिव वार”। सन १९५७ के उत्तर प्रदेश असेम्बली चुनाव में बंशीधर शुक्ल लखीमपुर से एम०एल०ए० चुने गये। सन १९७८ ईस्वी में शुक्ल जी को उत्तर प्रदेश सरकार के हिन्दी संस्थान ने मलिक मोहम्मद जायसी पुरस्कार से सम्मानित किया। किन्तु शुक्ल जी का सच्चा सम्मान तो जन जन में व्याप्त था उनकी रचनाओं के द्वारा, “कदम-कदम बढ़ाये जा खुशी के गीत गाये जा…..”  प्रत्येक सुबह रेडियों पर उन्ही का गीत गूंजता “उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है” जिसे मैने भी अपने बचपन में सुना है। सन १९८० में सच्चे समाजवादी की भूमिका निभाते हुए ७६ वर्ष की आयु में आप का निधन हो गया।

खूनी परचा, राम मड़ैया, किसान की अर्ज़ी, लीडराबाद, राजा की कोठी, बेदखली, सूखा आदि रचनाये उस दौर में जनमानस में खूब प्रचलित रही। पं० बंशीधर शुक्ल के ४८ वें जन्म-दिवस पर उनके गांव मन्योरा में एक अभिनन्दन समारोह हुआ। इसके पश्चात बसन्त पंचमी १ फ़रवरी सन १९७९ में कथा सम्राट अमृत लाल नागर व तत्कालीन उप-मुख्यमन्त्री भगवती सिंह की मौजूदगी में शुक्ल जी का अभिनन्दन उनके गाँव में किया गया। शुक्ल जी के बाद भी तब से आज तक यह सिलसिला जारी है, मन्योरा और जिला खीरी के लोगों द्वारा। शुक्ल जी के नाम पर उनके गांव मन्योरा में एक पुस्तकालय और लखीमपुर रेलवे स्टेशन में एक पुस्तकालय जो हमेशा बन्द रहता है। उस स्वतन्त्रता सेनानी और अवधी के मर्मग्य की बस यही स्मृति शेष है।

अन्तता: यही कहा जा सकता है सरकारों को इस देश की माटी के सपूतों के महान प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिए, नही तो तमाम बेहतर व जरूरी चीज़े नष्ट हो जायेगी।

कृष्ण कुमार मिश्र

आजादी के आसपास की बात है, मास्टर जगत पाल (नारायण) ने एक सरस्वती वन्दना लिखी थी, जो खूब प्रचलित हुई।

माँ बताती है बात सन १९५६ की है, जब उनके स्कूल मुरई-ताज़पुर में जगत पाल जी तैनात हुए, उनकी आदत में शुमार था कविता लेखन, वो हमेशा किसी न किसी विषय, वस्तु और व्यक्ति पर कविता लिख डालने में माहिर थे। कभी-२ तो डिप्टी पर ही कोई कविता लिख दी और स्कूल निरीक्षण के दौरान बच्चों ने जब वही कविता सुनाई तो डिप्टी साहब भी बाग-बाग हो गये।

आज ५४ वर्ष बाद भी वह कविता मेरी माँ को याद है, अब उन्ही के हवाले से ये रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।

माँ शारदे कहाँ तू वीणा बजा रही है।

किस मंजु ज्ञान से तू जग को लुभा रही है।

विनती नही हमारी क्यों मातु सुन रही हो।

हम दीन बालिकायें विनती सुना रहे हैं।

चरणों में तेरे माता मैं सर झुका रही हूँ।

बालक सभी जगत के सुत मातु है तिहारे।

प्राणों से प्रिय तुम्हे है हम पुत्र सब दुलारे।

हमको दयामयी तू ले गोद में पढ़ाओ।

अमृत का ले के प्याला माँ ज्ञान का पिलाओ।

हो सकता है ये कविता मुकम्मल न हो और माँ की विगत स्मृतियों में कुछ अंश धूमिल हो गये हो। यदि इसके बारे में कोई और मालूमात हो, तो आप सब जरूर अवगत कराइयेगा।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारत

+919451925997

Helios from the Temple of Athena at Troy( 300 BCE) that located on Pergamum Museum. courtsy: History of Mecedonia. साभार हिस्ट्री आफ़ मेसीडोनिया

……..मकर संक्रान्ति पर आप सभी को शुभकामनायें, आखिर सूरज तमाम झंझावातों के बावजूद अपनी मंजिल तक पहुंच गया, यानी मकर राशि के स्टेशन पर, ..वैसे उसने बड़ी तकलीफ़े झेली, खराब मौसम, नो विजिबिलिटी, पतवार खो गयी थी, नाव डगमगाई थी, पटरी से गाड़ी भी एक बार उतर गयी थी किन्तु उस साहसी ने सफ़र पूरा कर लिया और आ पहुंचा मकर नगर के राशि हवाई अड्डे पर!…..मैनहन टुडे!

आओं हम सब हमारे ब्रह्माण्ड के मुख्य ऊर्जा स्रोत को स्वागत करे, नमन करे!

सूर्य आज यानी १४ जनवरी को धनु राशि से पलायन कर मकर राशि पर पहुंचता है, आज के ही बाद से दिनों में बढ़ोत्तरी शुरू-ए होती है।

हमारे यहां मकर संक्रान्ति को खिचड़ी कह कर संबोधित किया जाता है। इसे पंतगों का त्योहार बनाया, मुगलों और नवाबों ने, अवध की पतंगबाजी बे-मिसाल है पूरे भारत में!  वैसे इस खगोलीय घटना के विविध रूप हैं हमारे भारत में, कहीं पोंगल तो कही लोहड़ी……..किन्तु अभिप्राय एक है…सूरज का मकर राशि में स्वागत करना। एक बात और १२ राशियां बारह संक्रान्ति, पर मकर संक्रान्ति अपना धार्मिक महत्व है। तमाम कथायें भी प्रचलित है इस घतना के सन्दर्भ में।

माघे मासि महादेव यो दाद घृतकंबलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अंते मोक्षं च विंदति॥


आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व मकर सन्क्रान्ति ३१  दिसम्बर को पड़ती थी और आज से ९००० वर्ष बाद ये घटना जू न में घटित होगी। वैसे ये ग्रहों का खेल है। जिसे विज्ञान अपने ढ़ग से समझाती है। पर मैं आप को लिए चलता हूं, मैनहन गांव में जहां ये त्योहार पांरपरिक ढ़ग से मनाया जाता है।

प्रात: ब्रह्म-मुहूर्त में तालाब, नदी या कुएं में स्नान करना शुभ माना जाता है। यहां के तमाम धार्मिक लोग इस रोज नैमिषारण्य के चक्र तीर्थ में स्नान करने जाते है। कुछ गंगा या गोमती में ।

सुबह की स्नान पूजन के बाद तोरई (कुकरबिटेसी) की सूखी लताओं से आग प्रज्वलित की जाती है ताकि सर्द मौसम से बचा जा सके। तोरई की लता को जलाना शुभ माना जाता है।

बच्चों को हमेशा यह कह कर प्रात: स्नान के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि जो सबसे पहले उठ कर तालाब के ठण्डे पानी में नहायेंगा उसे उतनी सुन्दर पत्नी व पति मिलेगा।

इस दिन शिव पूजा का विधान है और लोग स्नान आदि करने के बाद शिव की उपासना करते है उसके उपरान्त सन्तों और भिखारियों को खिचड़ी दान का कार्यक्रम।

इस तरह मनाते है मकर संक्रान्ति हमारे गाव में, हां एक बात तो भूल ही गया, यहां मेरे गाँव के लोग और खास-तौर से मेरी माँ की नज़र में कोई पशु-पक्षी नही छूटता जिसे खिचड़ी का भोग न लगाया जाय।

मकर संक्रान्ति का धार्मिक महत्व

किवदंतियां है कि इस दिन भगवान सूर्य (भास्कर)  अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन को ही चुना था। और इसी दिन को ही गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारत

नैनादेवी मन्दिर

१८१७ ई० में कुमायूं के कमिश्नर मिस्टर जी० ड्बल्यू० ट्रैल ने नैनीताल की यात्रा की, किन्तु यह स्थान दुनिया की नज़र में शकर व्यवसायी पी० वैरन के द्वारा सन १९३९ ई० में आया, और इसी व्यक्ति ने यहां योरोपीय उपनिवेशियों की रिहाइस गाह बनाई।

शिवालिक पहाड़ियों पर मौजूद एक कटोरे नुमा झील के चारो तरफ़ बसा ये शहर जनश्रुतियों व पुरानों के मुताबिक शिव पत्नी सती की आंख यानी नैन के गिरने से बनी यह झील ६४ शक्ति पीठों मे से एक माना जाता है। इस झील के उत्तर-पश्चिम किनारे पर नैना देवी का मन्दिर है।

पुराणों मे सप्त रिषियों में से तीन रिषियों का जिक्र भी मिलता है। स्कन्द पुरान में पुलस्त्य, पुलाह और अत्रि के आने का वर्णन है, इन रिषियों की हिमालय यात्रा के दौरान जब प्यास लगी तो उन्होंने यहां एक जलाशय का निर्माण कर उसे मानसरोवर के जल से पवित्र कर तीर्थ में परिवर्तित कर दिया।

अंग्रेजी हुकूमत में, सन १९४१-४२ ई० में  इस सुरम्य पहाड़ी स्थल की चर्चा अग्रेजों की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता से लेकर लन्दन तक में होना शुरू हो गयी थी।

पहाड़ियों से घिरी यह झील और इसके आस-पास की तमाम झीलें आकर्षण का केन्द्र बन गयी और प्रत्येक योरोपीय नागरिक यहां बसने की लालसा लेकर आने लगा। बाद में ब्रिटिश-भारतीय सरकार ने  नैनीताल को यूनाइटेड प्रोविन्सेज की गर्मियों की राजधानी घोषित कर दिया। और इसी दौरान यहां तमाम योरोपीय शैली की इमारतों का निर्माण हुआ, गवर्नर हाऊस और सेन्ट जान चर्च इस निर्माण कला के अदभुत उदाहरण है।

नैनीताल जनपद अब उत्तराखण्ड राज्य के अन्तर्गत है, और एक बेहतरीन पर्यटन स्थल जहां पूरे वर्ष देश-विदेश के पर्यटकों का आगमन जारी रहता है। यह शहर समुन्द्र तल से १९३४ मीटर की ऊचाई पर स्थित है।

यहां की आबोहवा और सुन्दर प्राकृतिक दृश्य मन को सकून देते ही हैं साथ ही आप की देव भूमि में उपस्थित का एहसास भी कराते हैं।

हांलाकि पर्यटन का बढ़ता दबाव इस शहर के मिज़ाज़ बदल रहा है।  भूस्खलन के कारण पवित्र देवदार, ओक, पांगर, पहाड़ी पीपल, सुरई, कुन्ज, अखरोट, हिसालू, किलमोरा आदि के वृक्षों को जो नुकसान पहुच रहा है उसकी भरपाई पुन: वृक्षारोपण से नही की जा पा रही है।

पहाड़ के इस शहर की सुन्दरता लाजवाब है जिसका जिक्र करने में मैं अपने आप को अक्षम पा रहा हूं, कभी आप आ के खुद महसूस कर लीजिए!

खुरपाताल, नैनीताल

एक बात-चीत नैनीताल के सम्मानित बाशिन्दे से, जिनकी तीन पीढ़िया इस शहर को देखती आई है, जिन्हे अफ़सोस है कि शहर तेज़ी से अपना मिज़ाज़ बदल रहा है जो कि खतरनाक है। वह इसे कु्छ यूं परिभाषित करते है कि इस शहर का अपना कुछ नही, न तो लोग और न ही संस्कृति यानी तहज़ीब!

कुछ भी नही है अपना इस शहर का !!!

कभी विदेशी शासको की एशगाह रही ये नगरी अब भारतीय धनाढ्य वर्ग की रिहाइस गाह बन चुकी है, जिनकी मेट्रोपोलिटन तहज़ीब इस शहर को कुछ भी देने में अक्षम है सिवाय धन के।

मैने उनसे कहा कि कोई भी इन्वैसिव स्पसीज़, नेटिव स्पसीज़ पर डामिनेन्ट होने की क्षमता रखती है फ़िर चाहे वह विदेशी हो या देशी! मेरा मतलब था वे लोग चाहे सात समन्दर पार से आकर कब्ज़ेदार बने हो इस नगर के, या सात सौ कि०मी० से आये हों। सभी ने पहाड़ के स्थानीय निवासियों का शोषण किया, नतीजतन वो आज भी उसी बदहाली में जीने को मज़बूर है जैसे १०० वर्ष पहले अग्रेजी राज में थे।

किन्तु मैं कुछ बसुधैव कुटुम्बकम वाले सिद्धांत का अनुगामी होकर बोला भाई कुछ तो बेहतर है इस नगर में विभिन्न संस्कृतियों के लोग अपने गुणों को भी छोड़ जाते है, बुराईयों के साथ-साथ………..विभिन्नता में एकता……..और विभिन्न तहजीबों का संगम है आप का शहर। पं० नेहरू के उत्तर भारत की तरह विभिन्न संस्कृतियों का कटोरा…!!

तो उनका जवाब था हां मिश्रा जी, बिल्कुल किसी गंदले पानी की तरह!

मैने अब बस इतना ही कहा कि भाई लूट लिया आप ने………………मै लाजवाब था।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारतवर्ष

सूफ़िज्म के महान व्यक्तियों ने  जो धार्मिक  आंदोलन चलाया वह सभी तरह के दुराव मिटाने की क्षमता रखता है। यहां मैं अमीर खुसरो को याद किए बिना नही रह सकता है और न ही उनके महान गुरू निज़ामुद्दीन औलिया को।

जरा इस राह पर चल कर देखे कुछ दूर………………

बागेवफ़ा ब्लाग पर श्रीमान मोहम्मद अली वफ़ा के हवाले से श्रीमान अज़ीज़ बर्नी के विचार पढ़े तो मन हुआ बात को आगे बढ़ाया जाय!

जिसमें बंकिम चन्द चटर्जी के उपन्यास आनन्द मठ का हवाला देकर मुसलमान बन्दे मातरम न गाये इसके लिए तमाम तर्क भी उद्धत किए गये। और बताया गया कि हिन्दुओं यानी सनातन धर्मियों की यह लड़ाई मुसलमानों के विरूद्ध थी न कि अंग्रेजों के।

शासक चाहे मुसलमान, हिन्दू या अंग्रेज़ कोई हो यदि वह दुष्ट है तो उसकी भर्त्सना अवश्य करनी चाहिए और उसे उखाड़ भी फ़ेकना चाहिए यदि कौमों में कूबत हो तो। और ऐसा ही एक प्रयास हुआ था बंगाल में अत्याचारी मुसलमान शासकों के खिलाफ़ जिसका दुख कुछ मुसलमानों को आज भी है।

आखिर क्यो ये भारतीय समाज के मुसलमान अपने आप को जीती हुई कौमें और हिन्दुओं को हारी हुई कौमें मानने पर आमादा है। और वे आज भी लोकतान्त्रिक सत्ता में किसी हिन्दू को शासन करते देख अपने जबरदस्ती के कथित अतीत को याद कर स्वंम को शासक कौमं का नुमाइन्दा मान बैठते है और मौजूदा समय में ये सपना भी देखते है कि सत्ता हमारे हाथों में हो……….आखिर ऐसा क्यों है।

तमाम उर्दू शायरों की शायरी में मुझे ये टीस सुनाई देती है और मुझे हंसी आती है जब मैं उस शायर के एक गरीब हिन्दुस्तानी मुसलमान के घर का वारिस पाता हूं जिसके बाप-दादाओं ने इन विदेशी मुस्लिम शासकों के तमाम अत्याचार सहे होते है, किन्तु कुछ पढ़ लिख जाने से वह भारतीय समाज़ का बेटा अपनी नसों में जबरदस्ती मोहम्मद गौरी, गज़नवी और औरंगजेब का खून इन्जेक्ट करता हुआ दिखाई पड़ता है।  क्यों न करे वो ऐसा भाई सभी शाही खून के वारिस बनना चाहते है।….

आज ये आंतकवादी कुछ उन्ही मुस्लिम आंक्रान्ताओं की तरह है जो कभी तलवार के दम पर और धर्म की ढ़ाल की बदौलत लूट-पाट मचाते थे, अब ये लोग ए०के०४७ से लैस होकर धार्मिक जेहाद कर रहे है और परिणाम स्वरूप हर गली-कूचे में मार गिराए जाते है, अपनी इन कारगुजारियों की बदौलत इन धार्मिक सेनानियों ने उन देशों और उन कौमॊ का क्या हाल किया है यह जग जाहिर है।

ईसाई, बौद्ध, हिन्दू, और यहूदी सभी का विकास देखते हुए किस विकास की राह पर है ये लोग और अभी तक कौन सा मुकाम हासिल कर पाए हैं।

बागे वफ़ा के लेखक और समाज़ के तमाम मुसलमानों की अमेरिका विरोधी मानसिकता सिर्फ़ इस लिए बनाई गयी है कुछ बीमार मनोदशा के लोगों द्वारा क्यों कि अमेरिका आंतकवाद के विरूद्ध है और वह आंतकवादी मुसलमान है!

आम आदमी को उनके अधिकार ब्रिटिश हूकूमत में ही मिलना शुरू हुए………….नही तो ये हिन्दू राजा और खानाबदोश मुसलमान शासको ने मुल्क का बेड़ा गर्क कर दिया था

एक कहानी, लेखक की अपनी भावना, तमाम ऐसी भी किताबे है जिसमे हिन्दुओं को काटने-मारने की बात लिखी तो क्या हम उसे सर्वमान्य ्मान ले! खैर ये सब फ़िजूल की बाते है, दुर्दान्त मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इस देश को लूटा और यहां के लोगों की अस्मिता को, विदेशी लुटेरे…आप की सहानभूति उनसे हो सकती है क्योंकि वो मुसलमान थे किन्तु आप के बुजर्गों पर जिनकी रंगों में भारत का रक्त था, जबरदस्ती थोपा गया ये धर्म …………. या स्वेच्छा से……….अंग्रेजो ने व्यापार तो अवश्य किया पर एक अच्छी व्यवस्था लागू की एक शासन प्रणाली उन्होनें न तो घर उजाड़े, न आग लगाई और न ही इज्जत लूटी………..और न ही मन्दिर तोड़े, जजिया जैसा कर भी नही लगाया उन्होंने।
और हिन्दू – मुस्लिम राजाओ के अत्याचार छुटकारा दिलाया, इन राजाओं ने हमेशा हमारी गरीब जनता का शोषण किया चाहे वह हिन्दू हो या फ़िर मुसलमान………..

बात किताब में क्या हैं और वह किस परिप्रेक्ष्य में लिखी गयी इस बात से मतलब नही कुछ अच्छी और कर्ण प्रिय बाते निकाल ली गयी, अब उसे हिन्दू ने कहा-गाया या मुसलमान………इससे कोई फ़र्क नहीनही तो अल्लामा इकबाल की नज़्मों हम इतना पसन्द करते है खासतौर से सारे जहां से अच्छा……….यदि हन इसकी कुछ लाइनों पर गौर करे तो ये सारे भारत की कौमों का प्रतिनिधत्व नही करती, सिर्फ़ मुसलमानों का करती है…..

ऐ आबे रौदे गंगा ! वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा

काल और परिस्थित के अनुसार मायने बदलते है, हमें चीज़ों को अपने मुताबुक ढ़ालना चाहिए, न कि लेखक की व्यक्तिगत भावना पर।

ऐसे तो फ़िर हमें राष्ट्रगान के प्रति भी सोचना चाहिए क्योंकि उसके गाने और लिखने का पर्याय भी कुछ और था, यदि कोई अच्छी बात किसी बुरे मकसद या प्रतिकूल हालातों में कही गयी हो तो क्या उसे अपनाना नही चाहिए।

यदि ईश गीत है फ़िर वह अल्लाह के लिए गाया गया हो या भगवान के लिए, बागे वफ़ा के ब्लागर के लेख में बन्देमातरम को काली की स्तुति का गीत बताया गया है, भाई मां हमारी हों या आप की मां तो मां होती है।

गलत बात की कुतर्कों व इतिहास के तर्कों के साथ   समन्वय  स्थापित कर पैरोकारी करना निहायत निन्दनीय है।

आ ज इस्लाम जैसा पाक शब्द  आंतकवाद जैसे नापाप शब्द के प्रीफ़िक्स के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है आखिर क्यों। क्योंकि उन खानाबदोश कबीलों ने रोज़ी-रोटी और धन के लिए जिन तलवारों से भारत के रज्जुल्लों को हराया, या उनसे सन्धि कर ली । जिन राजाओं की सेना सिर्फ़ उनकी नौकर होती थी,  न कि राज्य या राष्ट्र भावना से ओत-प्रोत, उन्हे हराकर भारतीयों को हारी हुई कौम मान लेना कहां तक उचित है । जबकि भारत की कौंमें चाहे वह हिन्दू हो मुसलमान हो या बौद्ध, वे गांधी केआंदोलन के अतिरिक्त कभी भी किसी आंदोलन या क्रान्ति का हिस्सा नही बनी, यहां तक की १८५७ ईस्वी की कथित क्रान्ति में भी। अभी शशि शेखर जी ने अपने एक संपादकीय में भारत के सभी हिन्दुओं को आर एस एस और भा ज पा की जागीर बताते हुए “हारी हुई कौमें” करार कर दिया इसका मुझे अफ़सोस है और उनके लेखन व मनोदशा पर भी।

हमारे गांव के सभी मुसलमान काका, चाचा और दादा किसी भी आंतकवादी संगठन को नही जानते और न ही वह रेडियों तेहरान, बगदाद या कराची सुनते है। और न तो वह इस्लाम के प्रसार-प्रचार या कट्टरता की बात करते है, वे सिर्फ़ अपने खेतों की, मवेशियों की, गांव की और अपने सुख व दुख की बात करते है। वो गंगा स्नान भी जाते है और धार्मिक आयोजनों में भी शरीक होते है, और ऐसा हिन्दू भी करते है, हम तज़ियाओं में शामिल होते है, उनके हर उतसव में भी और उनके पूज्यनीय मज़ारों पर भी फ़ूल चढ़ाते है। यकीन मानिए ये सब करते वक्त हम दोनों कौमों के किसी भी व्यक्ति को ये एहसास नही होता कि हम अलाहिदा कौमों से है और यही सत्य भी है। हमारे पूर्वज एक, भाषा एक, घर एक, गांव एक और एक धरती से है,  जो हमारा पोषण करती है।

इसलिए मेरा अनुरोध है इन दोनों कौमों के कथित व स्वंभू लम्बरदारों से कि कृपया जहरीली बातें न करे और गन्दे इतिहास की भी नही जो हमारा नही था । सिर्फ़ चन्द अय्यास राजाओं और नवाबों और धार्मिक बेवकूफ़ों का था वह अतीत जिसके बावत वो अपनी इबारते लिखवाते थे और कुछ बेवकूफ़ इतिहासकार उसी इतिहास के कुछ पन्नों की नकल कर अपनी व्यथित और बीमार मनोदशा के तमाम तर्क देकर समाज़ में स्थापित होना चाहते है।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन

भारतवर्ष

उत्तर प्रदेश के जिला खेरी मुख्यालय लखीमपुर से मितौली-मैंगलगंज जाने वाली सड़क पर एक जगह है जहां शीशम की डालियों पर गुलहड़ के फ़ूल लटकते हुए दिखाई देते है। ये विस्मयकारी और रोमांचित कर देने वाला दृश्य हर उस यात्री को चौकां देता है जो इस सड़क से गुजरता है। इस अदभुत बात में एक विशिष्ठता है कि ये पुष्प पूरे वर्ष भर पल्लवित होते है इस शीशम के वृक्ष पर।

जब मुझे पहली बार इस घटना के बावत जानकारी मिली तो मैं अवाक रह गया और अपने जीव विज्ञानी मस्तिष्क को पल भर में चकरघिन्नी कटा डाली…जीव जगत के अदभुत रहस्यों के संसार में किन्तु अफ़सोस मुझे वहां ऐसा कोई प्रमाण नही मिला ।

किसी और वनस्पति विज्ञानी से पूछने की हिम्मत नही हुई, और कही न कही यह भी चोर था मन में कि यदि प्रकृति का यह खेल सच्चा हुआ तो कोई और न ले उड़े मेरी इस खोज़ को!

तमाम बेवकूफ़ाना खयालों के साथ मन में रसगुल्ले फ़ोड़ता हुआ मैं उस जगह पर पहुंचा, एकबारगी तो मैं बेसुध सा हो गया उस नज़ारे को देखकर, अरे ये क्या, ये तो वास्तव में शीशम पर गुलहड़ के फ़ूल!

निकट पहुंचते ही मेरे मन की हिलोरे शान्त हो गयी, वज़ह यह कि इस पेड़ के निकट न तो कोई गुलहड़ का वृक्ष था और न ही कोई वैज्ञानिक विधि का इस्तेमाल हुआ था। यहां एक साधू कुटी बनाए हुए रहता है, उससे मुलाकात की और पूंछा माज़रा क्या है तो उसने भी टाल दिया।

दरअसल शीशम की टहनियों पर रोज़ कोई इन पुष्पों से सज़ाता है, जो बिल्कुल प्राकृतिक नज़र आते है, मानों इसी वृक्ष पर ये पुष्प खिले हों।

मैं मायूस होकर लौटा किन्तु एक सवाल आज़ भी मेरे मन में है, कि आखिर कौन है वह व्यक्ति और कैसी है उसकी यह शपथ की पूरे वर्ष वह चुन-चुन कर लाता है गुलहड़ के पुष्प इस शीशम के वृक्ष में टांगने के लिए। प्रकृति के विरूद्ध इस दुस्साहस में कही उसे ऐसा तो नही लग रहा है, कि कही एक दिन वास्तव में इस शीशम में गुलहड़ के पुष्प खिलने लगेंगे।

आज भी आप जब राजा लोने सिंह मार्ग पर कस्ता से मितौली की तरफ़ गुजरेंगे तो एक जगह सड़क के किनारे ये वृक्ष आप को मिलेगा जिसमें गुलहड़ के फ़ूल पल्लवित हो रहे हैं।

मुझे यहां विलियम वर्ड्सवर्थ की एक कविता की वो लाइन याद आ गयी ———

a treasure that God giveth……………

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

किसी रोज़ एक और भयानक हादसे पर चेतेगा प्रशासन-

मौत का सबब बन सकती है स्टेट हाइवे नम्बर २१ और मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड नम्बर ८६ सी की क्रासिंग।

एक सड़क जिसके नाम से गाफ़िल है खीरी के लोग- SH-21

लखीमपुर से मैंगलगंज तक जाने वाली सड़क ज्यों ही शहर से बाहर गुजरती है,  तो उसे एक लक्ष्मण रेखा पार करनी पड़ती है। जहां कुछ वर्ष पूर्व एक एडवोकेट की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी है। ये लक्ष्मण रेखा है SH-21, जिसे हमारे लोग आसाम रोड, और एल आर पी के नाम से जानते हैं जो कि नार्थ लखीमपुर में स्थित है, पूर्वोत्तर राज्यों में यह सड़क चाइना वार के उपरान्त बनवाई गयी थी। शायद कभी किसी राह चलते मुसाफ़िर ने लखीमपुर नाम सुनते ही इसे आसाम वाले लखीमपुर का स्मरण करते हुए आसम रोड कह दिया, या फ़िर किसी ट्रक वाले ने, जो आज सरकारी कागजो से लेकर आम जनमानस में परचलित शब्द हो गया, अज्ञानता बस बोला गया झूठ दोहराते-दोहराते कथित सच में तब्दील हो गया।

जबकि कथित आसाम रोड (SH-21)  NH-91 से निकलकर गंगा पार करती हुई, बिलग्राम, हरदोई, सीतापुर होते हुए लखीमपुर आती है, यहां से यह गोला होते हुए पीलीभीत में SH-26( SH-26, NH-74 में मिल जाती है) में मिलकर समाप्त हो जाती है।

ये SH-21 को जब शहर के बाहर बाईपास (SH-21)  को    MDR-86C क्रास करती हुई,  मोहम्मदी तक जाती है। यही सड़क जब मितौली कस्बे के आगे MDR-14C में मिलती है जो मैंगलगंज को जोड़ती है|

SH-21 को MDR-86C जब शहर के बाहर क्रास करती है तो वह क्रास इतना खतरनाक हो जाता है कि किसी भी वक्त कोई बड़ी दुर्घटना घट सकती है। वजह है यहां पर बढ़ता रिहाइसी इलाका और इस क्रास यानी चौराहे पर कोई रम्बल स्ट्रिप भी नही है और डिवाइडर भी नही, चूकिं स्टेट हाइवे को एक पतली सड़क पार करती,  आबादी से निकल कर इस लिए इन सड़कों पर गुजरने वाले तेज़ गति के वाहन रफ़्तार धीमी करना मुनासिब नही समझते, यहां किसी तरह की चेतावनी वाला बोर्ड है और न ही लाइट जिससे गुजरने वाले वाहन चालक को यह मालूम हो सके कि वह एक चौराहे को पार कर रहा है।

इसी चौराहे से थोड़ा हटकर राजा  बिजली पासी का स्मारक, यदि यह स्मारक इस चौराहे पर स्थित होता तो वाहनों की बे-रोक-टोक आवाजाही पर रुकावट हो सकती थी।

ऐसे में एक बेहतर विकल्प ये हो सकता है कि व्यवस्था को इस चौराहे पर १८५७ के क्रान्तिकारी राजा लोने सिंह का स्मारक बनवा दे,  राजा लोने सिंह के नाम से इस पूरे जनपद में कोई स्मारक नही है।

एक और सड़क जिसके नाम से गाफ़िल है खीरी के लोग।- MDR-86C यानी राजा लोने सिंह रोड

मेरी इस राय को एक और तथ्य मजबूती देता है, कि जो सड़क SH-21 को पार करती हुई चौराहे को अस्तित्व में लाती है उस सड़क का नाम “राजा लोने सिंह मार्ग” (MDR-86c) है, कभी लखीमपुर रेलवे क्रासिंग पर जहां से इस सड़क का उदगम है, वहां एक शिलालेख हुआ करता था जिस पर राजा लोने सिंह रोड लिखा था। अब न तो वहां कोई शिला बची और न ही लेख। लोग भी भूलते गये इस सड़क के नाम को साथ ही उस क्रान्तिवीर के महान कृत्यों को। वैसे अक्सर इस पुरानी शिला पर विज्ञापन ही चिपके रहते थे सो लेख से शहरवासी महरूम ही रहे, लिहाज़ा इस सड़क का नाम चलताऊ भाषा के अनुसार प्रचलन में आ गया लखीमपुर-मैंगलगंज रोड, या बेहजम रोड (लखीमपुर व मैंगलगंज के मध्य का गांव) इन चलताऊ शब्दों की उत्पत्ति मोटर क्लीनर और कंडक्टरों के मुख से हुई…………मितौली,,,,,,मैंगलगंज….बेहजम……..सवारी……..आदि

चौराहे पर इस महान एतिहासिक नायक की प्रतिमा लग जाने से दो लाभ होगे! एक तो हमारी पीढ़ी जो भूलती जा रही है अपने इस सुन्दर अतीत को, उसे मौका मिलेंगा कुछ जानने का, दूसरा इस बहाने इस सड़क से गुजरने वाले लोगों को अपनी व दूसरों की मौत से दो चार नही होना पड़ेगा, वो भी कुछ ठहरेंगे और शीष भले न नवाये इस स्मारक के समक्ष, किन्तु जिज्ञासा बस इस महान नाम से  परिचित तो ही जायेंगे।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारत

१६ दिसम्बर २००९, खीरी (उत्तर प्रदेश)जनपद का यह वीभत्स हादसा, राजा लोने सिंह मार्ग पर घटित हुआ।  जो तकरीबन ५५ किलोमीटर लम्बा है, लखीमपुर से मैंगलगंज तक। जिसमें पांच यात्रियों की मृत्यु हो गई। जबकि लगभग सभी सवार घायल हुए है जो जिला अस्पताल में भर्ती है, मितौली कस्बे के आगे कठना नदी पर स्थित पुल से पहले ये हादसा हुआ जहां  साइकल सवार को कुचल कर ड्राइबर चलती बस को छोड़ कर कूद गया और बस कठना नदी की कटरी मे पलटती हुई नीचे जा गिरी। ये बात औरंगाबाद निवासी दिलदार और मैनहन निवासी नेतराम मिश्र  ने बताई ये दोनों व्यक्ति  जिला अस्पताल में भर्ती है।

मृतकों में तीन व्यक्ति मितौली थाना क्षेत्र के है, जिसमें अरविन्द मिश्र ग्राम ओदारा, अब्दुल मज़ीद व अर्विन्द सिंह मितौली कस्बे के निवासी थे। जोगेश्वर नाम का व्यक्ति सीतापुर का बताया जा रहा है। जबकि एक व्यक्ति की शिनाख्त अभी नही हो पायी है।

घायलों व स्थानीय प्रत्यक्षदर्शीयों के मुताबिक मृतकों की सख्या अधिक बताई जा रही है।
दोषी परिस्थित है जिसे हमने बनाया है बदहाल सड़के, खटारा बसे, ट्रैफ़िक नियमों का उल्लघन! और इस सड़क के फ़ुटपाथ का गायब हो जाना। लखीमपुर से मैगलगंज(माइकल गंज)  तक के सकरे मार्ग पर यातायात का दबाव, जहां ट्रक, बैलगाड़ी, बस और ट्रैक्टरों की बढ़ती तादाद के बावजूद शासन व जनप्रतिनिधियों ने इस तरफ़ कोई ध्यान नही दिया। कभी सड़कों पर मौजूद गढ़्ढ़ों पर  फ़टी बुशर्ट पर प्योंदें लगाने जैसा फ़र्ज़ी काम हुआ तो कभी सड़क की चौड़ाई बढ़ाने के लिए नाप-जोख। जानकार बताते हैं कि इन गढ़्ढों की मरम्मत में भी पेंच होता है, जहां सड़क ज्यादा खराब होती है उसे नही ठीक किया जाता है, और जहां स्थित थोड़ी ठीक होती है उसमें पच्चीकारी कर दी जाती है ताकि निरीक्षण के दौरान वे उन अधिक टूटी सड़क को दिखा कर बता सके कि ये रोड इतनी खराब थी जिसे उन्होंने ठीक किया हैं। इसके अलावा भारत का नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी को इन अफ़सरों और ठेकेदारों पर डालकर आराम फ़रमाता है, हम किसी भी सरकारी काम में हस्तक्षेप करने से गुरेज करते है लेकिन क्यों?

उत्तर प्रदेश की बढ़ती जनसख्या और यातायात के संसाधन, जिनके लिए अब सड़के और शहर सकरे और छोटे होते जा रहे है किन्तु हमारे मुल्क का अनियोजित विकास समस्याओं को और बढ़ाता जा रहा बज़ाए उन्हे नियोजित करने के।

यहां मैं ईश्वरवादी हो गया!  क्योंकि मैं जानता हूं कि ये मरने वाले आम इन्सान थे, और घटना भी आम, हमारे मुल्क में सड़क दुर्घटना को सामान्य घटना ही माना जाता है, और इनमे मरने वालों के प्रति न तो मन्दिर-मस्ज़िदों मे प्रार्थना होती है और न ही राष्ट्रों के राष्ट्रा्ध्यक्ष शोक सभाओं का आयोजन करते है, क्योंकि ये मौते न तो  २६/११ की तरह किसी आंतकवादी घटना का परिणाम होती है, और न ही साम्प्रदायिक दंगों में। यहां न तो किसी का बल्ला चल रहा होता है, और न ही किसी टी०वी० शो में कम्पटीशन, न ही  कोई नेता या फ़िल्मी स्टार भी पांच सितारा अस्पताल में  होता है ! इनके लिए दुआए सिर्फ़ इनके घर वाले करेंगे न कि………………..!!!

इस लिए मेरे लिए ये जरूरी हो जाता है कि मै ईश्वरवादी हो जाऊ, अपने उन लोगों के लिए, जिनके रंगों में उसी धरती का अन्न, व पानी खून बन कर दौड़ रहा है जो मेरी रंगों में।

मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि उन्हे शान्ति प्रदत्त करे, वे मनुष्य जिन्होंने अपने-अपने परमात्मा को भी जुदा-जुदा कर लिया और दोज़ख व जन्नत को भी, उन सभी के लिए,  उन सभी के ईशों से, मैं कुछ पल हिन्दू तो कुछ पल मुसलमान बनकर, ताकि वह उन सब पर रहम करे, और अपनी शरण में ले। वह सुन्दर रचना करने वाला, अपनी इन रचनाओं को जो घायल और तकलीफ़ में है, उन्हे स्वस्थ्य करे।

मेरी ये प्रार्थना वह जरूर सुनेगा, क्योंकि मैं………………..धर्म जीना सिखाता है और ईश्वर जीवन के रास्ते पर चलने का साहस देता है। एक पिता की तरह।

कृष्ण कुमार मिश्र

मैनहन-२६२७२७

भारतवर्ष

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